ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
हैपीनेस सूचकांक का देश भूटान
01-Sep-2019 07:06 PM 153     

असम में जहाँ मेरा जन्म हुआ वहाँ से भूटान की सीमा सिर्फ 40 किलोमीटर दूर पड़ती है और बारिश के मौसम के बाद जब कभी आसमान बिलकुल साफ होता था तब हिमालय पर बसे भूटान के लहरदार पहाड़ मेरे कमरे की खिड़की से स्पष्ट दिखाई देते थे। लेकिन भूटान की राजधानी थिम्फू तक जाने का अवसर उम्र के 56 बसंत पार करने के बाद ही आया। भूटान के सौंदर्य से अभिभूत होकर अब सोचता हूँ पहले क्यों नहीं कभी भूटान गया।
थिम्फू जाने के लिए उत्तरी बंगाल के जयगाँव कस्बे से होकर जाना पड़ता है। एक तरफ जयगाँव पड़ता है और दूसरी ओर भूटान का शहर फूंट्शिलिंग। फूंट्शिलिंग को भूटान की आर्थिक राजधानी कहा जाता है। लगभग दस हजार की आबादी वाला फूंट्शिलिंग भूटान का व्यापारिक केंद्र है और कोई भी भारतीय नागरिक यहाँ बिना किसी प्रवेश-पत्र के आ-जा सकता है। लेकिन यहाँ से पाँच किलोमीटर दूर एक नाका पड़ता है जहाँ आपके प्रवेश-पत्र की जाँच की जाती है। प्रवेश-पत्र देने के लिए फूंट्शिलिंग में ही सरकार का आप्रवासन कार्यालय है जहाँ से आपको अपना वोटर पहचान-पत्र दिखाकर प्रवेश-पत्र निकलवाना पड़ता है जिसमें एक से दो घंटे का समय लग जाता है।
किसी भी भीड़भाड़ वाले गंदे से भारतीय कस्बे जैसा ही जयगाँव है। यहाँ मैं पैंतीस साल पहले आया था। तब इतनी दमघोंटू भीड़ नहीं थी। भारत और भूटान के बीच कोई दीवार भी नहीं थी। लेकिन अब देखा कि दीवार बन गई है और आने व जाने के लिए अलग-अलग फाटक बने हुए हैं। हालाँकि फाटक पर आपको कोई कुछ पूछता नहीं है। हमने ध्यान दिया कि जयगाँव में फाटक के इस पार क्या लोग अधिक धूम्रपान कर रहे हैं? लेकिन ऐसी कोई बात हमें दिखाई नहीं दी। भूटान दुनिया का पहला देश है जिसने अपने यहाँ धूम्रपान को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया है। आप सार्वजनिक स्थान पर खड़े होकर धूम्रपान करते हुए पकड़े गए तो आप पर 15-20 हजार रुपयों का जुर्माना लग सकता है। हमारे ड्राइवर ने सप्ताह भर का सिगरेटों का स्टॉक खरीद कर रख लिया, जो कि कानूनन गलत था। आगे हमने होटल की परिचारिकाओं को सिगरेट के लिए लार टपकाते देखा और हमारा ड्राइवर उनसे दोस्ती करने के लिए सिगरेटों का भरपूर उपयोग कर लेता था।
भूटान की राजभाषा जोंखा है और भूटानी लोग अपने देश को डØक लुप कहते हैं। अंग्रेजी पत्राचार में देश के नाम का उल्लेख भूटान के रूप में ही किया जाता है। कहते हैं भूटान शब्द की उत्पत्ति भोट और अंत शब्दों से हुई होगी। तिब्बत को भोट देश कहा जाता है और इस तरह भूटान भोट देश यानी तिब्बत का अंतिम छोर हो गया। पश्चिमी देशों में जिस चीज के कारण भूटान का नाम काफी प्रचारित हुआ है वह है यहाँ की सकल राष्ट्रीय