ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
कुम्भ के बहाने क्रिसमस स्मरण
CATEGORY : आवरण 01-Apr-2016 12:00 AM 579
कुम्भ के बहाने क्रिसमस स्मरण

यूरोप का ऐसा कोई बड़ा पर्व नहीं है जैसा भारत में कुम्भ मेला है कि लोग सब दिशाओं से आकर एक स्थान इकट्ठे हो जाएँ। ईसाई धर्म भी इतना प्राचीन नहीं है जितना हिंदू धर्म है। हाँ सारे यूरोप में क्रिसमस मनाया जाता है लेकिन हर देश में मनाने का अपना तरीक़ा है और यह भी बदलता रहता है। आगे यहाँ मध्य यूरोप के क्रिसमस की बात होगी यानी जर्मनी, ऑस्ट्रिया और विशेषकर चेक देश की जो मध्य यूरोप में है।
ईसाई धर्म चेक देश में नवीं शताब्दी में पूर्व से आया था और जल्द ही दूसरी लहर पश्चिम से आई। इससे पहले बहुत से देवता माने जाते थे। आज तक ईसाई धर्म से पहले के कुछ रिवाज बाक़ी हैं। चेक भाषा में क्रिसमस के लिए "एददृड़" शब्द है जिसका संबंध जर्मन शब्द ज़्ड्ढत्ण्दठ्ठड़ण्द्यड्ढद से होगा। माने बर्फ़ की तूफ़ानी रातें, यानी इस नाम में कोई धार्मिकता नहीं है। मौसम से संबंध है।
सबसे बड़ा दिन चौबीस दिसंबर है। कहना चाहिए कि उस दिन की शाम और रात जब ईसा मसीह का जन्म हुआ था। चेक भाषा में इस दिन को "दानशील दिवस' कहते हैं। इसी शाम को लोग आपस में उपहार देते हैं। यह रिवाज बहुत प्राचीन नहीं है। चेक में कहते हैं कि ईसा शिशु उपहार ले आता है। बहुत छोटे बच्चे इसका वि?ाास करते हैं, बाद में पूछने लगते हैं कि शिशु इतना सामान कैसे उठा पाता है। लेकिन वयस्क लोग भी ईसा शिशुु की बात करते हैं।
"दानशील दिवस' से पहले के चार सप्ताह अडवेंट माने आगमन की प्रतीक्षा कहलाते हैं। कुछ घरों में इन दिनों में छत से या दरवाज़े के ऊपर शंकुधारी माला विशेष लटकाते हैं। बहुत से घरों में "बतलहम' लगाते हैं। सख़्त कागज़ या लकड़ी की बनायी पशुशाला है जिसमें बतलहम शहर में ईसा मसीह का जन्म हुआ था। पशुशाला में ईसा शिशु, उसकी माँ और यूसुफ़ की छोटी पुतलियाँ रखी हुई हैं और गधे और बैल की पुतलियाँ भी हैं जो अपनी साँस से नवजात बच्चे को गर्माते थे। इसके सामने शाम को दीप जलाये जाते हैं। पृष्ठभूमि में शहर है। कभी पूर्वी शहर जैसा, कभी इस देश का शहर है। भूमि भी बनानेवाले की कल्पना-शक्ति के अनुसार या तो प्राच्य होती है यानि ताड़, हरी घास आदि या मध्य यूरोपीय बर्फ़ से ढंकी हुई। हालांकि आजकल मौसम के वि?ाव्यापी परिवर्तनों की वजह से क्रिसमस पर अक्सर बर्फ़ नहीं होती। ?