ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
क्वान्ग्तोंग विश्वविद्यालय में हिंदी विद्यार्थी सुश्री कौ ईन से आत्माराम शर्मा की बातचीत
01-Jan-2019 01:41 PM 780     

हिंदी की शुरुआत कैसे हुई?
बचपन से ही दूसरी भाषा सीखने में मेरी बड़ी रुचि है, किंतु चीन की अधिकांश स्कूली शिक्षा में केवल अंग्रेज़ी पढ़ाई जाती है। चीन में हिंदी भाषा को जानने वाले कम हैं और हिंदी बोलने वाले तो और ज़्यादा कम। चीनी लोग यूरोप तथा अमेरिका के बारे में बहुत बातचीत करते हैं, परन्तु भारत के बारे में कम। ऐसी स्थिति के कारण खोजने के लिए मैंने भारत के बारे में जानकारी ढूंढ़ी और फिर मुझे पता चला कि भारतीय संस्कृति, कला, धर्म एवं दर्शन बहुत ही समृद्ध है। हिंदी की देवनागरी लिपि सुंदर लगती है। एक देश को जानने का सबसे अच्छा तरीक़ा यह है कि उसी देश की मातृभाषा सीखकर स्थानीय लेखन, साहित्य पढ़ा जाये। इसीलिए मैंने हिंदी भाषा सीखना शुरू किया और भारतीय संस्कृति के रहस्य को खोजने आरंभ किया।
हिंदी सीखने पर माँ-पिता की क्या प्रतिक्रिया थी?
जब मैंने हिंदी सीखने का फ़ैसला किया, यद्यपि मेरे माता-पिता इस भाषा के बारे में कुछ भी नहीं जानते थे, परन्तु उन्होंने मेरे निर्णय का समर्थन किया। वे हमेशा मेरी इच्छा को सम्मान देते हैं और उन्हें भी यह अच्छा लगा कि मैं भारतीय संस्कृति के बारे में सीखकर चीन और भारत के आदान-प्रदान में कुछ योगदान दे सकती हूँ।
हिंदी सीखने के दौरान कैसी दिक्कतें आईं?
हिंदी भारोपीय भाषा परिवार में है इसलिए चीनी से बहुत अलग है। व्याकरण में कुछ परेशानियाँ मेरे सामने आयीं। हिंदी शब्दों में पुÏल्लग एवं स्त्रीलिंग का वर्गीकरण है, शब्दों का लिंग याद करना मुश्किल था। सबसे पहले मैंने पाठ्यपुस्तक में लिखे हुए एक-एक शब्दों के लिंग को याद किया और धीरे-धीरे मुझे कुछ नियम मिले, जैसे "ई" से अंत होने वाली अधिकांश संज्ञाएँ स्त्रीलिंग की हैं, "आ" से अंत होने वाली अधिकतर संज्ञाएँ पुÏल्लग हैं। इसके अलावा वाक्य की संरचना को समझना तथा उचित संरचना का प्रयोग करना भी चुनौती थी। उनका सामना करने के लिए मैंने हफ़्तावार एक पाठ पढ़कर दूसरों को सुनाया और सीखने की इस लगातार प्रक्रिया ने हिंदी के प्रति मेरी भावना को और मजबूत किया।
चीन में रहने वाले भारतीयों से हिंदी सीखने में मदद मिली?
विवेक मणि त्रिपाठी जी मेरे हिंदी अध्यापकों में से एक हैं। उन्हें चीनी भी आती है इसलिए हिंदी पढ़ाने में उनकी अतिश्रेष्ठ क्षमता है। वे हमेशा विद्यार्थियों की मदद करते हैं और प्रत्येक विद्यार्थी की क्षमता के अनुसार शिक्षा देते हैं। मेरी भारतीय दर्शन के बारे में रुचि है तो वे हमेशा मेरे प्रश्नों के उत्तर देकर दार्शनिक शब्दों, मतों एवं शास्त्रों के संबंध में बताते हैं। वे हमारे गृहकार्य में व्याकरण के एक-एक दोष को सही करते हैं, जिसके कारण हिंदी बोलने तथा लिखने में मेरी ग़लती धीरे-धीरे कम हो जा रही हैं।
कुछ समय पहले किरण वालिया जी भी मेरी अध्यापिका बनकर आईं। उन्होंने हिंदी भाषा का इतिहास एवं साहित्य विस्तार से विद्यार्थियों को बताया और वे हमेशा निबंध लिखने में हमें प्रोत्साहित करती हैं। उन्हें कक्षा में छोटी मौखिक या लिखित परिक्षा लेना पसंद है, जिसके द्वारा मैं हिंदी की संरचना में बेहतर प्रदर्शन करके ज्यादा आत्मविश्वासी हो गयी।
चीन में और कौन-सी भारतीय भाषाएँ बोली जाती हैं?