खुशी की संकल्पना। इसे सकल राष्ट्रीय आय या ग्रोस नेशनल इनकम के बरक्श स्थापित किया गया है। भूटान का कहना है कि सिर्फ आय बढ़ने से किसी व्यक्ति या किसी देश की खुशी नहीं बढ़ती। यदि आप अपने पर्यावरण को बरबाद करके अपनी आमदनी बढ़ाते हैं, या आपके पारिवारिक व सामाजिक संबंधों में तनाव है तो सिर्फ आर्थिक कारणों से इससे आपकी खुशी नहीं बढ़ सकती। हम शाम पाँच बजे फूंट्शिलिंग से चले और रात करीब आठ बजे रास्ते किनारे बने एक ढाबे में हमने चाय पी। देखा कि ढाबे की महिला मैनेजर आराम से बैठी मित्रों के साथ गपशप कर रही है। होटल की सभी कर्मचारी लड़कियाँ थीं और वे भी आपस में चुहलबाजी में व्यस्त थीं। दिनभर के काम की थकान उनके चेहरों पर नहीं झलक रही थी। ग्रोस नेशनल हैपीनेस के बारे में जो कुछ पढ़ा था उसे हम भूटान की जमीनी हकीकत के साथ मिलाने का प्रयास कर रहे थे।
यह साल का अंतिम दिन था और सवा लाख आबादी वाले राजधानी शहर थिम्फू की साफसुथरी सड़कें युवाओं की भीड़ से ठसाठस भरी थीं। तापमान एक डिग्री तक गिर चुका था और थोड़ी देर बाद दो-तीन डिग्री और नीचे गिरने वाला था। रेस्तरांओं में लड़कियाँ लड़कों के समान ही शराब का सेवन कर रही थीं। भूटान में धूम्रपान निषिद्ध है लेकिन शराब का काफी प्रचलन है। इसी तरह खाने में बीफ, पोर्क या याक नामक जानवर के मांस के सेवन को एक आम बात समझा जाता है। 1 जनवरी को थिम्फू में हमारे लिए चाय ला रही एक युवती ऊँची-नीची जमीन पर उलझकर गिरते-गिरते बची। उसने हमारी ओर देखकर हँसकर अंग्रेजी में कहा - रात का हैंगओवर अभी उतरा नहीं है।
हम जिस होटल में ठहरे थे वह शहर के बाहर खेतों के बीचोंबीच बनाया गया था। खेत जुताई के बाद बुआई के लिए तैयार थे। कहीं-कहीं बर्फ जमी हुई थी। यहाँ भूटान के प्रसिद्ध लाल चावल की खेती होती है। यह चावल मुख्यतः अमेरिका और यूरोप निर्यात किया जाता है। भूटान की अर्थनीति में खेती का हिस्सा अब घटकर 33 फीसदी रह गया है। हालाँकि दावा किया जाता है कि सारी की सारी खेती ऑरगेनिक खेती है, जिसमें रसायनों का उपयोग नहीं किया जाता। इसलिए साधारण अनाज की तुलना में कई गुना अधिक दाम मिल जाता है। पर्यटन को जानबूझकर काफी महँगा रखा गया है खासकर भारतीयों को छोड़कर अन्य विदेशियों के लिए। एक गैर-भारतीय पर्यटक को एक दिन में लगभग पंद्रह-सोलह हजार रुपए खर्च करने पड़ जाते हैं। इसी तरह भूटान की राष्ट्रीय पोशाक पहनने मात्र के दो सौ और तीन सौ रुपए पड़ जाते हैं। पुरुष जो भूटानी पोशाक पहनते हैं वह एक लंबा चोगा जैसा है जिसे ऊँचा उठाकर कमर पर एक कपड़े के बेल्ट से बाँध लेते हैं। इस चोगे को घो कहते हैं और बेल्ट को केरा। महिलाओं की पोशाक को किरा कहते हैं। सरकारी कार्यालयों, धार्मिक स्थलों, स्कूलों और सार्वजनिक कार्यक्रमों में शामिल होने वाले भूटानी नागरिकों को राष्ट्रीय पोशाक पहनना जरूरी है। जो लोग मूल रूप से भूटानी नहीं हैं, जैसे नेपाली भाषी भूटानी नागरिक, उन्हें भी राष्ट्रीय पोशाक पहनना जरूरी है।