ोत क्रिसमस का दृश्य निकट भविष्य में शायद केवल चित्र-पोस्टकार्डाें पर मिलेगा। छोटे कमरों में बतलहम के बजाय "पशुशाला' लगाते हैं जहाँ ईसा शिशु लेटा है, पास मारिया, यूसफ़ और दो पशु खड़े हैं। गिरजों में बड़े बतलहम लगाये जाते हैं। विशेषकर दानशील दिवस को परिवार इकट्ठे मिलते हैं। दिन में कब्रिस्तान भी जाने का रिवाज है, अपनों की कब्रों पर रोशनी जलाते, शंकुधारी माला रखते हैं। अगले दिनों में दूसरे रिश्तेदार मिलते हैं। क्रिसमस शांत स्मृतियों का समय है, किसी बड़ी शोरदार पार्टी का नहीं। पार्टियों की बारी नये वर्ष से पहले की शाम को आयेगी। हाँ नयी फ़ैशन है कि विशेषकर कुछ जवान लोग क्रिसमस पहाड़ों में या गर्म देशों में बिताते हैं। दानशील दिवस या इससे दो-एक दिन पहले कमरे में शंकुधारी पेड़ लगाते हैं। यह बहुत छोटा हो सकता है। अक्सर अधेड़ या वृद्ध लोगों के घर या छत छूता हुआ बच्चोंवाले घरों में। पेड़ ज़रूर शंकुधारी होना चाहिए। देवदार, चीड़, फर आदि। जाड़ों में वैसे भी दूसरे पेड़ों के पत्ते झड़े हुए हैं। छोटे कमरे में और बूढ़े लोगों के घर टहनी से भी काम चल जाता है। पेड़ को तरह-तरह से सजाते हैं। काँच की छोटी घंटियाँ और चमकीली रंगीन गोलियाँ ख़ासकर लोकप्रिय हैं लेकिन कोई भी नन्हीं पुतलियाँ भी हो सकती हैं। इसकी फ़ैशन बदलती है। पेड़ की टहनियों पर छोटे दीप लगाये जाते हैं, आजकल अक्सर बिजली की बत्तियाँ, पहले मोमबत्तियाँ जलायी जाती थीं। मोमबत्तियों से आग लग जाने का ख़तरा होता था लेकिन बढ़िया सुगंध थी जो बिजली की बत्ती से कभी नहीं हो सकती। बाहर चौकों पर बड़ा पेड़ लगाया जाता है। पेड़ लगाने की परंपरा बहुत पुरानी नहीं है। उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में यहाँ जर्मनी से आई थी, फिर धीरे-धीरे फैल गई। आजकल पेड़ या कम से कम टहनी हर घर में होती है। यह ईसाई पूर्व का रिवाज होगा जब प्रकृति की शक्तियों की पूजा होती थी। सब ऐसे रिवाज ईसाई धर्म में समा गये।
क्रिसमस से पहले बल्कि कुछ घरों में हफ़्तों पहले मिठाई विशेष बनाने का रिवाज है और घरों की विशेष सफ़ाई करने का रिवाज है। गृहणियों के मिठाई बनाने के अपने-अपने नुस्ख़े हैं या अपनी दादी नानी के पुराने नुस्ख़े हैं। "इस साल मैंने दस क़िस्म की मिठाई बनाई है' सुनने में आता है। कहना ज़रूरी नहीं कि सफ़ाई के साथ और दूसरे कामों के साथ यह बहुत थकानेवाला है और बहुत सी महिलाओं की शिकायत है कि यह सारा क्रिसमस क्यों चाहिए, किसी तरह से गुज़र जाए तो आराम मिलेगा। ऐसा कहना सही भी है लेकिन आधुनिकीकरण और व्यापारीकरण का एक अच्छा पहलू यह है कि क्रिसमसवाली अच्छी से अच्छी मिठाई बाज़ार में भी मिलती है। बुरा पहलू यह है कि लोग खाने को और ख़ुशहाली को इतनी प्राथमिकता देते हैं कि ख़ुद थक जाते हैं। क्रिसमस का मौलिक अर्थ यह नहीं था। रही भोजन की बात तो इसमें भी बहुत कुछ बदलता रहता है। आरंभ में क्रिसमस का कोई विशेष भोजन नहीं होता था।  