ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
कस्मै देवाय हविषा विधेम
CATEGORY : विमर्श 01-May-2016 12:00 AM 1849
कस्मै देवाय हविषा विधेम

जब भारतीय वैज्ञानिक विरासत की बात होती है, तो मन में ध्वनित हो उठता है ऋग्वेद के नासदीय सूक्त और हिरण्यगर्भ सूक्त के इन पद्यनुवादों का। ये पद्यानुवाद पं. जवाहरलाल नेहरू रचित पुस्तक "डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया' पर आधारित और ¶याम बेनेगल कृत दूरदर्¶ान धारावाहिक "भारत एक खोज' के ¶ाीर्षक गीत हुआ करते थे। वास्तव में भारतीय ज्ञान विज्ञान की ¶ाुरुआत वेदों (विद्, जानना) से होती है। कतिपय विद्वान वेदों को भारतीय मानस की संकल्पना मात्र मानते हैं और वेदों में वैज्ञानिकता बताने को अवैज्ञानिक मनोवृत्ति (ग़्दृद द्मड़त्ड्ढदद्यत्ढत्ड़ द्यड्ढथ्र्द्रड्ढद्ध) करार देते हैं। इस वर्ष की ¶ाुरुआत में राइबोसोम पर अपने अनुसंधान के लिए दो अन्य वैज्ञानिकों के साथ वर्ष 2009 का नोबेल पुरस्कार साझा करने वाले वेंकटरामन रामकृष्णन सुर्ख़ियों में आये, जब उन्होंने भारतीय विज्ञान कांग्रेस को एक सर्कस की संज्ञा दी और कहा कि वहाँ विज्ञान पर बहुत कम चर्चा होती है। पिछले वर्ष वहाँ यह दावा किया गया कि विमान का आविष्कार वैदिक युग में हो गया था। अतएव वे वहाँ कभी नहीं हिस्सा लेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय अंधवि·ाासों से निर्दे¶िात होते हैं। यह निर्णय क्षमता को प्रभावित करता है। वेंकटरामन राधाकृष्णन का कहना गलत नहीं है, फिर भी इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता है कि भारतीय मानस की जिज्ञासा की ¶ाुरुआत वेदों से ही हुई। यह नासदीय सूक्त के "किमावरीवः कुह कस्य ¶ार्मन अम्भः किमासीद् गहनं गभीरम्।' और हिरण्यगर्भ सूक्त के "कस्मै देवाय हविषा विधेम' से स्पष्ट है। हमें वैदिक ज्ञान विज्ञान की समीक्षा तत्कालीन युग की परिस्थितियों में जाकर करनी चाहिए। वह मानवीय जिज्ञासा का आरम्भिक युग था, जिसे हम विज्ञान की ¶ौ¶ावावस्था कह सकते हैं। फ्रांसिस बेकन कृत "द एडवांसमेंट ऑफ़ लर्निंग' से प्रेरित "मानवीय ज्ञान वृक्ष' मॉडल में भी ज्ञान की आरम्भिक तीन ¶ााखायें स्वीकारी गयीं - स्मरण (इतिहास), कारण (दर्¶ान) और कल्पना (कविता)। कारण यानि रीज़न से ही आस्था और विज्ञान का विकास सम्भव माना गया। वैदिक ऋषि स्वप्नद्रष्टा कहे गए अर्थात् वे सोते जागते ज्ञान विज्ञान का चिंतन मनन करते थे। यद्यपि उनके पास सीमित वैज्ञानिक साधन रहे होंगे, तथापि उनके प्रेक्षण और जिज्ञासा से उत्पन्न ज्ञान हमें उन महामानवों के प्रति अभिभूत कर देते हैं।
ऋग्वेद की एक ऋचा में अंतरिक्ष में सूर्य के आभासी भ्रमण को 12 आरे या तिल्लियों (द्मद्रदृत्त्ड्ढद्म) वाले चक्र के रूप में वर्णित किया गया है और 360 दिन तथा 360 रातों को मिलाकर कुल 720 इसके पुत्र कहे गए हैं।
"द्वाद¶ाारं नहि तज्जराय ववर्ति चक्रं परि द्याम् ऋतस्य। आ पुत्रा अग्ने मिथुनासो अत्र सप्त ¶ातानि विं¶ाति¶च।।' - ऋग्वेद, 1.164.11
((समय का) चक्र अपने 12 आरे के साथ अंतरिक्ष में बिना थके घूमता है। ओ अग्नि! इस (समय चक्र) पर 720 पुत्र (अर्थात् दिन और रात) हैं।)
इसी ऋचा के एक अन्य हिस्से में सूर्य की आभासी वार्षिक गति (वास्तव में पृथ्वी की परिक्रमण गति) को इस प्रकार वर्णित किया गया है :
"द्वाद¶ा प्रथय¶चक्रमेकं त्रीणि नभ्यानि क उ तच्चिकेत। तस्मिन्त्साकं त्रि¶ाता न ¶ांकवोच्र्पिताः षष्टिर्न चलचलासः।।' - ऋग्वेद, 1.164.48
(1 चक्र है, जिसके 12 चाप हैं; जिसकी धुरियाँ 3 भागों में बँटी हुई हैं; किन्तु कौन इसे जानता है? इसके अंतर्गत 360 आरे या तिल्लियाँ हैं, मानो यह चलायमान हो और अचल भी।)
यहाँ आरे दिनों की संख्या, धुरियाँ ग्रीष्म, वर्षा और ¶ाीत ऋतु और 12 चाप महीनों की संख्या को बताते हैं। इतना ही नहीं, ऋग्वेद में 13वें महीने अर्थात् मलमास या अधिकमास का भी जिक्र आता है। "वेद मासो धृतव्रत द्वाद¶ा प्रजावतः। वेद या उपजायते।।' (ऋग्वेद, 1.25.8)  - धृतव्रत (ऋषि) 12 महीनों को जानते हैं। वह उस महीना को भी जानते हैं, जो उत्पन्न किया जाता है।
यजुर्वेद में वर्णित "एका च मे तिरुा¶च मे, तिरुा¶च मे पञ्च च मे... (यजुर्वेद, वाजसनेयी संहिता, 18.24)' और "चतरुा¶च मेच्ष्टौ च मे द्वाद¶ा च मे ... (यजुर्वेद, वाजसनेयी संहिता, 18.25)' से स्पष्ट है कि वैदिक युग में ही विषम और सम संख्याओं का ज्ञान हो चुका था।
श्रुति या स्मृति पर आधारित सूत्रात्मक कृतियों में कल्प सूत्र, गृह्र सूत्र, समयाचारिक सूत्र (धर्मसूत्र) और ¶ाुल्बसूत्र ¶ाामिल हैं। ¶ाुल्बसूत्र में यज्ञ के लिए वेदियों के निर्माण का वर्णन है। मूल रूप से ये ज्यामितीय रचनाओं पर केंद्रित हैं। ¶ाुल्ब का अर्थ है - रस्सी, जो वेदियों के आकार को नापने में प्रयुक्त होती थीं। ये ¶ाुल्बसूत्र अपने लेखकों के नाम से जाने जाते हैं। इनमें प्रमुख हैं - बौधायन का ¶ाुल्बसूत्र, आपस्तम्ब का ¶ाुल्बसूत्र और कात्यायन का ¶ाुल्बसूत्र। इनमें बौधायन का ¶ाुल्बसूत्र सबसे प्राचीन माना जाता है। इन ¶ाुल्बसूत्रों का रचना समय 1200 से 800 ई. पू. माना गया है। अपने एक सूत्र में बौधायन ने विकर्ण के वर्ग का नियम दिया है- दीर्घस्याक्षणया रज्जुः पार्·ामानी तिर्यकं मानी च। यत्पृथग्भूते कुरुतस्तदुभयाङ्करोति।। एक आयत का विकर्ण उतना ही क्षेत्र इकट्ठा बनाता है जितने कि उसकी लम्बाई और चौड़ाई अलग-अलग बनाती हैं। पायथागोरस प्रमेय भी यही तथ्य अलग भाषा में वर्णित करता है। स्पष्ट है कि इस प्रमेय की जानकारी भारतीय गणितज्ञों को पाइथेगोरस के पहले से थी।
पिंगल छन्द¶ाास्त्र के जनक माने जाते हैं। वे सम्भवतः ई. पू. 2री सदी में हुए। पिंगल ने छन्द¶ाास्त्र 8.23 में ¶ाून्य और एक के मेल से 1 (0000), 2 (1000), 3 (0100), 4 (1100) इत्यादि को इस प्रकार अभिव्यक्त किया, उसी सिद्धांत को प्रकारांतर में आधुनिक कंप्यूटर्स में द्विधारी अंकों (डत्दठ्ठद्धन्र् ड्डत्ढ़त्द्यद्म) के निरूपण में अपनाया जाता है। पिंगल द्विधारी अंक पद्धति में अंक 0 से न ¶ाुरू होकर 1 से ¶ाुरू होता है और संख्या का मान बाँये से दायें ओर बढ़ते स्थानिक मान में 1 जोड़ने पर प्राप्त होता है, यथा, 0100 उ दहाई (2)
आर्यभट्ट 5वीं सदी के विख्यात गणितज्ञ, खगोलविद् और भौतिक ¶ाास्त्री हुए। आपने आर्यभटीय की रचना की, जो उनके काल के गणितीय विकास का सारसंक्षेप है। आर्यभटीय के प्रथम खण्ड में हम कटपयादि पद्धति में वर्णमाला के अक्षरों से बड़ी से बड़ी द¶ामलव संख्याओं का निरूपण पाते हैं : "रुपात कटपयपूर्वा वर्णा वर्णक्रमाद भवन्त्यंका। ञनौ ¶ाून्यम् प्रथमार्थे आ छेदे ऐ तृतीयार्थे।।' अर्थात् क, ट, प, य से ¶ाुरू होने वाले व्यंजन एक (रूपा) से बढ़ते क्रम में संख्याओं को बताते हैं। ञ और न का अर्थ ¶ाून्य होता है। इस पद्धति में स्वरों का कोई संख्यात्मक मान नहीं होता है। आर्यभट्ट ने जिस तरह पाई का ¶ाुद्ध मान द¶ामलव के चार अंकों तक निकाला, वह वि¶ोष रूप से उल्लेखनीय है : चतुरधिकं ¶ातमष्टगुणं द्वाषष्टिस्तथा सहरुााणाम। अयुतद्वयविष्कम्भस्यासन्नो वृत्त-परिणाहः।। अर्थात् 100 में 4 जोड़िये, लब्ध अंक को 8 से गुणा करिये और पुनः लब्ध अंक में 62000 जोड़ने से प्राप्त संख्या में 20000 से भाग दीजिये। यही वृत्त की परिधि और व्यास का अनुपात (पाई) का मान (3.1416) होता है। आर्यभट्ट ने यह भी बताया कि पृथ्वी अचला नहीं है, बल्कि यह सूर्य के चारों ओर परिक्रमण करती है। उन्होंने सूर्य और पृथ्वी की सापेक्षिक गति को इस प्रकार समझाया : अनुलोमगतिर्नौस्थः प¶यत्यचलं विलोमगं यद्वत्। अचलानि भानि तद्वत् समप¶िचमगानि लंकायाम्।। अर्थात् नाव में बैठा हुआ मनुष्य जब प्रवाह के साथ आगे बढ़ता है, तब वह समझता है कि अचर वृक्ष, पाषाण, पर्वत आदि पदार्थ उल्टी गति से जा रहे हैं। उसी प्रकार गतिमान पृथ्वी पर से स्थिर नक्षत्र भी उलटी गति से जाते हुए दिखाई देते हैं।
आर्यभट्ट के अतिरिक्त ब्राहृगुप्त (7वीं सदी), महावीराचार्य (9वीं सदी) और भास्कराचार्य (12वीं सदी) का भारतीय गणितीय विकास में उल्लेखनीय योगदान रहा। ब्राहृगुप्त ने ऋणात्मक संख्याओं से परिचय कराया, ¶ाून्य का गणित में प्रयोग सिखाया और गुणा पद्धति का भी आविष्कार किया। महावीराचार्य का अंकगणित और खासकर लघुत्तम समापवत्र्य (ख्र्दृध्र्ड्ढद्मद्य क्दृथ्र्थ्र्दृद ग्द्वथ्द्यत्द्रथ्ड्ढ) निकालने की पद्धति में वि¶ोष योगदान रहा। इसी तरह भास्कराचार्य ने बीज गणितीय समीकरण के समाधान के लिए सर्वप्रथम चक्रवत पद्धति ईजाद की।
मात्र गणित नहीं, प्राचीन भारतीयों का विज्ञान के विकास में भी सराहनीय प्रयास रहा। वै¶ोषिक दर्¶ान के प्रतिपादक कणाद (मूल नाम : औलुक्य) ने 6ठीं सदी में ही बताया कि भौतिक पदार्थ कणों (परमाणुओं) से बने होते हैं, जिन्हें नग्न आँखों से नहीं देखा जा सकता है और जिन्हें विभाजित नहीं किया जा सकता है।
नागार्जुन 10वीं सदी के भारतीय कीमियागार थे, जिन्होंने नकली स्वर्णाभूषण बनाने की पद्धति ईजाद की। अत्रेय संहिता (हरित संहिता) को वि·ा की पहली चिकित्सा पुस्तक होने का गौरव प्राप्त है। चरक आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति के और सुश्रुत ¶ाल्य क्रिया के जनक माने जाते हैं। इसके अतिरिक्त प्राचीन भारत में आयुर्वेद के पूरक के रूप में योग पद्धति का उदय हुआ। योग का अर्थ चित्त को इन्द्रियों से उत्पन्न विषयों का निरोध कर अंतरात्मा से जोड़ना है। भौतिक योग को हठयोग और आध्यात्मिक योग को राजयोग कहा गया। पतंजलि का योगसूत्र योग पर आधिकारिक पुस्तक है।
वर्तमान गणित के अनेक सिद्धांत प्राचीन भारतीयों को ज्ञात थे, किंतु वे अपने समकालीन यूरोपीय वैज्ञानिकों की तरह अपने ज्ञान के प्रलेखीकरण और प्रसारण करने में सिद्धहस्त नहीं थे, फलतः उनको विज्ञान जगत में उचित प्रतिष्ठा नहीं मिल पायी। इसके अलावे यूरोप ने अधिकाँ¶ा वि·ा पर लम्बे समय तक  ¶ाासन किया, जिससे उन्हें अपनी श्रेष्ठता को स्वीकार कराने में मदद मिली।

कस्मै देवाय हविषा विधेम
CATEGORY : विमर्श 01-May-2016 12:00 AM 1849
कस्मै देवाय हविषा विधेम

