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खयाली पुलाव
01-Feb-2018 09:48 AM 1534     

कभी सोचती हूँ कि एक किताब लिख लूँ। कम से कम इतना तो लिख ही लिया अब तक कि एक-दो पुस्तकें आसानी से छाप जाएँ। यकीन मानिए बहुत ज्यादा अनुभव नहीं है अभी लिखने का फिर भी किताब लिखने की समझ आ गयी है, ऐसा मुझे लगता है। पर दूसरे ही पल सोचती हूँ कि क्या करूंगी किताब लिखकर। जहां अखबार पढ़ने वाले शौकीनों की कमी हो गई है, वहाँ मेरी पुस्तक कौन पढ़ेगा? अखबार वालों के पास एक उद्योग और होता है, विज्ञापन छापने का। मेरे पास तो वो भी नहीं। फिर क्यों आकर्षित करेगी मेरी पुस्तक, और सबसे बड़ा सवाल कि किसे करेगी? पाठक अब दिये की रोशनी में भी ढूँढने से नहीं मिलने वाले, फिर..., फिर कौन पढ़ेगा इतनी मेहनत से लिखी गई किताब को। अब इसकी भी कोई मार्केटिंग होगी तो उसके भी गुर सीखने होंगे। यही बचा है अब लेखक के लिए, इतने बुरे दिन देखने को मिलेंगे किसी ने सोचा नहीं होगा। सुझाव भी ऐसे-ऐसे आते हैं कि...। पुस्तक मेले में देखा जाए तो पाठक कम लेखक ज्यादा मिलेंगे, अपनी पुस्तक की बोली लगाते हुये। क्या करें बिचारे, लिख चुके हैं, किसी को तो पढ़वाना ही होगी अपनी पुस्तक। सब कुछ स्पोंसर्ड हो गया है, चाहे वह प्रकाशक, लेखक या पाठक कोई भी हो। किसी से ये कहा जाए कि जरा फलानी किताब पढ़कर देखिये। बिना सोचे पहला वाक्य उनके मुंह से निकलेगा- जरा भिजवा दें। मतलब मुफ्त में पढ़ने के लिए किताब चाहिए और उसके बाद क्या ग्यारंटी कि वे आपकी किताब को उतनी ही आत्मीयता से पढ़ेंगे या नहीं।
लेखक यहाँ बेचारा हो जाता है और पाठक उग्र। न पढ़ी तो पुस्तक की समीक्षा कैसे होगी और फिर पुस्तक चर्चा में कैसे आएगी। न पुस्तक का नाम होगा न लेखक का। प्रकाशक के लिए तो फिर भी यह कोई आखरी रास्ता नहीं है।
सच में स्थिति यही है कि किताबों का जहां अंबार लग रहा है वहीं पाठकों कि संख्या में लगातार कमी आ रही है। फिर इन पुस्तक मेलों का क्या प्रायोजन। अपने-अपने लोगों को बुलाकर पुस्तक का लोकार्पण कर उन्हीं लोगों में मुफ्त की रेवड़ियों की तरह किताबों को भी बाँट दो। मतलब इतना सब करने का क्या फायदा?
मेरे दिल में कभी-कभी ऐसे ही मुफ्त का खयाल आता है कि क्यों न पुस्तक मेले को गांवों में पहुंचाया जाए। जहां छद्म पाठकों की संख्या नहीं होगी। बड़े-बड़े शहरों में फुरसत नहीं लोगों के पास किताब पढ़ने की और जिसे शौक है वो किंडल या पेनड्राइव या मोबाइल या फिर लैपटॉप का उपयोग पढ़ने के लिए कर लेता है। सस्ता और सहज होता है इन्हें कहीं भी ले जाना। फिर इतनी महंगी हार्ड कॉपी की जरूरत ही क्या? अब बचे वे लोग जो पुस्तक पढ़ने के शौकीन होते हुये भी उन तक किताबें नहीं पहुँच पाती हैं। क्या ऐसा समय नहीं आ गया जब पुस्तक मेले के स्वरूप को कुछ हद तक बदला जाये? क्यों यह केवल बड़े से शहर में ही सिमटा हुआ है? कई ऐसे लोग भी हैं जो शौक पालकर भी पहुँचने में असमर्थ हैं। वैसे भी बड़े शहरों में पुस्तक मेले का दूसरा नाम अँग्रेजी उत्सव है। फिर हिन्दी पुस्तकों को कौन पढ़ेगा? पर ये क्यों भूल जाते हैं कि हमारी जड़ें अब भी गाँव में ही हैं। पुस्तकों का रुख थोड़ा उधर कर दीजिये, कम से कम कबाड़ खाने की शोभा तो नहीं बनेंगी। कुछ सस्ता कर दीजिये, पढ़ने के लिए ऐसी किसी प्रतियोगिता का आयोजन भी कर सकते हैं जिसमें ज्यादा से ज्यादा पढ़ने वाले को उचित ईनाम दिया जाये। समझ में आ जाएगा पढ़ने में कितनी रुचि है लोगों की। बड़े शहरों में तो मेरे खयाल से इतने बड़े आयोजन की आवश्यकता ही नहीं बची। इलेक्ट्रॉनिक गजेट्स के द्वारा पुस्तकों को पढ़ने के लिए रख देना चाहिए। जहां पेपर की बचत होगी वहीं लागत में भी कमी आएगी। विशाल आयोजन के खर्च को गांवों की ओर प्रस्थापित कर देना चाहिए। जो पढ़ने से दूर हैं उन्हें पढ़ने मिल जाएगा और आयोजकों को इसका श्रेय भी मिल जाएगा। बहरहाल ये मेरी अपनी सोच है, आप क्या सोचते हैं ये आप जाने!

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