माँस ज़रूर नहीं खाते थे। मामूली घरों में अक्सर मटर, मेवा आदि और ज़रूर कुकुरमुत्ते खाते थे। कुकुरमुत्ते का खाना तरह-तरह से बनता था, अब भी बनता है। आजकल भी कुक्कुरमुत्ते ज़रूरी हैं। यह रिवाज ज़रूर ईसाई पूर्व है। अमीर घरों में मछली खाते थे। आजकल मछली के बिना काम नहीं चलता। मछली का चित्र चेक क्रिसमस का प्रतीक सा हो गया है। शाम को पहले मछली का शोरबा मिलता है, फिर तली हुई चेक मछली विशेष, कर्प। इसके साथ आलू का सलाद। अब दूसरी किस्म की मछलियों की भी फ़ैशन है। जिनको मछली पसंद नहीं, उनके लिए तला हुआ काटलेट या मलाई या वाइन मिला हुआ सोसेज विशेष है। क्रिसमस के केक विशेष के बिना भी काम नहीं चलता। यह बड़े ब्रेड-रोल से मिलता-जुलता है लेकिन मीठा है, आटे में किशमिश और बादाम मिला हुआ है।
आजकल एक नया रिवाज नज़र आया है। कुछ लोग कर्प ज़िंदा ख़रीदकर दानशील रात को नदी में छोड़ देते हैं। इरादा तो अच्छा है, समझते हैं कि एक मछली बेचारी की जान बच गई लेकिन गलत है। नतीजा यह होता है कि मछली नदी के ठंडे गंदले पानी में ज़िंदा नहीं रह सकती। हर देश के क्रिसमस के अपने गाने हैं जिनका विषय ईसा शिशु का जन्म है। वे बहुत सुरीले होते हैं। क्रिसमस के चेक गाने अक्सर चरवाहों के गाने हैं जो बताते हैं कि नवजात ईसा शिशु के लिए क्या क्या उपहार लाये हैं। मज़ाकिया गाने भी हैं। एक स्थानीय गाने में आदमी बेचारा शिकायत करता है कि बड़े दिन के लिए सामान लाने इधर-उधर दौड़ना पड़ा और जब ठीक सामान नहीं मिला तो घर आने पर पिटाई हुई। मध्य यूरोप में चौबीस दिसंबर को रात भर जागने का रिवाज होता था, बाद में केवल आधी रात तक। आधी रात को ईसा शिशु का जन्म हुआ था। आधी रात को सब गिरजों में सर्विस विशेष होती थी। आजकल केवल कुछ बड़े गिरजों में होती है। लोग आलसी हो गये हैं, आधी रात को घर से सर्दी में निकलने का मन नहीं होता।
यूरोप में चेक लोगों की नास्तिकता मशहूर है। कहना चाहिए कि यह साम्यवाद के दिनों की विरासत नहीं है। इसकी जड़ें पुरानी हैं, देश और क़ौम के इतिहास में जमी हैं। उलटे उन दिनों में ऐसे कुछ लोग भी गिरजे में जाते थे जो आजकल इसका नाम भी नहीं लेते। फिर भी, वास्तव में दिल दिमाग के नास्तिक आबादी में बहुत ज़्यादा नहीं हैं। बस अधिकतर लोगों को संगठित चर्च नहीं चाहिए, पादरी नहीं चाहिए। अपनी-अपनी तरह से मानते हैं कि हमारे ऊपर कोई महान शक्ति है। बहुत से लोग गिरजे में प्रार्थना करने नहीं आते, केवल गिरजे की आंतरिक सुंदरता देखने आते हैं। आख़िर प्राग और दूसरे पुराने नगरों में जगह-जगह बहुत सुंदर गिरजे हैं, छोटे शहरों में कम से कम एक होता है। सब से सुंदर गिरजे मध्य युग में बनवाये गये थे। आख़िर क्रिसमस जैसा भी हो क्रिसमस ही रहेगा।

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