जब भारतीय वैज्ञानिक विरासत की बात होती है, तो मन में ध्वनित हो उठता है ऋग्वेद के नासदीय सूक्त और हिरण्यगर्भ सूक्त के इन पद्यनुवादों का। ये पद्यानुवाद पं. जवाहरलाल नेहरू रचित पुस्तक "डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया' पर आधारित और ¶याम बेनेगल कृत दूरदर्¶ान धारावाहिक "भारत एक खोज' के ¶ाीर्षक गीत हुआ करते थे। वास्तव में भारतीय ज्ञान विज्ञान की ¶ाुरुआत वेदों (विद्, जानना) से होती है। कतिपय विद्वान वेदों को भारतीय मानस की संकल्पना मात्र मानते हैं और वेदों में वैज्ञानिकता बताने को अवैज्ञानिक मनोवृत्ति (ग़्दृद द्मड़त्ड्ढदद्यत्ढत्ड़ द्यड्ढथ्र्द्रड्ढद्ध) करार देते हैं। इस वर्ष की ¶ाुरुआत में राइबोसोम पर अपने अनुसंधान के लिए दो अन्य वैज्ञानिकों के साथ वर्ष 2009 का नोबेल पुरस्कार साझा करने वाले वेंकटरामन रामकृष्णन सुर्ख़ियों में आये, जब उन्होंने भारतीय विज्ञान कांग्रेस को एक सर्कस की संज्ञा दी और कहा कि वहाँ विज्ञान पर बहुत कम चर्चा होती है। पिछले वर्ष वहाँ यह दावा किया गया कि विमान का आविष्कार वैदिक युग में हो गया था। अतएव वे वहाँ कभी नहीं हिस्सा लेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय अंधवि·ाासों से निर्दे¶िात होते हैं। यह निर्णय क्षमता को प्रभावित करता है। वेंकटरामन राधाकृष्णन का कहना गलत नहीं है, फिर भी इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता है कि भारतीय मानस की जिज्ञासा की ¶ाुरुआत वेदों से ही हुई। यह नासदीय सूक्त के "किमावरीवः कुह कस्य ¶ार्मन अम्भः किमासीद् गहनं गभीरम्।' और हिरण्यगर्भ सूक्त के "कस्मै देवाय हविषा विधेम' से स्पष्ट है। हमें वैदिक ज्ञान विज्ञान की समीक्षा तत्कालीन युग की परिस्थितियों में जाकर करनी चाहिए। वह मानवीय जिज्ञासा का आरम्भिक युग था, जिसे हम विज्ञान की ¶ौ¶ावावस्था कह सकते हैं। फ्रांसिस बेकन कृत "द एडवांसमेंट ऑफ़ लर्निंग' से प्रेरित "मानवीय ज्ञान वृक्ष' मॉडल में भी ज्ञान की आरम्भिक तीन ¶ााखायें स्वीकारी गयीं - स्मरण (इतिहास), कारण (दर्¶ान) और कल्पना (कविता)। कारण यानि रीज़न से ही आस्था और विज्ञान का विकास सम्भव माना गया। वैदिक ऋषि स्वप्नद्रष्टा कहे गए अर्थात् वे सोते जागते ज्ञान विज्ञान का चिंतन मनन करते थे। यद्यपि उनके पास सीमित वैज्ञानिक साधन रहे होंगे, तथापि उनके प्रेक्षण और जिज्ञासा से उत्पन्न ज्ञान हमें उन महामानवों के प्रति अभिभूत कर देते हैं।
ऋग्वेद की एक ऋचा में अंतरिक्ष में सूर्य के आभासी भ्रमण को 12 आरे या तिल्लियों (द्मद्रदृत्त्ड्ढद्म) वाले चक्र के रूप में वर्णित किया गया है और 360 दिन तथा 360 रातों को मिलाकर कुल 720 इसके पुत्र कहे गए हैं।
"द्वाद¶ाारं नहि तज्जराय ववर्ति चक्रं परि द्याम् ऋतस्य। आ पुत्रा अग्ने मिथुनासो अत्र सप्त ¶ातानि विं¶ाति¶च।।' - ऋग्वेद, 1.164.11
((समय का) चक्र अपने 12 आरे के साथ अंतरिक्ष में बिना थके घूमता है। ओ अग्नि! इस (समय चक्र) पर 720 पुत्र (अर्थात् दिन और रात) हैं।)
इसी ऋचा के एक अन्य हिस्से में सूर्य की आभासी वार्षिक गति (वास्तव में पृथ्वी की परिक्रमण गति) को इस प्रकार वर्णित किया गया है :
"द्वाद¶ा प्रथय¶चक्रमेकं त्रीणि नभ्यानि क उ तच्चिकेत। तस्मिन्त्साकं त्रि¶ाता न ¶ांकवोच्र्पिताः षष्टिर्न चलचलासः।।' - ऋग्वेद, 1.164.48
(1 चक्र है, जिसके 12 चाप हैं; जिसकी धुरियाँ 3 भागों में बँटी हुई हैं; किन्तु कौन इसे जानता है? इसके अंतर्गत 360 आरे या तिल्लियाँ हैं, मानो यह चलायमान हो और अचल भी।)
यहाँ आरे दिनों की संख्या, धुरियाँ ग्रीष्म, वर्षा और ¶ाीत ऋतु और 12 चाप महीनों की संख्या को बताते हैं। इतना ही नहीं, ऋग्वेद में 13वें महीने अर्थात् मलमास या अधिकमास का भी जिक्र आता है। "वेद मासो धृतव्रत द्वाद¶ा प्रजावतः। वेद या उपजायते।।' (ऋग्वेद, 1.25.8)  - धृतव्रत (ऋषि) 12 महीनों को जानते हैं। वह उस महीना को भी जानते हैं, जो उत्पन्न किया जाता है।
यजुर्वेद में वर्णित "एका च मे तिरुा¶च मे, तिरुा¶च मे पञ्च च मे... (यजुर्वेद, वाजसनेयी संहिता, 18.24)' और "चतरुा¶च मेच्ष्टौ च मे द्वाद¶ा च मे ... (यजुर्वेद, वाजसनेयी संहिता, 18.25)' से स्पष्ट है कि वैदिक युग में ही विषम और सम संख्याओं का ज्ञान हो चुका था।
श्रुति या स्मृति पर आधारित सूत्रात्मक कृतियों में कल्प सूत्र, गृह्र सूत्र, समयाचारिक सूत्र (धर्मसूत्र) और ¶ाुल्बसूत्र ¶ाामिल हैं। ¶ाुल्बसूत्र में यज्ञ के लिए वेदियों के निर्माण का वर्णन है। मूल रूप से ये ज्यामितीय रचनाओं पर केंद्रित हैं। ¶ाुल्ब का अर्थ है - रस्सी, जो वेदियों के आकार को नापने में प्रयुक्त होती थीं। ये ¶ाुल्बसूत्र अपने लेखकों के नाम से जाने जाते हैं। इनमें प्रमुख हैं - बौधायन का ¶ाुल्बसूत्र, आपस्तम्ब का ¶ाुल्बसूत्र और कात्यायन का ¶ाुल्बसूत्र। इनमें बौधायन का ¶ाुल्बसूत्र सबसे प्राचीन माना जाता है। इन ¶ाुल्बसूत्रों का रचना समय 1200 से 800 ई. पू. माना गया है। अपने एक सूत्र में बौधायन ने विकर्ण के वर्ग का नियम दिया है- दीर्घस्याक्षणया रज्जुः पार्·ामानी तिर्यकं मानी च। यत्पृथग्भूते कुरुतस्तदुभयाङ्करोति।। एक आयत का विकर्ण उतना ही क्षेत्र इकट्ठा बनाता है जितने कि उसकी लम्बाई और चौड़ाई अलग-अलग बनाती हैं। पायथागोरस प्रमेय भी यही तथ्य अलग भाषा में वर्णित करता है। स्पष्ट है कि इस प्रमेय की जानकारी भारतीय गणितज्ञों को पाइथेगोरस के पहले से थी।
पिंगल छन्द¶ाास्त्र के जनक माने जाते हैं। वे सम्भवतः ई. पू. 2री सदी में हुए। पिंगल ने छन्द¶ाास्त्र 8.23 में ¶ाून्य और एक के मेल से 1 (0000), 2 (1000), 3 (0100), 4 (1100) इत्यादि को इस प्रकार अभिव्यक्त किया, उसी सिद्धांत को प्रकारांतर में आधुनिक कंप्यूटर्स में द्विधारी अंकों (डत्दठ्ठद्धन्र् ड्डत्ढ़त्द्यद्म) के निरूपण में अपनाया जाता है। पिंगल द्विधारी अंक पद्धति में अंक 0 से न ¶ाुरू होकर 1 से ¶ाुरू होता है और संख्या का मान बाँये से दायें ओर बढ़ते स्थानिक मान में 1 जोड़ने पर प्राप्त होता है, यथा, 0100 उ दहाई (2)
आर्यभट्ट 5वीं सदी के विख्यात गणितज्ञ, खगोलविद् और भौतिक ¶ाास्त्री हुए। आपने आर्यभटीय की रचना की, जो उनके काल के गणितीय विकास का सारसंक्षेप है। आर्यभटीय के प्रथम खण्ड में हम कटपयादि पद्धति में वर्णमाला के अक्षरों से बड़ी से बड़ी द¶ामलव संख्याओं का निरूपण पाते हैं : "रुपात कटपयपूर्वा वर्णा वर्णक्रमाद भवन्त्यंका। ञनौ ¶ाून्यम् प्रथमार्थे आ छेदे ऐ तृतीयार्थे।।' अर्थात् क, ट, प, य से ¶ाुरू होने वाले व्यंजन एक (रूपा) से बढ़ते क्रम में संख्याओं को बताते हैं। ञ और न का अर्थ ¶ाून्य होता है। इस पद्धति में स्वरों का कोई संख्यात्मक मान नहीं होता है। आर्यभट्ट ने जिस तरह पाई का ¶ाुद्ध मान द¶ामलव के चार अंकों तक निकाला, वह वि¶ोष रूप से उल्लेखनीय है : चतुरधिकं ¶ातमष्टगुणं द्वाषष्टिस्तथा सहरुााणाम। अयुतद्वयविष्कम्भस्यासन्नो वृत्त-परिणाहः।। अर्थात् 100 में 4 जोड़िये, लब्ध अंक को 8 से गुणा करिये और पुनः लब्ध अंक में 62000 जोड़ने से प्राप्त संख्या में 20000 से भाग दीजिये। यही वृत्त की परिधि और व्यास का अनुपात (पाई) का मान (3.1416) होता है। आर्यभट्ट ने यह भी बताया कि पृथ्वी अचला नहीं है, बल्कि यह सूर्य के चारों ओर परिक्रमण करती है। उन्होंने सूर्य और पृथ्वी की सापेक्षिक गति को इस प्रकार समझाया : अनुलोमगतिर्नौस्थः प¶यत्यचलं विलोमगं यद्वत्। अचलानि भानि तद्वत् समप¶िचमगानि लंकायाम्।। अर्थात् नाव में बैठा हुआ मनुष्य जब प्रवाह के साथ आगे बढ़ता है, तब वह समझता है कि अचर वृक्ष, पाषाण, पर्वत आदि पदार्थ उल्टी गति से जा रहे हैं। उसी प्रकार गतिमान पृथ्वी पर से स्थिर नक्षत्र भी उलटी गति से जाते हुए दिखाई देते हैं।
आर्यभट्ट के अतिरिक्त ब्राहृगुप्त (7वीं सदी), महावीराचार्य (9वीं सदी) और भास्कराचार्य (12वीं सदी) का भारतीय गणितीय विकास में उल्लेखनीय योगदान रहा। ब्राहृगुप्त ने ऋणात्मक संख्याओं से परिचय कराया, ¶ाून्य का गणित में प्रयोग सिखाया और गुणा पद्धति का भी आविष्कार किया। महावीराचार्य का अंकगणित और खासकर लघुत्तम समापवत्र्य (ख्र्दृध्र्ड्ढद्मद्य क्दृथ्र्थ्र्दृद ग्द्वथ्द्यत्द्रथ्ड्ढ) निकालने की पद्धति में वि¶ोष योगदान रहा। इसी तरह भास्कराचार्य ने बीज गणितीय समीकरण के समाधान के लिए सर्वप्रथम चक्रवत पद्धति ईजाद की।
मात्र गणित नहीं, प्राचीन भारतीयों का विज्ञान के विकास में भी सराहनीय प्रयास रहा। वै¶ोषिक दर्¶ान के प्रतिपादक कणाद (मूल नाम : औलुक्य) ने 6ठीं सदी में ही बताया कि भौतिक पदार्थ कणों (परमाणुओं) से बने होते हैं, जिन्हें नग्न आँखों से नहीं देखा जा सकता है और जिन्हें विभाजित नहीं किया जा सकता है।
नागार्जुन 10वीं सदी के भारतीय कीमियागार थे, जिन्होंने नकली स्वर्णाभूषण बनाने की पद्धति ईजाद की। अत्रेय संहिता (हरित संहिता) को वि·ा की पहली चिकित्सा पुस्तक होने का गौरव प्राप्त है। चरक आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति के और सुश्रुत ¶ाल्य क्रिया के जनक माने जाते हैं। इसके अतिरिक्त प्राचीन भारत में आयुर्वेद के पूरक के रूप में योग पद्धति का उदय हुआ। योग का अर्थ चित्त को इन्द्रियों से उत्पन्न विषयों का निरोध कर अंतरात्मा से जोड़ना है। भौतिक योग को हठयोग और आध्यात्मिक योग को राजयोग कहा गया। पतंजलि का योगसूत्र योग पर आधिकारिक पुस्तक है।
वर्तमान गणित के अनेक सिद्धांत प्राचीन भारतीयों को ज्ञात थे, किंतु वे अपने समकालीन यूरोपीय वैज्ञानिकों की तरह अपने ज्ञान के प्रलेखीकरण और प्रसारण करने में सिद्धहस्त नहीं थे, फलतः उनको विज्ञान जगत में उचित प्रतिष्ठा नहीं मिल पायी। इसके अलावे यूरोप ने अधिकाँ¶ा वि·ा पर लम्बे समय तक  ¶ाासन किया, जिससे उन्हें अपनी श्रेष्ठता को स्वीकार कराने में मदद मिली।

कस्मै देवाय हविषा विधेम
CATEGORY : विमर्श 01-May-2016 12:00 AM 1849
कस्मै देवाय हविषा विधेम

जब भारतीय वैज्ञानिक विरासत की बात होती है, तो मन में ध्वनित हो उठता है ऋग्वेद के नासदीय सूक्त और हिरण्यगर्भ सूक्त के इन पद्यनुवादों का। ये पद्यानुवाद पं. जवाहरलाल नेहरू रचित पुस्तक "डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया' पर आधारित और ¶याम बेनेगल कृत दूरदर्¶ान धारावाहिक "भारत एक खोज' के ¶ाीर्षक गीत हुआ करते थे। वास्तव में भारतीय ज्ञान विज्ञान की ¶ाुरुआत वेदों (विद्, जानना) से होती है। कतिपय विद्वान वेदों को भारतीय मानस की संकल्पना मात्र मानते हैं और वेदों में वैज्ञानिकता बताने को अवैज्ञानिक मनोवृत्ति (ग़्दृद द्मड़त्ड्ढदद्यत्ढत्ड़ द्यड्ढथ्र्द्रड्ढद्ध) करार देते हैं। इस वर्ष की ¶ाुरुआत में राइबोसोम पर अपने अनुसंधान के लिए दो अन्य वैज्ञानिकों के साथ वर्ष 2009 का नोबेल पुरस्कार साझा करने वाले वेंकटरामन रामकृष्णन सुर्ख़ियों में आये, जब उन्होंने भारतीय विज्ञान कांग्रेस को एक सर्कस की संज्ञा दी और कहा कि वहाँ विज्ञान पर बहुत कम चर्चा होती है। पिछले वर्ष वहाँ यह दावा किया गया कि विमान का आविष्कार वैदिक युग में हो गया था। अतएव वे वहाँ कभी नहीं हिस्सा लेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय अंधवि·ाासों से निर्दे¶िात होते हैं। यह निर्णय क्षमता को प्रभावित करता है। वेंकटरामन राधाकृष्णन का कहना गलत नहीं है, फिर भी इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता है कि भारतीय मानस की जिज्ञासा की ¶ाुरुआत वेदों से ही हुई। यह नासदीय सूक्त के "किमावरीवः कुह कस्य ¶ार्मन अम्भः किमासीद् गहनं गभीरम्।' और हिरण्यगर्भ सूक्त के "कस्मै देवाय हविषा विधेम' से स्पष्ट है। हमें वैदिक ज्ञान विज्ञान की समीक्षा तत्कालीन युग की परिस्थितियों में जाकर करनी चाहिए। वह मानवीय जिज्ञासा का आरम्भिक युग था, जिसे हम विज्ञान की ¶ौ¶ावावस्था कह सकते हैं। फ्रांसिस बेकन कृत "द एडवांसमेंट ऑफ़ लर्निंग' से प्रेरित "मानवीय ज्ञान वृक्ष' मॉडल में भी ज्ञान की आरम्भिक तीन ¶ााखायें स्वीकारी गयीं - स्मरण (इतिहास), कारण (दर्¶ान) और कल्पना (कविता)। कारण यानि रीज़न से ही आस्था और विज्ञान का विकास सम्भव माना गया। वैदिक ऋषि स्वप्नद्रष्टा कहे गए अर्थात् वे सोते जागते ज्ञान विज्ञान का चिंतन मनन करते थे। यद्यपि उनके पास सीमित वैज्ञानिक साधन रहे होंगे, तथापि उनके प्रेक्षण और जिज्ञासा से उत्पन्न ज्ञान हमें उन महामानवों के प्रति अभिभूत कर देते हैं।
ऋग्वेद की एक ऋचा में अंतरिक्ष में सूर्य के आभासी भ्रमण को 12 आरे या तिल्लियों (द्मद्रदृत्त्ड्ढद्म) वाले चक्र के रूप में वर्णित किया गया है और 360 दिन तथा 360 रातों को मिलाकर कुल 720 इसके पुत्र कहे गए हैं।
"द्वाद¶ाारं नहि तज्जराय ववर्ति चक्रं परि द्याम् ऋतस्य। आ पुत्रा अग्ने मिथुनासो अत्र सप्त ¶ातानि विं¶ाति¶च।।' - ऋग्वेद, 1.164.11
((समय का) चक्र अपने 12 आरे के साथ अंतरिक्ष में बिना थके घूमता है। ओ अग्नि! इस (समय चक्र) पर 720 पुत्र (अर्थात् दिन और रात) हैं।)
इसी ऋचा के एक अन्य हिस्से में सूर्य की आभासी वार्षिक गति (वास्तव में पृथ्वी की परिक्रमण गति) को इस प्रकार वर्णित किया गया है :
"द्वाद¶ा प्रथय¶चक्रमेकं त्रीणि नभ्यानि क उ तच्चिकेत। तस्मिन्त्साकं त्रि¶ाता न ¶ांकवोच्र्पिताः षष्टिर्न चलचलासः।।' - ऋग्वेद, 1.164.48
(1 चक्र है, जिसके 12 चाप हैं; जिसकी धुरियाँ 3 भागों में बँटी हुई हैं; किन्तु कौन इसे जानता है? इसके अंतर्गत 360 आरे या तिल्लियाँ हैं, मानो यह चलायमान हो और अचल भी।)
यहाँ आरे दिनों की संख्या, धुरियाँ ग्रीष्म, वर्षा और ¶ाीत ऋतु और 12 चाप महीनों की संख्या को बताते हैं। इतना ही नहीं, ऋग्वेद में 13वें महीने अर्थात् मलमास या अधिकमास का भी जिक्र आता है। "वेद मासो धृतव्रत द्वाद¶ा प्रजावतः। वेद या उपजायते।।' (ऋग्वेद, 1.25.8)  - धृतव्रत (ऋषि) 12 महीनों को जानते हैं। वह उस महीना को भी जानते हैं, जो उत्पन्न किया जाता है।
यजुर्वेद में वर्णित "एका च मे तिरुा¶च मे, तिरुा¶च मे पञ्च च मे... (यजुर्वेद, वाजसनेयी संहिता, 18.24)' और "चतरुा¶च मेच्ष्टौ च मे द्वाद¶ा च मे ... (यजुर्वेद, वाजसनेयी संहिता, 18.25)' से स्पष्ट है कि वैदिक युग में ही विषम और सम संख्याओं का ज्ञान हो चुका था।
श्रुति या स्मृति पर आधारित सूत्रात्मक कृतियों में कल्प सूत्र, गृह्र सूत्र, समयाचारिक सूत्र (धर्मसूत्र) और ¶ाुल्बसूत्र ¶ाामिल हैं। ¶ाुल्बसूत्र में यज्ञ के लिए वेदियों के निर्माण का वर्णन है। मूल रूप से ये ज्यामितीय रचनाओं पर केंद्रित हैं। ¶ाुल्ब का अर्थ है - रस्सी, जो वेदियों के आकार को नापने में प्रयुक्त होती थीं। ये ¶ाुल्बसूत्र अपने लेखकों के नाम से जाने जाते हैं। इनमें प्रमुख हैं - बौधायन का ¶ाुल्बसूत्र, आपस्तम्ब का ¶ाुल्बसूत्र और कात्यायन का ¶ाुल्बसूत्र। इनमें बौधायन का ¶ाुल्बसूत्र सबसे प्राचीन माना जाता है। इन ¶ाुल्बसूत्रों का रचना समय 1200 से 800 ई. पू. माना गया है। अपने एक सूत्र में बौधायन ने विकर्ण के वर्ग का नियम दिया है- दीर्घस्याक्षणया रज्जुः पार्·ामानी तिर्यकं मानी च। यत्पृथग्भूते कुरुतस्तदुभयाङ्करोति।। एक आयत का विकर्ण उतना ही क्षेत्र इकट्ठा बनाता है जितने कि उसकी लम्बाई और चौड़ाई अलग-अलग बनाती हैं। पायथागोरस प्रमेय भी यही तथ्य अलग भाषा में वर्णित करता है। स्पष्ट है कि इस प्रमेय की जानकारी भारतीय गणितज्ञों को पाइथेगोरस के पहले से थी।
पिंगल छन्द¶ाास्त्र के जनक माने जाते हैं। वे सम्भवतः ई. पू. 2री सदी में हुए। पिंगल ने छन्द¶ाास्त्र 8.23 में ¶ाून्य और एक के मेल से 1 (0000), 2 (1000), 3 (0100), 4 (1100) इत्यादि को इस प्रकार अभिव्यक्त किया, उसी सिद्धांत को प्रकारांतर में आधुनिक कंप्यूटर्स में द्विधारी अंकों (डत्दठ्ठद्धन्र् ड्डत्ढ़त्द्यद्म) के निरूपण में अपनाया जाता है। पिंगल द्विधारी अंक पद्धति में अंक 0 से न ¶ाुरू होकर 1 से ¶ाुरू होता है और संख्या का मान बाँये से दायें ओर बढ़ते स्थानिक मान में 1 जोड़ने पर प्राप्त होता है, यथा, 0100 उ दहाई (2)
आर्यभट्ट 5वीं सदी के विख्यात गणितज्ञ, खगोलविद् और भौतिक ¶ाास्त्री हुए। आपने आर्यभटीय की रचना की, जो उनके काल के गणितीय विकास का सारसंक्षेप है। आर्यभटीय के प्रथम खण्ड में हम कटपयादि पद्धति में वर्णमाला के अक्षरों से बड़ी से बड़ी द¶ामलव संख्याओं का निरूपण पाते हैं : "रुपात कटपयपूर्वा वर्णा वर्णक्रमाद भवन्त्यंका। ञनौ ¶ाून्यम् प्रथमार्थे आ छेदे ऐ तृतीयार्थे।।' अर्थात् क, ट, प, य से ¶ाुरू होने वाले व्यंजन एक (रूपा) से बढ़ते क्रम में संख्याओं को बताते हैं। ञ और न का अर्थ ¶ाून्य होता है। इस पद्धति में स्वरों का कोई संख्यात्मक मान नहीं होता है। आर्यभट्ट ने जिस तरह पाई का ¶ाुद्ध मान द¶ामलव के चार अंकों तक निकाला, वह वि¶ोष रूप से उल्लेखनीय है : चतुरधिकं ¶ातमष्टगुणं द्वाषष्टिस्तथा सहरुााणाम। अयुतद्वयविष्कम्भस्यासन्नो वृत्त-परिणाहः।। अर्थात् 100 में 4 जोड़िये, लब्ध अंक को 8 से गुणा करिये और पुनः लब्ध अंक में 62000 जोड़ने से प्राप्त संख्या में 20000 से भाग दीजिये। यही वृत्त की परिधि और व्यास का अनुपात (पाई) का मान (3.1416) होता है। आर्यभट्ट ने यह भी बताया कि पृथ्वी अचला नहीं है, बल्कि यह सूर्य के चारों ओर परिक्रमण करती है। उन्होंने सूर्य और पृथ्वी की सापेक्षिक गति को इस प्रकार समझाया : अनुलोमगतिर्नौस्थः प¶यत्यचलं विलोमगं यद्वत्। अचलानि भानि तद्वत् समप¶िचमगानि लंकायाम्।। अर्थात् नाव में बैठा हुआ मनुष्य जब प्रवाह के साथ आगे बढ़ता है, तब वह समझता है कि अचर वृक्ष, पाषाण, पर्वत आदि पदार्थ उल्टी गति से जा रहे हैं। उसी प्रकार गतिमान पृथ्वी पर से स्थिर नक्षत्र भी उलटी गति से जाते हुए दिखाई देते हैं।
आर्यभट्ट के अतिरिक्त ब्राहृगुप्त (7वीं सदी), महावीराचार्य (9वीं सदी) और भास्कराचार्य (12वीं सदी) का भारतीय गणितीय विकास में उल्लेखनीय योगदान रहा। ब्राहृगुप्त ने ऋणात्मक संख्याओं से परिचय कराया, ¶ाून्य का गणित में प्रयोग सिखाया और गुणा पद्धति का भी आविष्कार किया। महावीराचार्य का अंकगणित और खासकर लघुत्तम समापवत्र्य (ख्र्दृध्र्ड्ढद्मद्य क्दृथ्र्थ्र्दृद ग्द्वथ्द्यत्द्रथ्ड्ढ) निकालने की पद्धति में वि¶ोष योगदान रहा। इसी तरह भास्कराचार्य ने बीज गणितीय समीकरण के समाधान के लिए सर्वप्रथम चक्रवत पद्धति ईजाद की।
मात्र गणित नहीं, प्राचीन भारतीयों का विज्ञान के विकास में भी सराहनीय प्रयास रहा। वै¶ोषिक दर्¶ान के प्रतिपादक कणाद (मूल नाम : औलुक्य) ने 6ठीं सदी में ही बताया कि भौतिक पदार्थ कणों (परमाणुओं) से बने होते हैं, जिन्हें नग्न आँखों से नहीं देखा जा सकता है और जिन्हें विभाजित नहीं किया जा सकता है।
नागार्जुन 10वीं सदी के भारतीय कीमियागार थे, जिन्होंने नकली स्वर्णाभूषण बनाने की पद्धति ईजाद की। अत्रेय संहिता (हरित संहिता) को वि·ा की पहली चिकित्सा पुस्तक होने का गौरव प्राप्त है। चरक आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति के और सुश्रुत ¶ाल्य क्रिया के जनक माने जाते हैं। इसके अतिरिक्त प्राचीन भारत में आयुर्वेद के पूरक के रूप में योग पद्धति का उदय हुआ। योग का अर्थ चित्त को इन्द्रियों से उत्पन्न विषयों का निरोध कर अंतरात्मा से जोड़ना है। भौतिक योग को हठयोग और आध्यात्मिक योग को राजयोग कहा गया। पतंजलि का योगसूत्र योग पर आधिकारिक पुस्तक है।
वर्तमान गणित के अनेक सिद्धांत प्राचीन भारतीयों को ज्ञात थे, किंतु वे अपने समकालीन यूरोपीय वैज्ञानिकों की तरह अपने ज्ञान के प्रलेखीकरण और प्रसारण करने में सिद्धहस्त नहीं थे, फलतः उनको विज्ञान जगत में उचित प्रतिष्ठा नहीं मिल पायी। इसके अलावे यूरोप ने अधिकाँ¶ा वि·ा पर लम्बे समय तक  ¶ाासन किया, जिससे उन्हें अपनी श्रेष्ठता को स्वीकार कराने में मदद मिली।

