ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
कस्मै देवाय हविषा विधेम
01-May-2016 12:00 AM 4359     

जब भारतीय वैज्ञानिक विरासत की बात होती है, तो मन में ध्वनित हो उठता है ऋग्वेद के नासदीय सूक्त और हिरण्यगर्भ सूक्त के इन पद्यनुवादों का। ये पद्यानुवाद पं. जवाहरलाल नेहरू रचित पुस्तक "डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया' पर आधारित और ¶याम बेनेगल कृत दूरदर्¶ान धारावाहिक "भारत एक खोज' के ¶ाीर्षक गीत हुआ करते थे। वास्तव में भारतीय ज्ञान विज्ञान की ¶ाुरुआत वेदों (विद्, जानना) से होती है। कतिपय विद्वान वेदों को भारतीय मानस की संकल्पना मात्र मानते हैं और वेदों में वैज्ञानिकता बताने को अवैज्ञानिक मनोवृत्ति (ग़्दृद द्मड़त्ड्ढदद्यत्ढत्ड़ द्यड्ढथ्र्द्रड्ढद्ध) करार देते हैं। इस वर्ष की ¶ाुरुआत में राइबोसोम पर अपने अनुसंधान के लिए दो अन्य वैज्ञानिकों के साथ वर्ष 2009 का नोबेल पुरस्कार साझा करने वाले वेंकटरामन रामकृष्णन सुर्ख़ियों में आये, जब उन्होंने भारतीय विज्ञान कांग्रेस को एक सर्कस की संज्ञा दी और कहा कि वहाँ विज्ञान पर बहुत कम चर्चा होती है। पिछले वर्ष वहाँ यह दावा किया गया कि विमान का आविष्कार वैदिक युग में हो गया था। अतएव वे वहाँ कभी नहीं हिस्सा लेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय अंधवि·ाासों से निर्दे¶िात होते हैं। यह निर्णय क्षमता को प्रभावित करता है। वेंकटरामन राधाकृष्णन का कहना गलत नहीं है, फिर भी इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता है कि भारतीय मानस की जिज्ञासा की ¶ाुरुआत वेदों से ही हुई। यह नासदीय सूक्त के "किमावरीवः कुह कस्य ¶ार्मन अम्भः किमासीद् गहनं गभीरम्।' और हिरण्यगर्भ सूक्त के "कस्मै देवाय हविषा विधेम' से स्पष्ट है। हमें वैदिक ज्ञान विज्ञान की समीक्षा तत्कालीन युग की परिस्थितियों में जाकर करनी चाहिए। वह मानवीय जिज्ञासा का आरम्भिक युग था, जिसे हम विज्ञान की ¶ौ¶ावावस्था कह सकते हैं। फ्रांसिस बेकन कृत "द एडवांसमेंट ऑफ़ लर्निंग' से प्रेरित "मानवीय ज्ञान वृक्ष' मॉडल में भी ज्ञान की आरम्भिक तीन ¶ााखायें स्वीकारी गयीं - स्मरण (इतिहास), कारण (दर्¶ान) और कल्पना (कविता)। कारण यानि रीज़न से ही आस्था और विज्ञान का विकास सम्भव माना गया। वैदिक ऋषि स्वप्नद्रष्टा कहे गए अर्थात् वे सोते जागते ज्ञान विज्ञान का चिंतन मनन करते थे। यद्यपि उनके पास सीमित वैज्ञानिक साधन रहे होंगे, तथापि उनके प्रेक्षण और जिज्ञासा से उत्पन्न ज्ञान हमें उन महामानवों के प्रति अभिभूत कर देते हैं।
ऋग्वेद की एक ऋचा में अंतरिक्ष में सूर्य के आभासी भ्रमण को 12 आरे या तिल्लियों (द्मद्रदृत्त्ड्ढद्म) वाले चक्र के रूप में वर्णित किया गया है और 360 दिन तथा 360 रातों को मिलाकर कुल 720 इसके पुत्र कहे गए हैं।
"द्वाद¶ाारं नहि तज्जराय ववर्ति चक्रं परि द्याम् ऋतस्य। आ पुत्रा अग्ने मिथुनासो अत्र सप्त ¶ातानि विं¶ाति¶च।।' - ऋग्वेद, 1.164.11
((समय का) चक्र अपने 12 आरे के साथ अंतरिक्ष में बिना थके घूमता है। ओ अग्नि! इस (समय चक्र) पर 720 पुत्र (अर्थात् दिन और रात) हैं।)
इसी ऋचा के एक अन्य हिस्से में सूर्य की आभासी वार्षिक गति (वास्तव में पृथ्वी की परिक्रमण गति) को इस प्रकार वर्णित किया गया है :
