ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
कुछ खोते और कुछ संजोते चीनी गाँव
02-Jun-2017 02:44 AM 2402     

चीन के गाँवों को घूमने का सौभाग्य अपने साथ ही पढ़ा रहे अंग्रेज़ी के व्याख्याता के सौजन्य से मिला। ये गुआंगदोंग प्रांत से सटे प्रांत के एक गाँव के निवासी थे। साथ उठते-बैठते ये मित्र मेरे आत्मीय होते चले गए। जैसे ही अवसर मिलता साथ ही घूमने निकल जाते। कभी डिनर पर बुला लेते और कभी कोई पार्क या अन्य मित्रों की कंपनियाँ देखने निकल जाते। धीरे-धीरे यह प्रेम इतना प्रगाढ़ हुआ कि लंबे प्रवास पर उनके गाँव ही चला गया।
उनके गाँव जाना मेरे लिए सबसे बड़ी उपलब्धि रही। वहां का रहन-सहन और समृद्धि मुझे रह-रह कर कोसते-कचोटते रहते थे। उनकी समृद्धि खेती से नहीं उद्योग से थी। हमारे गाँव हरी सब्जी और आलू-प्याज बेचकर पक्की ईंटों के घरों तक पहुंचे हैं और चीनी गाँव सारी दुनिया में अपना माल निर्यात करके बड़े-बड़े मकानों के मालिक बने हैं।
 चीन में व्यवसाय करके संपदा स्वामी बनना सम्मान का विषय है। गली-गली में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के केंद्र हैं। ग्वान्ग्ज़ाऊ चीन का बड़ा व्यापारिक केंद्र है तो भला यहाँ इन्हें व्यापार में न जा पाने का बड़ा दुःख क्यों न हो। शिक्षा इनके आनन्द का नहीं ज़रूरत का अध्यवसाय है। मित्रों की देखादेखी इन्होंने दो बसें खरीद डालीं। आचरण में किसानी भरी होने के कारण ये व्यापारी नहीं बन पाए और बसें बेचनी पड़ीं। हमारे देश में भी व्यापार के क्षेत्र में बहुत कम ग्रामीण सफल हो पाते हैं। इस तरह चीन और भारत के गाँवों का चरित्र सीधे और सहज परिवेश का पोषक है।
किसी ईष्र्यालु पड़ोसी की भाँति मैं भी किसी चीनी गाँव की गरीबी देखना चाहता था। लेकिन मैं गरीबी नहीं देख पाया। इसका कारण चीनी गाँवों का अपनी पारंपरिक जीवन वृत्तियों का पूरी तरह परित्याग नहीं है। उन्होंने किसानी छोड़ी नहीं उसकी शैली भर बदली है। पानी के भराव वाले खेतों में मछलियाँ पालीं, ऊंची ज़मीन पर दलहन और गेहूँ-धान पैदा किया। ज़मीन के हर टुकड़े का इस्तेमाल किया। हम शायद इसलिए पीछे रह गए कि हमने यूरोप को देखकर अपनी जीवन शैली तो बदली पर उसको जीवन देनी वाली आमदनी की पगडंडी नहीं बदली।
जिस गाँव में मैं था वहाँ प्रायः हर किसान का अपना तालाब था, यानी जल संस्कृति वहाँ अब भी ज़िंदा है। यही कारण है कि उनकी फसलों को पानी के संकट का सामना नहीं करना पड़ता। लोग मिलजुल कर रहते हैं। भारतीय गाँवों जैसी इंच-इंच भर ज़मीन के लिए मारामारी नहीं है। जिन मित्र के यहाँ मैं गया था वे तीन पीढ़ियां पहले एक गाँव से अपने नए गाँव में आ बसे थे। लेकिन मजाल है कि उनके पट्टीदारों ने भला एक इंच ज़मीन भी कब्ज़ा की हो।
