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कवि सम्मेलन के बहाने
01-Nov-2017 04:43 PM 2517     

बड़े दिनों बाद कवि सम्मेलन और मुशायरा सुनने का सौभाग्य मिला। अनगिनत यादें ज़ेहन में दौड़ गईं। देवास के डायमंड चौराहे पर कई बड़े कवियों को सुनने का सुख मिला है। खूब जाते थे सुनने के लिए, इन्हीं कवि सम्मेलनों ने हमें परिवार, समाज और देश के लिए सोचने की समझ दी। कहते हैं न कि किसी का व्यक्तित्व उसकी परवरिश पर निर्भर करता है। ये परवरिश उसे देते हैं उसके माता-पिता, परिवार उसका शहर और उसका देश।
अपनी बात को शहर तक सीमित रखता हूं और अपनी जन्मभूमि देवास को सांस्कृतिक परवरिश के लिए धन्यवाद देता हूं। स्मृतियों की श्रृंखला को आगे बढ़ाता हूं। कविताओं-शायरी का ये शौक परवान चढ़ने के लिए कालिदास की नगरी उज्जैन से बेहतर और क्या जगह हो सकती है। कॉलेज के दिनों में कवि सम्मेलनों और जगजीत सिंह, गुलाम अली साहब की ग़ज़लों ने इस शौक को और गहरा किया। उज्जैन के विक्रमादित्य क्लाथ मार्केट, दौलतगंज चौराहा और कार्तिक मेले के कवि सम्मेलन आज भी यादों में हैं। एक बार जो कॉलेज से निकले तो छूट गया ये सिलसिला। शौक नहीं छूटा पर इस वक्त की आपाधापी में पढ़ने का शौक बना रहा और कुछ-कुछ पढ़ते-लिखते भी रहे।
कुछ सालों पहले ऊपर वाले ने अपने इस बंदे को अपने आप से मिलने का मौका दिया। अजीज दोस्त महेश ने युवा कवि आलोक श्रीवास्तव की मशहूर कविता "अम्मा" और "बाबूजी" का लिंक भेजा। आलोक जी की ये रचना तो बेमिसाल है ही साथ ही मैं भी फिर से जी उठा। फिर शुरू हो गया सिलसिला यूट्यूब पर कवियों और शायरों को सुनने का। बरसों बाद मैं एक बार फिर से शब्दों के जादूगरों के साथ एक मासूम बच्चे सा। भला हो यूट्यूब और फेसबुक का, मैं जुड़ गया एक बार फिर इस जज्बाती दुनिया से।
कुछ बरसों से किसी न किसी कारण से दुबई के कवि सम्मेलन और मुशायरे को सुनने नहीं जा सका और हमेशा मन में ये मलाल रहता था कि ऐसी भी क्या वक्त की आपाधापी कि अपने शौक को पूरा न किया जा सके। खैर इस साल ऊपर वाले की रहमत ही हो गई और एक छोड़ दो कवि सम्मेलन मुशायरे सुनने को मिल गए। यहां दुबई में कवि सम्मेलन-मुशायरे साथ ही आयोजित किए जाते हैं। इससे सुनने का आनंद कई गुना ज्यादा हो जाता है।
बरसों के बाद कवि सम्मेलन "लाईव" सुनने के सुख को कलम से शब्दों का रूप देना मेरे लिए संभव नहीं, किन्तु इतना कह सकता हूं कि दिल तृप्त हो गया।
एक कवि सम्मेलन के दौरान ऐसा कुछ हुआ जिसने मुझे यह लेख लिखने के लिए प्रेरित किया। हुआ यंू कि कविता पाठ के दौरान, कुछ जाहिल लोग (बाद में यह भी सोचा कि मैं कौन होता हूं किसी को जाहिल करार देने वाला) ऊटपटांग टिप्पणी करने लगे तो मुझ से और मेरे जैसे दो-चार लोगों से रहा नहीं गया और हमने उन्हें चिल्लाकर कहा "चुप रहो"। मन में आया कि ये कमबख़्त कौन होते हैं हमारे और कवियों के बीच आने वाले। थोड़ी देर हल्ला मचा फिर सब ठीक से चलने लगा। पर इस घटना ने मुझे बहुत उद्वेलित किया कुछ और सोचने पर मजबूर कर दिया।
पहले मैंने सोचा ये कैसे लोग थे। इस तरह कोई कैसे किसी आयोजन में बाधा पहँुचा सकता है, वगैरह वगैरह। लेकिन पुरानी यादों को खंगाला तो अपने आप से कहा कि कवि सम्मेलन तो ऐसे ही होते हैं। थोड़ा हल्ला गुल्ला, थोड़ी हूटिंग और जहां जनता को अच्छा लगा तो वाह वाह। तो फिर ये क्या हुआ मुझे, क्यों चिल्लाया में? शायद मेरा "ईमोशनल इंटोलरेंस" बढ़ गया है। अब तो चूंकि यूट्यूब पर ही कविता सुनते हैं तो सिर्फ मैं और कवि होते हैं, बीच में कोई नहीं। तो जब जितना सुनना है सुनो। पसंद आया तो फिर से सुनो, नहीं आया तो आगे बढ़ा दिया। मुकर्रर भी नहीं कहना और कवि के मूड की भी चिंता नहीं। इस मुई यूनलिका ने कवि तो पास ला दिया पर कवि सम्मेलन का असली अहसास भुला दिया। वो अहसास जिसमें कविता सुनने के आनंद के साथ, शोर-शराबा सहन करने का सामथ्र्य (वही अपना इमोशनल टॉलरेंस) होता है, एक पसंदीदा कवि के बाद किसी बोर कवि को झेलने की क्षमता होती है। मुद्दा यह प्रेषित करना चाहता हूं कि हमने जो सुख-सुविधाएँ अपने लिए जुटाई हैं उनके साथ-साथ जाने-अनजाने बहुत सारा इंटोलरेंस भी इकट्ठा कर लिया है। इस इंटोलरेंस का अहसास जिंदगी के हर पहलू में होना जरूरी है। इस कवि सम्मेलन के विस्तार को वृहद कीजिए, इसे जिंदगी के हर पहलू में महसूस कीजिए। हर तरह के लाईव कवि सम्मेलन सुनते रहिए और अपने आप से जुड़े रहिए। अपनी जमीन से जुड़े रहिये।

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