ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
लातूर का सूखा और "रैंगो' का कछुआ
01-May-2016 12:00 AM 1802     

बालीवुड की एनिमे¶ान फिल्म "रैंगों' का एक सीन है जिसमें मेयर (कछुआ) के दफ्तर में जब रैंगो (गिरगिट) मिलने जाता है तो मेयर उसे एक बोतल से पानी निकाल कर देता है। सीन में पानी को पे¶ा करने का तरीका बिल्कुल ऐसा है जैसे कोई महँगा पेय गरीब आदमी के सामने प्रस्तुत किया गया हो। आगे बढ़ने से पहले बता दूं कि फिल्म "रैंगो' एक ऐसे ¶ाहर की दास्तान है जहां पानी की भीषण कमी है, जहां हर बुधवार को ¶ाहर का मेयर यहां जनता के लिए पानी का नल खोलता है। फिल्म में नल खोलने का सीन आपको होठों पर ज़बान फेरने के लिए मजबूर कर देता है, वहीं जब नल में से पानी की जगह कीचड़ गिरता है तो आपको एक पल को अपना हलक़ सूखता सा महसूस होता है। पूरी फिल्म एक मेयर के अपनी जनता को धोखा देने और पानी पर कब्जा कर उनकी ज़मीन हथियाने की कहानी कहती है। रैंगो को 2011 में बेस्ट एनिमे¶ान फिल्म का ऑस्कर पुरस्कार मिला था।
इस साल कंप्यूटर ग्राफिक्स से लेकर मेकअप, एडिटिंग के साथ छह ऑस्कर अवॉर्ड बटोरने वाली "मैड मैक्स फ्यूरी रोड'  भी पानी पर सत्ता की सियासत को बयान करती है। हाल ही में रिलीज़ हुई "जंगल बुक' में भी पानी की कमी पड़ने और जल संधि लागू होने की बात बताई गई जिसके तहत जंगल के सारे जानवर एक साथ एक पोखर से पानी पीते हैं और कोई भी मांसाहारी किसी ¶ााकाहारी का ¶िाकार नहीं करता है।
सिनेमा की यह काल्पनिक दुनिया दरअसल उस यथार्थ का बयान कर रही है जो हमारे इर्द-गिर्द रचा जा रहा है। हर साल गर्मी पड़ना और फिर पानी पर चर्चा का गर्म होना अब एक खबर का हिस्सा-सा लगने लगा है। ऐसा नहीं है कि पानी को लेकर खून बहाना आज की खबर है। बीते कई सालों से इस तरह के संघर्ष की कहानी बार-बार सुनने को मिल रही है। लेकिन इतने सालों में अगर कुछ बदला है तो वह है सिर्फ सत्ता और पानी को लेकर चिंता करने का तरीका। हालांकि गौर से देखे तो यह चिंता साल भर मौज कर परीक्षा से एक रात पहले होने वाली चिंता जैसी है ।
हाल ही में लातूर में पानी के विकट संकट को देखते हुए जल दूत नाम की ट्रेन चलाई गई जो पांच लाख लीटर पानी लेकर रोज़ वहां पहुंचेगी। यह ट्रेन रोज़ाना कई किलोमीटर का सफर तय करेगी और इस पानी को पहुंचाने में लगभग तीन करोड़ का खर्चा होगा। इसी तरह की एक ट्रेन चौदह साल पहले राजस्थान के अजमेर से भीलवाड़ा इलाके में भी चलाई गई थी जो रोज़ाना पच्चीस लाख लीटर पानी लेकर जाती थी। वैसे तो पानी ले जाने वाली ट्रेन का इतिहास तीस साल पुराना है। 1980 से 1986 तक जब सौराष्ट्र में भीषण अकाल पड़ा था तो उस दौरान वहां का सबसे बड़े ¶ाहरों में से एक राजकोट पूरी तरह से प्यासा हो गया था। उसकी प्यास को बुझाने के लिए 1986 में पहली पानी की ट्रेन चलाई गई थी। इन तीस सालों में कई सत्ताएं बदली, कई तकनीकें बदली हम आधुनिकता की चरम पर पहुंचे और पानी का दोहन भी बदस्तूर जारी रहा। संचयन को भूल कर हमने हर रुाोत का दोहन किया।
मसलन मध्यप्रदे¶ा की राजधानी भोपाल जिसे तालों का ¶ाहर कहा जाता है जहां ले देकर दो तालाब बचे हैं, बाकी तालाबों पर कब भूमाफियाओं का कब्जा हो गया किसी को भनक तक नहीं लगी। भोपाल के तीन सीढ़ीदार तालाब जो उस दौर की इंजीनियरिंग का बेहतरीन नमूना थे। भोपाल के पहाड़ पर बने ईदगाह से जब बारि¶ा का पानी बहता था तो उस एक पतनाले के ज़रिये ताजुल मस्जिद के पीछे बने मोतिया तालाब में इकट्ठा कर लिया जाता था। जब यह तालाब लबालब हो जाता था तब एक ठेले वाली सड़क से होता हुआ पानी थोड़ी से ढलान पर बने सैय्यद सिद्दीक हुसैन के तालाब को भरता था और इस तालाब के भर जाने के बाद पानी मुं¶ाी हुसैन खां के तालाब में पहुंचता था और वहां से बेनज़ीर कॉलेज के पीछे बने पतनाले में छोड़ दिया जाता था। आज इन तालाबों का बस ज़िक्र भर बचा है क्योंकि अब इन तालाबों में पानी नहीं मकान नज़र आते हैं।
