ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
कौशलेन्द्र प्रपन्न
कौशलेन्द्र प्रपन्न

एमए हिंदी और संस्कृत, हिंदी पत्रकारिता में दो वर्षीय पीजी डिप्लोमा, दिल्ली विश्वविद्यालय से बीएड, गुरुकुल कांंंगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार से एमएलआइएस और योग में एक वर्षीय डिप्लोमा। ऑल इंडिया रेडियो दिल्ली से विभिन्न साक्षात्कार, परिचर्चा, बजट टॉक आदि प्रसारित। स्कूलों में अध्यापन एवं इक्नामिक टाइम्स में बतौर कॉपी एडिटर कार्य किया। पिछले दो दशकों से भाषा एवं शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत। दो किताबें भाषा, बच्चे और शिक्षा एवं कहने का कौशल प्रकाशित। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन एवं शोध पत्रों में आलेख प्रकाशित। मीडिया और शिक्षा की किताबों में पाठ सम्मिलित।


शिक्षकीय दुनिया की कहानी के पात्र
एक सम्वाद के अंश : "इक्कीस साल के बाद पहली बार किसी कार्यशाला में बैठा हूं। बहुत अच्छा लग रहा है। वरना तो जी कार्यशाला में पढ़ाने वाले घंटे का तीन-तीन हज़ार लेकर चुटकुलों के सहारे या फिर अपनी अपनी कहानी सुनाकर चले जाते हैं। हमारा समय भी ख़राब होता है
भारतीय भाषाओं का हाशियाकरण
मैथिली के महान महाकवि विद्यापति की पंक्ति ज़रा देखें और समझें "हम नहि आजु रहब अहि आंगन जं बुढ होइत जमाय, गे माई। एक त बैरी भेल बिध बिधाता दोसर धिया केर बाप। तेसरे बैरी भेल नारद बाभन। जे बुढ आनल जमाय। गे माइ।।" विद्यापति की काव्य संपदा से जो बेहद सह
शिक्षा नीति प्रारूप में भाषाई संस्तुतियां
हमारे समाज में भाषाओं को लेकर अपनी-अपनी धारणाएं मौजूद रही हैं। इनसे सावधानी और विवेकपूर्ण निर्णय लेना अपेक्षित होता है। तभी इस मसौदे से हिन्दी शिक्षण की अनिवार्यता को हटा दिया गया। यदि हम व्यापक परिदृश्य में समझने की कोशिश करें त
किताबों का बोझ कम करने के नाम पर
इतिहास की किताब का बोझ कम करने की दिशा में एनसीईआरटी ने दसवीं की कक्षा के इतिहास की किताब से तीन पाठ हटा दिए हैं। पहले यह पुस्तक 200 पेज की थी। अब 72 पेज हटा दिए गए हैं। पाठ्यपुस्तकों का बोझ कुछ तो कम हुआ ही होगा। गौरतलब हो कि 2017 में भी एनसीईआरट
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