ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
कविता एक दो
CATEGORY : कविता 01-Apr-2017 01:04 AM 99
कविता एक दो

एक

देख रहे है नींद का रास्ता एकटक
चौखट पर नज़रें टिका कर
वो दबे पाँव चली गयी
मुझसे नज़रें बचा कर
जब हम लगे खोजने
नींद को इधर-उधर
वो बैठी थी आपके नयनों में छुपकर!

दो

वो खेतों के मुंडेर पर बैठकर सखियों से बतियाना
आज भी याद है
आम के बगीचे में जाना
वो टिकोरों को चुराना फिर घर को भाग जाना
दुआर पर बैठ कर टिकोरों को खाना
वो स्वाद आज भी याद है।
खेतों के पगडण्डी पर दूर तक चलना
साथ में लहलहाते फसलों को छूना
वो छुअन आज भी याद है।
गाँव के मेले में जाना
खिलौनों को देखकर खुश हो जाना
वो आँखों की चमक आज भी याद है।
आज भी वही गाँव है
खेत है खनिहाल है
आज भी वही आम का बगीचा
वही दुआर है
आज भी वही लगते मेले हैं
बिकते वही खिलौने हैं
मैं भी वही हूँ
बस, अब वो बचपना नहीं रहा।

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