हिंदी के अलावा संस्कृत, पालि, तमिल, बांग्ला, गुजराती, पंजाबी, सिंहली आदि भाषाएँ भी पढ़ाई जाती हैं।
विश्वविद्यालय के इंडोलॉजी विभाग के बारे में बतायें।
मैं क्वान्ग्तोंग विदेशी भाषा विश्वविद्यालय में साढ़े तीन साल से हिंदी सीख रही हूँ। कहा जा सकता है कि यहाँ का हिंदी विभाग चीन में हिंदी भाषा के क्षेत्र में दूसरी सबसे अच्छी शिक्षा देने वाला संस्थान है। हमारे हिंदी विभाग की शुरुआत वर्ष 2012 में हुई थी। हिंदी भाषा का शुद्ध उच्चारण, व्याकरण, पाठ, साहित्य और हिंदी-वार्तालाप आदि विशेष रूप से पढ़ाए जाते हैं, साथ ही भारत का इतिहास, पुराण, धर्म, दर्शन, शास्त्र, सामाजिक व्यवस्था आदि विषयों का भी हमें सामान्य परिचय दिया जाता है। हमारा हिंदी विभाग हिंदी पढ़ाने तथा भारतीय संस्कृति का विस्तार रूप सें प्रसार करने दोनों पर ध्यान देता है।
योग्य शिक्षक किसी भी संस्थान के मुख्य आधार होते हैं। हमारे हिंदी विभाग में दो भारतीय और चार चीनी शिक्षक हैं। लगभग सभी चीनी शिक्षक चीन के प्रसिद्ध पेकिंग विश्वविद्यालय से हिंदी भाषा एवं साहित्य में उच्च शिक्षा ग्रहण किये हैं तथा साथ ही भारत में भी हिंदी भाषा का विधिवत अध्ययन किये हुए हैं। वे न केवल हिंदी पढ़ाते हैं, बल्कि भारतीय संस्कृति, दर्शन, साहित्य, राजनीति आदि विषयों का भी हमसे परिचय कराते हैं जिससे हमें भारत को समझने में ज्यादा आसानी होती है। वे हिंदी भाषा के विकास और भारत-चीन के आदान-प्रदान के लिए हर प्रकार का प्रयास करते हैं, जिनके योगदान से हमारा विश्वविद्यालय चीन-भारत के बीच सांस्कृतिक संपर्क का सेतु बन गया है।
हिंदी विभाग से स्नातक हुए कुछ विद्यार्थी भारत जाकर हिंदी एवं संस्कृत विषय में एम.ए. कर रहे हैं, कुछ विद्यार्थियों को भारत में नौकरी मिली है और वे स्थायी-अस्थायी रूप से वहां कार्यरत है। हमारे विभाग की अधिकतर लड़कियों ने भारत की यात्रा की, जबकि चीन में कुछ लोग भारत की सुरक्षा समस्या पर चिंता करके भारत में पर्यटन नहीं करना चाहते हैं। इस दृष्टि से हमारे विश्वविद्यालय का हिंदी विभाग भारत और चीन के बीच सांस्कृतिक-आर्थिक आदान-प्रदान में बड़ा योगदान दे रहा है जो भारत-चीन के मैत्री सम्बन्ध में प्रगाढ़ता के लिए आवश्यक एवं सुखद दोनों है।
चीन में रहने वाले भारतीय सार्वजनिक तौर पर अपनी मातृभाषाएँ बोलते हैं?
