ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
कुम्भ और कुम्भीपाक
01-Apr-2016 12:00 AM 1064     

समुद्र-मंथन से अमृत निकलता है और विष-वारुणी भी। जब विष्णु वि?ामोहिनी का रूप धारण करके धोखे से दानवों को वारुणी और देवों को अमृत पिलाते हैं तो वे एक ही बर्तन में अन्दर से दो भाग करके अमृत और वारुणी रखते हैं। जीव के इसी कुम्भ में अमृत और वारुणी ही नहीं, समुद्र मंथन वाले सभी चौदह रत्न है।
अगस्त्य ऋषि अपने आकार के बल पर नहीं बल्कि अपने छोटे आकार में अवस्थित विराट की पहचान के बल पर समुद्र पी जाने का चमत्कार करते हैं और अपने आकार को ही महत्त्वपूर्ण मानने वाला बड़ा आकार चाहता है लेकिन जीव का आकार भौतिक रूप में तो इतना बड़ा नहीं हो सकता कि समुद्र को पी जाए।
एक सामान्य मनुष्य को "उस' की विराटता के दर्शन कराने के लिए हमारे यहाँ तीर्थ यात्रा का विधान है। तीर्थ नदी या समुद्र के तट पर या पहाड़ों में हैं और इन तीनों को देखकर ही मनुष्य को परम शक्ति की विराटता और उसके साथ अपने संबंध की अनुभूति होती है। कुम्भ जैसे बड़े आयोजन नदियों के किनारे ही होते हैं जहाँ मात्र स्नान के लिए ही अपार जन समूह एक खास दिन इकट्ठे नहीं होते। नदियाँ सभी सभ्यताओं की जननी हैं। आज भी इनके बिना मनुष्य का जीवन संकट में पड़ जाता है। नदी के प्रवाह से ही जीवन के प्रवाह की प्रेरणा मिलती है। प्रवाह के बल पर ही नदी स्वच्छ और उपयोगी रहती है। प्रवाह का रुकना नदी की मौत है। यह मौत मनुष्य के स्वार्थ और नदी के प्रति उत्तरदायित्त्वहीनता के कारण होती है।
भारत के अतिरिक्त बहुत से देशों में नदी के किनारे उत्सव आयोजित होते हैं। अमरीका एक नया देश है। उसके उत्सवों में पुराने देशों के उत्सवों की मिथकीयता नहीं है। वे शुद्ध मनोरंजन और व्यवसाय हैं लेकिन चूंकि उसका नदी प्रेम अलौकिक नहीं है इसलिए उसके आयोजनों में किसी तरह की भावनात्मकता नहीं बल्कि भौतिक व्यवस्था है। उसके नदी तट पर आयोजित समारोहों और उत्सवों में नदी को बिगड़ने से बचाने के सभी प्रावधान हैं जिनका पालन आयोजन करने वालों को निभाने पड़ते हैं। भारत की तरह नहीं कि आयोजन को एक रुपकात्मकता, सांस्कृतिकता या आध्यात्मिकता में उलझा दिया और किसी भी नैतिक या कानूनी जिम्मेदारी को निभाए बिना लोग नाच देखकर चलते बने और बोतलों, दोनों, पैकेटों का कचरा अब तक साफ़ नहीं हुआ है। इस मायने में तो वहाँ के आयोजनों का भौतिक स्वरूप ही ठीक है। यह अंतर है पवित्रता और स्वच्छता की अवधारणा का। पवित्रता एक अलौकिक और मात्र मानसिक बात है लेकिन स्वच्छता एक नितांत भौतिक और परिणाम मूलक बात। गंगा जल के दो छींटों से आप पवित्र तो हो सकते हैं लेकिन स्वच्छ होने के लिए साबुन या और किसी चीज से रगड़-रगड़ कर सफाई करना ज़रूरी है। पवित्रता अपनाइए लेकिन स्वच्छता की कीमत पर नहीं।
वैसे तो आजकल कई तरह के कुम्भ होने लग गए हैं जैसे- विज्ञापन का कुम्भ, क्रिकेट का कुम्भ, फिल्मों का कुम्भ आदि लेकिन इस पौराणिक कुम्भ का संबंध समुद्र मंथन के प्रतीक या मिथ से जोड़ा जाता है। अमृत कुम्भ से जहाँ-जहाँ बूँदें गिरीं वहाँ-वहाँ मेला लगता है अर्थात अमृत पर किसी एक का एकाधिकार नहीं बल्कि सभी का है। और उसे व्यक्तिगत तौर पर एकाधिकार हासिल करने की संकुचित मनोवृत्ति के कारण ही तो मिलकर समुद्र मंथन करने वाले देव और दानव आपस में लड़े। विष्णु के समझाने के बाद भी देवों ने साझा नहीं किया। क्या कुम्भ का यह भी एक सन्देश नहीं हो सकता?