कस्मै देवाय हविषा विधेम?
CATEGORY : व्याख्या 01-Jun-2016 12:00 AM 1927
कस्मै देवाय हविषा विधेम?

गर्भनाल पत्रिका, मई 2016 अंक में प्राचीन भारत में ज्ञान-विज्ञान की चर्चा करते हुए वैदिक युग की वैज्ञानिक जिज्ञासाओं और संभावनाओं को रेखांकित किया गया था। इस चर्चा की शुरुआत राइबोसोम पर अपने अनुसंधान के लिए दो अन्य वैज्ञानिकों के साथ वर्ष 2009 का नोबेल पुरस्कार साझा करने वाले वी. रामकृष्णन के उस बयान से की गई थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि भारतीय विज्ञान कांग्रेस एक सर्कस है और वहाँ विज्ञान की चर्चा बहुत कम होती है तथा पिछले वर्ष वहाँ यह दावा किया गया था कि विमान का आविष्कार वैदिक युग में हो गया था; अतएव वह वहाँ कभी हिस्सा नहीं लेंगे। वी. रामकृष्णन का कहना गलत नहीं है और वेदों से भारतीय जिज्ञासा की शुरुआत को मानना भी गलत नहीं है; जिसका प्रमाण पिछले आलेख में दिया जा चुका है। फिर भारतीय वैज्ञानिक विरासत की ¶ोष गाथा कहने से पहले यह जानना रुचिकर हो सकता है कि वैदिक युग में विमान के आविष्कार की बात कहाँ से आई?
सर्वप्रथम इसका जिक्र पं. श्रीपाद दामोदर सातवलेकर (1951) ने अपनी वैदिक व्याख्यान माला (31वाँ व्याख्यान) में "वैदिक समय के सैन्य की ¶िाक्षा और रचना' शीर्षक के अंतर्गत किया था। यह तथ्य मान्य है कि वेद की कविताओं में प्रकृति की शक्तियों का महामानवीकरण किया गया है; किंतु पं. सातवलेकर ने मरुत् (पवन, हवा या इसका अवि·ासनीय मानवीकरण) को मृ, द्यदृ ड्डत्ड्ढ और उति प्रत्यय मानकर या फिर मा, नहीं और रुद, रोनेवाला कहकर वीर मत्र्य या मनुष्यों की श्रेणी में ला दिया। पं. सातवलेकर ने 49 पवन को 7न्7उ49 मरुत् सैनिकों का गण मान लिया। एक उदाहरण देखिए - "न पर्वता न नद्यो वरन्त वो यत्राचिध्वं मरुतो गच्छयेदु तत्। उत द्यावापृथिवी याथनापरि शुभं यातामनु रथा अवृत्सत।।' (ऋग्वेद 5/55/7) इसका अर्थ उन्होंने इस प्रकार किया - "हे मरुत् वीरों! न पर्वत और न नदियाँ आपके मार्ग को प्रतिबंधित कर सकती हैं, आप जहाँ जाना चाहते हैं, वहाँ पहुँचते ही हैं। द्यावापृथिवी के ऊपर जहाँ चाहे वहाँ जाते हैं, शुभ स्थान को जाने के समय आपके रथ आगे ही बढ़ते हैं, उनको कोई प्रतिबंधित नहीं कर सकता है।' अब इस सुंदर कविता को कोई मरुत् सैनिकों का विमान पर आवाजाही बता दे, तो फिर कविता और विज्ञान में क्या फर्क रह जायेगा। पं. सातवलेकर ने एक अन्य ऋचा को उद्धृत कर उसका अनुवाद इस प्रकार किया है - "ते म आहुर्य आययुः उप द्युभिर्विमिर्मदे। नरो मर्या अरेपसः ईमान् प¶यन्नि तिष्टुहि।।' (ऋग्वेद 5/53/3) - "वे निष्पाप वीर मेरे पास तेजस्वी पक्षी सदृश यानों में आकर कहने लगे कि इन वीरों की प्रशंसा कर।' स्पष्ट है की वेद की ऋचाओं में मरुत् (पवन) का अलंकार सहित वर्णन है। अतएव यह निष्कर्ष निकालना पूर्णतः अवैज्ञानिक है कि ऋग्वेदिक काल में ही विमानों का आविष्कार हो गया था। इस सम्बन्ध में कोई प्रलेखन वेदों में नहीं मिलता है।
वेदों में गणित और खगोल विज्ञान की चर्चा अव¶य है और इसका विवरण पिछले आलेख में किया जा चुका है। अब मध्यकालीन भारत (11वीं - 18वीं सदी) की ओर बढ़ते हैं। इस कालखण्ड में भारत में विज्ञान और प्रौद्योगिकी का विकास दो धाराओं में विभक्त हो गया : पहली धारा में परम्परागत ज्ञान-विज्ञान का प्रवाह होता रहा और दूसरी धारा इस्लाम और यूरोप के ज्ञान-विज्ञान से जन्मी।
विदित है कि मध्यकाल में मुस्लिम भारत आए। इस समय तक परम्परागत ज्ञान-विज्ञान में ह्यास होने लगा था। हारी हुई कौम सदा विजेता के रीति-रिवाजों का अनुसरण करती है और गुलामी में नवाचार (त्दददृध्ठ्ठद्यत्दृदद्म) की संभावना क्षीण होने लगती है। फलस्वरूप अरब मुल्कों में प्रचलित ¶िाक्षा को इस काल में अपनाया जाने लगा। परिणामस्वरूप मकतब और मदरसा अस्तित्व में आने लगे। प्राचीन भारत के गणित का स्वर्णकाल विस्मृत होता गया और मुस्लिम ¶िाक्षा संस्थाओं को राजकीय प्रश्रय दिया जाने लगा। अनेक स्थानों पर अपने निर्धारित पाठ्यक्रमों के साथ मदरसों की शृंखला स्थापित की गयी। ¶ोख अब्दुल्लाह और ¶ोख अज़ीज़ुल्लाह नामक दो क़ाबिल भाईयों ने संबल और आगरा में मदरसों की स्थापना की। मुल्क़ की स्थानीय प्रतिभाओं के अलावे अरब, फारस और मध्य ए¶िाया से क़ाबिल लोगों को मदरसा संभालने के लिए बुलाया गया। प्राथमिक स्तर से ही अंकगणित, क्षेत्रमिति, ज्यामिति, खगोलिकी, लेखा, लोक प्रशासन और कृषि विज्ञान को शामिल किया गया। यद्यपि इस काल में विज्ञान का अपेक्षित विकास नहीं हो सका, तथापि प्राचीन भारतीय विज्ञान परम्परा और अन्य देशों में प्रचलित मध्यकालीन विज्ञान पद्धतियों के बीच समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया गया।
इस काल में राजा-महाराजाओं तथा सरकारी महकमों को खाद्य, वस्त्र और अस्त्र-शस्त्र की आपूर्ति करने के लिए कारखानों का विकास हुआ। कारखानों में केवल वस्तुएँ उत्पादित नहीं होती थी, बल्कि यह युवाओं के लिए तकनीकी और रोजगारपरक ¶िाक्षा का केंद्र भी था।
मध्यकाल में विषयवार विज्ञान और तकनीक के विकास का लेखा-जोखा गणित के विकास से शुरू किया जा सकता है। इस काल में गणित की अनेक कृतियाँ प्रकाश में आर्इं। नरसिंह दैवज्ञ के पुत्र नारायण पंडित ने गणितकौमुदी और बीजगणितवतंस नाम से गणित की पुस्तकों को लिखा। गुजरात के गंगाधर ने लीलावती क्रमदीपिका, सिद्धांतदीपिका और लीलावती व्याख्या लिखी। इन सबों ने त्रिकोणमिति के अनुपातों ज्या (द्मत्दड्ढ), कोज्या (ड़दृद्मत्दड्ढ), स्पर्शज्या (द्यठ्ठदढ़ड्ढदद्य) इत्यादि का मान प्राप्त करने में योगदान किया। नीलकण्ठ ने तंत्रसंग्रह नाम से गणित की पुस्तक लिखी, जिसमें त्रिकोणमितीय फलनों को निकालने की विधि बताई गई।
गणेश दैवज्ञ ने बुद्धिविलासिनी नाम से लीलावती पर भाष्य लिखा, जिसमें अनेक उदाहरण भी प्रस्तुत किये गए। वल्लभ सम्प्रदाय के कृष्ण ने नवांकुर नाम से भास्कर द्वितीय के बीजगणित पर भाष्य लिखा, जिसमें प्रथम और द्वितीय क्रम के अनिर्धारित समीकरणों को हल करने की विधि बताई गई।
इसके अलावे, नीलकण्ठ ज्योतिर्विद ने ताजिक ग्रन्थ की रचना की, जिसमें फ़ारसी की तकनीकी पदावली का उपयोग किया गया। अकबर के कहने पर फ़ैज़ी ने भास्कर के बीजगणित का अनुवाद किया। इस काल में नसरुद्दीन अतुसी नाम के गणित के विद्वान भी हुए।
मुस्लिम शासक मूलतः योद्धा और ¶िाकारी होते थे, जो घोड़ा, कुत्ता, चीता, बाज जैसे पशु-पक्षियों को पालते थे। उनके समय में हंसदेव ने मृग-पक्षी शास्त्र नाम से जीव विज्ञान की पुस्तक लिखी। यद्यपि यह वैज्ञानिक पुस्तक नहीं कही जा सकती है, फिर भी इसमें ¶िाकारी पशु-पक्षियों का विवरण मिलता है। अकबर को घोड़ों, हाथियों इत्यादि के संकर नस्लों के विकास में वि¶ोष रुचि थी। जहाँगीर ने अपनी किताब तुजुक-ए-जहाँगीरी में इन संकर नस्लों की पैदाइश से संबंधी प्रयोगों का विवरण लिखा है। उसने लगभग 36 किस्म के जानवरों का उल्लेख किया है। जहाँगीर प्रकृतिप्रेमी भी था। उसके दरबारी चित्रकारों, खासकर मंसूर ने इन जानवरों के सुंदर चित्र बनाये और अन्य चित्रकारों ने लगभग 57 पौधों के चित्र गढे, जो आज भी अजायबघरों और निजी संग्रहों की शोभा बढ़ाते हैं।
मध्यकालीन भारत में रसायन विज्ञान का विकास कागज निर्माण उद्योग में हुआ। उस समय क¶मीर, सियालकोट, जाफराबाद, पटना, मुर्¶िादाबाद, अहमदाबाद और मैसूर कागज उत्पादन के मुख्य केंद्र थे। इन केंद्रों पर कागज निर्माण की प्रक्रिया लगभग समान थी, किंतु लुग्दी निर्माण अलग-अलग कच्ची सामग्रियों से होता था।
मुगलों को गन पाउडर के निर्माण की पद्धति का ज्ञान था। भारतीय कारीगरों ने विस्फोटकों के निर्माण की प्रक्रिया सीख ली थी। शुक्राचार्य विरचित शुक्रनीति में विस्फोटक बनाने की चर्चा है। इस समय फुलझड़ियों और पटाखों का बनना भी शुरु हो गया था। आईन-ए-अकबरी में अकबर के दरबार में प्रयुक्त होने वाले इत्रों का जिक्र मिलता है। एक खूबसूरत बात यह है कि मुग़लकाल के लोकप्रिय  गुलाब के इत्र को खोजने का श्रेय मलिका-ए-हुस्न नूरजहाँ को दिया जाता है।
इस काल में खगोल विज्ञान का भी विकास हुआ। पूर्व में विरचित खगोल विज्ञान के ग्रंथों पर भाष्य लिखे गए।
फ़िरोज़शाह के दरबारी खगोलविद् महेंद्र सूरी ने यंत्रराज नाम से खगोलीय प्रेक्षण का उपकरण बनाया। इस समय केरल में परमे·ार और महाभास्करीय नामक दो विख्यात खगोलविद् और पंचांग निर्माता हुए। नीलकण्ठ सोमसुतवन ने आर्यभटीय की टीका रची। कमलाकर ने इस्लाम के खगोल विज्ञान का विस्तृत अध्ययन किया। जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय खगोल विज्ञान के संरक्षक थे। उन्होंने दिल्ली, उज्जैन, वाराणसी, मथुरा और जयपुर में वेधशालाएं स्थापित की।
भारतीय इतिहास के मध्यकाल में राजाश्रय के अभाव में प्राचीन भारत की तरह आयुर्वेद का विकास नहीं हो सका। फिर भी, वंगसेन कृत शारंगधर संहिता और चिकित्सा संग्रह और भावमिश्र कृत भावप्रकाश का संकलन हुआ। शारंगधर संहिता (13वीं सदी) में रोग निर्धारण के लिए मूत्र जाँच और दवा के रूप में अफीम के प्रयोग का जिक्र मिलता है। इस ग्रन्थ में रसचिकित्सा के रूप में पारद और पारद रहित खनिज औषधियों का उल्लेख मिलता है। इसी काल में तमिलनाडु में सिद्ध चिकित्सा पद्धति का विकास हुआ, जिसमें दीर्घ जीवन प्राप्त करने के लिए अनुभूत योगों का वर्णन है।
मध्यकाल में ही भारत में यूनानी तिब्ब चिकित्सा पद्धति का प्रचार-प्रसार हुआ। अली बिन रब्बन ने अपनी किताब फिरदौसु हिकमत में यूनानी दवाओं और भारतीय चिकित्सा विज्ञान को कलमबद्ध किया। हकीम दिया मुहम्मद ने मजीनी-ए-दिया नामक किताब में अरबी, फ़ारसी और हिंदुस्तानी दवा पद्धतियों को लिखा। इसी तरह फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ ने तिब्ब-ए-फिरोजशाही की रचना की। इसी तरह औरंगज़ेब और दारा¶िाकोह को समर्पित चिकित्सा की किताबें प्रकाश में आर्इं।
मध्यकालीन भारत में कृषि की रूपरेखा प्राचीन भारत जैसी ही थी। लेकिन विदेशी व्यापारियों के द्वारा कुछ नई फसलों और बागवानी का विकास किया गया। उन दिनों गेहूँ, धान, जौ, ज्वार, दलहन, तेलहन, कपास, गन्ना और नील मुख्य फसल के अंतर्गत आते थे। प¶िचमी घाट में काली मिर्च की और क¶मीर में केशर तथा फलों की खेती होती थी। तमिलनाडु में अदरख और दालचीनी की खेती तथा केरल में इलाइची, चन्दन और नारियल की उपज होती थी। भारत में 16वीं-17वीं शताब्दी के दौरान तम्बाकू, मिर्च, आलू, अमरुद, शरीफा, काजू और अनानास आया। इसी काल में बिहार और मालवा क्षेत्र में अफीम की खेती शुरू हुई। उन्नत बागवानी की शुरुआत हुई। 16वीं सदी में ही गोआ में आम की कलमों के बनाने की शुरुआत हुई। मुगलों ने कई आमों के बाग़ लगवाये।
सिंचाई के लिए कुएँ, तालाबों, नहरों, रहटों, ढेंकी इत्यादि का प्रयोग होने लगा। आगरा के इलाके में फ़ारसी घिरनियों का प्रयोग कुएँ से पानी निकालने के लिए होता था। इस काल में राज्य के द्वारा भूमि माप और भूमि वर्गीकरण के आधार पर सिंचाई की व्यवस्था होती थी, जो शासकों और कृषकों, दोनों के लिए फायदेमंद थी।
(क्रमशः)

कस्मै देवाय हविषा विधेम?
CATEGORY : व्याख्या 01-Jun-2016 12:00 AM 1927
कस्मै देवाय हविषा विधेम?