चीन में रहने वाले भारतीय सार्वजनिक स्थल पर अपने साथियों (दूसरे भारतीयों) से अपनी मातृभाषाओं में बातचीत करते हैं, जबकि वे हमेशा चीनी लोगों से या तो अंग्रेज़ी बोलते हैं या तो चीनी बोलते हैं, क्योंकि चीन में हिंदी या अन्य भारतीय भाषाएँ आने वाले लोग बहुत कम हैं।
चीन में भारतीयों के काम-धंधे क्या हैं?
2017 के सर्वेक्षण के अनुसार चीन में रहने वाले भारतीयों की संख्या लगभग 15 हजार है। इनमें से कुछ भारतीय रेस्तराँ खोलकर काम करते हैं, कुछ व्यापार करते हैं, कुछ चीनी कम्पनी में काम करते हैं, कुछ चीन के विश्वविद्यालयों में साहित्य, औषध-विज्ञान आदि सीख रहे हैं, कुछ भारत-चीन के आदान-प्रदान के लिए चीन में अध्ययन करते हैं।
भारतीय अतीतजीवी और आधुनिक एक साथ हो सकते हैं, क्या कहेंगी?
मैंने भारत में कई जगहों की यात्रा की और ऐसा महसूस किया कि उच्च शिक्षा पाने वाले भारतीय अन्य भारतीयों से अलग हैं। जिन्हें उच्च शिक्षा मिली, उनका दृष्टिकोण व्यापक होता है और विचार स्वतंत्र होते हैं। ऐसे व्यक्ति के विचार आधुनिक होते हैं, जबकि अन्य भारतीय विचारों से कुछ स्तर पर अतीतजीवी होते हैं। अक्सर ऐसे लोगों के विचार में महिलाओं को घर में रहकर बच्चों का पालन करना चाहिए, निम्न जातियां अच्छे बर्ताव के लायक नहीं, क्योंकि पराधीन रहने का उनका स्वभाव हो गया है। ऐसे लोग दूसरों के मुँह से सुनकर बाकी दुनिया के बारे में राय कायम करते हैं।
दूसरी ओर शहरों में रहने वाले भारतीयों की जीवनशैली आधुनिक होती हैं। देश के विकास के लिए आधुनिकीकरण का बड़ा महत्व है। भारत अभी औद्योगिक समाज की और विकसित हो रहा है और इस प्रक्रिया में बड़ी संभावना दिखायी देती है।
भारतीय और पश्चिमी दुनिया के लोगों के बरताव में फर्क महसूस करती हैं?
चीनी लोग अपने देश में रहने वाले भारतीयों के साथ बहुत ही विनयपूर्ण व्यवहार करते हैं। ठीक वैसे ही जैसे अमेरिका, रूस, जापान तथा तीसरी दुनिया के देशों के नागरिकों के साथ होने वाले बरताव की तरह। "दूर से आने वाले दोस्तों का हमेशा स्वागत" चीन में एक प्रसिद्ध कहावत है इसीलिए दूसरों देशों से आने वाले लोगों का समान रूप से आदर तथा स्वागत किया जाता है।
अक्सर भारतीयों पर आरोप लगाया जाता है कि वे जिस देश में रहते हैं, वहाँ के निवासियों और उसके सामाजिक ताने-बाने में वे बहुत कम घुलते-मिलते हैं।
यों यह बात प्रायः हरेक विदेशी पर लागू होती है। भारत अथवा दूसरे देशों में रहने वाले चीनी भी ऐसा ही करते हैं। फिर भी मुझे लगता है कि चीन में रहने वाले कुछ भारतीय सार्वजनिक स्थानों पर कम ही बोलते हैं। वे नौकरी के अलावा चीनी लोगों से बातचीत कम करते हैं और अपने लिए लघु-भारत बना लेते हैं। ऐसी स्थिति पर मुझे अजीब लगता है क्योंकि जब मैं भारत में भ्रमण कर रही थी तो भारतीय लोग एक-दूसरे से ज्यादा बोलते थे और हमेशा उत्साह से दूसरों देशों के व्यक्तियों का स्वागत करके बातचीत करते थे।
हिंदी के प्रवासी साहित्य के बारे में क्या राय है?
