ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
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पचमढ़ी : एक शब्द चित्र
01-Mar-2017 11:56 PM 494
पचमढ़ी : एक शब्द चित्र

विन्ध्य की अंतिम हद को छूकर बहती,
पवित्र नर्मदा की अथाह जलराशि के पार,
सतपुड़ा की सुरम्य पहाड़ियों पर,
प्रकृति की अलौकिक छटाओं के बीच बसी-
सलोनी पचमढ़ी!

घुमावदार पहाड़ी र

हिंदी भाषा अपनी बोली
01-Mar-2017 11:53 PM 487
हिंदी भाषा  अपनी बोली

हिंदी भाषा

गूँजे हिंदी भाषा मन में
मुरली बजे ज्यों वृंदावन में

हिंदी भाषा के मतवाले
इसको तन-मन से सुनते हैं
इसके सारे भक्त निराले
इसके सपने ही बुनते ह

रिश्ते
01-Mar-2017 11:49 PM 485
रिश्ते

रिश्तों की रंग-बिरंगी कतरनें
रखी हैं संजो कर मैंने।
ये रिश्ते आम हैं, कोई खास नहीं
इनके बनाने-बिगड़ने पर मेरा जोर नहीं।

इन नज़ाकत रिश्तों की
हिफ़ाज़त करो, तो सब है


एक दो
01-Mar-2017 11:44 PM 482
एक दो

एक
नया रूप धरके खनकाती कंगना
रुनझुन बजाती रुपहली पायलिया
मुस्कान होठों पर सजा कर मोहनिया

जवाँ नूर चेहरे पर है दमकता
आती है सज-धज के दूर ही से लुभाती
अकेले मे

क्या खोया क्या पाया पतझड़ की पगलाई धूप
01-Mar-2017 11:39 PM 484
क्या खोया क्या पाया  पतझड़ की पगलाई धूप

क्या खोया क्या पाया

अनगिन तारों में इक तारा ढूँढ रहा है,
क्या खोया क्या पाया
बैठा सोच रहा मन।
 
छोटा-सा सुख मुट्ठी से गिर
फिसल गया,
खुशियों का दल हाथ

पलाश शिरीष के फूल
01-Feb-2017 12:57 AM 761
पलाश शिरीष के फूल

पलाश

झूम रहे हैं पलाश
हौले-हौले
ओढ़ ओढ़नी
नुपुर बजाते खवाबों के
खिल गये हैं
पलाश

मौसम के आँगन में
अहसास के परिंदों पर
सु


मेरी कविता
01-Feb-2017 12:52 AM 684
मेरी कविता

गाय को गुड़
चिड़िया को दाना
भूखे की रोटी है कविता
सूरदास की आंख
जटायू पांख है कविता
कभी खेत की फसल
वीरों की नस्ल है कविता

पर आज उदास है मेरी कविता
बाजा

मूक दीवारें मोह के धागे
01-Feb-2017 12:48 AM 656
मूक दीवारें मोह के धागे

मूक दीवारें

जिंदगी की चहक कुछ और ही होती
काश दीवारें सुनने के साथ
कुछ कह भी सकतीं
जमाना जान जाता
भीतर उमड़ते
उस ज्वालामुखी का आक्रोश
कई रा

ऋतुराज बसन्त
01-Feb-2017 12:45 AM 654
ऋतुराज बसन्त

आ गया ऋतुराज बसन्त ।
छा गया ऋतुराज बसन्त ।।
हरित घेंघरी पीत चुनरिया  
पहिन प्रकृति ने ली अँगड़ाई
नव-समृद्धि पा विनत हुए तरु
झूम उठी देखो अमराई।
आज सुखद सुरभित सा क


मन व्यथित मेरे प्रवासी गीत में जो ढल रहा है
01-Feb-2017 12:40 AM 642
मन व्यथित मेरे प्रवासी  गीत में जो ढल रहा है

मन व्यथित मेरे प्रवासी

आज फिर इस धुन्ध में डूबी हुई स्मॄति के किनारे
किसलिये तू आ गया है? ओढ़ कर बैठा उदासी