भारत में तालाब बनाने की परंपरा बहुत पुरानी है। सन् अट्ठारह सौ में मैसूर राज के दीवान ने वहां 39 हजार तालाब बनाए थे। दे¶ा की राजधानी दिल्ली में ही लगभग 350 तालाब हुआ करते थे। लेकिन आज आप ढूंढने जाएंगे तो एक तालाब भी बमु¶िकल मिल पाएगा। इंदौर के पास देवास में बीते तीस सालों में छोटे बड़े सभी तालाब भूमाफियाओं के कब्ज़े में हैं और बताया जाता है कि 1990 से यहां रोज़ाना ट्रेन पानी लेकर आती है।
वर्तमान सरकार ने पानी पर चिंता ज़ाहिर करने में एक कदम आगे बढ़ते हुए गंगा मंत्रालय बना दिया। लेकिन मंत्रालय ने बीते एक साल में ज़बानी खर्च करने के अलावा कुछ भी नहीं किया। गंगा के "उद्धार' के लिए बना मंत्रालय बीते सालों में गंगा को ठीक करने के लिए बैठक पर बैठक कर रहा है, योजनाओं पर योजनाएं बना रहा है। उत्तराखंड से लेकर गंगा बेल्ट पर डैम बनने का सिलसिला भी उतनी ही तेजी से काम कर रहा है। 250 करोड़ की लागत से गंगोत्री से महज़ 50 किमी की दूरी पर बने लाहोरी नागपाल डेम को बंद तो कर दिया गया लेकिन जिन पहाड़ों में छेद किये गये थे और टनल बनाई गई थी उन्हे भरने के बजाए उस पर गेट लगा दिया गया है। इससे सरकार की नियत साफ होती है। वहीं यमुना के किनारे श्रीश्री रवि¶ांकर के कार्यक्रम को करवाने की अनुमति देने वाले मृत होती यमुना को लेकर कितनी चिंतित है साफ नज़र आता है। जिम्मेदार संस्थाओं की दूरंदे¶ाी का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि सूखती गंगा और मरती यमुना को छोड़कर वह सरस्वती को ढूंढने में पैसा और वक्त ज़ाया करने में लगी हुई है। इसके लिए सरस्वती के रूट पर हर पचास किमी की दूरी पर कुंए खुदवाए जा रहे हैं जिससे ज़मीन के नीचे के पानी की जांच करके यह पता किया जा सके कि सरस्वती का अस्तित्व है या नहीं।
दरअसल पानी को लेकर जो सियासत रची जा रही है वह सिर्फ ध्यान भटकाने का काम कर रही है। जो नदी मर रही है उसे जीवित करने के बजाए जो नहीं है उसकी खोज चल रही है। नए तालाब बनाने के बजाए जो अस्तित्व में थे उसकी ज़मीन को ही बेचा जा रहा है। लातूर तक तीन करोड़ रुपए खर्च कर ट्रेन चलायी जा रही है लेकिन समुद्र के पानी को पीने के लायक बनाने की तकनीक पर कोई वि¶ोष ध्यान नहीं दिया जा रहा है। नहीं तो दुनिया भर के चक्कर लगाने वाले दे¶ा के नेता एक चक्कर इज़राइल का भी लगा आते और उनसे समुद्र के पानी को साफ करने की तकनीक ही ले लेते ।
लेकिन दरअसल पानी का बाज़ार आज सबसे बड़ा बाज़ार है। चाहे फिर वह बोतल में बंद पीने का पानी हो या सॉफ्ट डिं्रक, जो प्यास बुझाने का दावा करते हैं । दरअसल रैंगो का मेयर कछुआ हो या मैड मैक्स फ्यूरी का राजा जो चिरयौवन के लिए मां के दूध से नहाता है, यह किरदार उन सत्ताधारियों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो कछुए की तरह लंबी उम्र की कामना करते हैं और जनता के सामने खुद को भगवान की तरह पे¶ा करके सारे रुाोतों पर कब्जा जमाए बैठे हैं।
यह करोड़ो का खर्चा करके ट्रेन चला कर अपनी चिंता ज़ाहिर करते रहेंगे लेकिन सुधार के बारे में विचार नहीं करेंगे। हो सकता है लातूर जाने वाली ट्रेन किसी फिल्म निर्माता को ज़रूर कोई कहानी का आयडिया दे दे और इस बार काकोरी कांड की तरह पानी की ट्रेन लूटने पर कोई फिल्म बन जाए।

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