चीन पहुँचने के कुछ दिनों बाद "चीन और भारत के संबंध" पर प्रति सप्ताह एक कक्षा लेनी पड़ी। दोनों देशों के संबंधों को खंगालना पड़ा। ये संबंध हजारों साल पुराने निकले। लगभग अपनी सभ्यता जितने ही पुराने। जिन दिनों सिंधु नदी के किनारे एक सभ्यता फल-फूल रही थी यहाँ चीन में पीली नदी की सभ्यता थी। दोनों देशों के बीच व्यापार था। साहित्यिक और सांस्कृतिक संबंध था। सबसे बड़ी परेशानी इस सांस्कृतिक संबंध को व्याख्यायित करने में आई। विद्यार्थियों के तरह-तरह के प्रश्नों का सामना करना पड़ा। शहर तो शहर चीनी गाँवों तक में जाति-पांति नहीं है। वहाँ हान जाति के 93 प्रतिशत लोग रहते हैं। शेष में अन्य जातियों और धर्मों के लोग आते हैं। हमारे गाँवों के पतन के पीछे फालतू फंड के फ़साद और मुकदमे हैं। थाने बहुत दूर-दूर और कोर्ट कचहरियाँ भी बहुत कम देखीं। विकास की एक निशानी तो यही है। दूसरे मंदिर-मस्जिद और अन्य तरह के पूजा स्थल वहाँ बहुत कम हैं। केवल बड़े-बड़े शहरों में चर्चित धार्मिक स्थल हैं। इसलिए भी इनकी ऊर्जा अनावश्यक रूप से नष्ट नहीं होती। यह सब तो है ही साथ में सबसे बड़ी बात है कि आज तक गाँवों की संवेदना मरी नहीं है। आज भी अतिथि सम्मान में इनका सांस्कृतिक रूप झांका जा सकता है।
चीन भी भारत की ही तरह पुरातन ग्राम्य संस्कृति प्रधान देश है। शहर यहाँ भी सांस्कृतिक गरिमा में अपेक्षाकृत ओछे हैं। यहाँ भी संवेदनशीलता केवल गाँवों तक सीमित है, बाक़ी मनुष्य मशीन बन चुका है। इसके बावजूद कि गाँव के लोग शहरों में जा बसे हैं। अब उनमें शहरी नजाकत-नफासत के साथ वैभव प्रेम ज़्यादा आ गया है वरना चीनी ग्रामीण भी भारतीय ग्रामीणों की तरह संतोषी ही रहे हैं। वे भी मात्र पशुपालन और खेती से संतुष्ट रहे हैं।
"येल यूनिवर्सिटी" के शोध अध्येता एरिक मिलर ने सन् 2014 के अपने अध्ययन में लिखा है कि "केंद्रीय शेडोंग प्रांत, जहाँ कृषि से सबसे अधिक आय है, उसके एक मामूली से गाँव में हम रहते थे। आबादी लगभग 880 थी। मैं वहाँ बुढ़ापे पर अनुसंधान करने के लिए गया था। ज्यादातर परिवार एक साथ बंद आंगन वाले घरों में रहते हैं। अधिकाँश घर शहरी अपार्टमेंट्स जितना साफ नहीं थे, जबकि कुछ घर साफ और बहुत अच्छी तरह से सज्जित थे। सबसे ख़ास बात यह कि रसोई अभी भी बाहर हैं, आंगन और एक टॉयलेट, शावर या पानी का पाइप है। लोग टीवी, वाशिंग मशीन, मोटर साइकिल रखते हैं। कुछ के पास कारें भी हैं। ग्रामीण जीवन मौसम के इर्द-गिर्द घूमता है। एक मकई फसल और एक गेहूं फसल इस क्षेत्र की मुख्य फसलें हैं और प्रत्येक फसल का एक बहुत व्यस्त समय है। बीच में बहुत अधिक आराम है। जीवन भी बाजारों के आसपास ही घूमता है जहां लोग समूह में होते हैं और खरीदने और बेचने ह्रेतु एकत्र होते हैं। कहीं-कहीं प्रत्येक दिन बाज़ार लगती है।"
प्रत्येक दिन बाज़ार लगने का अर्थ ही है कि गाँव भी शहर से कम समृद्ध नहीं हैं। लेकिन यहाँ भी ग्राम्य संस्कृति में बाज़ार प्रमुख नहीं है। उसे ज़रूरत तक सीमित रखा गया है।
