ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
किंवदन्ती बन गई किताब
CATEGORY : आवरण विशेष 01-May-2016 12:00 AM 1828
किंवदन्ती बन गई किताब

कीसी भी हिंदी लेखक की पुस्तक के यदि तीन संस्करण यानि 1500 किताबें प्रका¶िात हो जाए तो उसका मन टेड़ा-टेड़ा चलने लगता है। कभी कोई हिन्दी लेखक कल्पना में भी सोच नही सकता कि उसकी पुस्तक की लाख प्रति भी बिक पायेगी। ऐसे में चमत्कार होता है अनुपम मिश्र की 1993 में प्रका¶िात पुस्तक "आज भी खरे हैं तालाब' की दो लाख से भी अधिक प्रतियां बिक चुकी हैं। कुछ चोरी छिपे प्रका¶िात कर ली गई हैं उनका हिसाब यहां नही है। ने¶ानल बुक ट्रस्ट सहित अन्य छह प्रका¶ान गृहों ने इसे प्रका¶िात किया है। इसे सात आठ भाषाओं में अनुवादित किया जा चुका है। आ¶चर्य ये है कि इसके विभिन्न भाषाओं और "ब्रोन लिपि' सहित चालीस संस्करण बाज़ार में उपलब्ध हैं और अनेक संस्करणों में लेखक श्री अनुपम मिश्र का नाम नहीं है। इस पुस्तक का संयोजन व ¶ाोध ¶ाीना व मंजुश्री ने किया है वहीं अपने अद्भुत रेखाचित्रों से सजाया है दिलीप चिंचालकर ने।
दे¶ा के इक्कीस आका¶ावाणी केंद्रों ने इसे पूरा का पूरा प्रसारित किया है। कुछ केंद्रों ने श्रोताओं के आग्रह पर दोबारा व तिबारा भी प्रसारित किया है,  सुहासिनी मुले ने इस पर एक फ़िल्म बनाई है "नेचर टुडे'। गुजराती की पत्रिका "जन्मभूमि' में इसे अनुवादित करके धारावाहिक रूप से प्रका¶िात किया गया। भोपाल के संपादक ¶ाब्बीर कादरी ने इसे उर्दू में अनुवादित करके एक वि¶ो¶ाांक प्रका¶िात किया। बांग्ला में इसका अनुवाद किया निरुपमा अधिकारी ने। सुहासिनी मुले ने इस पर वृत्तचित्र बनाया है ।
अठारह वर्ष तक प्रतिवर्ष एक लाख रुपया कमाने के बाद गाँधी ¶ाांति प्रतिष्ठान ने अपने मुनाफे से मुक्त कर दिया है। कभी इस ऐतिहासिक पुस्तक के लेखक अनुपम मिश्र ने अपनी सफलता से मगरूर होकर कोई ¶ाोर नही मचाया।
दिल्ली वि·ा विद्यालय के हिन्दी पाठ्यक्रम में अच्छी हिन्दी के उदाहरण स्वरूप इस पुस्तक के अं¶ा पाठ्यक्रम में दिए गए हैं। हो सकता है ये काव्यमय  भाषा उन्हें अपने पिता कवि भवानी प्रसाद मिश्र जी से विरासत में मिली है । बानगी इन पुस्तक अं¶ा में देखिये --- "अनपूछी ग्यारस है। अब क्या पूछना है। सारी बातचीत पहले हो ही चुकी है। तालाब की जगह भी तय हो चुकी है, तय करने वाली आँखों में ना जाने कितनी बरसातें उतर चुकी हैं इसलिए वहां ऐसे सवाल नहीं उठते कि पानी कहाँ से आता है। कितना पानी आता है, उसका कितना भाग कहाँ रोका जा सकता है। ये सवाल नही हैं, बातें हैं, सीधी सादी, उनकी हथेलियों पर रखी। इन्हीं में से कुछ आँखों ने पहले भी तालाब खोदे हैं।' या "----वरुण देवता का स्मरण है। तालाब कहीं भी ख़ुद रहा हो, दे¶ा के एक कोने से दूसरे कोने तक की नदियों को पुकारा जा रहा है। ¶लोकों की लहरें थमती हैं, मिट्टी में फावड़ा के टकराने  की खड़खड़ाहट से। पाँच लोग पाँच परात, मिट्टी में खोदते हैं। दस हाथ परातो को उठाकर पाल पर डालते  हैं। यहीं बंधेगी पाल। गुड़ बँट जाता है। आखों में बसा तालाब का पूरा चित्र फावड़े से नि¶ाान लगाकर, ज़मीन पर उतार लिया गया है।'
