ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
लागा चुनरी में दाग़
01-Jun-2016 12:00 AM 2336     

पण्डित कुमार गंधर्व की आवाज़ आ रही है। वे कबीर के करघे की लय पर गा रहे हैं-
दास कबीर जतन सों ओढ़ी, ज्यों की त्यों धर दीन्हीं चदरिया।
झीनी-झीनी बीनी चदरिया।
अपने कर्म की लय पर रचा गया कबीर का यह गीत उनके पूरे जीवन पर छाया हुआ है। कबीर की कहानी एक चुनरी को जतन से ओढ़ने की ही कहानी तो है- कहीं दाग़ न लग जाये।
यह मिट्टी में मिली-सी देह; जिसे देवताओं, मुनियों और मनुष्यों ने ओढ़-ओढ़कर मैला किया है। कबीर इस देह की चदरिया को जतन से ओढ़ते हैं और उस अनन्त की चादर में लिपट जाना चाहते हैं; जिसमें सब देहें समायी हुई हैं।
सारा जगत उसी एक चादर में लिपटा हुआ है। यह जो रोज़ बीत जाने वाला आठ पहर का हमारा जीवन है; यही तो उस चादर की लम्बाई है। इसे क्षिति-जल-पावक-गगन-समीर रोज़ अपने-अपने रंगों से रँगते रहते हैं। इस पर सूरज और चाँद-सितारे रोज़ अपने छापे लगाते हैं। जिसने ऐसी चुनरी दी है; वही कबीर का पिया है-
चुनरिया हमारी पिया ने सँवारी,
कोई पहिरै पिय की प्यारी।
आठ हाथ की बनी चुनरिया,
पँच रंग पटिया पारी।
चाँद-सुरुज जामें आँचल लागे,
जगमग जोति उजारी।
बिनु ताने यह बनी चुनरिया,
दास कबीर बलिहारी।
हम एक अनन्त चुनरी का छोटा-सा टुकड़ा ओढ़े हुए हैं। चीर इसी छोटे-से टुकड़े का खींचा जाता है। मान-अपमान, प्रेम-घृणा, राग-द्वेष के दाग़ इसी छोटे-से टुकड़े पर लगते हैं। जीवन यूँ ही बीतता रहता है। हर बार फिर एक नया चीर मिल जाता है और वही बार-बार खींचा जाता है। यह छोटी-सी रामनामी रोज़ तार-तार होकर बिखर जाती है। पर राम निरञ्जन की न्यारी चुनरी तो अनन्त है। चीर बढ़ता ही जाता है; उसका अन्त ही नहीं आता। सिर्फ़ एक पुकार चाहिए। श्री हरि अपने करघे का सारा कपड़ा लेकर दौड़े चले आते हैं।
हमारा जीवन एक बहुत बड़ी साड़ी सेल की इस तरह है, जहाँ डिफेक्टड साड़ियाँ ही ज्यादा हैं। कपड़े के व्यापारी उन्हें सस्ते दाम पर बेच देते हैं। दाग़दार चुनरी कोई अपने पास क्यों रखना चाहेगा। जो देवियाँ इन साड़ियों को खरीद लाती हैं; वे उनके बारे में नहीं जानतीं। दुकानदार ही जानता है। ग्राहक की बुद्धि तो ठगी रह जाती है।
कबीर उस बेदाग़ चुनरी की सबको खबर देते हैं जो अनन्त के ¶ाो रूम में प्रदर्¶िात है। जिसे ढाई अक्षर के सैंयाँ ने सृजन-पालन-संहार के ताने-बाने पर बुना है-
अकारो विष्णुरुद्दिष्ट, उकारस्तु महे¶वर:।
मकारस्तु स्मृतो ब्राहृा, प्रणवस्तु त्रयात्मक:।।