"द्वाद¶ा प्रथय¶चक्रमेकं त्रीणि नभ्यानि क उ तच्चिकेत। तस्मिन्त्साकं त्रि¶ाता न ¶ांकवोच्र्पिताः षष्टिर्न चलचलासः।।' - ऋग्वेद, 1.164.48
(1 चक्र है, जिसके 12 चाप हैं; जिसकी धुरियाँ 3 भागों में बँटी हुई हैं; किन्तु कौन इसे जानता है? इसके अंतर्गत 360 आरे या तिल्लियाँ हैं, मानो यह चलायमान हो और अचल भी।)
यहाँ आरे दिनों की संख्या, धुरियाँ ग्रीष्म, वर्षा और ¶ाीत ऋतु और 12 चाप महीनों की संख्या को बताते हैं। इतना ही नहीं, ऋग्वेद में 13वें महीने अर्थात् मलमास या अधिकमास का भी जिक्र आता है। "वेद मासो धृतव्रत द्वाद¶ा प्रजावतः। वेद या उपजायते।।' (ऋग्वेद, 1.25.8)  - धृतव्रत (ऋषि) 12 महीनों को जानते हैं। वह उस महीना को भी जानते हैं, जो उत्पन्न किया जाता है।
यजुर्वेद में वर्णित "एका च मे तिरुा¶च मे, तिरुा¶च मे पञ्च च मे... (यजुर्वेद, वाजसनेयी संहिता, 18.24)' और "चतरुा¶च मेच्ष्टौ च मे द्वाद¶ा च मे ... (यजुर्वेद, वाजसनेयी संहिता, 18.25)' से स्पष्ट है कि वैदिक युग में ही विषम और सम संख्याओं का ज्ञान हो चुका था।
श्रुति या स्मृति पर आधारित सूत्रात्मक कृतियों में कल्प सूत्र, गृह्र सूत्र, समयाचारिक सूत्र (धर्मसूत्र) और ¶ाुल्बसूत्र ¶ाामिल हैं। ¶ाुल्बसूत्र में यज्ञ के लिए वेदियों के निर्माण का वर्णन है। मूल रूप से ये ज्यामितीय रचनाओं पर केंद्रित हैं। ¶ाुल्ब का अर्थ है - रस्सी, जो वेदियों के आकार को नापने में प्रयुक्त होती थीं। ये ¶ाुल्बसूत्र अपने लेखकों के नाम से जाने जाते हैं। इनमें प्रमुख हैं - बौधायन का ¶ाुल्बसूत्र, आपस्तम्ब का ¶ाुल्बसूत्र और कात्यायन का ¶ाुल्बसूत्र। इनमें बौधायन का ¶ाुल्बसूत्र सबसे प्राचीन माना जाता है। इन ¶ाुल्बसूत्रों का रचना समय 1200 से 800 ई. पू. माना गया है। अपने एक सूत्र में बौधायन ने विकर्ण के वर्ग का नियम दिया है- दीर्घस्याक्षणया रज्जुः पार्·ामानी तिर्यकं मानी च। यत्पृथग्भूते कुरुतस्तदुभयाङ्करोति।। एक आयत का विकर्ण उतना ही क्षेत्र इकट्ठा बनाता है जितने कि उसकी लम्बाई और चौड़ाई अलग-अलग बनाती हैं। पायथागोरस प्रमेय भी यही तथ्य अलग भाषा में वर्णित करता है। स्पष्ट है कि इस प्रमेय की जानकारी भारतीय गणितज्ञों को पाइथेगोरस के पहले से थी।
पिंगल छन्द¶ाास्त्र के जनक माने जाते हैं। वे सम्भवतः ई. पू. 2री सदी में हुए। पिंगल ने छन्द¶ाास्त्र 8.23 में ¶ाून्य और एक के मेल से 1 (0000), 2 (1000), 3 (0100), 4 (1100) इत्यादि को इस प्रकार अभिव्यक्त किया, उसी सिद्धांत को प्रकारांतर में आधुनिक कंप्यूटर्स में द्विधारी अंकों (डत्दठ्ठद्धन्र् ड्डत्ढ़त्द्यद्म) के निरूपण में अपनाया जाता है। पिंगल द्विधारी अंक पद्धति में अंक 0 से न ¶ाुरू होकर 1 से ¶ाुरू होता है और संख्या का मान बाँये से दायें ओर बढ़ते स्थानिक मान में 1 जोड़ने पर प्राप्त होता है, यथा, 0100 उ दहाई (2)
