ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
कविता Next
अंतद्र्वंद
फिर से वो ही आग जलेगीफिर से वो पानी बरसेगाबबली का दिल रो रोकर फिर से पापा को तरसेगा।माँ के सूखी छाती भी सोचे मुन्ना कैसा होगाशायद निंदा करते नेता के मन में जिंदा होगा। फिर से आंगन में टूटी चूड़ी के ...
कैसा सफ़र राह देख रही हूँ
कैसा सफ़र माचिस की तीली-सा जीवन जला बुझाजो दिखलाती थी ख़्वाब उन रातों का क्या हुआज़िंदगी ने मुझे डाला किस उलझन मेंन दौड़ ख़त्म हुई न जीत ही सकाअपनी मर्जी से किस्मत कैसे लिखवातेएक अधूरापन मेरा हम सफर...
वरदान
दुखी दिख रहे थे पंडित जी, हुयी दोस्त को चिंता भारीउसने कहा कहो पंडितजी, तुम्हे हो गयी क्या बीमारी?पंडित जी ने कहा कि मेरी पत्नी से हो गयी लड़ाईपूरे हफ्ते कुछ न बोलने की उसने सौगंध उठाई। कहा दोस्त ने कठिन नहीं कुछ, शपथ श्रीम...
दीघा का मोहना तट शिमला में साँझ
दीघा का मोहना तट यहां वृंदावन की सुगंधित गलियां नहीं नहीं है इत्रों का कारोबार यहां राधा-कृष्ण ने कभी नहीं रचाया महारासगोपियों की करतल ध्वनियों से नहीं गूंजा कभी मोहना तक फिर भी सुंदर है इस तट ...
समय की शिला पर नए साल! अब के जो आना
समय की शिला पर यह समय की शिला हैइससे छेड़छाड़ मत करनाजो कुछ भी फुसफुसाओगेइस पर खुद जाएगादिल में कितना गहरा छिपा होजगजाहिर हो जायेगादेना पड़ेगा हर प्रश्न का उत्तरहर प्रश्न कचहरी हो जाएग...
हम जो चाहते हैं
सहलाना चाहते हैंहम तुम्हारी कोमल भावनाओं कोमानवता के स्नेहिल स्पर्श सेजिसकी छुअनजीवन भर रोमांचित करती रहे तुम्हेंऔर जिस किसी को भी छू लेतुम्हारी परछाईंस्पंदित होता रहेपुलक सेवो भी सारी उम्र...
आज मैं जब भी
आज मैं ये देशों की दुनिया, ये विदेशों का युग हैयूँ ही सब ये दिन-रात इक हो चले हैंयहाँ चाँद छुपता है या अब सहर देखें क्यूँ मेरे ये दिन-रात एक हो चले हैं वो छत पे सुबह चिड़ियों का डेरावो सवेरे की ठंडक में नींदो...
सन्त ट्रम्प परिवर्तन
सन्त ट्रम्प सौ सौ चूहे खाय कै बिल्ली बन गई सन्तझूठ हजारों बोलि कै ट्रम्प बना प्रेसीडेन्टशपथ ग्रहण में सब कहैं सदा बोलिहैं साँचट्रम्प मनहिं मन बोलिया बोलिहउँ सदा असाँचदारू पी कै सरल जन झूठ बोलिहैं भायदारु न पीव...
सच से आज मुलाकात हो गई
धूमिल, कांतिहीन स्वरूप देखकरमैंने पूछ ही लिया यह कैसा रूप बनाया है? दर्शन भी दुर्लभ हो लिए हैं अब तो सच ने कहा, इस युग ने ही यह स्वरूप दिया हैझूठ ग्रहण बनकर मुझे आधा या कभी पूरा ही निगल जाता हैमैंने तर्क क...
बचपन के दोस्त
पर्वत की चोटी से जब बर्फ पिघलने लगती है भूली भटकी नन्ही चिड़िया जब दाना चुगने लगती है तितली मंडराते देख जब कलियाँ शर्माने लगती हैंओस दमकती फूलों परजब पंछी गाना गाते हैंबचपन के दिन सताते हैं तब द...
सितंबर की हवा मेरा समय
सितंबर की हवा सरसराती, फरफरातीअपने रेशमी परों में आसमान को समेटतीदेर बाद मिलने वाली सहेली की तरह मुझसे लिपटती सितंबर की हवा। कुछ भींनी, कुछ नमकुछ शीतल, कुछ गरमकुछ तेज, कुछ मध्यम...
चरवाहे के साथ शब्द हो जाते हैं दुर्निवार
चरवाहे के साथ मैं नहीं समझता राग-बन्दिशें-ख्याल, आरोह-अवरोह फिर भी बहुत अच्छा लगता है तुम्हारा गाना लय-अलय। तुम्हारे स्वर आकुल बार-बार झंकृत करते हैं मन क्या होता है ऐसा किउदासी ...
QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 12.00 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^