हमारे बच्चे न जाने क्या पढ़ते हैं। उन्हें वेतन भोगी गुरु मिले हुए हैं। सद्गुरु अब कहाँ मिलते है, जो ढाई अक्षर का पाठ पढ़ा सकें। वेतन भोगी गुरु अ-अनार का, उ-उल्लू का और म-मछली का ही पढ़ा पाते हैं। इससे आगे उनकी गति नहीं। वे ढाई अक्षर की गहराई में विद्यार्थी को उतार ही नहीं पाते।
अनार को कभी गैर से देखिए। एक-एक दाना कितनी झिल्लियों के बीच एक-दूसरे से जुड़ा रहता है। हर दाना अपने में रसपूर्ण और सुन्दर सृष्टि है। समूचे अनार के भीतर सत्य, ¶िाव और सुन्दर विराजमान है। जगत के पालन हार विष्णु ऐसे ही हैं। वे अकार में निवास करते हुए सारे जगत को अनार के दोनों की तरह जोड़े रहते हैं।
उनका एक नाम नारायण भी है। वे काल की ¶ौया बनाकर पानी की धरती पर ¶ायन करते हैं और वहीं उनके करीब मकार में ब्राहृा रहते हैं, रचना के लिए तड़पते हैं। वे जलमग्न विष्णु में मछली की तरह सिहरते हैं और एक दुनिया रचकर उन्हें सौंप देते हैं।
सृष्टि पूरे "म' से भी कहाँ उत्पन्न होती है। हमारी दुनिया की रचना के लिए आधा "म' ही काफी है। बाकी बचे हुए आधे "म' से और कई संसार रचे जा रहे होंगे, विष्णु को सौंपे जा रहे होंगे।
सृजन और पालन के प्रतिनिधि इस डेढ़ अक्षर के बीच एक उकार भी है, जिसमें काल के प्रतिनिधि ¶िाव निवास करते हैं। जिनके एक तरफ जीवन की रचना हो रही है और दूसरी तरफ उसे पाला-पोसा जा रहा है। ¶िाव काल रूप हरि हैं, जिनमें सारी रचनाएँ समाती चली जाती हैं। वे प्रेमपूर्वक सबको अंगीकार करते हैं।
यही है कबीर का वह ढाई अक्षर, जिससे वे प्रेम करना सिखाते हैं। सचमुच इस ढाई अक्षर को पढ़कर ही पण्डित हुआ जा सकता है। इस ढाई अक्षर के सैयाँ के सामने सचमुच सारी पोथियाँ बेकार हैं। यह ओंकार उस सन्नाटे का छन्द है जो प्रत्येक प्रलय के बाद ¶ोष रह जाता है और इसी छन्द से हर बार नयी सृष्टि का अर्थ खुलता है।
हर बार सत्य केवल इतना ही रहता है कि हम न जाने कहाँ से आते हैं, कुछ देर यहाँ रहते हैं, फिर न जाने कहाँ चले जाते हैं। यहाँ कोई ओढ़ना-बिछौना हमारा नहीं है। वह तो किसी व्याकुल प्रेमी ने हमें छोटा-सा जीवन काट लेने के लिए ही दिया है। उसे दाग़दार बनाने का किसी को क्या हक़ है। हम उसे जतन से ओढ़ें और सराय के मालिक को बेदाग लौटा दें।
हमारे जैसे पथिक लगातार आते ही जा रहे हैं। उन्हें बेदाग़ ओढ़न-बिछावन मिलनी ही चाहिए। कबीर इसी जिम्मेदारी के अहसास से भरकर अपनी चादर को मैली किए बिना ज्यों की त्यों उसी ढाई अक्षर के सैंयाँ को लौटा देना चाहते हैं। तभी तो वे उससे नैना लड़ा पाते हैं। जो छाप-तिलक सब छीन लेता है। इतना कोरा कर देता है कि उसकी दी हुई बेदाग चुनरी फिर उसी की ओर खिंचती चली जाती है।
ये जगत मकड़ी के जाले की तरह है जो अपने आपसे धागा छोड़ता है। खुद अपने आपको बुनता है और फिर खुद अपने से अपने को अपने में खींच लेता है।