भूटान का जो हिस्सा उत्तरी बंगाल और असम से सटता है उसे दक्षिणी भूटान कहते हैं। इन इलाकों में नेपाली भाषियों की अच्छी खासी तादाद है। नेपालियों को यहाँ नेपाली न कहकर शारचोक्पा कहते हैं, यानी दक्षिण के रहने वाले। इसके विपरीत थिम्फू जैसे ऊँचे स्थानों पर रहने वाले लोग अपने आपको लोतशाम्पा कहते हैं यानी पूरब में रहने वाले लोग। नेपाली भाषा का भूटान में अच्छा खासा प्रभाव है। एक अनुमान के मुताबिक लगभग 40 प्रतिशत लोग नेपाली भाषा बोलते हैं। और यह भूटानियों की आशंका का एक कारण भी है। पहले दक्षिण के जिलों में नेपाली भाषा भी पाठ्यक्रम में शामिल हुआ करती थी। लेकिन बाद में इसे हटा दिया गया। शिक्षा का माध्यम अब भी अंग्रेजी ही है और अंग्रेजी के अतिरिक्त स्कूलों में सिर्फ जोंखा भाषा सिखाई जाती है। स्कूली शिक्षा और प्राथमिक स्वास्थ्य दोनों ही सरकार की जिम्मेवारी हैं।
भूटान में जाकर एक अपूर्व शांति की अनुभूति होती है। वैसे ऐतिहासिक रूप से भी भूटान को एक शांत देश होने का सौभाग्य प्राप्त है। वर्तमान राजवंश की शुरुआत ज्यादा पुरानी नहीं है। 1907 में उग्येन वांग्चुक ने आपस में लड़ रही छोटी-छोटी रियासतों को एकजुट कर भूटान में एक नए युग की शुरुआत की। राजघरानों के सभी वयस्कों, रसूखदार परिवारों, राजकीय अधिकारियों की उपस्थिति में 1907 में उग्येन वांग्चुक को सर्वसम्मत राजा मान लिया गया। व्यापक सर्वसम्मति को देखते हुए ब्रिटिश भारत के शासकों ने भी उग्येन वांग्चुक को तुरंत मान्यता दे दी। इसके बाद से भूटान के राजकार्य में जो स्थायित्व आया वह आज तक जारी है। हालांकि ब्रिटिश का राजनीतिक एजेंट थिम्फू में रहता था और विदेश मंत्रालय के कामों में ब्रिटिश सरकार की राय लेना भूटान के राजा के लिए अनिवार्य था, फिर भी भूटान के तिब्बत के साथ पारंपरिक रिश्तों में ब्रिटिश भारत की सरकार ने कभी अड़ंगा नहीं लगाया। इस तरह हालांकि भूटान की स्थिति अन्य भारतीय रियासतों की तरह ही थी, लेकिन हकीकत में भूटान हमेशा एक स्वतंत्र स्वयंभू देश बनकर रहा। स्वाधीन भारत की सरकार ने इसी स्थिति को आगे जारी रखा और बाद में चलकर हुए नए समझौते में भूटान पर विदेश संबंधों के मामले में थोपी गई सीमाओं को भी खत्म कर दिया गया।
भूटान के इतिहास में एक मजेदार वाकया आता है। नामग्याल नामक राजा ने सत्रहवीं सदी में भूटान को एकीकृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। नामग्याल की उपस्थिति भूटान के लिए इतनी महत्वपूर्ण थी कि उसकी मृत्यु हो जाने के बाद भी अधिकारियों ने 54 सालों तक इस तथ्य को छुपाकर रखा। 1651 में नामग्याल की मृत्यु हो गई थी, लेकिन 1705 में ही आमलोगों को इस बात का पता चल पाया। राजशाही में राजा का नाम कितना महत्वपूर्ण होता है यह इसी तथ्य से जाना जा सकता है।