बात दिल्ली से ही ¶ाुरू की जाए-दिल्ली में अंग्रेजों के आने से पूर्व 350 तालाब थे। इन्होंने वॉटर वक्र्स बनवाया, तालाब भरकर नल लगवाये गए। गुस्से में स्त्रियां लोक गीतों में गाली गातीं, "फिरंगी नल मत लगवा दियो' लेकिन बरसों बाद गलती समझ में भी आई तो क्या क्योंकि पाइप बिछाने व नल लगाने से ¶ाहर को पानी नहीं दिया जा सकता क्योंकि तालाबों पर मोहल्ले, बाज़ार, स्टेडियम खड़े हो चुके थे। उदाहरण तो और भी हैं- सन् 1800 में मैसूर में 39000 तालाब थे। सन् 1831 में अंग्रेजों ने इन्हें दी जाने वाली रा¶िा आधी कर दी तो ये सूखते चले गए। इन्दौर का बिलावली तालाब हो या सागर का तालाब - सरकार की लापरवाही के कारण सूख मरे। आज तुर्रा ये है कि इन्दौर में पानी लाने के लिए योजनायें चलती रहती हैं। देवास में सारे तालाब भर दिए गए तो सन् 1990 में इन्दौर से पचास  टैंकर पानी लेकर रेल से लाये गए। खर्च का अनुमान सहज  ही लगाया जा सकता है। ये घटनायें इंगत करती हैं कि किस तरह तालाबों की उपेक्षा के कारण भारत में जल की समस्या उत्त्पन्न हो गई है। इसी पुस्तक से तालाब खोदने के आंदोलन की ¶ाुरुआत हुई थी।
पाठकों का अपार तालाब उमड़ा देनी वाली यह पुस्तक अपने आप में चमत्कार है क्योंकि इस पुस्तक के कारण ही भारत में स्थान-स्थान पर मृत प्राय तालाब छलक उठे हैं, राजस्थान में सूखे तालाबों में पानी लहरा रहा है, हरियाली छा गई है, अवि¶वसनीय लगता है ना? इस किताब के बारे में अनुपम जी बताया कि ये किताब 1993 में प्रका¶िात हुई थी। मैंने 1983 से इसको लिखने की योजना बनाई थी। जगह-जगह यात्रायें की, जहाँ भी सामग्री उपलब्ध थी उसका अध्ययन किया। आगे वे बताते हैं कि बीसवीं सदी के उत्तरार्ध से वैज्ञानिक भविष्य में होने वाली पानी की कमी से चिंतित थे। मैंने सोचा सैकड़ों, हजारों तालाब ¶ाून्य से अचानक प्रगट नहीं हुए होंगे। इनके पीछे इकाई थी बनवाने वालों की, दहाई थी बनाने वालों की। यह इकाई, दहाई सैकड़ा हज़ार बनती थी, लेकिन पिछले दो सौ वर्ष में नए किस्म की पढ़ाई पढ़ गए समाज ने इन्हें लगभग ¶ाून्य की तरफ धकेल दिया। इस समाज में उत्सुकता भी नही बची कि समाज को पानी यानी जीवन देने वाले तालाब कौन बनाता रहा?
पुस्तक का आरंभ पाटन के चार भाइयों की एक प्राचीन घटना से होता है कि किस तरह एक भाई की बेटी को अपने खेत में पारस पत्थर मिला और वे उसे सरकारी संपत्ति समझ कर राजा को देने गए। राजा ने वह पत्थर उन्हें दे दिया व कहा, "इससे आप रुपया कमाइये व उससे तालाब खुदवाते जाइये।' उन भाइयों के नाम के तालाब आज भी वहां मौजूद हैं।
ये पुस्तक स्पष्ट करती है कि तालाब के अंग भी होते हैं जैसे आगौर, आगर व पाल। तालाब से जुड़े बहुत रोचक किस्सों का भंडार है ये पुस्तक -- जैसे बिहार की एक महरानी  को रोज़ एक ही तालाब में नहाना पसंद नहीं था तो महाराजा ने उनके लिए 365 तालाब खुदवा दिये थे। गड़वाल के सहरुाताल नामक स्थान पर सचमुच ही सहरुाताल हैं।
मज़े की बात ये है कि कई तालाबों के नाम आसपास की कहानियों से जुड़े हुए हैं। कहते हैं जामगढ़ के राजा ने एक   तोप बनवाई जिसके चलाने से बीस मील दूर एक गढ्ढा बन गया। बारि¶ा आने पर ये तालाब बन गया। इसका नाम ही गोलाताल पड़ गया था। मुंगेर के राजा की पाँच बेटियों ने पहाड़ी के पास बने तालाब में कूदकर जान दे दी थी तो उस तालाब का नाम बन गया "हा हा पंचकुमारी  ताल'। राजस्थान की प्रसिद्ध लोकगायिका जस्मा ओदन धार नगरी के तालाब पर काम कर रही थी। जब राजा भोज ने उसे देखा तो राज पाट तक छोड़ने का फैसला ले लिया था। जस्मा ने राजा की रानी बनने से पहले मरना पसंद किया। आज भी फ़सल काटने के बाद रात-रात भर जस्मा के गीत उड़ीसा से लेकर  छत्तीसगढ़, मालवा, महकौ¶ाल, राजस्थान व गुजरात मे गाये जाते हैं।