गर्भनाल पत्रिका, मई 2016 अंक में प्राचीन भारत में ज्ञान-विज्ञान की चर्चा करते हुए वैदिक युग की वैज्ञानिक जिज्ञासाओं और संभावनाओं को रेखांकित किया गया था। इस चर्चा की शुरुआत राइबोसोम पर अपने अनुसंधान के लिए दो अन्य वैज्ञानिकों के साथ वर्ष 2009 का नोबेल पुरस्कार साझा करने वाले वी. रामकृष्णन के उस बयान से की गई थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि भारतीय विज्ञान कांग्रेस एक सर्कस है और वहाँ विज्ञान की चर्चा बहुत कम होती है तथा पिछले वर्ष वहाँ यह दावा किया गया था कि विमान का आविष्कार वैदिक युग में हो गया था; अतएव वह वहाँ कभी हिस्सा नहीं लेंगे। वी. रामकृष्णन का कहना गलत नहीं है और वेदों से भारतीय जिज्ञासा की शुरुआत को मानना भी गलत नहीं है; जिसका प्रमाण पिछले आलेख में दिया जा चुका है। फिर भारतीय वैज्ञानिक विरासत की ¶ोष गाथा कहने से पहले यह जानना रुचिकर हो सकता है कि वैदिक युग में विमान के आविष्कार की बात कहाँ से आई?
सर्वप्रथम इसका जिक्र पं. श्रीपाद दामोदर सातवलेकर (1951) ने अपनी वैदिक व्याख्यान माला (31वाँ व्याख्यान) में "वैदिक समय के सैन्य की ¶िाक्षा और रचना' शीर्षक के अंतर्गत किया था। यह तथ्य मान्य है कि वेद की कविताओं में प्रकृति की शक्तियों का महामानवीकरण किया गया है; किंतु पं. सातवलेकर ने मरुत् (पवन, हवा या इसका अवि·ासनीय मानवीकरण) को मृ, द्यदृ ड्डत्ड्ढ और उति प्रत्यय मानकर या फिर मा, नहीं और रुद, रोनेवाला कहकर वीर मत्र्य या मनुष्यों की श्रेणी में ला दिया। पं. सातवलेकर ने 49 पवन को 7न्7उ49 मरुत् सैनिकों का गण मान लिया। एक उदाहरण देखिए - "न पर्वता न नद्यो वरन्त वो यत्राचिध्वं मरुतो गच्छयेदु तत्। उत द्यावापृथिवी याथनापरि शुभं यातामनु रथा अवृत्सत।।' (ऋग्वेद 5/55/7) इसका अर्थ उन्होंने इस प्रकार किया - "हे मरुत् वीरों! न पर्वत और न नदियाँ आपके मार्ग को प्रतिबंधित कर सकती हैं, आप जहाँ जाना चाहते हैं, वहाँ पहुँचते ही हैं। द्यावापृथिवी के ऊपर जहाँ चाहे वहाँ जाते हैं, शुभ स्थान को जाने के समय आपके रथ आगे ही बढ़ते हैं, उनको कोई प्रतिबंधित नहीं कर सकता है।' अब इस सुंदर कविता को कोई मरुत् सैनिकों का विमान पर आवाजाही बता दे, तो फिर कविता और विज्ञान में क्या फर्क रह जायेगा। पं. सातवलेकर ने एक अन्य ऋचा को उद्धृत कर उसका अनुवाद इस प्रकार किया है - "ते म आहुर्य आययुः उप द्युभिर्विमिर्मदे। नरो मर्या अरेपसः ईमान् प¶यन्नि तिष्टुहि।।' (ऋग्वेद 5/53/3) - "वे निष्पाप वीर मेरे पास तेजस्वी पक्षी सदृश यानों में आकर कहने लगे कि इन वीरों की प्रशंसा कर।' स्पष्ट है की वेद की ऋचाओं में मरुत् (पवन) का अलंकार सहित वर्णन है। अतएव यह निष्कर्ष निकालना पूर्णतः अवैज्ञानिक है कि ऋग्वेदिक काल में ही विमानों का आविष्कार हो गया था। इस सम्बन्ध में कोई प्रलेखन वेदों में नहीं मिलता है।
वेदों में गणित और खगोल विज्ञान की चर्चा अव¶य है और इसका विवरण पिछले आलेख में किया जा चुका है। अब मध्यकालीन भारत (11वीं - 18वीं सदी) की ओर बढ़ते हैं। इस कालखण्ड में भारत में विज्ञान और प्रौद्योगिकी का विकास दो धाराओं में विभक्त हो गया : पहली धारा में परम्परागत ज्ञान-विज्ञान का प्रवाह होता रहा और दूसरी धारा इस्लाम और यूरोप के ज्ञान-विज्ञान से जन्मी।
विदित है कि मध्यकाल में मुस्लिम भारत आए। इस समय तक परम्परागत ज्ञान-विज्ञान में ह्यास होने लगा था। हारी हुई कौम सदा विजेता के रीति-रिवाजों का अनुसरण करती है और गुलामी में नवाचार (त्दददृध्ठ्ठद्यत्दृदद्म) की संभावना क्षीण होने लगती है। फलस्वरूप अरब मुल्कों में प्रचलित ¶िाक्षा को इस काल में अपनाया जाने लगा। परिणामस्वरूप मकतब और मदरसा अस्तित्व में आने लगे। प्राचीन भारत के गणित का स्वर्णकाल विस्मृत होता गया और मुस्लिम ¶िाक्षा संस्थाओं को राजकीय प्रश्रय दिया जाने लगा। अनेक स्थानों पर अपने निर्धारित पाठ्यक्रमों के साथ मदरसों की शृंखला स्थापित की गयी। ¶ोख अब्दुल्लाह और ¶ोख अज़ीज़ुल्लाह नामक दो क़ाबिल भाईयों ने संबल और आगरा में मदरसों की स्थापना की। मुल्क़ की स्थानीय प्रतिभाओं के अलावे अरब, फारस और मध्य ए¶िाया से क़ाबिल लोगों को मदरसा संभालने के लिए बुलाया गया। प्राथमिक स्तर से ही अंकगणित, क्षेत्रमिति, ज्यामिति, खगोलिकी, लेखा, लोक प्रशासन और कृषि विज्ञान को शामिल किया गया। यद्यपि इस काल में विज्ञान का अपेक्षित विकास नहीं हो सका, तथापि प्राचीन भारतीय विज्ञान परम्परा और अन्य देशों में प्रचलित मध्यकालीन विज्ञान पद्धतियों के बीच समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया गया।
इस काल में राजा-महाराजाओं तथा सरकारी महकमों को खाद्य, वस्त्र और अस्त्र-शस्त्र की आपूर्ति करने के लिए कारखानों का विकास हुआ। कारखानों में केवल वस्तुएँ उत्पादित नहीं होती थी, बल्कि यह युवाओं के लिए तकनीकी और रोजगारपरक ¶िाक्षा का केंद्र भी था।
मध्यकाल में विषयवार विज्ञान और तकनीक के विकास का लेखा-जोखा गणित के विकास से शुरू किया जा सकता है। इस काल में गणित की अनेक कृतियाँ प्रकाश में आर्इं। नरसिंह दैवज्ञ के पुत्र नारायण पंडित ने गणितकौमुदी और बीजगणितवतंस नाम से गणित की पुस्तकों को लिखा। गुजरात के गंगाधर ने लीलावती क्रमदीपिका, सिद्धांतदीपिका और लीलावती व्याख्या लिखी। इन सबों ने त्रिकोणमिति के अनुपातों ज्या (द्मत्दड्ढ), कोज्या (ड़दृद्मत्दड्ढ), स्पर्शज्या (द्यठ्ठदढ़ड्ढदद्य) इत्यादि का मान प्राप्त करने में योगदान किया। नीलकण्ठ ने तंत्रसंग्रह नाम से गणित की पुस्तक लिखी, जिसमें त्रिकोणमितीय फलनों को निकालने की विधि बताई गई।
गणेश दैवज्ञ ने बुद्धिविलासिनी नाम से लीलावती पर भाष्य लिखा, जिसमें अनेक उदाहरण भी प्रस्तुत किये गए। वल्लभ सम्प्रदाय के कृष्ण ने नवांकुर नाम से भास्कर द्वितीय के बीजगणित पर भाष्य लिखा, जिसमें प्रथम और द्वितीय क्रम के अनिर्धारित समीकरणों को हल करने की विधि बताई गई।
इसके अलावे, नीलकण्ठ ज्योतिर्विद ने ताजिक ग्रन्थ की रचना की, जिसमें फ़ारसी की तकनीकी पदावली का उपयोग किया गया। अकबर के कहने पर फ़ैज़ी ने भास्कर के बीजगणित का अनुवाद किया। इस काल में नसरुद्दीन अतुसी नाम के गणित के विद्वान भी हुए।
मुस्लिम शासक मूलतः योद्धा और ¶िाकारी होते थे, जो घोड़ा, कुत्ता, चीता, बाज जैसे पशु-पक्षियों को पालते थे। उनके समय में हंसदेव ने मृग-पक्षी शास्त्र नाम से जीव विज्ञान की पुस्तक लिखी। यद्यपि यह वैज्ञानिक पुस्तक नहीं कही जा सकती है, फिर भी इसमें ¶िाकारी पशु-पक्षियों का विवरण मिलता है। अकबर को घोड़ों, हाथियों इत्यादि के संकर नस्लों के विकास में वि¶ोष रुचि थी। जहाँगीर ने अपनी किताब तुजुक-ए-जहाँगीरी में इन संकर नस्लों की पैदाइश से संबंधी प्रयोगों का विवरण लिखा है। उसने लगभग 36 किस्म के जानवरों का उल्लेख किया है। जहाँगीर प्रकृतिप्रेमी भी था। उसके दरबारी चित्रकारों, खासकर मंसूर ने इन जानवरों के सुंदर चित्र बनाये और अन्य चित्रकारों ने लगभग 57 पौधों के चित्र गढे, जो आज भी अजायबघरों और निजी संग्रहों की शोभा बढ़ाते हैं।
मध्यकालीन भारत में रसायन विज्ञान का विकास कागज निर्माण उद्योग में हुआ। उस समय क¶मीर, सियालकोट, जाफराबाद, पटना, मुर्¶िादाबाद, अहमदाबाद और मैसूर कागज उत्पादन के मुख्य केंद्र थे। इन केंद्रों पर कागज निर्माण की प्रक्रिया लगभग समान थी, किंतु लुग्दी निर्माण अलग-अलग कच्ची सामग्रियों से होता था।
मुगलों को गन पाउडर के निर्माण की पद्धति का ज्ञान था। भारतीय कारीगरों ने विस्फोटकों के निर्माण की प्रक्रिया सीख ली थी। शुक्राचार्य विरचित शुक्रनीति में विस्फोटक बनाने की चर्चा है। इस समय फुलझड़ियों और पटाखों का बनना भी शुरु हो गया था। आईन-ए-अकबरी में अकबर के दरबार में प्रयुक्त होने वाले इत्रों का जिक्र मिलता है। एक खूबसूरत बात यह है कि मुग़लकाल के लोकप्रिय  गुलाब के इत्र को खोजने का श्रेय मलिका-ए-हुस्न नूरजहाँ को दिया जाता है।
इस काल में खगोल विज्ञान का भी विकास हुआ। पूर्व में विरचित खगोल विज्ञान के ग्रंथों पर भाष्य लिखे गए।
फ़िरोज़शाह के दरबारी खगोलविद् महेंद्र सूरी ने यंत्रराज नाम से खगोलीय प्रेक्षण का उपकरण बनाया। इस समय केरल में परमे·ार और महाभास्करीय नामक दो विख्यात खगोलविद् और पंचांग निर्माता हुए। नीलकण्ठ सोमसुतवन ने आर्यभटीय की टीका रची। कमलाकर ने इस्लाम के खगोल विज्ञान का विस्तृत अध्ययन किया। जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय खगोल विज्ञान के संरक्षक थे। उन्होंने दिल्ली, उज्जैन, वाराणसी, मथुरा और जयपुर में वेधशालाएं स्थापित की।
भारतीय इतिहास के मध्यकाल में राजाश्रय के अभाव में प्राचीन भारत की तरह आयुर्वेद का विकास नहीं हो सका। फिर भी, वंगसेन कृत शारंगधर संहिता और चिकित्सा संग्रह और भावमिश्र कृत भावप्रकाश का संकलन हुआ। शारंगधर संहिता (13वीं सदी) में रोग निर्धारण के लिए मूत्र जाँच और दवा के रूप में अफीम के प्रयोग का जिक्र मिलता है। इस ग्रन्थ में रसचिकित्सा के रूप में पारद और पारद रहित खनिज औषधियों का उल्लेख मिलता है। इसी काल में तमिलनाडु में सिद्ध चिकित्सा पद्धति का विकास हुआ, जिसमें दीर्घ जीवन प्राप्त करने के लिए अनुभूत योगों का वर्णन है।
मध्यकाल में ही भारत में यूनानी तिब्ब चिकित्सा पद्धति का प्रचार-प्रसार हुआ। अली बिन रब्बन ने अपनी किताब फिरदौसु हिकमत में यूनानी दवाओं और भारतीय चिकित्सा विज्ञान को कलमबद्ध किया। हकीम दिया मुहम्मद ने मजीनी-ए-दिया नामक किताब में अरबी, फ़ारसी और हिंदुस्तानी दवा पद्धतियों को लिखा। इसी तरह फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ ने तिब्ब-ए-फिरोजशाही की रचना की। इसी तरह औरंगज़ेब और दारा¶िाकोह को समर्पित चिकित्सा की किताबें प्रकाश में आर्इं।
मध्यकालीन भारत में कृषि की रूपरेखा प्राचीन भारत जैसी ही थी। लेकिन विदेशी व्यापारियों के द्वारा कुछ नई फसलों और बागवानी का विकास किया गया। उन दिनों गेहूँ, धान, जौ, ज्वार, दलहन, तेलहन, कपास, गन्ना और नील मुख्य फसल के अंतर्गत आते थे। प¶िचमी घाट में काली मिर्च की और क¶मीर में केशर तथा फलों की खेती होती थी। तमिलनाडु में अदरख और दालचीनी की खेती तथा केरल में इलाइची, चन्दन और नारियल की उपज होती थी। भारत में 16वीं-17वीं शताब्दी के दौरान तम्बाकू, मिर्च, आलू, अमरुद, शरीफा, काजू और अनानास आया। इसी काल में बिहार और मालवा क्षेत्र में अफीम की खेती शुरू हुई। उन्नत बागवानी की शुरुआत हुई। 16वीं सदी में ही गोआ में आम की कलमों के बनाने की शुरुआत हुई। मुगलों ने कई आमों के बाग़ लगवाये।
सिंचाई के लिए कुएँ, तालाबों, नहरों, रहटों, ढेंकी इत्यादि का प्रयोग होने लगा। आगरा के इलाके में फ़ारसी घिरनियों का प्रयोग कुएँ से पानी निकालने के लिए होता था। इस काल में राज्य के द्वारा भूमि माप और भूमि वर्गीकरण के आधार पर सिंचाई की व्यवस्था होती थी, जो शासकों और कृषकों, दोनों के लिए फायदेमंद थी।
(क्रमशः)

कस्मै देवाय हविषा विधेम?
CATEGORY : व्याख्या 01-Jun-2016 12:00 AM 1927
कस्मै देवाय हविषा विधेम?

