ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
ज्ञान और शिक्षा की प्रकृति
01-May-2018 05:30 PM 2030     

विगत दिनों एक छोटा-सा समाचार था- अपंजीकृत मदरसों और वैदिक स्कूलों की पढाई अमान्य। आगे खुलासा था कि यह सलाह सेन्ट्रल एडवाइजरी बोर्ड ऑफ़ एज्यूकेशन की उपसमिति द्वारा सरकार को भेजी गई रिपोर्ट में शामिल है। इसके लिए केंद्र अपंजीकृत मदरसों और वैदिक स्कूलों के बच्चों की पहचान करेगा।
इस देश में कोई 25 विश्वविद्यालय विभिन्न नामों से संचालित हैं जिन्हें विश्वविद्यालय आयोग से मान्यता प्राप्त नहीं है। वैसे जिन्हें मान्यता प्राप्त है वे भी कितने मान्य या माननीय सिद्ध होते हैं यह एक खुला रहस्य है। देश में दो लाख फर्जी गैर सरकारी संगठनों की सूची बनाई गई है उससे भी संस्थानबद्ध अवैध गतिविधियों का अनुमान हो सकता है। देश में अपराधी किस्म के, दबंग और सत्ता के निकटस्थ लोगों द्वारा चलाए हजारों निजी सामान्य विद्यालय, चिकित्सा, अभियांत्रिकी महाविद्यालय व अन्य संस्थान संचालित हैं जो विद्यार्थियों, अध्यापकों का तरह-तरह से शोषण करते हैं और किसी भी प्रकार देश, समाज में सद्भाव, न्यायप्रियता, अनुशासन और मूल्यों की स्थापना नहीं कर रहे हैं, बल्कि बहुत बार तो आपराधिक कृत्यों में संलग्न पाए जाते हैं। फिर वह चाहे विद्यार्थियों से होस्टल, ड्रेस, किताबों, स्टेशनरी के नाम पर ज्यादा दाम वसूलना हो या फिर मनमानी फीस या नक़ल करवाना और फिर मेरिट का डंका पीटना।
आज जिस तरह से चुनावों में जाति, धर्म, संप्रदाय के कार्ड खेले जा रहे हैं वे सरकारों की न्यायप्रियता और लोकतांत्रिक मूल्यों के बड़े-बड़े भाषणों की पोल खोल देते हैं। सरकारें किस आधार पर किसी निजी सम्प्रदाय, धर्म या संस्थान को जनता का पैसा मनमाने तरीके से दे सकती हैं। धर्म और आस्था किसी समूह के नितांत निजी मामले हैं। उनका उद्देश्य, उनके नियम किसी भी संविधान और न्यायपालिका में प्रश्न किए जाने से परे हैं।
शिक्षा का प्राण और प्रेरणा हैं जिज्ञासा। धार्मिक और सांस्कृतिक संस्थानों में जिज्ञासा, संवाद, तर्क और प्रयोग के लिए कोई स्थान नहीं है। इसलिए शिक्षा का काम किसी भी प्रकार की सामाजिक और संवैधानिक अप्रतिबद्धता वाले संस्थानों के हवाले नहीं किया जा सकता फिर चाहे वह किसी अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा संचालित संस्थान हो या फिर बहुसंख्यक समाज द्वारा। सब अपने-अपने हिसाब के कट्टर, अन्धविश्वासी, तर्क और जिज्ञासा को हतोसाहित करने वाले, वास्तविक और तात्त्विक मुद्दों से आँखें चुराने वाले होते हैं। वे आस्था और धर्म के नाम पर आपको यह सब करने के लिए बाध्य करते हैं।
अंधविश्वास किस धर्म में नहीं हैं। किसी संस्कृति विशेष के नाम पर बने संस्थान की भी कोई न कोई धर्म-संप्रदायगत कुंठा, सीमा और अवैज्ञानिक आस्था होगी। उसके आधार पर बने संस्थान में पूर्ण जिज्ञासा, तर्क, प्रयोग और असहमति के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता। चर्च यदि गैलीलियो के वैज्ञानिक चिंतन से घबराकर उसे अपने लिए चुनौती मानकर उसका मुंह बंद कर देता है तो अन्य धर्म भी चाहे उदारता की कितनी ही बातें करें लेकिन अंततः सभी धर्म एक जैसे ही हैं। इस लोक की समस्याओं और तर्कों से आँख चुराकर किसी अज्ञात लोक में मरणोपरांत उसका समाधान बताने वाले। इसलिए इस समाचार के अनुसार इस दृष्टि और सिद्धांत को और आगे बढाया जाना चाहिए कि शिक्षा का काम किसी भी धर्म या संस्कृति के निजी विचारों और आस्थाओं पर नहीं छोड़ा जाए अन्यथा भले ही उनमें वैज्ञानिक आधार पर तैयार किया गया पाठ्यक्रम पढ़ाया जाता हो। लेकिन यह भी एक कटु सच है कि उनमें एक ख़ास मानसिकता वाले अध्यापक रखे जाते हैं, जिनके द्वारा तरह-तरह से बच्चों की एक विशेष मानसिकता बना दी जाती है जिसमें समस्त मानवता के बहुत कम स्थान बचता है। उसमें भिन्न धर्म, संस्कृति और रहन-सहन वालों का गुज़ारा कम ही हो पाता है। सभी धर्म मनुष्य की एकता नहीं बल्कि उनकी भिन्नता को अपनी पहचान का आधार बनाते हैं।
