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कविता एक दो
01-Apr-2017 01:04 AM 1699     

एक

देख रहे है नींद का रास्ता एकटक
चौखट पर नज़रें टिका कर
वो दबे पाँव चली गयी
मुझसे नज़रें बचा कर
जब हम लगे खोजने
नींद को इधर-उधर
वो बैठी थी आपके नयनों में छुपकर!

दो

वो खेतों के मुंडेर पर बैठकर सखियों से बतियाना
आज भी याद है
आम के बगीचे में जाना
वो टिकोरों को चुराना फिर घर को भाग जाना
दुआर पर बैठ कर टिकोरों को खाना
वो स्वाद आज भी याद है।
खेतों के पगडण्डी पर दूर तक चलना
साथ में लहलहाते फसलों को छूना
वो छुअन आज भी याद है।
गाँव के मेले में जाना
खिलौनों को देखकर खुश हो जाना
वो आँखों की चमक आज भी याद है।
आज भी वही गाँव है
खेत है खनिहाल है
आज भी वही आम का बगीचा
वही दुआर है
आज भी वही लगते मेले हैं
बिकते वही खिलौने हैं
मैं भी वही हूँ
बस, अब वो बचपना नहीं रहा।

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