गर्भनाल पत्रिका, मई 2016 अंक में प्राचीन भारत में ज्ञान-विज्ञान की चर्चा करते हुए वैदिक युग की वैज्ञानिक जिज्ञासाओं और संभावनाओं को रेखांकित किया गया था। इस चर्चा की शुरुआत राइबोसोम पर अपने अनुसंधान के लिए दो अन्य वैज्ञानिकों के साथ वर्ष 2009 का नोबेल पुरस्कार साझा करने वाले वी. रामकृष्णन के उस बयान से की गई थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि भारतीय विज्ञान कांग्रेस एक सर्कस है और वहाँ विज्ञान की चर्चा बहुत कम होती है तथा पिछले वर्ष वहाँ यह दावा किया गया था कि विमान का आविष्कार वैदिक युग में हो गया था; अतएव वह वहाँ कभी हिस्सा नहीं लेंगे। वी. रामकृष्णन का कहना गलत नहीं है और वेदों से भारतीय जिज्ञासा की शुरुआत को मानना भी गलत नहीं है; जिसका प्रमाण पिछले आलेख में दिया जा चुका है। फिर भारतीय वैज्ञानिक विरासत की ¶ोष गाथा कहने से पहले यह जानना रुचिकर हो सकता है कि वैदिक युग में विमान के आविष्कार की बात कहाँ से आई?
सर्वप्रथम इसका जिक्र पं. श्रीपाद दामोदर सातवलेकर (1951) ने अपनी वैदिक व्याख्यान माला (31वाँ व्याख्यान) में "वैदिक समय के सैन्य की ¶िाक्षा और रचना' शीर्षक के अंतर्गत किया था। यह तथ्य मान्य है कि वेद की कविताओं में प्रकृति की शक्तियों का महामानवीकरण किया गया है; किंतु पं. सातवलेकर ने मरुत् (पवन, हवा या इसका अवि·ासनीय मानवीकरण) को मृ, द्यदृ ड्डत्ड्ढ और उति प्रत्यय मानकर या फिर मा, नहीं और रुद, रोनेवाला कहकर वीर मत्र्य या मनुष्यों की श्रेणी में ला दिया। पं. सातवलेकर ने 49 पवन को 7न्7उ49 मरुत् सैनिकों का गण मान लिया। एक उदाहरण देखिए - "न पर्वता न नद्यो वरन्त वो यत्राचिध्वं मरुतो गच्छयेदु तत्। उत द्यावापृथिवी याथनापरि शुभं यातामनु रथा अवृत्सत।।' (ऋग्वेद 5/55/7) इसका अर्थ उन्होंने इस प्रकार किया - "हे मरुत् वीरों! न पर्वत और न नदियाँ आपके मार्ग को प्रतिबंधित कर सकती हैं, आप जहाँ जाना चाहते हैं, वहाँ पहुँचते ही हैं। द्यावापृथिवी के ऊपर जहाँ चाहे वहाँ जाते हैं, शुभ स्थान को जाने के समय आपके रथ आगे ही बढ़ते हैं, उनको कोई प्रतिबंधित नहीं कर सकता है।' अब इस सुंदर कविता को कोई मरुत् सैनिकों का विमान पर आवाजाही बता दे, तो फिर कविता और विज्ञान में क्या फर्क रह जायेगा। पं. सातवलेकर ने एक अन्य ऋचा को उद्धृत कर उसका अनुवाद इस प्रकार किया है - "ते म आहुर्य आययुः उप द्युभिर्विमिर्मदे। नरो मर्या अरेपसः ईमान् प¶यन्नि तिष्टुहि।।' (ऋग्वेद 5/53/3) - "वे निष्पाप वीर मेरे पास तेजस्वी पक्षी सदृश यानों में आकर कहने लगे कि इन वीरों की प्रशंसा कर।' स्पष्ट है की वेद की ऋचाओं में मरुत् (पवन) का अलंकार सहित वर्णन है। अतएव यह निष्कर्ष निकालना पूर्णतः अवैज्ञानिक है कि ऋग्वेदिक काल में ही विमानों का आविष्कार हो गया था। इस सम्बन्ध में कोई प्रलेखन वेदों में नहीं मिलता है।
वेदों में गणित और खगोल विज्ञान की चर्चा अव¶य है और इसका विवरण पिछले आलेख में किया जा चुका है। अब मध्यकालीन भारत (11वीं - 18वीं सदी) की ओर बढ़ते हैं। इस कालखण्ड में भारत में विज्ञान और प्रौद्योगिकी का विकास दो धाराओं में विभक्त हो गया : पहली धारा में परम्परागत ज्ञान-विज्ञान का प्रवाह होता रहा और दूसरी धारा इस्लाम और यूरोप के ज्ञान-विज्ञान से जन्मी।
विदित है कि मध्यकाल में मुस्लिम भारत आए। इस समय तक परम्परागत ज्ञान-विज्ञान में ह्यास होने लगा था। हारी हुई कौम सदा विजेता के रीति-रिवाजों का अनुसरण करती है और गुलामी में नवाचार (त्दददृध्ठ्ठद्यत्दृदद्म) की संभावना क्षीण होने लगती है। फलस्वरूप अरब मुल्कों में प्रचलित ¶िाक्षा को इस काल में अपनाया जाने लगा। परिणामस्वरूप मकतब और मदरसा अस्तित्व में आने लगे। प्राचीन भारत के गणित का स्वर्णकाल विस्मृत होता गया और मुस्लिम ¶िाक्षा संस्थाओं को राजकीय प्रश्रय दिया जाने लगा। अनेक स्थानों पर अपने निर्धारित पाठ्यक्रमों के साथ मदरसों की शृंखला स्थापित की गयी। ¶ोख अब्दुल्लाह और ¶ोख अज़ीज़ुल्लाह नामक दो क़ाबिल भाईयों ने संबल और आगरा में मदरसों की स्थापना की। मुल्क़ की स्थानीय प्रतिभाओं के अलावे अरब, फारस और मध्य ए¶िाया से क़ाबिल लोगों को मदरसा संभालने के लिए बुलाया गया। प्राथमिक स्तर से ही अंकगणित, क्षेत्रमिति, ज्यामिति, खगोलिकी, लेखा, लोक प्रशासन और कृषि विज्ञान को शामिल किया गया। यद्यपि इस काल में विज्ञान का अपेक्षित विकास नहीं हो सका, तथापि प्राचीन भारतीय विज्ञान परम्परा और अन्य देशों में प्रचलित मध्यकालीन विज्ञान पद्धतियों के बीच समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया गया।
इस काल में राजा-महाराजाओं तथा सरकारी महकमों को खाद्य, वस्त्र और अस्त्र-शस्त्र की आपूर्ति करने के लिए कारखानों का विकास हुआ। कारखानों में केवल वस्तुएँ उत्पादित नहीं होती थी, बल्कि यह युवाओं के लिए तकनीकी और रोजगारपरक ¶िाक्षा का केंद्र भी था।
मध्यकाल में विषयवार विज्ञान और तकनीक के विकास का लेखा-जोखा गणित के विकास से शुरू किया जा सकता है। इस काल में गणित की अनेक कृतियाँ प्रकाश में आर्इं। नरसिंह दैवज्ञ के पुत्र नारायण पंडित ने गणितकौमुदी और बीजगणितवतंस नाम से गणित की पुस्तकों को लिखा। गुजरात के गंगाधर ने लीलावती क्रमदीपिका, सिद्धांतदीपिका और लीलावती व्याख्या लिखी। इन सबों ने त्रिकोणमिति के अनुपातों ज्या (द्मत्दड्ढ), कोज्या (ड़दृद्मत्दड्ढ), स्पर्शज्या (द्यठ्ठदढ़ड्ढदद्य) इत्यादि का मान प्राप्त करने में योगदान किया। नीलकण्ठ ने तंत्रसंग्रह नाम से गणित की पुस्तक लिखी, जिसमें त्रिकोणमितीय फलनों को निकालने की विधि बताई गई।
गणेश दैवज्ञ ने बुद्धिविलासिनी नाम से लीलावती पर भाष्य लिखा, जिसमें अनेक उदाहरण भी प्रस्तुत किये गए। वल्लभ सम्प्रदाय के कृष्ण ने नवांकुर नाम से भास्कर द्वितीय के बीजगणित पर भाष्य लिखा, जिसमें प्रथम और द्वितीय क्रम के अनिर्धारित समीकरणों को हल करने की विधि बताई गई।
इसके अलावे, नीलकण्ठ ज्योतिर्विद ने ताजिक ग्रन्थ की रचना की, जिसमें फ़ारसी की तकनीकी पदावली का उपयोग किया गया। अकबर के कहने पर फ़ैज़ी ने भास्कर के बीजगणित का अनुवाद किया। इस काल में नसरुद्दीन अतुसी नाम के गणित के विद्वान भी हुए।
मुस्लिम शासक मूलतः योद्धा और ¶िाकारी होते थे, जो घोड़ा, कुत्ता, चीता, बाज जैसे पशु-पक्षियों को पालते थे। उनके समय में हंसदेव ने मृग-पक्षी शास्त्र नाम से जीव विज्ञान की पुस्तक लिखी। यद्यपि यह वैज्ञानिक पुस्तक नहीं कही जा सकती है, फिर भी इसमें ¶िाकारी पशु-पक्षियों का विवरण मिलता है। अकबर को घोड़ों, हाथियों इत्यादि के संकर नस्लों के विकास में वि¶ोष रुचि थी। जहाँगीर ने अपनी किताब तुजुक-ए-जहाँगीरी में इन संकर नस्लों की पैदाइश से संबंधी प्रयोगों का विवरण लिखा है। उसने लगभग 36 किस्म के जानवरों का उल्लेख किया है। जहाँगीर प्रकृतिप्रेमी भी था। उसके दरबारी चित्रकारों, खासकर मंसूर ने इन जानवरों के सुंदर चित्र बनाये और अन्य चित्रकारों ने लगभग 57 पौधों के चित्र गढे, जो आज भी अजायबघरों और निजी संग्रहों की शोभा बढ़ाते हैं।
मध्यकालीन भारत में रसायन विज्ञान का विकास कागज निर्माण उद्योग में हुआ। उस समय क¶मीर, सियालकोट, जाफराबाद, पटना, मुर्¶िादाबाद, अहमदाबाद और मैसूर कागज उत्पादन के मुख्य केंद्र थे। इन केंद्रों पर कागज निर्माण की प्रक्रिया लगभग समान थी, किंतु लुग्दी निर्माण अलग-अलग कच्ची सामग्रियों से होता था।
मुगलों को गन पाउडर के निर्माण की पद्धति का ज्ञान था। भारतीय कारीगरों ने विस्फोटकों के निर्माण की प्रक्रिया सीख ली थी। शुक्राचार्य विरचित शुक्रनीति में विस्फोटक बनाने की चर्चा है। इस समय फुलझड़ियों और पटाखों का बनना भी शुरु हो गया था। आईन-ए-अकबरी में अकबर के दरबार में प्रयुक्त होने वाले इत्रों का जिक्र मिलता है। एक खूबसूरत बात यह है कि मुग़लकाल के लोकप्रिय  गुलाब के इत्र को खोजने का श्रेय मलिका-ए-हुस्न नूरजहाँ को दिया जाता है।
इस काल में खगोल विज्ञान का भी विकास हुआ। पूर्व में विरचित खगोल विज्ञान के ग्रंथों पर भाष्य लिखे गए।
फ़िरोज़शाह के दरबारी खगोलविद् महेंद्र सूरी ने यंत्रराज नाम से खगोलीय प्रेक्षण का उपकरण बनाया। इस समय केरल में परमे·ार और महाभास्करीय नामक दो विख्यात खगोलविद् और पंचांग निर्माता हुए। नीलकण्ठ सोमसुतवन ने आर्यभटीय की टीका रची। कमलाकर ने इस्लाम के खगोल विज्ञान का विस्तृत अध्ययन किया। जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय खगोल विज्ञान के संरक्षक थे। उन्होंने दिल्ली, उज्जैन, वाराणसी, मथुरा और जयपुर में वेधशालाएं स्थापित की।
भारतीय इतिहास के मध्यकाल में राजाश्रय के अभाव में प्राचीन भारत की तरह आयुर्वेद का विकास नहीं हो सका। फिर भी, वंगसेन कृत शारंगधर संहिता और चिकित्सा संग्रह और भावमिश्र कृत भावप्रकाश का संकलन हुआ। शारंगधर संहिता (13वीं सदी) में रोग निर्धारण के लिए मूत्र जाँच और दवा के रूप में अफीम के प्रयोग का जिक्र मिलता है। इस ग्रन्थ में रसचिकित्सा के रूप में पारद और पारद रहित खनिज औषधियों का उल्लेख मिलता है। इसी काल में तमिलनाडु में सिद्ध चिकित्सा पद्धति का विकास हुआ, जिसमें दीर्घ जीवन प्राप्त करने के लिए अनुभूत योगों का वर्णन है।
मध्यकाल में ही भारत में यूनानी तिब्ब चिकित्सा पद्धति का प्रचार-प्रसार हुआ। अली बिन रब्बन ने अपनी किताब फिरदौसु हिकमत में यूनानी दवाओं और भारतीय चिकित्सा विज्ञान को कलमबद्ध किया। हकीम दिया मुहम्मद ने मजीनी-ए-दिया नामक किताब में अरबी, फ़ारसी और हिंदुस्तानी दवा पद्धतियों को लिखा। इसी तरह फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ ने तिब्ब-ए-फिरोजशाही की रचना की। इसी तरह औरंगज़ेब और दारा¶िाकोह को समर्पित चिकित्सा की किताबें प्रकाश में आर्इं।
मध्यकालीन भारत में कृषि की रूपरेखा प्राचीन भारत जैसी ही थी। लेकिन विदेशी व्यापारियों के द्वारा कुछ नई फसलों और बागवानी का विकास किया गया। उन दिनों गेहूँ, धान, जौ, ज्वार, दलहन, तेलहन, कपास, गन्ना और नील मुख्य फसल के अंतर्गत आते थे। प¶िचमी घाट में काली मिर्च की और क¶मीर में केशर तथा फलों की खेती होती थी। तमिलनाडु में अदरख और दालचीनी की खेती तथा केरल में इलाइची, चन्दन और नारियल की उपज होती थी। भारत में 16वीं-17वीं शताब्दी के दौरान तम्बाकू, मिर्च, आलू, अमरुद, शरीफा, काजू और अनानास आया। इसी काल में बिहार और मालवा क्षेत्र में अफीम की खेती शुरू हुई। उन्नत बागवानी की शुरुआत हुई। 16वीं सदी में ही गोआ में आम की कलमों के बनाने की शुरुआत हुई। मुगलों ने कई आमों के बाग़ लगवाये।
सिंचाई के लिए कुएँ, तालाबों, नहरों, रहटों, ढेंकी इत्यादि का प्रयोग होने लगा। आगरा के इलाके में फ़ारसी घिरनियों का प्रयोग कुएँ से पानी निकालने के लिए होता था। इस काल में राज्य के द्वारा भूमि माप और भूमि वर्गीकरण के आधार पर सिंचाई की व्यवस्था होती थी, जो शासकों और कृषकों, दोनों के लिए फायदेमंद थी।
(क्रमशः)

कस्मै देवाय हविषा विधेम?
CATEGORY : व्याख्या 01-Jul-2016 12:00 AM 1927
कस्मै देवाय हविषा विधेम?

