ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
क्या खोया क्या पाया पतझड़ की पगलाई धूप
CATEGORY : कविता 01-Mar-2017 11:39 PM 913
क्या खोया क्या पाया  पतझड़ की पगलाई धूप

क्या खोया क्या पाया

अनगिन तारों में इक तारा ढूँढ रहा है,
क्या खोया क्या पाया
बैठा सोच रहा मन।
 
छोटा-सा सुख मुट्ठी से गिर
फिसल गया,
खुशियों का दल हाथ हिलाता निकल गया,
भागे गिरते-पड़ते पीछे,
मगर हाथ में
आया जो सपना वो फिर से
बदल गया,
सबसे अच्छा चुनने में उलझा ये जीवन।
क्या खोया क्या पाया
बैठा सोच रहा मन।
 
सबकी देखा-देखी में
मैं भी इतराया,
मिला नहीं कुछ मगर हृदय
क्षण को भरमाया,
आसमान को छू लेने के पागलपन में
अपनी मिट्टी का टुकड़ा
बेकार गँवाया,
सीधा सादा जीवन रस्ते कांकर बोये
फूलों के मधुरस में भी
पाया कड़वापन।
 
क्या खोया क्या पाया
बैठा सोच रहा मन।



पतझड़ की पगलाई धूप

भोर भई जो आँखें मींचे
तकिये को सिरहाने खींचे
लोट गई इक बार पीठ पर
ले लम्बी जम्हाई धूप
अनमन सी अलसाई धूप।
 
पौंछ रात का बिखरा काजल
सूरज नीचे दबता आँचल
खींच अलग हो दबे पैर से
देह-चुनर सरकाई धूप
यौवन ज्यों सुलगाई धूप।
 
फुदक-फुदक खेले आँगन भर
ख़ाने-ख़ाने एक पाँव पर
पत्ती-पत्ती आँख मिचौली
बचपन सी बौराई धूप
खिल-खिल खिलती आई धूप।

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