यदि उत्पत्ति की दृष्टि से देखें, तो हिंदी का प्रवासी साहित्य अंग्रेजी उपनिवेशवाद का उत्पाद है। हिंदी के प्रवासी लेखकों ने विदेश में बिताए गए अपने सामाजिक अनुभवों को लिखा है। इन लेखकों ने पूर्व-पश्चिमी के द्वंद्व को अभिव्यक्ति किया। किंतु यदि सांस्कृतिक आदान-प्रदान की दृष्टि से देखें तो हिंदी का प्रवासी साहित्य पूर्वी विचार और पश्चिमी विचार के अंदर दिखाते हुए सांस्कृतिक विविधता और वैश्विक समझौता है, जिसके द्वारा पार-सांस्कृतिक संलयन की गति बढ़ायी जा सकती है।
दुनिया में अनेक डाइस्पोरा घटनाएँ हुई हैं, जिनसे प्रवासी साहित्य उत्पन्न हो गए। यहूदी डाइस्पोरा घटना में यहूदी भाषा का प्रवासी साहित्य उभर गया, जो हिब्रू, स्लाव, जर्मन आदि भाषाओं के मूलतत्वों से बनती हुई नयी भाषा है। क़ुली-व्यापार में चीनी भाषा के प्रवासी साहित्य उत्पन्न हुआ। आयरिश-अकाल के कारण आयलैंडवासियों का प्रवास हुआ और उन्होंने आयरिश भाषा का साहित्य लिखा जाने लगा। तो इस प्रकार कहा जा सकता है कि हिंदी के प्रवासी साहित्य का लिखा जाना और कहा जाना कोई नयी बात नहीं है। दुनिया की अनेक कौमों और भाषाओं में इस तरह की प्रवृत्ति दिखाई देती है।
हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाये जाने की मुहिम चलायी जा रही है। इसे किस तरह से देखती हैं। अगर यह लक्ष्य हासिल भी हो गया तो इससे क्या फायदा होगा।
विश्व में हिंदी बोलने वाली जनसंख्या बड़ी है। न केवल भारत में, बल्कि मॉरीशस, फ़ीजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद-टोबैगो और अमेरिका आदि देशों में भी हिंदी ख़ूब बोली जाती है। लेकिन हिंदी ने अपने बोल-चाल में चलन के बावजूद सरकारी स्तर पर पर्याप्त सम्मान प्राप्त नहीं किया है। इसीलिए उसके संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनने में थोड़ी मुश्किल है। यदि भारतीय हिंदी के प्रभाव का विस्तार करने पर ज्यादा ध्यान दें और भारत तेज़ गति से विकास प्रक्रिया को जारी रखे तो हिंदी की संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनने की बड़ी संभावना होगी। अगर यह लक्ष्य हासिल भी हो गया तो हिंदी का अंतरराष्ट्रीय प्रभाव बढ़ जाएगा और व्यापारिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक पक्षों में हिंदी बड़ी शक्ति हो जाएगी। अंतरराष्ट्रीय समाज में भारत का स्थान भी ज्यादा ऊँचा हो जाएगा।
भारतीय भाषाओं की विविधता और उसके भविष्य के बारे में क्या सोचती हैं।
प्राचीन से आधुनिक काल तक भारत में बहुत भाषाओं का प्रयोग किया गया था, जैसे संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, ब्रज, अवधी, खड़ीबोली, मराठी, गुजराती, तमिल आदि। व्यापक राज्य, लम्बा इतिहास व प्रगाढ़ संस्कृति के कारण भारतीय भाषाओं की विविधता है। हिंदी भारत की जनभाषा, राजभाषा एवं राष्ट्रभाषा है और भारत सरकार अभी हिंदी पर ज्यादा ध्यान दे रही है। विविध स्थानीय भाषाओं का अस्तित्व सार्थक है, हिंदी के विकास करने का भी महत्व है। इसी प्रकार विविधता में एकता मुझे लगता है कि भारत के लिए लाभदायक है।

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