ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
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हम जो चाहते हैं

सहलाना चाहते हैं
हम तुम्हारी कोमल भावनाओं को
मानवता के स्नेहिल स्पर्श से
जिसकी छुअन
जीवन भर रोमांचित करती रहे तुम्हें
और जिस किसी को भी छू ले
तुम्हारी परछाईं
स्पं

आज मैं जब भी

आज मैं

ये देशों की दुनिया, ये विदेशों का युग है
यूँ ही सब ये दिन-रात इक हो चले हैं
यहाँ चाँद छुपता है या अब सहर देखें
क्यूँ मेरे ये दिन-रात एक हो चले हैं

वो छत पे सु

सन्त ट्रम्प परिवर्तन

सन्त ट्रम्प

सौ सौ चूहे खाय कै बिल्ली बन गई सन्त
झूठ हजारों बोलि कै ट्रम्प बना प्रेसीडेन्ट
शपथ ग्रहण में सब कहैं सदा बोलिहैं साँच
ट्रम्प मनहिं मन बोलिया बोलिहउँ सदा असाँच

सच से आज मुलाकात हो गई

धूमिल, कांतिहीन स्वरूप देखकर
मैंने पूछ ही लिया
यह कैसा रूप बनाया है?
दर्शन भी दुर्लभ हो लिए हैं अब तो
सच ने कहा, इस युग ने ही यह स्वरूप दिया है
झूठ ग्रहण बनकर मुझे आधा य

बचपन के दोस्त

पर्वत की चोटी से जब
बर्फ पिघलने लगती है
भूली भटकी नन्ही चिड़िया
जब दाना चुगने लगती है
तितली मंडराते देख जब
कलियाँ शर्माने लगती हैं
ओस दमकती फूलों पर
जब पंछी ग

सितंबर की हवा मेरा समय

सितंबर की हवा

सरसराती, फरफराती
अपने रेशमी परों में आसमान को समेटती
देर बाद मिलने वाली
सहेली की तरह मुझसे लिपटती
सितंबर की हवा।

कुछ भींनी, कुछ

चरवाहे के साथ शब्द हो जाते हैं दुर्निवार

चरवाहे के साथ

मैं नहीं समझता
राग-बन्दिशें-ख्याल, आरोह-अवरोह
फिर भी बहुत अच्छा लगता है
तुम्हारा गाना लय-अलय।

तुम्हारे स्वर आकुल
बार-बार झंकृत

सूखे पत्ते


मुझे कुछ सूखे पत्तों पर
टहलनें की तमन्ना है
अकेले दूर तक चुपचाप
ख़ुद अपने ख़्यालों के
सिमटते फैलते सायों के
झुरमुट से जुदा होकर
नये इक मील पत्थर से
गुज़रने की

जॉब सैटिस्फेक्शन

जॉब सैटिस्फेक्शन ढूँढनी है तोे
उन्हें देखें जिनके पास
नौकरी नहीं
उन्हें देखें
जिनके भाग्य में पढ़ाई नहीं
उन्हें देखें जिनके पास
खाने का अन्न नहीं
उन्हें देखें जिन

हिंसा ढ़ोती परम्परा मौनम् स्तुति

हिंसा ढ़ोती परम्परा

हिंसा ढ़ोती क्रूर, कुरुप परम्परा
लगता है यह अजीब बड़ा।
"बलि" कहता "धर्म" पशुवध को,
कालप्रश्न कौंधता, मेरे जेहन में
है धर्म "पशु" कारण खतरे में?

काफ़ी का कप मुझे भी पेड़ बना देता

काफ़ी का कप

टेबल पर कॉफ़ी का कप
मेरी तरह चुपचाप सा
पंखे का शोर मेरे अंदर के मौन-सा
सीने के अंदर एक उमस
बिल्कुल इस मौसम के जैसी

जानती हूँ कप के तल

गुजिश्ता वक्त की तस्वीर पढ़ना आना चाहिए

गुजिश्ता वक्त की तस्वीर

किसी रतजगे को पार करके आया मुसाफिर
आंखों में फैली थकान की चादर को समेटे हुए
नींद का इंतजार नहीं करता
नींद चली आती है
सफेद घोड़ो

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