स्वप्न की चंचल पतंगों का अभी तक कौन धागा

यहाँ पर भीड़ में सब अजनबी हैं
01-Jan-2017 01:52 AM 2504
यहाँ पर भीड़ में सब अजनबी हैं

शायर जनाब अनवारे इस्लाम की बात करती हुई ग़ज़लों की किताब का शीर्षक है- मिजाज़ कैसा है।
उस की आँखों में आ गए आंसू
मैंने पूछा मिजाज़ कैसा है
दूर तक रेत ही चमकती है
कोई पानी नहीं है धो

गुनियाँ प्लैटफ़ॉर्म
01-Jan-2017 01:46 AM 2506
गुनियाँ प्लैटफ़ॉर्म

गुनियाँ

माँ ने चिरैया का नाम
रखा था "गुनियाँ"
कभी सूप पर आ बैठती
और तकती थी माँ की ऐनक को
कभी फुदक कर
आरसी (दर्पण) के सामने जा बैठती थी
लड़त


ऐ जिंदगी तू मेरी धुन गा के तो देख
01-Jan-2017 01:38 AM 2494
ऐ जिंदगी तू मेरी धुन  गा के तो देख

ऐ जिंदगी

ऐ जिंदगी गर्दिश का तारा न बन
बेशक धूप और छाया न बन
बनना है तो बन जा मेरी हिम्मत
यूं काँटों का ताज न बन।

मेरे रूठे अल्फाज की कहानी

स्वीकार
01-Jan-2017 01:33 AM 2108
स्वीकार

नैया पर मैं बैठ अकेली
निकली हूँ लाने उपहार
भव-सागर में भंवर बड़े हैं
दूभर उठना इनका भार
ना कोई मांझी ना पतवार
खड़ी मैं सागर में मंझधार
फिर भी जीवन है स्वीकार।

रा

उम्मीद का आसमान
01-Jan-2017 01:22 AM 2110
उम्मीद का आसमान

देश में हर जगह नक़ली नोट थे
डरता था बिना जुर्म के पकड़ा ना जाऊँ
देश की मुद्रा बदल दिल से
डर की याद भुला दी मोदी ने।

डर लगता था सड़क पे निकल कर
कहीं कोई आतकंवादी बम न फ


चिन्ता
01-Jan-2017 01:17 AM 2109
चिन्ता

कहते हैं लोग
कोई साथ नहीं निभाता
चिन्ता से पूछो
कैसे नाता निभाया जाता
चिन्ता तो परछाई है
कब अलग किसी से रह पाई
विरला ही होगा
जिसे इसने नहीं घेरा
सब को एक

प्रेम का बन्धन
01-Jan-2017 01:13 AM 2491
प्रेम का बन्धन

लम्बा प्रवास, भारत की तैयारी थी, न थे पैर जमीं पर
आकाश में मैं उड़ती थी, आ पहुँची मैं वतन अपने पर
इन्दिरा गाँधी एयरपोर्ट पर, धीमी बत्तियां जलती थीं
अमेरिका की चकाचौंध के बाद, मीठी-सी

प्रकृति अनंत
01-Dec-2016 12:00 AM 1309
प्रकृति अनंत

प्रकृति

एक आम, मामूली-सी पहाड़ी-सी लड़की
सीढ़ीनुमा खेतों में  बेफ़िक्र घूमती-सी लड़की
देखकर जल जाए कोई ख़ुशगवार-सी लड़की,
पर कुछ ख़ास नहीं, क्यों? आकर्षक-सी लड़क


युद्ध की कालिख
01-Dec-2016 12:00 AM 1305
युद्ध की कालिख

भूरी धरती के स्याह माथे पर
तुमने देखी है युद्ध की कालिख?
खून, बारूद में सने बच्चे!
अपने हाथों में माँ का हाथ लिए
एक आवाक बेजुबां बच्ची!
तुमने देखा है अपने लालच को
बम ध

बंधन में स्पंदन
01-Dec-2016 12:00 AM 1299
बंधन में स्पंदन

तुझे क्या हुआ?
तू तो ठीक है, मस्त है
पका पेड़ है, फिर भी स्वस्थ है
मेरा क्या?
माँ मेरा क्या....

