ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
कुम्भ में जल हो!
01-Apr-2016 12:00 AM 1641     

कुम्भ, घड़ा, घट, कलश आदि सब एक ही परिवार के शब्द हैं। लेकिन भगवान "घट घट
 वासी' हैं, घड़े-घड़े वासी नहीं। भक्ति में कलश को कैलाश से जोड़ दिया। अधिक प्यार आया तो किसी घड़े को गागर और गगरी भी कह दिया। अधजल गगरी को छलकने का अवसर मिला। लोगों पर घड़ों पानी पड़ने की नौबत भी आ गई। कोई लुटिया ही डुबाने लगे। हमने किसी के पुण्य का घड़ा तो कभी नहीं सुना लेकिन पाप के घड़े के भर जाने की बात अवश्य सुनी है। पानी में डुबा कर घड़ा भरने में हुई आवाज़ को सुन कर राजा दशरथ ने शब्दवेधी बाण चला दिया था। बचपन में पढ़ा था कैसे एक बुद्धिमान कौवे ने घड़े के थोड़े से पानी को कंकर-पत्थर डाल-डाल कर अपनी चोंच के पास पहुँचाया था। (उस समय स्ट्रॉ का प्रचलन नहीं था।) सामान्य लोग लोटे-बाल्टी से (विशिष्ट लोग शॉवर/टब में) स्नान करते हैं लेकिन मंदिरों में अभी भी कुम्भाभिषेकम् होता है।
बचपन में एक-दूसरे से पूछते थे, "तेरी बजी में क्या घड़ा?' उत्तर होता था, "नौने पौं'। "बूँद बूँद कर घट भरै' सब जानते हैं। साथ में यह भी जानते हैं कि बूँद-बूँद टपकने से वही घट खाली भी हो जाता है। जितना समय एक घड़े को बूँद-बूँद पानी टपका कर पूरा खाली होने में लगता था, उसको एक घड़ी कहते थे। तभी भगवान को "दो घड़ी ज़रा इंसान बन के देख' की चुनौती दी गई और "घड़ी घड़ी मेरा दिल धड़के' गाया गया।
कुम्भकार (कुम्हार) को घड़े बनाते देख कर ब्रह्मा जी की कल्पना आसान हो गई। "माटी के पुतले काहे को बिसारा है हरिनाम?' पूछा जाने लगा। कबीर ने भी कच्ची मिटटी और कुम्हार का संवाद सुना, "माटी कहै कुम्हार से, तू क्यों रूँधै मोहि?'। कच्चे घड़े के सहारे तैर कर नदी पार अपनी हीर के पास जाने के प्रयत्न में रांझा की जान गई। घड़े को तपाया जाता है। शायद उसी से "कुम्भीपाक' नरक की कल्पना की गई। कहीं-कहीं घड़े के अंदर रख कर पकाये जाने की यंत्रणा को कुम्भीपाक नरक माना गया है। पक्के घड़े का वाद्य यन्त्र की तरह भी उपयोग होता है। टूटे घड़े के ठीकरों को एक दूसरे के सिरों पर फोड़ने की अब नयी प्रथा चल गई है।
शरीर के कुछ भागों को घड़ों या कलशों की उपमा दी जाती थी। किसी के कान छाज जैसे तो समझ में आ सकते हैं लेकिन कुम्भकर्ण कोई कैसे हो गया? उसी तरह घटोत्कच जी भी अपने नाम में घड़ा लगाए घूमते थे। राणा कुम्भा के माता-पिता को शायद पता नहीं था कि संस्कृत में कुम्भा वेश्या को कहा जाता है। जलकुम्भी एक पौधा भी होता है। चेन्नै में कुम्भकोणम नगर है। घड़ियाल की नाक पर एक घड़े जैसी संरचना उसे मगर से विशिष्ट बना देती है।  