विदेशों से आजकल कुम्भ देखने के लिए आने वालों के आकर्षण का मुख्य केंद्र है- नागा साधुओं का कुम्भ स्नान। क्या कुम्भ केवल नागा साधुओं के कारण ही है? यह ठीक है कि नागा साधु धर्म की रक्षा के लिए प्राण हथेली पर रखने वालों की एक साहसी फौज रहे हैं लेकिन यह वस्त्र हीनता भी क्या प्रतीकात्मकता नहीं है? नागा साधु बनने से पहले व्यक्ति अपना स्वयं का श्राद्ध कर देता है अर्थात इस भौतिक संसार से सर्वथा संबंध विहीनता। जब किसी को वैसे भी संन्यास दिलाया जाता है तो वह वस्त्र पहन कर नदी में जाता है और फिर उस वस्त्र को नदी में ही छोड़कर निर्वस्त्र बाहर आता है अर्थात् उसने अपना यह भौतिक शरीर त्याग दिया। लेकिन सभी सन्यासी निर्वस्त्र तो नहीं रहते, कम से कम के कोपीन तो धारण करते ही हैं। नागा साधुओं ने इस प्रतीक को शुद्ध अभिधा में अपना लिया। निर्वस्त्र और दिगंबर की व्यंजना में भी अन्तर है। शिव दिगंबर हैं, लेकिन निर्वस्त्र नहीं, बाघम्बर धारण करते हैं। निर्वस्त्र तो जैन धर्म के एक पंथ के संत भी होते हैं, लेकिन वे उसे एक शालीनता और लोकव्यवहार को ध्यान में रखकर निभाते हैं। वस्त्र तो दिगंबर, निर्वस्त्र, नग्न और नागा चारों में ही नहीं होते हैं लेकिन व्यंजना में अन्तर है। हम अपनी व्यष्टि का विस्तार सभी दिशाओं में करें, नंगे न बनें। व्यष्टि के कुम्भ में कैद हो जाना ही संसार के लिए कुम्भीपाक रचता है।
कुम्भ में सबसे पहले इन्हीं नागाओं के अखाड़ों का स्नान होता है। इनके भी कई अखाड़े हैं और वे अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के चक्कर में आपस में भिड़ भी जाते हैं। अब कुम्भ मात्र भीड़, मज़मा हो गए हैं। उसकी चेतना, आध्यात्मिकता, मिथाकीयता को पुन& स्पष्ट व्याख्यायित और कार्य रूप में प्रकट और कालांतर में सिद्ध होना चाहिए।
अमृत को बंद नहीं बल्कि अपने कुम्भ (घट) की सीमाबद्धता को लाँघकर एक जिंदा नदी की तरह लोक जीवन, जन-जन में प्रवाहित होना चाहिए।
अहंकार और स्वार्थ का घट फूटे बिना वह जल जल में नहीं समा सकता। कुम्भ नहीं, जल ही सत्य है, नदी के प्रवाह की तरह प्रवहमान आस्थाओं की स्वच्छता ही कुम्भ है।
आज धर्म, लोकतंत्र, सम्प्रदाय आदि के नाम पर अपने-अपने सीमाबद्ध कुम्भों में अमरीका से आस्ट्रेलिया तक लोक की सकारात्मक और समन्वयकारी चेतना का पाक बन रहा है। कुंठाओं का कुम्भ फूटे बिना निस्तार नहीं है।

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