आर्यभट्ट 5वीं सदी के विख्यात गणितज्ञ, खगोलविद् और भौतिक ¶ाास्त्री हुए। आपने आर्यभटीय की रचना की, जो उनके काल के गणितीय विकास का सारसंक्षेप है। आर्यभटीय के प्रथम खण्ड में हम कटपयादि पद्धति में वर्णमाला के अक्षरों से बड़ी से बड़ी द¶ामलव संख्याओं का निरूपण पाते हैं : "रुपात कटपयपूर्वा वर्णा वर्णक्रमाद भवन्त्यंका। ञनौ ¶ाून्यम् प्रथमार्थे आ छेदे ऐ तृतीयार्थे।।' अर्थात् क, ट, प, य से ¶ाुरू होने वाले व्यंजन एक (रूपा) से बढ़ते क्रम में संख्याओं को बताते हैं। ञ और न का अर्थ ¶ाून्य होता है। इस पद्धति में स्वरों का कोई संख्यात्मक मान नहीं होता है। आर्यभट्ट ने जिस तरह पाई का ¶ाुद्ध मान द¶ामलव के चार अंकों तक निकाला, वह वि¶ोष रूप से उल्लेखनीय है : चतुरधिकं ¶ातमष्टगुणं द्वाषष्टिस्तथा सहरुााणाम। अयुतद्वयविष्कम्भस्यासन्नो वृत्त-परिणाहः।। अर्थात् 100 में 4 जोड़िये, लब्ध अंक को 8 से गुणा करिये और पुनः लब्ध अंक में 62000 जोड़ने से प्राप्त संख्या में 20000 से भाग दीजिये। यही वृत्त की परिधि और व्यास का अनुपात (पाई) का मान (3.1416) होता है। आर्यभट्ट ने यह भी बताया कि पृथ्वी अचला नहीं है, बल्कि यह सूर्य के चारों ओर परिक्रमण करती है। उन्होंने सूर्य और पृथ्वी की सापेक्षिक गति को इस प्रकार समझाया : अनुलोमगतिर्नौस्थः प¶यत्यचलं विलोमगं यद्वत्। अचलानि भानि तद्वत् समप¶िचमगानि लंकायाम्।। अर्थात् नाव में बैठा हुआ मनुष्य जब प्रवाह के साथ आगे बढ़ता है, तब वह समझता है कि अचर वृक्ष, पाषाण, पर्वत आदि पदार्थ उल्टी गति से जा रहे हैं। उसी प्रकार गतिमान पृथ्वी पर से स्थिर नक्षत्र भी उलटी गति से जाते हुए दिखाई देते हैं।
आर्यभट्ट के अतिरिक्त ब्राहृगुप्त (7वीं सदी), महावीराचार्य (9वीं सदी) और भास्कराचार्य (12वीं सदी) का भारतीय गणितीय विकास में उल्लेखनीय योगदान रहा। ब्राहृगुप्त ने ऋणात्मक संख्याओं से परिचय कराया, ¶ाून्य का गणित में प्रयोग सिखाया और गुणा पद्धति का भी आविष्कार किया। महावीराचार्य का अंकगणित और खासकर लघुत्तम समापवत्र्य (ख्र्दृध्र्ड्ढद्मद्य क्दृथ्र्थ्र्दृद ग्द्वथ्द्यत्द्रथ्ड्ढ) निकालने की पद्धति में वि¶ोष योगदान रहा। इसी तरह भास्कराचार्य ने बीज गणितीय समीकरण के समाधान के लिए सर्वप्रथम चक्रवत पद्धति ईजाद की।
मात्र गणित नहीं, प्राचीन भारतीयों का विज्ञान के विकास में भी सराहनीय प्रयास रहा। वै¶ोषिक दर्¶ान के प्रतिपादक कणाद (मूल नाम : औलुक्य) ने 6ठीं सदी में ही बताया कि भौतिक पदार्थ कणों (परमाणुओं) से बने होते हैं, जिन्हें नग्न आँखों से नहीं देखा जा सकता है और जिन्हें विभाजित नहीं किया जा सकता है।
नागार्जुन 10वीं सदी के भारतीय कीमियागार थे, जिन्होंने नकली स्वर्णाभूषण बनाने की पद्धति ईजाद की। अत्रेय संहिता (हरित संहिता) को वि·ा की पहली चिकित्सा पुस्तक होने का गौरव प्राप्त है। चरक आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति के और सुश्रुत ¶ाल्य क्रिया के जनक माने जाते हैं। इसके अतिरिक्त प्राचीन भारत में आयुर्वेद के पूरक के रूप में योग पद्धति का उदय हुआ। योग का अर्थ चित्त को इन्द्रियों से उत्पन्न विषयों का निरोध कर अंतरात्मा से जोड़ना है। भौतिक योग को हठयोग और आध्यात्मिक योग को राजयोग कहा गया। पतंजलि का योगसूत्र योग पर आधिकारिक पुस्तक है।
वर्तमान गणित के अनेक सिद्धांत प्राचीन भारतीयों को ज्ञात थे, किंतु वे अपने समकालीन यूरोपीय वैज्ञानिकों की तरह अपने ज्ञान के प्रलेखीकरण और प्रसारण करने में सिद्धहस्त नहीं थे, फलतः उनको विज्ञान जगत में उचित प्रतिष्ठा नहीं मिल पायी। इसके अलावे यूरोप ने अधिकाँ¶ा वि·ा पर लम्बे समय तक  ¶ाासन किया, जिससे उन्हें अपनी श्रेष्ठता को स्वीकार कराने में मदद मिली।

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