कर्तव्यों की सूली पर चढ़ा हूँ
अधिकारों की बाढ़ में फंसा हूँ

माँ का सिंगार
01-Dec-2016 12:00 AM 1310
माँ का सिंगार

निज भाषा के प्रचार
और प्रसार के लिए
हर प्रयास तुम करो
हाँ ये आस तुम करो
विकास तुम करो।

माँ भारती की गोद में लेखनी स्वतंत्र है
है बोलने का हक़ भी विचार भी स्व


इबारत देवदास
01-Dec-2016 12:00 AM 1301
इबारत देवदास

इबारत

ज़िन्दगी से शिकायत अक्सर तो कभी बाद मुद्दत करते हैं,
उस मुलाकात के बाद अब हम  रंगों से मुहब्बत करते हैं
हम चंद हर्फ़ लिखते हैं जज़्बात से  हमे शायर न समझो
वो

गीत लिखूं मैं ऐसा मेघा ऐसे बरसो तुम
01-Dec-2016 12:00 AM 1297
गीत लिखूं मैं ऐसा मेघा ऐसे बरसो तुम

इक गीत लिखूँ मैं ऐसा कल-कल झरने जैसा।
दिल में सोयी आग जला दे
परिवर्तन का बिगुल बजा दे
निज हाथों किस्मत लिखने का
मन में दृढ़ संकल्प जगा दे
पावन गीता के जैसा, मीरा भक्ति के जै

बदली दिया याद घुटन
01-Dec-2016 12:00 AM 1306
बदली दिया याद घुटन

बदली

आज बदली है
मेरी यादों से बचना
काई है
उन राहों की फिसलन से बचना
पगडण्डी सूखेगी तभी
जब लम्बी धूप होगी
इन्तज़ार करना।
अहसास
न छूना
न पास आना


कहाँ है चाँद की वह चाँदनी?
01-Dec-2016 12:00 AM 1293
कहाँ है चाँद की वह चाँदनी?

कहाँ है चाँद की वह चाँदनी
शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा की
रजतमय वह रोशनी?
प्रश्नकर्ता मैं नहीं
वह है पक्षियों की मंडली
भूख प्यास को त्यागकर
भ्रमण करते दूर तक
आँखे

एक दो
01-Dec-2016 12:00 AM 1305
एक दो

एक

कई साल पहले किसी ने उसके हाथ में
कुछ कागज़ पकड़ाए थे
जो आज पीले से बीमार पड़े हैं
उसकी ज़ेब में

एक पीला बीमार-सा वातावरण घेरे है
ग्यारह मंज़िल की इस इमा

दूसरा पहलू
01-Nov-2016 12:00 AM 2128
दूसरा पहलू


सभ्यता का दूसरा पहलू
विकास का वीभत्स चेहरा
उघाड़ देती है आग
जलकर-झुलसकर मरती
जीव-जातियों की दर्दनाक चीखें
और उससे भी भयानक
खामोशियों के बीच
बहरे बने हु


रंग मंच
01-Nov-2016 12:00 AM 2133
रंग मंच

जरस बज रहा है
गुंबद ऊंचाई का प्रतीक
आधार स्तम्भ
बाहुबलि भुजाएँ

कमल मकरंद से सुरभित
मूर्तिमान देवता
वैभव के रसिया पुजारी
रूप के दीवाने पुरोहित

हवा

आज का शिवाला
01-Nov-2016 12:00 AM 2127
आज का शिवाला

पहले थी कतारें,
पात्र हाथ में गोरस का
व्याकुलता रहती, मन में
कब दर्शन होगा अर्घा का।

आज भी दिखती वही कतारें
हाथ में पैसा मेहनत का
मन सबका व्याकुल उतना ही

दरवाजे और खिड़कियाँ
01-Nov-2016 12:00 AM 2124
दरवाजे और खिड़कियाँ

दरवाज़े व्यवहारिक होते हैं
और खिड़कियाँ भावुक।

दरवाज़े सिर्फ समझते हैं
साँकल की बोली
कदमों की आहटें।

खिड़कियाँ पहचानती हैं
दबे पाँव पुरवाई का
चुपके से अंद

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