भारतीय मानस की अनवरत् जिज्ञासा की कथा की यह कड़ी आधुनिक भारत में वैज्ञानिक विकास लिखने के क्रम में बारम्बार यही प्रशन मानस पटल पर उभर कर आता है, "कस्मै देवाय हविषा विधेम?' अर्थात् किस देवता की उपासना करें हम हवि देकर? क्या हमें वर्तमान वैज्ञानिक विकास के आलोक में अपने पूर्वजों के सत्य को जानने के प्रयासों और अतीत की उनकी गौरवपूर्ण उपलब्धियों विस्मृत कर देना चाहिए और नए सिरे से नए विज्ञान ऋषियों (वैज्ञानिकों) की उपासना करनी चाहिये? क्या भारत को अपने उस अतीत से नाता तोड़ लेना चाहिए, जिसने अपनी जिगीषा और जीजिविषा से इस देशा को आगे बढ़ाया और रहने लायक बनाया? फिर भारत की पहचान मिट जायेगी। उस भारत की पहचान जिसने पूर्ण औदार्य और सहिष्णुता से सबको अपनाया। ज़रूरत इस बात कि है कि हम समय और देशा की सीमा से परे मानवता की उन सारी शाौर्यपूर्ण उपलब्धियों को आत्मसात करें जो इसे अभ्युदय और निःश्रेयस के मार्ग पर ले जाए। आवशयकता इस बात की है कि हम जीवन को अर्थ देने वाले सत्य को जानने की अधीरता दिखाएँ और ऐसे नवीन गतिशाील दृष्टिकोण का विकास करें जिसके लिए हमारे पूर्वज जाने गए, किन्तु गुलामी के कुछ समय में हम जिनसे विमुख हो गए। अगर सत्य ही अंतिम वास्तविकता है, तो इसे शाा·ात, अन·ार और अपरिवर्तनशाील होना चाहिये; किन्तु उस सत्य की परख के लिए मानस का दायरा समय के साथ-साथ बढ़ाना ज़रूरी है। सत्य सदैव वही रहता है, लेकिन समय के साथ-साथ मानस के पूर्वज्ञान में बढ़ोत्तरी के कारण यह सत्य की अभिव्यक्ति नए संकेतों से करता है। हमें मानवता की सोच और उसके निरन्तर विकास के लिए सत्य को इसी नए जीवन्त रूप में ग्रहण करने की ज़रूरत है और साथ ही सत्य के प्रवाह क्रम में जो धूल उस पर बैठ गई, उसे भी हटाना है।
धर्म ने जीवन के नैतिक मूल्यों और जीवन का सही रास्ता बताकर जीवन मानवता की बड़ी सहायता की; किन्तु इसने अपने वि·ाास के प्रति समर्पण पर जोर देकर मानव की प्रकृति के रहस्यों को जानने की जिज्ञासा को हर लिया। इसी प्रकार, दर्शान ने तार्किकता और कारण का सहारा लिया; किन्तु तार्किकता और कारण भी तो महज मानस की उपज हैं और इनका तथ्यों से कोई वास्ता नहीं होता है। इन दोनों के विपरीत विज्ञान ने जीवन के अंतिम उद्देशय पर ध्यान न देकर तथ्यों और मात्र तथ्यों पर अपना ध्यान केंद्रित किया। इसके चलते मानवीय ज्ञान में अभूतपूर्व वृद्धि होने लगी और पहली बार यह धारणा बनी कि मानव प्रकृति का ग़ुलाम नहीं है, बल्कि उसमें प्रकृति पर विजय पाने की ताक़त है।
आधुनिक भारत में इस तथ्यपरक वैज्ञानिक सोच के विकास की शाुरुआत 19वीं शाताब्दी के उत्तराद्र्ध से मान सकते हैं। इस काल के भारतीय वैज्ञानिकों ने सामान्य जन-मानस को आस्था और वि·ाास से हटाकर संदेह करने वाली, उसको चुनौती देने वाली या उसे अस्वीकार करने वाली वैज्ञानिक सोच को विकसित करने में अभूतपूर्व योगदान दिया।
इस क्रम में सर्वप्रथम श्रीनिवास अयंगर रामानुजन (1887-1920) का नाम उल्लेखनीय है। 22 दिसम्बर 1887 को तमिलनाडु के इरोड में जन्मे रामानुजन कुशााग्र-बुद्धि गणितज्ञ हुए। कहते हैं कि बचपन से ही संख्याएं उन तक खिंची चली आती थीं। मात्र 13 वर्ष की अवस्था में उन्हें जी.एस. कार रचित "सिनोप्सिस ऑफ़ एलीमेंट्री रिजल्ट्स इन प्योर मैथमेटिक्स' मिला और इससे वह गणित की दुनियाँ से जुड़ते चले गए। फिर उन्होंने गणित में स्वयं निर्मित अभिधारणाओं का विकास करना आरम्भ कर दिया। रामानुजन की जीवनी "द मैन हु न्यु इन्फिनिटी' के लेखक रॉबर्ट कैनिगल का कहना था कि 11 साल की अवस्था में "सहपाठी उनसे मदद मांगने आने लगे थे' एक साल बाद वो "अपने शिाक्षकों को चुनौती देने लगे थे' और जब वो 13 साल के थे वो एस.एल. लोनी की त्रिकोणमिति के मास्टर हो गए थे। इस किताब को अब भी कुछ भारतीय छात्र पढ़ते हैं।
वह गणित में खुद की विकसित की गयी धारणाओं और परिणामों का नोट्स लिख लिया करते थे। उनके तीन नोट्स, जो रामानुजन का फ्रायेड नोटबुक्स के नाम से जाना जाता है, हमारे पास उपलब्ध है। रामानुजन यद्यपि पारम्परिक महाविद्यालयी शिाक्षा नहीं प्राप्त कर पाए, किन्तु वह जर्नल ऑफ़ इंडियन मैथमेटिकल सोसाइटी में गणितीय समस्या और समाधान लिखते गये। 1911 में आपने इसी जर्नल में बरनोली संख्या पर अपना विलक्षण शाोध-पत्र प्रकाशिात कराया। इससे उन्हें ख्याति मिली और वह मद्रास के बौद्धिक लोगों के बीच विलक्षण गणितज्ञ के रूप से पहचाने जाने लगे।
औपचारिक शिाक्षा नहीं पा सकने के कारण उन्हें रोजमर्रा की जरूरतों और गणित के शाोध के बीच तालमेल बिठाना बहुत मुशिकल होता गया। बहुत दिक्कतों के बाद उन्हें मद्रास पोर्ट ट्रस्ट में क्लर्क की नौकरी मिली। यहाँ से उनकी विलक्षण प्रतिभा को निखरने का मौका मिला, क्योंकि यहाँ उन्हें गणित के जानकारों का साथ मिला। यहीं उन्हें जी.एच. हार्डी की किताब "ऑर्डर्स ऑफ़ इन्फिनिटी' मिली। उन्होंने हार्डी को एक पत्र लिखा, जिसमें 120 प्रमेयों और सूत्रों का ज़िक्र किया। हार्डी ने उनकी विलक्षण प्रतिभा को पहचाना और उनके लंदन आने की व्यवस्था की। औपचारिक शिाक्षा के नहीं होने के बावजूद यहाँ उन्हें ट्रिनिटी कॉलेज में दाखिला मिला, जहाँ से आपने दो वर्ष से कम समय में ही स्नातक की उपाधि प्राप्त की। फिर उनकी, हार्डी और जे.ई. लिटिलवुड की टीम बनी और उनके कई शाोधपत्र प्रकाशिात हुए। रामानुजन पहले भारतीय थे, जिन्हें ट्रिनिटी कॉलेज का फेलो चुना गया और इसी तरह वे दूसरे भारतीय हुए, जो रॉयल सोसाइटी ऑफ़ लंदन के फेलो बने।
रामानुजन की गणितीय मेधा इस बात का प्रमाण है कि प्राचीन ही नहीं आधुनिक काल में भी भारत में गणितीय अभिधारणाओं का जन्म होता रहा। इतना ज़रूर लगता है कि औपनिवेसिक भारत में रामानुजन की प्रत्यक्ष गणितीय योग्यता उस तरह उभर नहीं सकी, जैसी वो किसी और देशाकाल में उभर सकती थी। यूरोप में पुनर्जगारण के बाद रामानुजन जैसी प्रतिभा वाले किसी छात्र को आसानी से एक मार्गदर्शाक मिल जाता। जिससे उसकी प्रतिभा को मांजने में काफ़ी मदद मिलती। ब्रिाटेन के उपनिवेशा भारत में उन्हें बेहद आम तरीके से आगे बढ़ने के मौके मिले।
भारतीय तार्किकता और जिज्ञासा को वैज्ञानिक सोच में तब्दील करने में सर चन्द्रशोखर वेंकट रमण (1888-1970) का नाम अग्रणीय पंक्ति में उल्लेख करने के लायक है। 1930 में भौतिकी में नोबेल पुरस्कार पाने वाले सी.वी. रमण पहले एशिायाई नागरिक थे, जिन्हें यह गौरव प्राप्त हुआ। प्रकृति-प्रदत्त प्रतिभा से संपन्न सी.वी. रमण संस्कृत साहित्य, संगीत और विज्ञान के माहौल में पले-बढ़े। भारतीय अंकेक्षण और लेखा परीक्षा में अव्वल आने के बाद उन्होंने मात्र 19 वर्ष की अवस्था में कोलकाता के वित्त विभाग में सहायक महालेखाकार का पदभार संभाला, किंतु विज्ञान के प्रति अपने असीम लगाव के कारण शाीघ्र ही उन्होंने यह पद त्यागकर कोलकाता वि·ाविद्यालय के विज्ञान महाविद्यालय में भौतिकी के प्रोफेसर के रूप में योगदान किया।
संगीत के प्रति ही उतने लगाव के कारण आप संगीत वाद्ययंत्रों यथा, वीणा, वायलिन और मृदंगम पर शाोध करने लगे। 1921 में आपने रॉयल सोसाइटी, लंदन के समक्ष तन्तु-वाद्ययंत्रों के सिद्धांत पर अपना पेपर प्रस्तुत किया। 1924 में वे रॉयल सोसाइटी ऑफ़ लंदन के फेलो चुन लिए गए।
कहते हैं कि जब सी.वी. रमण इंग्लैंड की यात्रा पर थे, तो समन्दर के नीले रंग ने उन्हें आकर्षित किया। उनकी जिज्ञासा बलवती हो उठी कि तब भी जब समन्दर में लहरें उठती हैं, इसका रंग नीला ही क्यों बना रहता है। उन्हें पूर्वाभास हुआ कि सम्भवतः यह जल के अणुओं द्वारा सूर्य के प्रकाशा के प्रकीर्णन (टूटना) के कारण है। उन्होंने अपना प्रयोग शाुरू कर दिया और "प्रकाशा का आणविक प्रकीर्णन' आलेख रॉयल सोसाइटी ऑफ़ लंदन को भेजा। विज्ञान जगत उनकी उपलब्धि पर अवाक हो गया। 28 फ़रवरी 1928 को उन्होंने रमण प्रभाव की खोज की थी, जिसकी याद में अब 28 फ़रवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाया जाता है। जब भौतिकशाास्त्री इस बात पर बहस कर रहे थे कि प्रकाशा तरंग है या कण; रमण ने सिद्ध कर दिखाया कि प्रकाशा फोटोन नामक कणों से निर्मित है। 1930 में उन्हें रमण प्रभाव की खोज के लिए भौतिकी का नोबेल पुरस्कार दिया गया। स्वयं रमण के शाब्दों में, "जब नोबल पुरस्कार की घोषणा की गई थी तो मैं ने इसे अपनी व्यक्तिगत विजय माना, मेरे लिए और मेरे सहयोगियों के लिए एक उपलब्धि-एक अत्यंत असाधारण खोज को मान्यता दी गई है, उस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए जिसके लिए मैंने सात वर्षों से काम किया है। लेकिन जब मैंने देखा कि उस खचाखच हाल में मेरे इर्द-गिर्द पशिचमी चेहरों का समुद्र है और मैं, केवल एक ही भारतीय, अपनी पगड़ी और बन्द गले के कोट में था, तो मुझे लगा कि मैं वास्तव में अपने लोगों और अपने देशा का प्रतिनिधित्व कर रहा हूं। जब किंग गुस्टाव ने मुझे पुरस्कार दिया तो मैंने अपने आपको वास्तव में विनम्र महसूस किया, यह भावप्रवण पल था लेकिन मैं अपने ऊपर नियंत्रण रखने में सफल रहा। जब मैं घूम गया और मैंने ऊपर ब्रिाटिशा यूनियन जैक देखा जिसके नीचे मैं बैठा रहा था और तब मैंने महसूस किया कि मेरे गरीब देशा, भारत का अपना ध्वज भी नहीं है और मेरा मन इसी से पूर्णत: अभिभूत हो गया।
भारत को यशा और आदर दिलानेवाले आधुनिक विज्ञान मनीषियों में डॉ. जगदीशा चन्द्र बोस (1858-1937) का नाम चिरस्मरणीय है। तत्कालीन भारत और वर्तमान बांग्लादेशा के मेनसिंह में जन्मे बोस को 1885 में प्रेसीडेंसी कॉलेज में भौतिकी का सहायक प्रोफेसर नियुक्त किया गया; किंतु अपने अंग्रेज सहकर्मी से लगभग आधा वेतन दिए जाने के कारण उन्होंने पद त्याग दिया। बाद में, उन्होंने विज्ञान की सेवा करने का निशचय किया और विद्युत तरंगों के गुणों का अध्ययन करने के लिए एक उपकरण बनाया। अपने शाोधपत्र "द इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशान एंड पोलरीज़शान ऑफ़ इलेक्ट्रिक रे' के लिए 1917 में उन्हें नाइट की उपाधि मिली और 1920 में वे रॉयल सोसाइटी ऑफ़ लंदन के फेलो बनाये गए। वह यह सम्मान पाने वाले पहले भारतीय भौतिशाास्त्री थे। डॉ. बोस को पूरे वि·ा में उनके आविष्कार क्रेस्कोग्राफ के लिए जाना जाता है। यह उपकरण पौधों के सूक्ष्म से सूक्ष्मतर वृद्धि और गतिविधियों को मापने में सक्षम होता है। इसके आधार पर डॉ. बोस ने यह दिखाया कि पौधों का भी परिसंचरण तंत्र होता है। उन्होंने कई अन्य उपकरण भी बनाये, जिन्हें बोस उपकरण के नाम से जाना जाता है। इन सबके अलावे इन्होंने मारकोनी से पहले बेतार यंत्र का आविष्कार किया; लेकिन औपनेवेशिाक दासता के माहौल में इसका श्रेय मारकोनी को ही मिला। जब किसी ने इस ओर उनका ध्यान दिलाया तो आपने कहा कि क्या फर्क पड़ता है कि आविष्कार किसने किया; मानवता को एक आविष्कार तो मिला।
वर्तमान में जब भारत के न्यूक्लिअर पॉवर ग्रुप में शाामिल होने के कूटनीतिक प्रयासों को चीन द्वारा वीटो किये जाने के कारण असफलता मिली है, हमें स्मरण हो आता है भारत के परमाणु ऊर्जा के जनक डॉ. होमी जहाँगीर भाभा (1909-1966) का। मुम्बई के एक पारसी परिवार में जन्मे और पले-बढे डॉ. भाभा ने मैकेनिकल इंजीनियरिंग में कैम्ब्रिाज से उपाधि प्राप्त की और 1935 में डॉक्टरेट की उपाधि भी ली। 1939 तक उनकी ख्याति ब्राहृांडीय विकिरणों पर मौलिक शाोध के लिए हो चुकी थी। भारत लौटने पर डॉ. सी.वी. रमण के आग्रह पर उन्होंने बेंगलुरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान में रीडर के रूप में पदभार ग्रहण किया और शाीघ्र ही वे प्रोफेसर बने। यहाँ उन्हें भौतिकी के अन्य क्षेत्र में शाोध संस्थान बनाने का ध्यान आया और सर दोराब जी टाटा के सहयोग से आपने 1945 में अपने पैतृक आवास पर ही परमाणु ऊर्जा में मौलिक अनुसंधान के लिए टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च की नींव रखी।
भारत का परमाणु अनुसंधान केंद्र जिसे अब भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर या भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र के नाम से जाना जाता है, ट्रॉम्बे में स्थापित किया गया। भारत का पहला एटॉमिक रिएक्टर "अप्सरा' भी उनके ही मार्गदर्शान में बनाया गया। डॉ. भाभा 1948 में भारत के परमाणु ऊर्जा आयोग के पहले अध्यक्ष बने। परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में उनका अध्ययन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बड़े महत्व का माना जाता है। वे संयुक्त राष्ट्रसंघ समर्थित परमाणु ऊर्जा के शाांतिपूर्ण प्रयोग के वास्ते अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के भी अध्यक्ष रहे।
आधुनिक भारत के अन्य महान वैज्ञानिकों में डॉ. विक्रम साराभाई का भी अपना स्थान है। भारत के पहले उपग्रह आर्यभट्ट के प्रक्षेपण में उनकी प्रमुख भूमिका थी। आपने डॉ. सी.वी. रमण के मार्गदर्शान में ब्राहृांडीय विकिरणों पर काम किया था और कैंब्रिाज वि·ाविद्यालय से डॉक्टर ऑफ़ फिलोसफी की उपाधि प्राप्त की थी। डॉ. साराभाई बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। आपने कई अंतर्राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों को स्थापित किया, जिसमें भारतीय प्रबंध संस्थान का नाम विशोष तौर पर उल्लेखनीय है। वे भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान आयोग के भी अध्यक्ष रहे। आपने ही थुम्बा इक्वेटोरियल रॉकेट लॉÏन्चग स्टेशान की आधारशिाला रखने में मार्गदर्शान किया। उपग्रह संचार से गाँवों तक शिाक्षा कैसे पहुँचे, इसकी योजना आपने ही बनाई।
इसी कड़ी में एक और नाम जुड़ता है, जो मिसाइल मैन के नाम से प्रसिद्ध भारत के 11वें राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम (1931-2015) का है। डॉ. कलाम ने एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में उपाधि प्राप्त करने के बाद 1963 से 1982 तक भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान में सेवा की। विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र में आपने उपग्रह प्रक्षेपण वाहन एस.एल.वी. -3 का विकास किया, जिसने रोहिणी उपग्रह को कक्षा में स्थापित किया। 1982 में रक्षा अनुसंधान विकास संस्थान के निदेशाक के रूप में उन्हें इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम का दायित्व सौंपा गया। उन्होंने रक्षा क्षेत्र की पाँच परियोजनाओं - पृथ्वी, त्रिशाूल, आकाशा, नाग और अग्नि के विकास में योगदान दिया। अग्नि मिसाइल में प्रयुक्त होने वाली हल्की सामग्री से आपने पोलियो पीड़ितों के लिए अत्यंत हल्की वैशााखी बनवाई। यह सामग्री अब ह्मदय रोगियों की बैलून एंजियोप्लास्टी में स्टेंट के रूप में काम में लाई जाती है। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के व्यक्तित्व में वैदिक ऋषियों की तरह शाुद्ध भारतीय आत्मा थी।
"कस्मै देवाय हविषा विधेम?' यज्ञ की पूर्णाहुति सफल नहीं हो सकती है, यदि सत्येन्द्रनाथ बोस (1894-1974), शाान्ति स्वरूप भटनागर (1894-1955), प्रफुल्लचन्द्र राय (1861-1944) और मेघनाद साहा (1893-1956) सरीखे आधुनिक भारतीय विज्ञान ऋषियों के नामों का उल्लेख न किया जाये।
अब प्रशन यह उठता है कि इतनी अच्छी वैज्ञानिक विरासत होने के बावजूद, एक ही बार में मंगल पर मंगलयान भेजने के बावजूद या फिर एक ही साथ अनेक उपग्रहों के सफल प्रक्षेपण के बाद भी, देशा में दशाकों से कोई बड़ा और मौलिक अनुसंधान क्यों नहीं हुआ है। विगत कई दशाकों से कोई नोबेल पुरस्कार क्यों नहीं मिला है? इनफ़ोसिस के संस्थापक एन.आर. नारायण मूर्ति ने कहा था, "विगत 60 वर्षों में भारत मात्र पशिचमी वैज्ञानिक विकास के सहारे रहा है और इसमें हमने मात्र थोड़ा जोड़ा है। हमारे पास कोई प्रभावशााली आईडिया दावा करने के लिए नहीं है।'
मैसाचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी, अमेरिका के 10 सर्वोच्च आविष्कारों की बात करते हुए उन्होंने कहा, "ग्लोबल पोजिशानिंग सिस्टम, बायोनिक प्रोस्थेसिस और माइक्रोचिप - यह सब तभी सफल हुआ, क्योंकि एम.आई.टी. के छात्रों और शिाक्षकों ने एक अलग मार्ग का अनुशारण किया। प्रायः सभी आविष्कार - कार, बल्व, रेडियो, टीवी, कंप्यूटर, इंटरनेट, वाई-फाई, एम् आर आई, लेसर, रोबॉट इत्यादि पशिचमी शिाक्षा और अनुसन्धान केंद्रों में ही हुए, फिर आई.आई.एस.सी. और आई.आई.टी. जैसी हमारी संस्थाओं का विगत 60 से अधिक वर्षों में समाज को बेहतर बनाने में क्या योगदान रहा है?' उन्होंने यह जोर दिया कि आज हमारे विद्वानों और विदेशा के विद्वानों के बीच विचारों का स्वतंत्र प्रवाह समय की ज़रूरत है।
इसके अलावे यह समझना ज़रूरी है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी देशा को आगे बढ़ाने वाला इंजन है। अतएव देशा के नोडल संस्थाओं यथा, वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद तथा भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद को समुचित वित्त और प्रशाासनिक ढाँचा प्रदान करते हुए राजनीतिक उदासीनता से बचाने की ज़रूरत है। इन सब के अतिरिक्त अनुसंधान को उत्साहित करने की बड़ी आवशयकता है। ध्यातव्य है कि भारत में मात्र दो लाख शाोधकर्ता हैं - 10 हज़ार कार्यबल के मुकाबले मात्र चार शाोधकर्ता, जबकि चीन में दस हज़ार कार्यबल में 18 शाोधकर्ता और ब्रााजील में इतने ही कार्यबल में सात शाोधकर्ता। भारत में 2013 में कुल 90 हज़ार शाोधपत्र जमा किये गए, जबकि चीन में यह संख्या 3 लाख से भी ज़्यादा थी।
यह सब विचारणीय तथ्य हैं। समय रहते अगर हम अपने शौक्षिक और अनुसंधान संस्थानों में नवाचार की लहर लाएंगे, तभी भारत के वि·ागुरु होने का सपना पूरा हो पायेगा

कस्मै देवाय हविषा विधेम?
CATEGORY : व्याख्या 01-Jul-2016 12:00 AM 1927
कस्मै देवाय हविषा विधेम?

