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कृति-विमर्श Next
जीवित रहेगा प्रमथ्यु
कभी-कभी इतिहास में ऐसे क्षण आते हैं और अक्सर आते हैं, जब जीवन के किसी मोड़ पर देखी, सुनी या पढ़ी रचना साक्षात् मूर्त हो जाती है। सामयिक और प्रासंगिक हो जाती है। उसके प्रतीक नूतन अर्थ के आलोक में भास्कर हो उठते हैं। जीवन को नई दृष्टि मिलती है, अनुभवो...
अद्र्धनारीश्वर : एक सम्पूर्ण व्यक्तित्व
काहानी, उपन्यास और नाटकों के रचनाकार विष्णु प्रभाकर वैसे तो हिंदी साहित्य के लिए एक प्रतिष्ठित नाम हैं किन्तु उनकी पुस्तक "आवारा मसीहा" ने उन्हें एक उत्कृष्ट जीवनीकार के रूप में भी स्थापित कर दिया जो कि जाने-माने बंगला उपन्यासकार शरतचंद्र के जीवन ...
गुजिश्ता दौर के ऐतिहासिक चरित्र
साहित्यिक दृष्टि से आज हिंदी बहुत समृद्ध है। नाना विधाओं के साहित्य से हिन्दी का रचना संसार जगर-मगर है। कविता की सरिता तो आठवीं-नवीं सदी में ही बह निकली थी। लेकिन गद्य का झरना उन्नीसवीं सदी में आके फूटा। गद्य की विधाओं में सबसे प्रमुख विधा उपन्यास...
महेश अनघ की कहानियां कौतूहल काव्य रस और सामाजिक न्याय की त्रिवेणी
समकालीन हिन्दी की कृतियों में "जोग लिखी" और "शेषकुशल" नवगीतकार और कथाकार महेश अनघ के ये    दो कहानी संग्रह, इस कारण से उल्लेखनीय कहे जा सकते हैं क्योंकि इनमें कौतूहल काव्य रस और सामाजिक न्याय की अनूठी त्रिवेणी प्रवहमान है। कहानी में...
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