दो

नैन का दुख बैन जानें, बैन का दुख श्रवना।
पिण्ड का दुख प्रान जानें, प्रान का दुख मरना।
आस का दुख प्यास जानें, प्यास का दुख नीर।
भगति का दुख राम जानें, कहै दास कबीर।

महात्मा कबीर कहते हैं कि हमारी आँखों का दुख हमारी ही वाणी जानती है क्योंकि हम जो देखते हैं, उसे ही तो कहते हैं। हमारे बोलने का दुख हमारे कान ही तो सुनते हैं। हमारे ¶ारीर का दुख हमारे ही प्राण जानते हैं और प्राणों का दुख, सिवा हमारी मौत के और कौन जानता होगा। हमारी आस का दुख हमारी ही प्यास जानती है और प्यास का दुख तो पानी ही जानता है। कबीरदास को भरोसा है कि तब फिर हमारी भक्ति का दुख राम ज़रूर जानते होंगे।
कबीर समाज सुधारक नहीं थे। उनका वि¶वास व्यक्ति के उद्धार में सदा रहा। एक बार व्यक्ति सहज समाधि को पा ले, तो सामाजिक जीवन अपने-आप सहज हो जाएगा। दरअसल सच्ची सहज समाधि में वे ही लोग लीन माने जायेंगे जो असीम को प्रेम की सीमा में बाँध पाते हैं। जो अरूप को रूप में रंग देते हैं और अनबोले को बोलने के आनन्द से भर देते हैं। कबीर की दृष्टि में सच्चा सुमिरन वही है, जहाँ अपनी याद आ जाये। जिन्हें अपनी याद आ जाती है, वे ही सबको जगह दे पाते हैं।
सबको अपने दिल में जगह देने के लिए हमारी भाषा ही हमारे काम आती है। वह तो सबके अन्त:करण की परिचारिका है क्योंकि सिर्फ़ आदमी ही है जिसने अपनी ¶ाब्द ध्वनियों में सार्थकता और व्यंजकता पाई है। ¶ाब्द हमारी आत्मा का हिस्सा हैं। वे हमारे दिल की गहराइयों से बुलबुले की तरह ऊपर आते हैं और हमारी ही साँस उन्हें वाणी के रूप में प्रकट कर देती है। सबके ¶ाब्द हमे¶ाा सच्चे होते हैं। हम ही अपनी-अपनी भावनाओं के अनुरूप ¶ाब्दों को मनमाने अर्थ पहनाते हैं। इसी कारण संसार में द्वन्द्व पैदा होते हैं।
कबीर की दृष्टि में साँचा ¶ाब्द तो स्वभाव से निर्गुण है। वह किसी भी अर्थ का स्पर्¶ा ही नहीं करता। सगुण संसार ही अनेक प्रकार के अर्थों की छबियों से भरा रहता है। कबीर कहते हैं कि सदा निर्गुण का ध्यान करते हुए सगुण संसार की सेवा करते रहना चाहिए। यही निष्काम कर्मयोग है जिसे सार्वजनिक जीवन में महात्मा गांधी ने सिद्ध कर दिखाया। आज राजनीति, धर्म और बाज़ार की भाषा में जो उग्रता और कुतर्कपूर्ण झगड़ालूपन दिखाई देता है उसका यही कारण है कि अपने भावरूप ¶ाब्दों के रस को पहचाने बिना बहुत कुछ बोला जा रहा है। तभी तो हम आहत भावनाओं से खूब भरे हैं। पर जो हमारे भीतर अनाहत ¶ाब्द है, उसे नहीं पहचान पा रहे हैं।
जिस तरह अभिव्यक्ति के लिए ¶ाब्द और अर्थ की संपृक्ति चाहिए, वैसे ही भक्ति के लिए सच्ची श्रद्धा और वि¶वास चाहिए। यह हमारी समस्या है कि हम कहना कुछ चाहते हैं पर दूसरों को कुछ और ही सुनायी पड़ता है। ¶ाायद यह इसलिए होता है कि हम अपने ¶ाब्दों को अपने दिल के तराजू पर तौलकर नहीं बोलते। जो ¶ाोर हमें चारों तरफ से घेरे हुए है, वह बुद्धि की चालाकियों का ¶ाोर है। उसमें अन्तरगति से उत्पन्न होने वाला वह साँचा ¶ाब्द ही नहीं है, जो सद्विवेक से भर सके। ¶ाब्द तो हमारे बाहर और भीतर की दुनिया के बीच दूत का काम करते हैं। वे दुभाषिए हैं क्योंकि हम जो कहना चाहते हैं, वे उसी को प्रकट करने में हमारी सहायता करते हें।
सन्त कबीर हमें सिखाते हैं कि हमारी भाषा कोई वस्तु नहीं है। वह एक निरन्तर अनुभवगम्य प्रक्रिया है, जो हमारे मन, वचन और कर्म से अभिन्न है। जैसे गाने वाले के साथ संगीत अभिन्न है। इतने सारे ¶ाब्दों से भरी दुनिया में, जो हमारी ही साँसों के झूले पर झूलते हुए आते हैं, हमें बार-बार उन्हें सच साबित करना पड़ता है। कबीर दरअसल उसे साँचा ¶ाब्द कहते हैं जो जय-पराजय की कोटियों से बाहर है। वे जिस सनातन तत्व को राम कहकर आवाज़ देते हैं, वह राम उनकी अनुभूति है, भौतिक उपस्थिति नहीं। जहाँ राम के प्रति सच्ची प्रेमानुभूति है, कबीर की दृष्टि में वहाँ काँकर-पाथर के मंदिर नहीं होते और  जहाँ ख़ुदा को रूह से महसूस करने का अहसास है, वहाँ मस्ज़िदें नहीं होतीं।

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