भारतीय मानस की अनवरत् जिज्ञासा की कथा की यह कड़ी आधुनिक भारत में वैज्ञानिक विकास लिखने के क्रम में बारम्बार यही प्रशन मानस पटल पर उभर कर आता है, "कस्मै देवाय हविषा विधेम?' अर्थात् किस देवता की उपासना करें हम हवि देकर? क्या हमें वर्तमान वैज्ञानिक विकास के आलोक में अपने पूर्वजों के सत्य को जानने के प्रयासों और अतीत की उनकी गौरवपूर्ण उपलब्धियों विस्मृत कर देना चाहिए और नए सिरे से नए विज्ञान ऋषियों (वैज्ञानिकों) की उपासना करनी चाहिये? क्या भारत को अपने उस अतीत से नाता तोड़ लेना चाहिए, जिसने अपनी जिगीषा और जीजिविषा से इस देशा को आगे बढ़ाया और रहने लायक बनाया? फिर भारत की पहचान मिट जायेगी। उस भारत की पहचान जिसने पूर्ण औदार्य और सहिष्णुता से सबको अपनाया। ज़रूरत इस बात कि है कि हम समय और देशा की सीमा से परे मानवता की उन सारी शाौर्यपूर्ण उपलब्धियों को आत्मसात करें जो इसे अभ्युदय और निःश्रेयस के मार्ग पर ले जाए। आवशयकता इस बात की है कि हम जीवन को अर्थ देने वाले सत्य को जानने की अधीरता दिखाएँ और ऐसे नवीन गतिशाील दृष्टिकोण का विकास करें जिसके लिए हमारे पूर्वज जाने गए, किन्तु गुलामी के कुछ समय में हम जिनसे विमुख हो गए। अगर सत्य ही अंतिम वास्तविकता है, तो इसे शाा·ात, अन·ार और अपरिवर्तनशाील होना चाहिये; किन्तु उस सत्य की परख के लिए मानस का दायरा समय के साथ-साथ बढ़ाना ज़रूरी है। सत्य सदैव वही रहता है, लेकिन समय के साथ-साथ मानस के पूर्वज्ञान में बढ़ोत्तरी के कारण यह सत्य की अभिव्यक्ति नए संकेतों से करता है। हमें मानवता की सोच और उसके निरन्तर विकास के लिए सत्य को इसी नए जीवन्त रूप में ग्रहण करने की ज़रूरत है और साथ ही सत्य के प्रवाह क्रम में जो धूल उस पर बैठ गई, उसे भी हटाना है।
धर्म ने जीवन के नैतिक मूल्यों और जीवन का सही रास्ता बताकर जीवन मानवता की बड़ी सहायता की; किन्तु इसने अपने वि·ाास के प्रति समर्पण पर जोर देकर मानव की प्रकृति के रहस्यों को जानने की जिज्ञासा को हर लिया। इसी प्रकार, दर्शान ने तार्किकता और कारण का सहारा लिया; किन्तु तार्किकता और कारण भी तो महज मानस की उपज हैं और इनका तथ्यों से कोई वास्ता नहीं होता है। इन दोनों के विपरीत विज्ञान ने जीवन के अंतिम उद्देशय पर ध्यान न देकर तथ्यों और मात्र तथ्यों पर अपना ध्यान केंद्रित किया। इसके चलते मानवीय ज्ञान में अभूतपूर्व वृद्धि होने लगी और पहली बार यह धारणा बनी कि मानव प्रकृति का ग़ुलाम नहीं है, बल्कि उसमें प्रकृति पर विजय पाने की ताक़त है।
आधुनिक भारत में इस तथ्यपरक वैज्ञानिक सोच के विकास की शाुरुआत 19वीं शाताब्दी के उत्तराद्र्ध से मान सकते हैं। इस काल के भारतीय वैज्ञानिकों ने सामान्य जन-मानस को आस्था और वि·ाास से हटाकर संदेह करने वाली, उसको चुनौती देने वाली या उसे अस्वीकार करने वाली वैज्ञानिक सोच को विकसित करने में अभूतपूर्व योगदान दिया।
इस क्रम में सर्वप्रथम श्रीनिवास अयंगर रामानुजन (1887-1920) का नाम उल्लेखनीय है। 22 दिसम्बर 1887 को तमिलनाडु के इरोड में जन्मे रामानुजन कुशााग्र-बुद्धि गणितज्ञ हुए। कहते हैं कि बचपन से ही संख्याएं उन तक खिंची चली आती थीं। मात्र 13 वर्ष की अवस्था में उन्हें जी.एस. कार रचित "सिनोप्सिस ऑफ़ एलीमेंट्री रिजल्ट्स इन प्योर मैथमेटिक्स' मिला और इससे वह गणित की दुनियाँ से जुड़ते चले गए। फिर उन्होंने गणित में स्वयं निर्मित अभिधारणाओं का विकास करना आरम्भ कर दिया। रामानुजन की जीवनी "द मैन हु न्यु इन्फिनिटी' के लेखक रॉबर्ट कैनिगल का कहना था कि 11 साल की अवस्था में "सहपाठी उनसे मदद मांगने आने लगे थे' एक साल बाद वो "अपने शिाक्षकों को चुनौती देने लगे थे' और जब वो 13 साल के थे वो एस.एल. लोनी की त्रिकोणमिति के मास्टर हो गए थे। इस किताब को अब भी कुछ भारतीय छात्र पढ़ते हैं।
वह गणित में खुद की विकसित की गयी धारणाओं और परिणामों का नोट्स लिख लिया करते थे। उनके तीन नोट्स, जो रामानुजन का फ्रायेड नोटबुक्स के नाम से जाना जाता है, हमारे पास उपलब्ध है। रामानुजन यद्यपि पारम्परिक महाविद्यालयी शिाक्षा नहीं प्राप्त कर पाए, किन्तु वह जर्नल ऑफ़ इंडियन मैथमेटिकल सोसाइटी में गणितीय समस्या और समाधान लिखते गये। 1911 में आपने इसी जर्नल में बरनोली संख्या पर अपना विलक्षण शाोध-पत्र प्रकाशिात कराया। इससे उन्हें ख्याति मिली और वह मद्रास के बौद्धिक लोगों के बीच विलक्षण गणितज्ञ के रूप से पहचाने जाने लगे।
औपचारिक शिाक्षा नहीं पा सकने के कारण उन्हें रोजमर्रा की जरूरतों और गणित के शाोध के बीच तालमेल बिठाना बहुत मुशिकल होता गया। बहुत दिक्कतों के बाद उन्हें मद्रास पोर्ट ट्रस्ट में क्लर्क की नौकरी मिली। यहाँ से उनकी विलक्षण प्रतिभा को निखरने का मौका मिला, क्योंकि यहाँ उन्हें गणित के जानकारों का साथ मिला। यहीं उन्हें जी.एच. हार्डी की किताब "ऑर्डर्स ऑफ़ इन्फिनिटी' मिली। उन्होंने हार्डी को एक पत्र लिखा, जिसमें 120 प्रमेयों और सूत्रों का ज़िक्र किया। हार्डी ने उनकी विलक्षण प्रतिभा को पहचाना और उनके लंदन आने की व्यवस्था की। औपचारिक शिाक्षा के नहीं होने के बावजूद यहाँ उन्हें ट्रिनिटी कॉलेज में दाखिला मिला, जहाँ से आपने दो वर्ष से कम समय में ही स्नातक की उपाधि प्राप्त की। फिर उनकी, हार्डी और जे.ई. लिटिलवुड की टीम बनी और उनके कई शाोधपत्र प्रकाशिात हुए। रामानुजन पहले भारतीय थे, जिन्हें ट्रिनिटी कॉलेज का फेलो चुना गया और इसी तरह वे दूसरे भारतीय हुए, जो रॉयल सोसाइटी ऑफ़ लंदन के फेलो बने।
रामानुजन की गणितीय मेधा इस बात का प्रमाण है कि प्राचीन ही नहीं आधुनिक काल में भी भारत में गणितीय अभिधारणाओं का जन्म होता रहा। इतना ज़रूर लगता है कि औपनिवेसिक भारत में रामानुजन की प्रत्यक्ष गणितीय योग्यता उस तरह उभर नहीं सकी, जैसी वो किसी और देशाकाल में उभर सकती थी। यूरोप में पुनर्जगारण के बाद रामानुजन जैसी प्रतिभा वाले किसी छात्र को आसानी से एक मार्गदर्शाक मिल जाता। जिससे उसकी प्रतिभा को मांजने में काफ़ी मदद मिलती। ब्रिाटेन के उपनिवेशा भारत में उन्हें बेहद आम तरीके से आगे बढ़ने के मौके मिले।
भारतीय तार्किकता और जिज्ञासा को वैज्ञानिक सोच में तब्दील करने में सर चन्द्रशोखर वेंकट रमण (1888-1970) का नाम अग्रणीय पंक्ति में उल्लेख करने के लायक है। 1930 में भौतिकी में नोबेल पुरस्कार पाने वाले सी.वी. रमण पहले एशिायाई नागरिक थे, जिन्हें यह गौरव प्राप्त हुआ। प्रकृति-प्रदत्त प्रतिभा से संपन्न सी.वी. रमण संस्कृत साहित्य, संगीत और विज्ञान के माहौल में पले-बढ़े। भारतीय अंकेक्षण और लेखा परीक्षा में अव्वल आने के बाद उन्होंने मात्र 19 वर्ष की अवस्था में कोलकाता के वित्त विभाग में सहायक महालेखाकार का पदभार संभाला, किंतु विज्ञान के प्रति अपने असीम लगाव के कारण शाीघ्र ही उन्होंने यह पद त्यागकर कोलकाता वि·ाविद्यालय के विज्ञान महाविद्यालय में भौतिकी के प्रोफेसर के रूप में योगदान किया।
संगीत के प्रति ही उतने लगाव के कारण आप संगीत वाद्ययंत्रों यथा, वीणा, वायलिन और मृदंगम पर शाोध करने लगे। 1921 में आपने रॉयल सोसाइटी, लंदन के समक्ष तन्तु-वाद्ययंत्रों के सिद्धांत पर अपना पेपर प्रस्तुत किया। 1924 में वे रॉयल सोसाइटी ऑफ़ लंदन के फेलो चुन लिए गए।
कहते हैं कि जब सी.वी. रमण इंग्लैंड की यात्रा पर थे, तो समन्दर के नीले रंग ने उन्हें आकर्षित किया। उनकी जिज्ञासा बलवती हो उठी कि तब भी जब समन्दर में लहरें उठती हैं, इसका रंग नीला ही क्यों बना रहता है। उन्हें पूर्वाभास हुआ कि सम्भवतः यह जल के अणुओं द्वारा सूर्य के प्रकाशा के प्रकीर्णन (टूटना) के कारण है। उन्होंने अपना प्रयोग शाुरू कर दिया और "प्रकाशा का आणविक प्रकीर्णन' आलेख रॉयल सोसाइटी ऑफ़ लंदन को भेजा। विज्ञान जगत उनकी उपलब्धि पर अवाक हो गया। 28 फ़रवरी 1928 को उन्होंने रमण प्रभाव की खोज की थी, जिसकी याद में अब 28 फ़रवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाया जाता है। जब भौतिकशाास्त्री इस बात पर बहस कर रहे थे कि प्रकाशा तरंग है या कण; रमण ने सिद्ध कर दिखाया कि प्रकाशा फोटोन नामक कणों से निर्मित है। 1930 में उन्हें रमण प्रभाव की खोज के लिए भौतिकी का नोबेल पुरस्कार दिया गया। स्वयं रमण के शाब्दों में, "जब नोबल पुरस्कार की घोषणा की गई थी तो मैं ने इसे अपनी व्यक्तिगत विजय माना, मेरे लिए और मेरे सहयोगियों के लिए एक उपलब्धि-एक अत्यंत असाधारण खोज को मान्यता दी गई है, उस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए जिसके लिए मैंने सात वर्षों से काम किया है। लेकिन जब मैंने देखा कि उस खचाखच हाल में मेरे इर्द-गिर्द पशिचमी चेहरों का समुद्र है और मैं, केवल एक ही भारतीय, अपनी पगड़ी और बन्द गले के कोट में था, तो मुझे लगा कि मैं वास्तव में अपने लोगों और अपने देशा का प्रतिनिधित्व कर रहा हूं। जब किंग गुस्टाव ने मुझे पुरस्कार दिया तो मैंने अपने आपको वास्तव में विनम्र महसूस किया, यह भावप्रवण पल था लेकिन मैं अपने ऊपर नियंत्रण रखने में सफल रहा। जब मैं घूम गया और मैंने ऊपर ब्रिाटिशा यूनियन जैक देखा जिसके नीचे मैं बैठा रहा था और तब मैंने महसूस किया कि मेरे गरीब देशा, भारत का अपना ध्वज भी नहीं है और मेरा मन इसी से पूर्णत: अभिभूत हो गया।
भारत को यशा और आदर दिलानेवाले आधुनिक विज्ञान मनीषियों में डॉ. जगदीशा चन्द्र बोस (1858-1937) का नाम चिरस्मरणीय है। तत्कालीन भारत और वर्तमान बांग्लादेशा के मेनसिंह में जन्मे बोस को 1885 में प्रेसीडेंसी कॉलेज में भौतिकी का सहायक प्रोफेसर नियुक्त किया गया; किंतु अपने अंग्रेज सहकर्मी से लगभग आधा वेतन दिए जाने के कारण उन्होंने पद त्याग दिया। बाद में, उन्होंने विज्ञान की सेवा करने का निशचय किया और विद्युत तरंगों के गुणों का अध्ययन करने के लिए एक उपकरण बनाया। अपने शाोधपत्र "द इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशान एंड पोलरीज़शान ऑफ़ इलेक्ट्रिक रे' के लिए 1917 में उन्हें नाइट की उपाधि मिली और 1920 में वे रॉयल सोसाइटी ऑफ़ लंदन के फेलो बनाये गए। वह यह सम्मान पाने वाले पहले भारतीय भौतिशाास्त्री थे। डॉ. बोस को पूरे वि·ा में उनके आविष्कार क्रेस्कोग्राफ के लिए जाना जाता है। यह उपकरण पौधों के सूक्ष्म से सूक्ष्मतर वृद्धि और गतिविधियों को मापने में सक्षम होता है। इसके आधार पर डॉ. बोस ने यह दिखाया कि पौधों का भी परिसंचरण तंत्र होता है। उन्होंने कई अन्य उपकरण भी बनाये, जिन्हें बोस उपकरण के नाम से जाना जाता है। इन सबके अलावे इन्होंने मारकोनी से पहले बेतार यंत्र का आविष्कार किया; लेकिन औपनेवेशिाक दासता के माहौल में इसका श्रेय मारकोनी को ही मिला। जब किसी ने इस ओर उनका ध्यान दिलाया तो आपने कहा कि क्या फर्क पड़ता है कि आविष्कार किसने किया; मानवता को एक आविष्कार तो मिला।
वर्तमान में जब भारत के न्यूक्लिअर पॉवर ग्रुप में शाामिल होने के कूटनीतिक प्रयासों को चीन द्वारा वीटो किये जाने के कारण असफलता मिली है, हमें स्मरण हो आता है भारत के परमाणु ऊर्जा के जनक डॉ. होमी जहाँगीर भाभा (1909-1966) का। मुम्बई के एक पारसी परिवार में जन्मे और पले-बढे डॉ. भाभा ने मैकेनिकल इंजीनियरिंग में कैम्ब्रिाज से उपाधि प्राप्त की और 1935 में डॉक्टरेट की उपाधि भी ली। 1939 तक उनकी ख्याति ब्राहृांडीय विकिरणों पर मौलिक शाोध के लिए हो चुकी थी। भारत लौटने पर डॉ. सी.वी. रमण के आग्रह पर उन्होंने बेंगलुरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान में रीडर के रूप में पदभार ग्रहण किया और शाीघ्र ही वे प्रोफेसर बने। यहाँ उन्हें भौतिकी के अन्य क्षेत्र में शाोध संस्थान बनाने का ध्यान आया और सर दोराब जी टाटा के सहयोग से आपने 1945 में अपने पैतृक आवास पर ही परमाणु ऊर्जा में मौलिक अनुसंधान के लिए टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च की नींव रखी।
भारत का परमाणु अनुसंधान केंद्र जिसे अब भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर या भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र के नाम से जाना जाता है, ट्रॉम्बे में स्थापित किया गया। भारत का पहला एटॉमिक रिएक्टर "अप्सरा' भी उनके ही मार्गदर्शान में बनाया गया। डॉ. भाभा 1948 में भारत के परमाणु ऊर्जा आयोग के पहले अध्यक्ष बने। परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में उनका अध्ययन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बड़े महत्व का माना जाता है। वे संयुक्त राष्ट्रसंघ समर्थित परमाणु ऊर्जा के शाांतिपूर्ण प्रयोग के वास्ते अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के भी अध्यक्ष रहे।
आधुनिक भारत के अन्य महान वैज्ञानिकों में डॉ. विक्रम साराभाई का भी अपना स्थान है। भारत के पहले उपग्रह आर्यभट्ट के प्रक्षेपण में उनकी प्रमुख भूमिका थी। आपने डॉ. सी.वी. रमण के मार्गदर्शान में ब्राहृांडीय विकिरणों पर काम किया था और कैंब्रिाज वि·ाविद्यालय से डॉक्टर ऑफ़ फिलोसफी की उपाधि प्राप्त की थी। डॉ. साराभाई बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। आपने कई अंतर्राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों को स्थापित किया, जिसमें भारतीय प्रबंध संस्थान का नाम विशोष तौर पर उल्लेखनीय है। वे भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान आयोग के भी अध्यक्ष रहे। आपने ही थुम्बा इक्वेटोरियल रॉकेट लॉÏन्चग स्टेशान की आधारशिाला रखने में मार्गदर्शान किया। उपग्रह संचार से गाँवों तक शिाक्षा कैसे पहुँचे, इसकी योजना आपने ही बनाई।
इसी कड़ी में एक और नाम जुड़ता है, जो मिसाइल मैन के नाम से प्रसिद्ध भारत के 11वें राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम (1931-2015) का है। डॉ. कलाम ने एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में उपाधि प्राप्त करने के बाद 1963 से 1982 तक भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान में सेवा की। विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र में आपने उपग्रह प्रक्षेपण वाहन एस.एल.वी. -3 का विकास किया, जिसने रोहिणी उपग्रह को कक्षा में स्थापित किया। 1982 में रक्षा अनुसंधान विकास संस्थान के निदेशाक के रूप में उन्हें इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम का दायित्व सौंपा गया। उन्होंने रक्षा क्षेत्र की पाँच परियोजनाओं - पृथ्वी, त्रिशाूल, आकाशा, नाग और अग्नि के विकास में योगदान दिया। अग्नि मिसाइल में प्रयुक्त होने वाली हल्की सामग्री से आपने पोलियो पीड़ितों के लिए अत्यंत हल्की वैशााखी बनवाई। यह सामग्री अब ह्मदय रोगियों की बैलून एंजियोप्लास्टी में स्टेंट के रूप में काम में लाई जाती है। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के व्यक्तित्व में वैदिक ऋषियों की तरह शाुद्ध भारतीय आत्मा थी।
"कस्मै देवाय हविषा विधेम?' यज्ञ की पूर्णाहुति सफल नहीं हो सकती है, यदि सत्येन्द्रनाथ बोस (1894-1974), शाान्ति स्वरूप भटनागर (1894-1955), प्रफुल्लचन्द्र राय (1861-1944) और मेघनाद साहा (1893-1956) सरीखे आधुनिक भारतीय विज्ञान ऋषियों के नामों का उल्लेख न किया जाये।
अब प्रशन यह उठता है कि इतनी अच्छी वैज्ञानिक विरासत होने के बावजूद, एक ही बार में मंगल पर मंगलयान भेजने के बावजूद या फिर एक ही साथ अनेक उपग्रहों के सफल प्रक्षेपण के बाद भी, देशा में दशाकों से कोई बड़ा और मौलिक अनुसंधान क्यों नहीं हुआ है। विगत कई दशाकों से कोई नोबेल पुरस्कार क्यों नहीं मिला है? इनफ़ोसिस के संस्थापक एन.आर. नारायण मूर्ति ने कहा था, "विगत 60 वर्षों में भारत मात्र पशिचमी वैज्ञानिक विकास के सहारे रहा है और इसमें हमने मात्र थोड़ा जोड़ा है। हमारे पास कोई प्रभावशााली आईडिया दावा करने के लिए नहीं है।'
मैसाचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी, अमेरिका के 10 सर्वोच्च आविष्कारों की बात करते हुए उन्होंने कहा, "ग्लोबल पोजिशानिंग सिस्टम, बायोनिक प्रोस्थेसिस और माइक्रोचिप - यह सब तभी सफल हुआ, क्योंकि एम.आई.टी. के छात्रों और शिाक्षकों ने एक अलग मार्ग का अनुशारण किया। प्रायः सभी आविष्कार - कार, बल्व, रेडियो, टीवी, कंप्यूटर, इंटरनेट, वाई-फाई, एम् आर आई, लेसर, रोबॉट इत्यादि पशिचमी शिाक्षा और अनुसन्धान केंद्रों में ही हुए, फिर आई.आई.एस.सी. और आई.आई.टी. जैसी हमारी संस्थाओं का विगत 60 से अधिक वर्षों में समाज को बेहतर बनाने में क्या योगदान रहा है?' उन्होंने यह जोर दिया कि आज हमारे विद्वानों और विदेशा के विद्वानों के बीच विचारों का स्वतंत्र प्रवाह समय की ज़रूरत है।
इसके अलावे यह समझना ज़रूरी है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी देशा को आगे बढ़ाने वाला इंजन है। अतएव देशा के नोडल संस्थाओं यथा, वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद तथा भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद को समुचित वित्त और प्रशाासनिक ढाँचा प्रदान करते हुए राजनीतिक उदासीनता से बचाने की ज़रूरत है। इन सब के अतिरिक्त अनुसंधान को उत्साहित करने की बड़ी आवशयकता है। ध्यातव्य है कि भारत में मात्र दो लाख शाोधकर्ता हैं - 10 हज़ार कार्यबल के मुकाबले मात्र चार शाोधकर्ता, जबकि चीन में दस हज़ार कार्यबल में 18 शाोधकर्ता और ब्रााजील में इतने ही कार्यबल में सात शाोधकर्ता। भारत में 2013 में कुल 90 हज़ार शाोधपत्र जमा किये गए, जबकि चीन में यह संख्या 3 लाख से भी ज़्यादा थी।
यह सब विचारणीय तथ्य हैं। समय रहते अगर हम अपने शौक्षिक और अनुसंधान संस्थानों में नवाचार की लहर लाएंगे, तभी भारत के वि·ागुरु होने का सपना पूरा हो पायेगा

कस्मै देवाय हविषा विधेम?
CATEGORY : व्याख्या 01-Jul-2016 12:00 AM 1927
कस्मै देवाय हविषा विधेम?

