ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
कुंभ का वैज्ञानिक पक्ष
01-Apr-2016 12:00 AM 1436     

कुम्भ के दो पहलू हैं। पहला पक्ष है पुराणों से उद्धृत है, ज्योतिष शास्त्र भी मान्यता देता है लेकिन ज्योतिष शास्त्र ज्यादा पुराना है और इसे पहले से मान्यता दे रहा है। ज्योतिष शास्त्र के हिसाब से सूर्य, चंद्रमा, गुरु और शनि की विशेष युतियों में कुछ खास किस्म की खगोलीय ऊर्जाएं पृथ्वी पर चुनिंदा स्थानों पर स्थित जल भंडारों को प्रभावित करती हैं और यह ऊर्जित जल मनुष्य के स्वास्थ व कार्मिक ऊर्जाओं को बल देता है, पुष्ट बनाता है। कुम्भ के लिए जो नियम निधार्रित हैं उसके अनुसार प्रयागराज में कुम्भ तब लगता है माघ अमावस्या के दिन सूर्य और चंद्रमा मकर राशि में होते हैं और गुरु मेष राशि में होता है। विष्णु पुराण में बताया गया है कि जब गुरु कुम्भ राशि में होता है और सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है तब हरिद्वार में कुम्भ लगता है।
सूर्य एवं गुरु जब दोनों ही सिंह राशि में होते हैं तब कुम्भ नासिक में गोदावरी के तट पर लगता है। गुरु जब कुम्भ राशि में प्रवेश करता है तब उज्जैन में कुम्भ लगता है। सागर मंथन से जब अमृत कलश प्राप्त हुआ तब अमृतघट को लेकर देवताओं और असुरों में युद्ध शुरू हो गया। इसी खींचतान में अमृत की बूंदें जहां छलकीं वहां कुम्भ का आयोजन होता है। इस युद्ध के दौरान चंद्रमा ने अमृत की सुरक्षा की, गुरु ने कलश को छिपाकर रखा, सूर्य ने कलश को फूटने से बचाया और शनिदेव ने इंद्र के कोप से अमृत की रक्षा की। ऐसे में इन चार ग्रहों का कुम्भ के आयोजन में व्यापक महत्व है।
बड़ा ही मनोरम और भव्य स्वरूप होता है कुम्भ के मेले का। चारों तरफ दिव्यता विद्यमान रहती है। हर कहीं से संत पधारते हैं। हर प्रकार का साधक बिना बुलाये चला आता है। यह सब मात्र श्रद्धावश है या फिर इसके पाश्र्व में कोई वैज्ञानिक कारण भी है? हमें अपने वैदिक ऋषियों और पुराणकालीन ऋषियों की खोज जो सिर्फ मानव मात्र के कल्याण के लिए थी उसमें आज के परिप्रेक्ष्य में नए सिरे से अनुसंधान की आवश्यकता है। इस खोज के दौरान साधना पद्धतियों का अनुसरण करते हुए एक रात्रि गहन ध्यान में जल के विषय में सोचते हुए जल में विचित्र प्रकार के आकार दिखने लगे जैसे छोटे-छोटे चमकते हुए हीरे की तरह के क्रिस्टल तैर रहे हों। दिनचर्या में वापस आने के बाद नासा व दूसरे शोध कार्याें को जानने के जतन में जापानी वैज्ञानिक मसारू इमेटो के बारे में पता लगा। मसारू ने जल पर गहन शोध में पाया कि जल में अत्यंत विशेष प्रकार की संरचनाएं निर्मित होती हैं जिनका आधार वहां का वातावरण, कॉस्मिक ऊर्जाएं और वहां स्थित भावनाएं होती हैं। जल के यह विशेष क्रिस्टल आपकी ऊर्जाओं को प्रभावित करते हैं क्योंकि हमारा शरीर ७५ फीसद से ज्यादा हिस्सा जल से निर्मित है इसलिए जल के यह क्रिस्टल शरीर को बनाने बिगाड़ने में बड़ा योगदान करते हैं। ऋषियों का अनुसंधान लाखों साल पहले इस सत्य को जान चुका था और विशेष कॉस्मिक परिस्थितियों का लाभ कैसे आने वाली पीढ़ियों को दिया जाए इसका उन्होंने तरीका भी निकाल लिया था। वस्तुत: कुम्भ इसी प्रकार की खोज का नतीजा है जो मानवमात्र के लिए प्रत्येक लिहाज से कल्याणकारी है।

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