एक बार एक विद्यार्थी जिसका हिन्दी नाम सुरेश ही मैं जानता हूँ (उसके मूल चीनी नाम से मैं भिज्ञ नहीं हूँ) उसने कहा, "भारत में जाति-पाँति है। ऊँच-नीच का भेद-भाव है। क्या आप इसे भारत की संस्कृति का हिस्सा नहीं मानते?" मैंने कहा, कदापि नहीं। यह भारत की संस्कृति नहीं है। भारत की संस्कृति भेद की नहीं मेल की है। भारत की संस्कृति में करुणा प्रवाहित है, जिसने अपनों को ही नहीं परायों को भी अपने में समेटा है। उस करुणा को तो बुद्ध आपके भी देश में लेकर आए। अपने देश में उपलब्ध बौद्ध साहित्य में इस करुणा का अबाध प्रवाह आज भी आप पा सकते हैं। उसने और भी अनेक प्रश्न किए, मैंने उत्तर दिए पर वह संतुष्ट नहीं हुआ। मैं भी कहाँ संतुष्ट हुआ। मैं छटपटाता रहा समझाने के लिए और वह छटपटाता रहा समझने के लिए। घर आकर देर रात तक सोचा। उस समय मुझे समझ में आया कि यही छटपटाहट ही तो संस्कृति है। वह भारत में हो रहे भेदभाव से छटपटा रहा है और बुद्ध छटपटा रहे थे सारे संसार के भेद-भाव और पीड़ा भरी आह-कराह से। इसीलिए जीवन भर उसे हरने के लिए देश-देशांतर भटकते रहे। इस छटपटाहट को पहचानना कोई कम कठिन काम है क्या?
प्रायः यहाँ के विद्यार्थी परेशान होकर पूछते हैं, "भारत में बलात्कार होते हैं?" मैं इसका उत्तर न में नहीं दे पाता हूँ। टालता हूँ। "हर देश में होते हैं" कहकर अपने को सुरक्षित अंचल में पहुँचा तो लेता हूँ पर चैन वहाँ भी नहीं मिलता। यहाँ फिर वही छटपटाहट घेर लेती है। देर-देर तक सोचता हूँ तो सोचता ही रह जाता हूँ। खुद से प्रश्न करता हूँ तो फिर क्या इन बच्चों का दोष है? यहाँ भी नहीं में उत्तर मिलता है। इसके बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचता हूँ कि इस सूचना को परोसने वाले हमी तो हैं। हमारा सच्चरित्रता और संतोष वाला संस्कार लुप्त हो रहा है, जबकि चीन के ग्राम्य चरित्र में अब भी है।
चीन के ग्राम्य जीवन में सांस्कृतिक सौष्ठव तो नहीं मरा है पर उसका भौतिक पतन हमसे भी अधिक अवश्य हुआ है। भौतिक पतन के सिलसिले में हुआ यह था कि जब सन् 1978 में देंग जियाओपिंग के द्वारा चीन में सुधार और उन्मुक्त व्यापार नीति का शुभारंभ हुआ तब तक इसकी जनसंख्या की 20 फीसदी से भी कम आबादी शहरों में बसती थी। लेकिन चौंका देने वाले आर्थिक विकास और शहरीकरण के तीन दशकों के भीतर चीनी समाज का चेहरा ही बदल गया। अब तो स्थिति यह है कि विलुप्त होने की कगार पर खड़े हज़ारों ऐतिहासिक गांवों को बचाने के लिए तत्काल कार्रवाई करने के लिए आग्रह किया जा रहा है। प्रोफेसर ली चीन और ली हुआ तोंग जैसे समाज सेवी और ग्राम्य संस्कृति के संरक्षक गांवों की रक्षा करने में जुटे हैं। इनका मानना है कि अगर अभी हमने गाँव बचाना शुरू नहीं किया तो शहर भी नहीं बचेंगे। इनके प्रयासों के फलस्वरूप अब गाँव कुछ खोते हैं तो उससे पहले कुछ संजोते भी हैं। माँ-बाप को छोड़कर शहर जाने वाले युवा अब लौटते ही नहीं वापसी पर बहुत कुछ बचाकर भी लाते हैं। बहुत पहले से जो लोग गाँव छोड़कर शहरों में जा बसे थे वे भी अब अपने अपने गाँव लौटकर आलीशान घर बना रहे हैं।

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