भारतीय मानस की अनवरत् जिज्ञासा की कथा की यह कड़ी आधुनिक भारत में वैज्ञानिक विकास लिखने के क्रम में बारम्बार यही प्रशन मानस पटल पर उभर कर आता है, "कस्मै देवाय हविषा विधेम?' अर्थात् किस देवता की उपासना करें हम हवि देकर? क्या हमें वर्तमान वैज्ञानिक विकास के आलोक में अपने पूर्वजों के सत्य को जानने के प्रयासों और अतीत की उनकी गौरवपूर्ण उपलब्धियों विस्मृत कर देना चाहिए और नए सिरे से नए विज्ञान ऋषियों (वैज्ञानिकों) की उपासना करनी चाहिये? क्या भारत को अपने उस अतीत से नाता तोड़ लेना चाहिए, जिसने अपनी जिगीषा और जीजिविषा से इस देशा को आगे बढ़ाया और रहने लायक बनाया? फिर भारत की पहचान मिट जायेगी। उस भारत की पहचान जिसने पूर्ण औदार्य और सहिष्णुता से सबको अपनाया। ज़रूरत इस बात कि है कि हम समय और देशा की सीमा से परे मानवता की उन सारी शाौर्यपूर्ण उपलब्धियों को आत्मसात करें जो इसे अभ्युदय और निःश्रेयस के मार्ग पर ले जाए। आवशयकता इस बात की है कि हम जीवन को अर्थ देने वाले सत्य को जानने की अधीरता दिखाएँ और ऐसे नवीन गतिशाील दृष्टिकोण का विकास करें जिसके लिए हमारे पूर्वज जाने गए, किन्तु गुलामी के कुछ समय में हम जिनसे विमुख हो गए। अगर सत्य ही अंतिम वास्तविकता है, तो इसे शाा·ात, अन·ार और अपरिवर्तनशाील होना चाहिये; किन्तु उस सत्य की परख के लिए मानस का दायरा समय के साथ-साथ बढ़ाना ज़रूरी है। सत्य सदैव वही रहता है, लेकिन समय के साथ-साथ मानस के पूर्वज्ञान में बढ़ोत्तरी के कारण यह सत्य की अभिव्यक्ति नए संकेतों से करता है। हमें मानवता की सोच और उसके निरन्तर विकास के लिए सत्य को इसी नए जीवन्त रूप में ग्रहण करने की ज़रूरत है और साथ ही सत्य के प्रवाह क्रम में जो धूल उस पर बैठ गई, उसे भी हटाना है।
धर्म ने जीवन के नैतिक मूल्यों और जीवन का सही रास्ता बताकर जीवन मानवता की बड़ी सहायता की; किन्तु इसने अपने वि·ाास के प्रति समर्पण पर जोर देकर मानव की प्रकृति के रहस्यों को जानने की जिज्ञासा को हर लिया। इसी प्रकार, दर्शान ने तार्किकता और कारण का सहारा लिया; किन्तु तार्किकता और कारण भी तो महज मानस की उपज हैं और इनका तथ्यों से कोई वास्ता नहीं होता है। इन दोनों के विपरीत विज्ञान ने जीवन के अंतिम उद्देशय पर ध्यान न देकर तथ्यों और मात्र तथ्यों पर अपना ध्यान केंद्रित किया। इसके चलते मानवीय ज्ञान में अभूतपूर्व वृद्धि होने लगी और पहली बार यह धारणा बनी कि मानव प्रकृति का ग़ुलाम नहीं है, बल्कि उसमें प्रकृति पर विजय पाने की ताक़त है।
आधुनिक भारत में इस तथ्यपरक वैज्ञानिक सोच के विकास की शाुरुआत 19वीं शाताब्दी के उत्तराद्र्ध से मान सकते हैं। इस काल के भारतीय वैज्ञानिकों ने सामान्य जन-मानस को आस्था और वि·ाास से हटाकर संदेह करने वाली, उसको चुनौती देने वाली या उसे अस्वीकार करने वाली वैज्ञानिक सोच को विकसित करने में अभूतपूर्व योगदान दिया।
इस क्रम में सर्वप्रथम श्रीनिवास अयंगर रामानुजन (1887-1920) का नाम उल्लेखनीय है। 22 दिसम्बर 1887 को तमिलनाडु के इरोड में जन्मे रामानुजन कुशााग्र-बुद्धि गणितज्ञ हुए। कहते हैं कि बचपन से ही संख्याएं उन तक खिंची चली आती थीं। मात्र 13 वर्ष की अवस्था में उन्हें जी.एस. कार रचित "सिनोप्सिस ऑफ़ एलीमेंट्री रिजल्ट्स इन प्योर मैथमेटिक्स' मिला और इससे वह गणित की दुनियाँ से जुड़ते चले गए। फिर उन्होंने गणित में स्वयं निर्मित अभिधारणाओं का विकास करना आरम्भ कर दिया। रामानुजन की जीवनी "द मैन हु न्यु इन्फिनिटी' के लेखक रॉबर्ट कैनिगल का कहना था कि 11 साल की अवस्था में "सहपाठी उनसे मदद मांगने आने लगे थे' एक साल बाद वो "अपने शिाक्षकों को चुनौती देने लगे थे' और जब वो 13 साल के थे वो एस.एल. लोनी की त्रिकोणमिति के मास्टर हो गए थे। इस किताब को अब भी कुछ भारतीय छात्र पढ़ते हैं।
वह गणित में खुद की विकसित की गयी धारणाओं और परिणामों का नोट्स लिख लिया करते थे। उनके तीन नोट्स, जो रामानुजन का फ्रायेड नोटबुक्स के नाम से जाना जाता है, हमारे पास उपलब्ध है। रामानुजन यद्यपि पारम्परिक महाविद्यालयी शिाक्षा नहीं प्राप्त कर पाए, किन्तु वह जर्नल ऑफ़ इंडियन मैथमेटिकल सोसाइटी में गणितीय समस्या और समाधान लिखते गये। 1911 में आपने इसी जर्नल में बरनोली संख्या पर अपना विलक्षण शाोध-पत्र प्रकाशिात कराया। इससे उन्हें ख्याति मिली और वह मद्रास के बौद्धिक लोगों के बीच विलक्षण गणितज्ञ के रूप से पहचाने जाने लगे।
औपचारिक शिाक्षा नहीं पा सकने के कारण उन्हें रोजमर्रा की जरूरतों और गणित के शाोध के बीच तालमेल बिठाना बहुत मुशिकल होता गया। बहुत दिक्कतों के बाद उन्हें मद्रास पोर्ट ट्रस्ट में क्लर्क की नौकरी मिली। यहाँ से उनकी विलक्षण प्रतिभा को निखरने का मौका मिला, क्योंकि यहाँ उन्हें गणित के जानकारों का साथ मिला। यहीं उन्हें जी.एच. हार्डी की किताब "ऑर्डर्स ऑफ़ इन्फिनिटी' मिली। उन्होंने हार्डी को एक पत्र लिखा, जिसमें 120 प्रमेयों और सूत्रों का ज़िक्र किया। हार्डी ने उनकी विलक्षण प्रतिभा को पहचाना और उनके लंदन आने की व्यवस्था की। औपचारिक शिाक्षा के नहीं होने के बावजूद यहाँ उन्हें ट्रिनिटी कॉलेज में दाखिला मिला, जहाँ से आपने दो वर्ष से कम समय में ही स्नातक की उपाधि प्राप्त की। फिर उनकी, हार्डी और जे.ई. लिटिलवुड की टीम बनी और उनके कई शाोधपत्र प्रकाशिात हुए। रामानुजन पहले भारतीय थे, जिन्हें ट्रिनिटी कॉलेज का फेलो चुना गया और इसी तरह वे दूसरे भारतीय हुए, जो रॉयल सोसाइटी ऑफ़ लंदन के फेलो बने।
रामानुजन की गणितीय मेधा इस बात का प्रमाण है कि प्राचीन ही नहीं आधुनिक काल में भी भारत में गणितीय अभिधारणाओं का जन्म होता रहा। इतना ज़रूर लगता है कि औपनिवेसिक भारत में रामानुजन की प्रत्यक्ष गणितीय योग्यता उस तरह उभर नहीं सकी, जैसी वो किसी और देशाकाल में उभर सकती थी। यूरोप में पुनर्जगारण के बाद रामानुजन जैसी प्रतिभा वाले किसी छात्र को आसानी से एक मार्गदर्शाक मिल जाता। जिससे उसकी प्रतिभा को मांजने में काफ़ी मदद मिलती। ब्रिाटेन के उपनिवेशा भारत में उन्हें बेहद आम तरीके से आगे बढ़ने के मौके मिले।
भारतीय तार्किकता और जिज्ञासा को वैज्ञानिक सोच में तब्दील करने में सर चन्द्रशोखर वेंकट रमण (1888-1970) का नाम अग्रणीय पंक्ति में उल्लेख करने के लायक है। 1930 में भौतिकी में नोबेल पुरस्कार पाने वाले सी.वी. रमण पहले एशिायाई नागरिक थे, जिन्हें यह गौरव प्राप्त हुआ। प्रकृति-प्रदत्त प्रतिभा से संपन्न सी.वी. रमण संस्कृत साहित्य, संगीत और विज्ञान के माहौल में पले-बढ़े। भारतीय अंकेक्षण और लेखा परीक्षा में अव्वल आने के बाद उन्होंने मात्र 19 वर्ष की अवस्था में कोलकाता के वित्त विभाग में सहायक महालेखाकार का पदभार संभाला, किंतु विज्ञान के प्रति अपने असीम लगाव के कारण शाीघ्र ही उन्होंने यह पद त्यागकर कोलकाता वि·ाविद्यालय के विज्ञान महाविद्यालय में भौतिकी के प्रोफेसर के रूप में योगदान किया।
संगीत के प्रति ही उतने लगाव के कारण आप संगीत वाद्ययंत्रों यथा, वीणा, वायलिन और मृदंगम पर शाोध करने लगे। 1921 में आपने रॉयल सोसाइटी, लंदन के समक्ष तन्तु-वाद्ययंत्रों के सिद्धांत पर अपना पेपर प्रस्तुत किया। 1924 में वे रॉयल सोसाइटी ऑफ़ लंदन के फेलो चुन लिए गए।
कहते हैं कि जब सी.वी. रमण इंग्लैंड की यात्रा पर थे, तो समन्दर के नीले रंग ने उन्हें आकर्षित किया। उनकी जिज्ञासा बलवती हो उठी कि तब भी जब समन्दर में लहरें उठती हैं, इसका रंग नीला ही क्यों बना रहता है। उन्हें पूर्वाभास हुआ कि सम्भवतः यह जल के अणुओं द्वारा सूर्य के प्रकाशा के प्रकीर्णन (टूटना) के कारण है। उन्होंने अपना प्रयोग शाुरू कर दिया और "प्रकाशा का आणविक प्रकीर्णन' आलेख रॉयल सोसाइटी ऑफ़ लंदन को भेजा। विज्ञान जगत उनकी उपलब्धि पर अवाक हो गया। 28 फ़रवरी 1928 को उन्होंने रमण प्रभाव की खोज की थी, जिसकी याद में अब 28 फ़रवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाया जाता है। जब भौतिकशाास्त्री इस बात पर बहस कर रहे थे कि प्रकाशा तरंग है या कण; रमण ने सिद्ध कर दिखाया कि प्रकाशा फोटोन नामक कणों से निर्मित है। 1930 में उन्हें रमण प्रभाव की खोज के लिए भौतिकी का नोबेल पुरस्कार दिया गया। स्वयं रमण के शाब्दों में, "जब नोबल पुरस्कार की घोषणा की गई थी तो मैं ने इसे अपनी व्यक्तिगत विजय माना, मेरे लिए और मेरे सहयोगियों के लिए एक उपलब्धि-एक अत्यंत असाधारण खोज को मान्यता दी गई है, उस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए जिसके लिए मैंने सात वर्षों से काम किया है। लेकिन जब मैंने देखा कि उस खचाखच हाल में मेरे इर्द-गिर्द पशिचमी चेहरों का समुद्र है और मैं, केवल एक ही भारतीय, अपनी पगड़ी और बन्द गले के कोट में था, तो मुझे लगा कि मैं वास्तव में अपने लोगों और अपने देशा का प्रतिनिधित्व कर रहा हूं। जब किंग गुस्टाव ने मुझे पुरस्कार दिया तो मैंने अपने आपको वास्तव में विनम्र महसूस किया, यह भावप्रवण पल था लेकिन मैं अपने ऊपर नियंत्रण रखने में सफल रहा। जब मैं घूम गया और मैंने ऊपर ब्रिाटिशा यूनियन जैक देखा जिसके नीचे मैं बैठा रहा था और तब मैंने महसूस किया कि मेरे गरीब देशा, भारत का अपना ध्वज भी नहीं है और मेरा मन इसी से पूर्णत: अभिभूत हो गया।
भारत को यशा और आदर दिलानेवाले आधुनिक विज्ञान मनीषियों में डॉ. जगदीशा चन्द्र बोस (1858-1937) का नाम चिरस्मरणीय है। तत्कालीन भारत और वर्तमान बांग्लादेशा के मेनसिंह में जन्मे बोस को 1885 में प्रेसीडेंसी कॉलेज में भौतिकी का सहायक प्रोफेसर नियुक्त किया गया; किंतु अपने अंग्रेज सहकर्मी से लगभग आधा वेतन दिए जाने के कारण उन्होंने पद त्याग दिया। बाद में, उन्होंने विज्ञान की सेवा करने का निशचय किया और विद्युत तरंगों के गुणों का अध्ययन करने के लिए एक उपकरण बनाया। अपने शाोधपत्र "द इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशान एंड पोलरीज़शान ऑफ़ इलेक्ट्रिक रे' के लिए 1917 में उन्हें नाइट की उपाधि मिली और 1920 में वे रॉयल सोसाइटी ऑफ़ लंदन के फेलो बनाये गए। वह यह सम्मान पाने वाले पहले भारतीय भौतिशाास्त्री थे। डॉ. बोस को पूरे वि·ा में उनके आविष्कार क्रेस्कोग्राफ के लिए जाना जाता है। यह उपकरण पौधों के सूक्ष्म से सूक्ष्मतर वृद्धि और गतिविधियों को मापने में सक्षम होता है। इसके आधार पर डॉ. बोस ने यह दिखाया कि पौधों का भी परिसंचरण तंत्र होता है। उन्होंने कई अन्य उपकरण भी बनाये, जिन्हें बोस उपकरण के नाम से जाना जाता है। इन सबके अलावे इन्होंने मारकोनी से पहले बेतार यंत्र का आविष्कार किया; लेकिन औपनेवेशिाक दासता के माहौल में इसका श्रेय मारकोनी को ही मिला। जब किसी ने इस ओर उनका ध्यान दिलाया तो आपने कहा कि क्या फर्क पड़ता है कि आविष्कार किसने किया; मानवता को एक आविष्कार तो मिला।
वर्तमान में जब भारत के न्यूक्लिअर पॉवर ग्रुप में शाामिल होने के कूटनीतिक प्रयासों को चीन द्वारा वीटो किये जाने के कारण असफलता मिली है, हमें स्मरण हो आता है भारत के परमाणु ऊर्जा के जनक डॉ. होमी जहाँगीर भाभा (1909-1966) का। मुम्बई के एक पारसी परिवार में जन्मे और पले-बढे डॉ. भाभा ने मैकेनिकल इंजीनियरिंग में कैम्ब्रिाज से उपाधि प्राप्त की और 1935 में डॉक्टरेट की उपाधि भी ली। 1939 तक उनकी ख्याति ब्राहृांडीय विकिरणों पर मौलिक शाोध के लिए हो चुकी थी। भारत लौटने पर डॉ. सी.वी. रमण के आग्रह पर उन्होंने बेंगलुरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान में रीडर के रूप में पदभार ग्रहण किया और शाीघ्र ही वे प्रोफेसर बने। यहाँ उन्हें भौतिकी के अन्य क्षेत्र में शाोध संस्थान बनाने का ध्यान आया और सर दोराब जी टाटा के सहयोग से आपने 1945 में अपने पैतृक आवास पर ही परमाणु ऊर्जा में मौलिक अनुसंधान के लिए टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च की नींव रखी।
भारत का परमाणु अनुसंधान केंद्र जिसे अब भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर या भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र के नाम से जाना जाता है, ट्रॉम्बे में स्थापित किया गया। भारत का पहला एटॉमिक रिएक्टर "अप्सरा' भी उनके ही मार्गदर्शान में बनाया गया। डॉ. भाभा 1948 में भारत के परमाणु ऊर्जा आयोग के पहले अध्यक्ष बने। परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में उनका अध्ययन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बड़े महत्व का माना जाता है। वे संयुक्त राष्ट्रसंघ समर्थित परमाणु ऊर्जा के शाांतिपूर्ण प्रयोग के वास्ते अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के भी अध्यक्ष रहे।
आधुनिक भारत के अन्य महान वैज्ञानिकों में डॉ. विक्रम साराभाई का भी अपना स्थान है। भारत के पहले उपग्रह आर्यभट्ट के प्रक्षेपण में उनकी प्रमुख भूमिका थी। आपने डॉ. सी.वी. रमण के मार्गदर्शान में ब्राहृांडीय विकिरणों पर काम किया था और कैंब्रिाज वि·ाविद्यालय से डॉक्टर ऑफ़ फिलोसफी की उपाधि प्राप्त की थी। डॉ. साराभाई बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। आपने कई अंतर्राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों को स्थापित किया, जिसमें भारतीय प्रबंध संस्थान का नाम विशोष तौर पर उल्लेखनीय है। वे भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान आयोग के भी अध्यक्ष रहे। आपने ही थुम्बा इक्वेटोरियल रॉकेट लॉÏन्चग स्टेशान की आधारशिाला रखने में मार्गदर्शान किया। उपग्रह संचार से गाँवों तक शिाक्षा कैसे पहुँचे, इसकी योजना आपने ही बनाई।
इसी कड़ी में एक और नाम जुड़ता है, जो मिसाइल मैन के नाम से प्रसिद्ध भारत के 11वें राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम (1931-2015) का है। डॉ. कलाम ने एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में उपाधि प्राप्त करने के बाद 1963 से 1982 तक भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान में सेवा की। विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र में आपने उपग्रह प्रक्षेपण वाहन एस.एल.वी. -3 का विकास किया, जिसने रोहिणी उपग्रह को कक्षा में स्थापित किया। 1982 में रक्षा अनुसंधान विकास संस्थान के निदेशाक के रूप में उन्हें इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम का दायित्व सौंपा गया। उन्होंने रक्षा क्षेत्र की पाँच परियोजनाओं - पृथ्वी, त्रिशाूल, आकाशा, नाग और अग्नि के विकास में योगदान दिया। अग्नि मिसाइल में प्रयुक्त होने वाली हल्की सामग्री से आपने पोलियो पीड़ितों के लिए अत्यंत हल्की वैशााखी बनवाई। यह सामग्री अब ह्मदय रोगियों की बैलून एंजियोप्लास्टी में स्टेंट के रूप में काम में लाई जाती है। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के व्यक्तित्व में वैदिक ऋषियों की तरह शाुद्ध भारतीय आत्मा थी।
"कस्मै देवाय हविषा विधेम?' यज्ञ की पूर्णाहुति सफल नहीं हो सकती है, यदि सत्येन्द्रनाथ बोस (1894-1974), शाान्ति स्वरूप भटनागर (1894-1955), प्रफुल्लचन्द्र राय (1861-1944) और मेघनाद साहा (1893-1956) सरीखे आधुनिक भारतीय विज्ञान ऋषियों के नामों का उल्लेख न किया जाये।
अब प्रशन यह उठता है कि इतनी अच्छी वैज्ञानिक विरासत होने के बावजूद, एक ही बार में मंगल पर मंगलयान भेजने के बावजूद या फिर एक ही साथ अनेक उपग्रहों के सफल प्रक्षेपण के बाद भी, देशा में दशाकों से कोई बड़ा और मौलिक अनुसंधान क्यों नहीं हुआ है। विगत कई दशाकों से कोई नोबेल पुरस्कार क्यों नहीं मिला है? इनफ़ोसिस के संस्थापक एन.आर. नारायण मूर्ति ने कहा था, "विगत 60 वर्षों में भारत मात्र पशिचमी वैज्ञानिक विकास के सहारे रहा है और इसमें हमने मात्र थोड़ा जोड़ा है। हमारे पास कोई प्रभावशााली आईडिया दावा करने के लिए नहीं है।'
मैसाचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी, अमेरिका के 10 सर्वोच्च आविष्कारों की बात करते हुए उन्होंने कहा, "ग्लोबल पोजिशानिंग सिस्टम, बायोनिक प्रोस्थेसिस और माइक्रोचिप - यह सब तभी सफल हुआ, क्योंकि एम.आई.टी. के छात्रों और शिाक्षकों ने एक अलग मार्ग का अनुशारण किया। प्रायः सभी आविष्कार - कार, बल्व, रेडियो, टीवी, कंप्यूटर, इंटरनेट, वाई-फाई, एम् आर आई, लेसर, रोबॉट इत्यादि पशिचमी शिाक्षा और अनुसन्धान केंद्रों में ही हुए, फिर आई.आई.एस.सी. और आई.आई.टी. जैसी हमारी संस्थाओं का विगत 60 से अधिक वर्षों में समाज को बेहतर बनाने में क्या योगदान रहा है?' उन्होंने यह जोर दिया कि आज हमारे विद्वानों और विदेशा के विद्वानों के बीच विचारों का स्वतंत्र प्रवाह समय की ज़रूरत है।
इसके अलावे यह समझना ज़रूरी है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी देशा को आगे बढ़ाने वाला इंजन है। अतएव देशा के नोडल संस्थाओं यथा, वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद तथा भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद को समुचित वित्त और प्रशाासनिक ढाँचा प्रदान करते हुए राजनीतिक उदासीनता से बचाने की ज़रूरत है। इन सब के अतिरिक्त अनुसंधान को उत्साहित करने की बड़ी आवशयकता है। ध्यातव्य है कि भारत में मात्र दो लाख शाोधकर्ता हैं - 10 हज़ार कार्यबल के मुकाबले मात्र चार शाोधकर्ता, जबकि चीन में दस हज़ार कार्यबल में 18 शाोधकर्ता और ब्रााजील में इतने ही कार्यबल में सात शाोधकर्ता। भारत में 2013 में कुल 90 हज़ार शाोधपत्र जमा किये गए, जबकि चीन में यह संख्या 3 लाख से भी ज़्यादा थी।
यह सब विचारणीय तथ्य हैं। समय रहते अगर हम अपने शौक्षिक और अनुसंधान संस्थानों में नवाचार की लहर लाएंगे, तभी भारत के वि·ागुरु होने का सपना पूरा हो पायेगा

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal | Yellow Loop | SysNano Infotech | Structured Data Test ^