प्राचीन राजाओं ने कुछ युक्तियां खोज रक्खी थीं, जिससे जनता की रुचि तालाब में बनी रहे इसके लिए वे जनता को ल्हास खेलने आमंत्रण देते थे जिसके अंतर्गत वे सभी के साथ तालाब के पाल पर मिट्टी डालते थे। जैसलमेर मे घड़सीसर तालाब में ख़ुद सबसे पहले राजा तलाब  की मिट्टी काटकर तगाड़ी भर कर डालता था। राजा तेजसिंह पर तो पाल पर हमला हुआ था, वे मारे भी गए किन्तु फिर भी राजाओं का ल्हास खेलना बंद नही हुआ था।
ये पुस्तक जानकारी देती है कि किस तरह छत्तीसगढ़ में तालाब बनाते समय उसमें मन्दिर, बाज़ार, घुड़साल, हाथीखाना, ¶ामसान भूमि, वे¶यालय, अखाड़ों व स्कूलों की मिट्टी डाली जाती थी। इसका कारण ये रहा होगा कि हर वर्ग के लोग पानी के महत्व को समझें। गौड़ राजा तो उसकी लगान माफ कर देते थे जो अपनी ज़मीन पर तालाब बनाता था। बुंदेलखंड की कुछ पंचायत तो अपराधी को तालाब खोदने की सज़ा सुनती थी। किसी को कही गढ़ा हुआ खजाना मिलता था तो वह तालाब बनवा देता था। ऐसी बहुतेरी दिलचस्प प्राचीन घटनायें इस पुस्तक में पढ़ने को मिलती हैं।
इस पुस्तक से जुड़े रोचक तथ्य भी गौर करने लायक हैं। मध्यप्रदे¶ा सरकार ने जब इसकी 25 हजार प्रतियां खरीदने की माँग रक्खी तो इतना बड़ा ऑर्डर उन्हें अपनी ही प्रेस में छापकर पूरा कराना पड़ा।
भारत ज्ञान विज्ञान परिषद ने भी इसकी 25 हजार प्रतियों का प्रका¶ान किया। सूरत के हीरा व्यापारियों को इस पुस्तक के प्रभाव से ऐसा लगाने लगा कि वे सब अपनी तिजोरिया ही भर रहे हैं और असली तिजोरिया (कुएँ तालाब, बावड़ी) खाली होते जा रहे हैं तो उन्होंने अपने-अपने गाँवों में तालाब खोदने का काम आरंभ किया। उद्घाटन के समय बाजे-गाजे के साथ लेखक अनुपम मिश्र का भी सम्मान किया गया। गुजरात की अभियान संस्था ने कम पानी वाले इलाके कच्छ में सैकड़ों पानी के रुाोतों का उद्धार किया। मध्यप्रदे¶ा के पत्रकार अनिल यादव  ने इस किताब से प्रेरित होकर मध्यप्रदे¶ा के जल रुाोतों पर किताब लिखकर वहां भी उनका जीर्णोद्धार करवाया। कहना न होगा दे¶ा के हर हिस्से में तालाबों का काम हुआ लेकिन देवघर, बिहार झारखंड के रावण तालाब व सागर के वि·ा विद्यालय तालाब की खुदाई का किस्सा बहुत म¶ाहूर हुआ है।
इस किताब से प्रेरणा लेकर अरावली की ढलान पर छोटे-छोटे बाँध बनाकर नदियों को जीवनदान दिया गया है जिससे जंगल को नया जीवन मिला।
1907 के गज़ेटियर में एक अंग्रेज़ ने दे¶ा का "व्यवस्थित' इतिहास लिखा था जिसमें तालाब से जुड़े कुछ किस्सों का उल्लेख है, लेकिन तालाबों पर ¶ाोध व लेखन करके अनुपम मिश्र ने सारे भारत को अपना ऋणी  बना दिया है। इस पुस्तक से प्रेरित होकर आज तक भारत में लगभग पैंतीस  हज़ार के क़रीब तालाब खोदे जा चुके हैं व अभी भी लोगों का तालाब बनाना जारी है।
जैसे कि तालाब समाज की साझी मिल्कियत होती है वैसे ही यह पुस्तक भी अब समाज की साझा विरासत हो गई है। उल्लेखनीय है कि पुस्तक के लेखक अनुपम मिश्र ने अपना लेखकीय अधिकार (कॉपीराइट) इस पुस्तक से हटा कर घोषणा की  है- "इस पुस्तक की सामग्री का किसी भी रूप में उपयोग किया जा सकता है। रुाोत का उल्लेख करें तो अच्छा लगेगा।'

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