ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
ललित मोहन जोशी
ललित मोहन जोशी
लंदन स्थित फ़िल्म इतिहासकार, वृत्त फ़िल्मकार और लेखक। दो द¶ाकों (1988-2008) तक बीबीसी हिंदी सेवा में प्रसारक पत्रकार रहे। बीबीसी टेलीविज़न में बॉलीवुड और बस्ट (1993) के प्रोडूसर और कई वृत्त चित्रों का सह निर्माण। "गार्डियन' और "इंडिया टुडे' में लेखन। वर्ष 2000 में स्थापित साउथ ए¶िायन सिनेमा फाउंडे¶ान (एस.ए. सी.एफ़.) के संस्थापक निदे¶ाक और "साउथ ए¶िायन सिनेमा' पत्र के संस्थापक संपादक। बॉलीवुड पॉपुलर इंडियन सिनेमा, अ डोर टू अदूर, निरंजन पाल अ फॉरगॉटन लीजेंड के लेखक और सहलेखक। भारतीय और ब्रिातानी पत्रिकाओं में कवितायें प्रका¶िात। तीन नाटकों - गोपिये हरुली (कुमाऊनी), अंतरद्वन्द (हिंदी) और योर्स कृष्णा मेनन (अंग्रेजी) का लेखन और निर्दे¶ान। तीन वृत्त चित्रों "बियॉन्ड पार्टी¶ान', "जय हो गुलज़ार' और "निरंजन पाल- अ फॉरगॉटन लीजेंड' का निर्दे¶ान।

याद रहेंगे प्राण शर्मा
प्राण शर्मा के कृतित्व को अगर समग्रता में देखें तो उसका मूल इंसानी रिश्तों की पड़ताल है। उनकी कृतियों से ज़ाहिर होता है कि इस पड़ताल की शुरूआत वह अपने आप से करते हैं।ख़ामोशियाँ भी चाहिए कुछ तो कभी कभी सीखा हूँ एक बात ये भी ज़िन्दगी से मैं
भारतीय सिनेमा के एक सौ चार वर्ष
भारतीय सिनेमा की बात की शुरूआत इस सूचना से करना चाहूंगा कि लंदन फिल्म संस्कृति के केंद्र, ब्रिटिश फिल्म इंस्टिट्यूट (बीएफआई) सॉउथबैंक में, इस वर्ष भारत की हिंदी फिल्मों पर विशेष कार्यक्रम आयोजित किये जा रहे हैं। इस अवसर पर साउथ एशियन सिनेमा फ़ाउन्ड
फ़िल्मों के विस्मृत इतिहास पुरुष  निरंजन पाल
ब्रिटिश और भारतीय फ़िल्मों के निर्माण में साझेदारी की नींव रखने वाले फ़िल्म-कहानीकार, पटकथा लेखक, फ़िल्म निर्माता और साहित्यकार निरंजन पाल ऐसे पहले भारतीय थे, जिन्होंने अपनी कृतियों द्वारा भारतीय और योरोपीय संस्कृतियों का सुन्दर समन्वय किया। वे इन दो
बदली दिया याद घुटन
बदली आज बदली हैमेरी यादों से बचना काई हैउन राहों की फिसलन से बचना पगडण्डी सूखेगी तभीजब लम्बी धूप होगीइन्तज़ार करना।अहसासन छूनान पास आना न देखना मुझे उन आँखों सेबस यूँ ह

लंदन में बरसात के दिन
अक्सर कहा जाता है कि लंदन या ब्रिाटेन में वर्षाऋतु नहीं होती केवल बरसात का मौसम होता है। यहाँ जब लोग घर से निकलते हैं तो झोले में घर की चाबी, खाने का डिब्बा, ट्रेन में पढ़ने के लिए एक किताब के अलावा, एक छाता ज़रूर रखते हैं। न जाने किस मोड़ पर इन्द्रद
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