भूटान की आबादी महज आठ लाख है। इस बात के लिए भूटान की दाद देनी पड़ेगी कि भारत जैसे विशाल देश के पड़ोस में बसा होने के बावजूद इसने अपनी विशिष्ट पहचान, परंपरा और संस्कृति को बचाकर रखा है। भारतीय बिना वीसा और पासपोर्ट के भूटान में प्रवेश कर सकते हैं लेकिन वे वहाँ सिर्फ सात दिन तक रह सकते हैं। अनवरत आर्थिक अवसरों की तलाश में रहने वाले भारतीयों के लिए ऐसे प्रतिबंधों को जायज ही कहा जाएगा। भारत सरकार ने भी कभी इस बात के लिए भूटान पर दबाव नहीं डाला कि वह भारतीय नागरिकों को वर्क परमिट दे या उन्हें अधिक समय वहाँ रहने की इजाजत दे। थिम्फू में घुसते ही आपको विशिष्ट भूटानी संस्कृति पग-पग पर दिखाई देने लगती है। सरकारी आदेश के अनुसार भवनों को विशिष्ट भूटानी शैली में बनाना अनिवार्य है। इसमें घर के ऊपर टिन का ढलाऊ छाजन लगाना जरूरी है जिससे भवनों की छतें विशिष्ट रूप ले लेती हैं और हर भवन डिब्बा जैसा नहीं लगता। पारंपरिक भूटानी भवनों में कील और लोहे की छड़ों का इस्तेमाल नहीं होता था। लकड़ी का भरपूर उपयोग होता था और लकड़ी को पारंपरिक रंगों से सजाया जाता था। इस भवन निर्माण शैली का काफी हिस्सा आज भी प्रयोग होता है। अमरीका के टेक्सास विश्वविद्यालय ने अपने परिसर में भवन निर्माण के लिए इसी भूटानी शैली को अपना लिया है जो उस परिसर को अनोखी विशिष्टता प्रदान करती है। भूटान के लिए भी यह गौरव का विषय है। इसी तरह अधिकतर पुरुष और महिलाएँ भूटानी पोशाक घो और किरा शौक से पहनते हैं। तीखी मिर्च का भूटानी व्यंजन एमा दास्सी और केवा दास्सी लगभग हर रेस्तरां में मिलता है।
भूटान में अब भी तीन पीढ़ियाँ एक ही परिवार में रहती हैं। अधिकतर भूटानी समुदायों में वंश परंपरा लड़की के नाम से चलती है। पुराने रिवाज के अनुसार बड़ी लड़की को ही परिवार की संपत्ति का अधिकतर हिस्सा मिलता है, हालांकि आजकल लोग अपनी सारी संतानों के बीच संपत्ति को बराबर-बराबर बाँटने लगे हैं। पूर्वोत्तर भारत के मेघालय में भी वंश परंपरा लड़की के नाम से चलती है लेकिन वहाँ संपत्ति का ज्यादा हिस्सा सबसे छोटी लड़की को मिलता है। ज्यादातर विवाह प्रेम विवाह होते हैं। एक दुकान में दुकान की महिला मालिक बकाया पैसे जब मेरे लड़के को देने लगी तो मैंने मजाक में कहा कि इसे मत दो, यह मेरा लड़का सारे पैसे उड़ा देता है। इस पर महिला बोली कि मेरे भी जवान लड़का है और मैं उसे अधिक पैसे खर्च करने के लिए देती हूँ। आखिर वह लड़का है, उसके कई तरह के खर्चे हैं, उसे लड़की भी पटाना है। मुझ पर भी तो किसी ने खर्च किया था। खर्च नहीं करोगे तो लड़की का पटना मुश्किल है।