सभी धर्म ईश्वर को एक और सभी जीवों को उसकी संतान बताते हैं लेकिन वास्तव में सभी धर्म अंदरखाने एक-दूसरे की आलोचना ही नहीं बल्कि निंदा करते हैं। दूसरे धर्मों की मनगढ़ंत बुराइयाँ करके बच्चों के मन में अन्य सभी धर्मों के प्रति घृणा भर देते हैं। दुनिया में धार्मिक घृणा लोगों की व्यक्तिगत कुंठा नहीं है बल्कि उनके ही धर्म के ठेकेदारों द्वारा दूसरे धर्मों के प्रति फैलाई गई असत्य और अवैज्ञानिक धारणाओं के कारण है। ऐसे संस्थानों में डॉक्टर नहीं बल्कि क्रिश्चियन डॉक्टर, हिन्दू डॉक्टर, मुसलमान डॉक्टर तैयार होने की संभावना ज्यादा होती है। एक और मज़े की बात है कि अब तो हम पशु-पक्षियों और दवाइयों को भी धर्म के आधार पर पहचानने लगे हैं। जैसे कि तुलसी हिन्दू और मिस्वाक मुसलमान। (मिस्वाक रेगिस्तान में पाया जाने वाला एक फल है जिसे पील कहते हैं। यह अरब देशों के रेगिस्तान में भी पाया जाता है। इसकी लकड़ी का दातुन करना विशेष रूप से रमजान के महिने में पवित्र समझा जाता है।)
हमारे वैदिक धर्म में या उसकी समकालीन अन्य सभ्यताओं में कहीं किसी विशेष मूर्ति, विशेष प्रकार की प्रार्थना, धार्मिक स्थान, रहन-सहन का आग्रह नहीं है। हमारे यहाँ वैदिक युग के बाद आने वाले जैन, बौद्ध, नाथ, लिंगायत, सिक्ख आदि सम्प्रदाय हैं, धर्म नहीं है। वे एक प्रकार से विद्वानों के अपने-अपने जीवन दर्शन हैं। इसी प्रकार दुनिया के विभिन्न दर्शनों को लिया जा सकता है। इसीलिए हम वैदिक धर्म के बाद उसके समानानंतर प्रभाव में आए अन्य विचारों और दर्शनों को हिन्दू धर्म में ही मानते हैं। हालांकि हिन्दू शब्द बहुत नया है। हम खुद उसे धर्म नहीं बल्कि एक जीवन-दर्शन/ जीवन-शैली कहते हैं जिसमें अनेक भिन्नताओं का समाहार हो जाता है। लेकिन वैदिक धर्म से दार्शनिक भिन्नता रखने वाले सम्प्रदाय अपने को अलग धर्म मानते और मनवाना चाहते हैं क्योंकि अलग झंडे और अड्डे के बिना व्यक्तिगत दाल नहीं गल सकती। इसलिए धर्म और ऊपरी भेद का धंधा करने वाले अपने दर्शन को सबसे भिन्न और अपरिवर्तनीय बताते और मानते हैं और उसकी बाह्य पहचान के लिए प्राण दे देने और ले लेने को ही धर्म मानते हैं। वही मोक्ष का द्वार और जीवन की परम उपलब्धि है।
आज लिंगायत यदि अपने को अलग तरह से पहचाना जाना चाहते हैं तो देश की एकता को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। हाँ, उस सम्प्रदाय के कुछ लोगों को अल्पसंख्यक के नाम से कुछ सुविधाएँ मिल जाएँ। लेकिन मानवीय गरिमा और सुविधाएँ किसी धार्मिक पहचान की मोहताज क्यों हो।
यह कट्टरता है। यही विभेद है। यही अन्याय है। यही समस्या है। विभेद का धंधा करने वाले सभी इस बात का विरोध करेंगे। सारी दुनिया में धर्म, नस्ल, जाति, राष्ट्र आदि के हिसाब से अलग-अलग कानून न हों। समाज में आने पर, अन्यों से कार्य-व्यवहार करते समय सभी पर आवश्यक, समान, न्यायपूर्ण और नैतिक नियम लागू हों। पानी पर प्यासे का, शिक्षा पर जिज्ञासु का, भोजन पर भूखे का, औषधि पर रोगी का और न्याय पर पीड़ित का अधिकार है। मानव की बात कीजिए, मानवता की बात कीजिए, न्याय की बात कीजिए। इन्हीं में सभी धर्म, सम्प्रदाय और जातियाँ समाहित हो जाएँगी।
इसलिए यदि किसी धर्म के केंद्र अपना निजी संस्थान चलाते हैं तो चलाएँ लेकिन उनके पाठ्यक्रम और डिग्री को नौकरी के लिए मान्य नहीं किया जाए। ऐसा होने पर वे अपने निजी धार्मिक कर्मकांड की ज़रूरतें पूरी करने के लिए वांच्छित लोगों को प्रशिक्षित करेंगे। उसका किसी सरकार, सरकारी सहायता से कोई संबंध नहीं होगा।
सेन्ट्रल एडवाइजरी बोर्ड ऑफ़ एजूकेशन की सिफ़ारिश का यही मंतव्य होना चाहिए। इसे किसी भी प्रकार किसी विभेदकारी और विशेष धार्मिक उद्देश्य के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।
ज्ञान और शिक्षा को उनकी मूल भावना और प्रकृति में रहने दें। उसे राजनीति, शोषण, विभेद और अन्धता का हित साधन करने वाली न बनाया जाए अन्यथा यह दीये से घर जला लेने वाली बात होगी।

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