कहा जाता है कि एक बार सुरों और असुरों ने मिल कर समुद्र-मंथन किया। सुरों ने (आदत के अनुसार) चालाकी से असुरों को शेषनाग जी का सिर थमा दिया और खुद पूँछ पकड़ी। जब शेष नाग जी के मुंह से धुंआ और ज्वाला निकली तो वे सब असुरों को झेलनी पड़ीं। "समान कार्य, समान वेतन' को दरकिनार कर जब अमृत बाँटने का अवसर आया तो अमृत-कलश घड़ा/कुम्भ को लेकर धन्वन्तरि जी या गरुड़ जी खिसक लिये। समुद्र से काफी दूर हरिद्वार पहुँच कर सुस्ताने का मन बनाया। इरादा तो शायद हिमालय में बसी देवनगरी तक जाने का था लेकिन पहाड़ की ऊँचाइयों को देख कर वापिस प्रयाग जी का रुख कर लिया। मराठों ने उन्हें नासिक और बाद में उज्जैन आने के लिए भी मना लिया। दक्षिण भारत नहीं गए। शायद उन्हें केवल हिंदी और मराठी का ज्ञान था। इस यात्रा में उन्हें पूरे बारह वर्ष लग गए। रेल गाड़ी से यात्रा करते तो शायद एक दो साल कम लगते। दक्षिण भारत न जाने का एक कारण यह भी हो सकता है कि उन की अगस्त्य जी से बोलचाल न हो। अगस्त्य जी को घड़ों से बड़ा लगाव था क्योंकि बचपन में जब सब बच्चों की तरह उन्होंने पूछा कि मम्मी मैं कहाँ से आया तो उन्हें उत्तर दिया गया कि वह घड़े से उत्पन्न हुए थे और इसलिए उनका एक नाम "कुम्भज' था। (आचार्य द्रोण को भी कुछ ऐसा ही उत्तर मिला था।)
यह भी आगे कहा जाता है कि इन चारों जगह अमृत की कुछ बूँदें गिर गयीं थीं। यदि खुले मुख वाले घड़े या कुम्भ की जगह एक खाली बिसलेरी की प्लास्टिक बोतल में अमृत भर कर नकली सील लगा कर ले जाते तो हर जगह बूँदें नहीं टपकतीं। लेकिन फिर कुम्भ मेला कहाँ से होता? "बोतल' मेला तो हमने सुना नहीं। लगता है उन्हें कभी-कभी पूर्ण विश्राम नहीं मिला। अर्धविश्राम के कारण अर्धकुम्भ भी होने लगे। हो सकता है कि तब तक घड़ा आधा खाली हो चुका हो। ज्योतिष के अनुसार बृहस्पति ग्रह अगर कुम्भ राशि में चले जाएँ तो कुम्भ मेले की बात समझ में आती है, लेकिन बृहस्पति जी के सिंह राशि में होने में एक या आधे घड़े का क्या काम है यह आप ही बता सकते हैं।        
दूषित पानी पीने से ही "अमृत धारा' की ज़रूरत पड़ती है। आज कल जल-प्रदूषण जिस गति से बढ़ रहा है, उसे देख कर लगता है कि अगली बार समुद्र-मंथन शुद्ध पेय जल को पाने के लिए किया जाएगा। शुद्ध पानी अमृत से भी दुर्लभ होगा। संत कबीर का बहुत पहले से ध्यान जल पर था। उनकी अमृतवाणी बोलती है - "जल में कुम्भ, कुम्भ में जल है, बाहर भीतर पानी'। गुरु नानक जी भी कह गए हैं, "रूखी सूखी खाय के, ठंडा पानी पी'। "रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून' हमें रहीम सिखा गए। हमारे शरीर का लगभग ६५ प्र.श. भाग पानी है। चाँद हो या मंगल, सभी जगह पानी ढूँढने की ललक लगी रहती है। जहाँ पानी होगा वहाँ शायद हमारी तरह का जीवन भी होगा।  
आइये, अमृत की बात देवताओं पर छोड़ दें। हमको मालूम है अमृत की हकीकत लेकिन, लगी हो प्यास तो पानी ही याद आता है। हमारे घड़ों में  शीतल, आनंददायक स्वच्छ जल भरा रहे, इसकी कामना करें और इसके लिए सतत प्रयत्नशील रहें। हम सब पानी को शुद्ध, स्वच्छ रखने का प्रयास करें। इस से बढ़ कर पुण्य कार्य और कोई नहीं है।

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