दुनियाभर में छोटे-छोटे समुदायों की संस्कृतियों का बचे रहना बहुत महत्वपूर्ण है। भारत के पूर्वोत्तर राज्यों की अशांति का मूल कारण ही यही है। उत्तरी भारत और पड़ोसी बांग्लादेश की भारी भीड़ के सामने यहाँ के समुदायों की अपनी विशिष्टता को बचाए रखने की जद्दोजहद को समझने की जरूरत है। जबकि पूर्वोत्तर भारत से बाहर का कोई बिरला ही इस बात को समझ पाता है। शायद इसका कारण यह हो कि पूर्वोत्तर से बाहर के किसी अन्य राज्य में अब तक इस तरह का संकट नहीं आया है कि वहाँ के स्थानीय लोगों के बाहर की विशाल आबादी में खो जाने का खतरा पैदा हुआ हो। पूर्वोत्तर भारत की इस पृष्ठभूमि से वाकिफ हमारे जैसे किसी व्यक्ति के लिए यह सचमुच सुकून देने वाला था कि चलो कोई तो है जिसने भारी चुनौतियों के बीच भी अपने आपको जैसा वह है वैसा बनाए रखा है।
आबादी के दबाव के सामने अपनी विशिष्टता बचाए रखना जितना ही चुनौतीपूर्ण है आर्थिक दबावों के सामने अपनी नदियों, जंगलों और हवा को बचाए रखना। भूटान इस कसौटी पर खरा उतरता है। यहाँ का 72 फीसदी हिस्सा अभी भी जंगलों से भरा हुआ है। हालाँकि बहुसंख्यक आबादी मांसाहारी है लेकिन नदियों में मछली पकड़ना प्रतिबंधित है। पारो घाटी जाने वाली हमारी सड़क के साथ-साथ पारो छू नदी बहती है। इस नदी के पानी की शुद्धता का वर्णन कैसे किया जाए। यदि आपके हाथ से कोई सूई भी नदी में गिर जाए तो आप आसानी से उसे पानी में से उठा सकते हैं। इतना साफ है इसका पानी। पारो स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय में तेंदुए का सिर और उसकी छाल सजाए हुए थे। उसे देखकर याद आया कि असम में भूटान के बिलकुल पास बसे हमारे नाना के घर पर भी ऐसा ही एक भूसा भराया हुआ तेंदुआ हुआ करता था। भूटान के राजकीय अधिकारियों का नाना के यहाँ काफी आना-जाना था। उन्हीं में से किसी ने वह तेंदुआ उपहार के रूप में दिया होगा। लेकिन नाना के यहाँ वह बेशकीमती तोहफा एक कबाड़ भरे कमरे में तिरस्कृत पड़ा रहता था। और उसका उपयोग कभी-कभार हम बच्चों को डराने के लिए किया जाता था। कहते हैं उपहार उसी को देना चाहिए जो उसके योग्य हो।
वापस आते समय हम मुख्यपथ पर बने उसी ढाबे में रुके जहाँ जाते समय रुके थे। हमें देखना था कि हैपीनेस सूचकांक वही है या जाते समय हमने जो देखा था वह सिर्फ हमारे पूर्वाग्रह का नतीजा था। हमने देखा कि मैनेजर उस रात की तरह आज भी अपने मित्रों के साथ गपशप में मुब्तिला थी। परिचारिकाएँ उसी तरह चुहलबाजी कर रही थीं। उनके चेहरों पर काम की थकान नहीं थी। दिन होने की वजह से ढाबे में काफी भीड़ थी। लोग बीफ, पोर्क और चिकन के साथ भात खा रहे थे। गूगल ने आज शाम बर्फबारी होने का अनुमान बताया है। लेकिन लोगों के चेहरों पर इसके कारण शिकन तक नहीं है।

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