ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
कमलेश्वर की गंगा और लोगों के स्नान
01-Dec-2018 06:51 PM 1566     

कमलेश्वर जी ने जब "गंगा" पत्रिका के सम्पादन का भार सम्भाला तो उन्होंने पत्रिका में लोगों की जम के धुलाई की तथा उसे नाम दिया, "गंगा स्नान"। उन्होंने जुलाई, "86 में "मित्र प्रकाशन" के मालिक को गंगा स्नान कराया था, जिस पुण्य के प्रसाद स्वरूप "मित्र प्रकाशन" ने वकील के ज़रिए उन्हें नोटिस भेजा था, इस लड़ाई में जीतने के लिए कमलेश्वर जी ने लेखकों का आह्वान किया था कि जो लेखक "मित्र प्रकाशन" में छपे हैं लेकिन पारिश्रमिक नहीं मिला है, वे "गंगा" की अदालत में अपने आवेदन पत्र दें।
मुझे मित्र प्रकाशन से अच्छा पारिश्रमिक मिलता था जो रचना छपने के 15-20 दिन के भीतर ही प्राप्त हो जाता था। "गंगा" कितना पारिश्रमिक देती है, देती भी है या नहीं, कितने दिन के बाद देती है, मुझे इसकी कोई जानकारी नहीं थी क्योंकि मैं "गंगा" में कभी नहीं छपी थी। इस लड़ाई का क्या अंत हुआ, इसकी भी कोई जानकारी मुझे नहीं थी। बस, इतना पता था कि "गंगा" हर महीने किसी न किसी की धुलाई करती है। जहाँ धुलाई का काम कमलेश्वर जी करें, वहाँ कौन नहीं धुलना चाहेगा? बहुत से महापुरुष गंगा स्नान के लिए लालायित पाए गए थे।
उनके फिल्मों में चले जाने से लोग समझते थे कि वे साहित्य से चले गए। असल में लोगों की समझ दाद देने लायक है। कोई चार दिन लेखकों के इर्द-गिर्द मंडरा ले तो उसे लगता है कि वह साहित्य में आ गया। कोई कुछ अर्सा लेखन से दूर रहे तो लोग समझते हैं कि वह साहित्य से चला गया। सच पूछिए तो साहित्य का जंगल इतना ऊबड़-खाबड़ है कि लेखक खुद तो उगना चाहते हैं पर दूसरों की क़तर-ब्यौंत में लगे रहते हैं। ठीक भी है, ये कोई अमीरों की कोठियों के बाग़ तो हैं जो माली तैनात होंगे। यहाँ तो उगेंगे भी खुद और काटेंगे भी खुद। तो मित्रों, जो लोग कमलेश्वर को साहित्य से चला गया समझ रहे थे, यह उनकी सरासर नादानी थी। वे फिर पूरे ढोल-धमाके के साथ "गंगा" में लोगों को डुबकियाँ लगवा रहे थे, पहले कमलेश्वर जी ने आम आदमी की बात करके पूरा एक साहित्यिक आन्दोलन चला दिया था, अब ख़ास आदमियों को चुन-चुन कर उनके मुखौटे उतार रहे थे। अपनी इस निर्भीक मुद्रा के द्वारा उन्होंने अन्याय और भ्रष्टाचार के लिए चुल्लू भर पानी नहीं, पूरी गंगा बहा दी थी। न जाने किस-किस को डर हो गया होगा कि कब कमलेश्वर जी उन्हें डुबोने का प्रबंध करें।
मैं कमलेश्वर जी का बहुत सम्मान करती थी। अभी भी करती हूँ। उनकी बहुमुखी प्रतिभा एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व से प्रभावित भी थी। वे एक सफ़ल व्यक्ति थे। लेखन, फ़िल्म, दूरदर्शन, पत्रकारिता, जिस क्षेत्र में भी हों, अपने लिए पुख्ता ज़मीन बना लेते थे। लेखन और पत्रकारिता के क्षेत्र में तो आन्दोलन से इतर स्थिति उन्हें ग्राह्य नहीं थी। उनसे जुड़ी हुई स्थितियों में कमलेश्वरपन साफ़-साफ़ झलकता था। वे कहीं भी आगे आएँ, समकालीन सोच को झकझोरते ही थे। उनकी इस रचनात्मकता का कायल कोई क्यों न हो?
उन दिनों कमलेश्वर जी दिल्ली दूरदर्शन में अतिरिक्त महानिदेशक के पद पर कार्यरत थे। मैं उसी मंत्रालय के एक अन्य विभाग में अधिकारियों का रवैया दोषपूर्ण होने के कारण अत्यन्त त्रासद दिन भोग रही थी। कमलेश्वर जी और मैं एक ही अधिकारी-आवासीय भवन में आमने-सामने के फ़्लैट में रहते थे। एक दिन मैंने उनसे प्रार्थना की कि वे कोशिश करके मेरा तबादला दिल्ली दूरदर्शन या रेडियो में करा दें। हम एक ही मंत्रालय के अंतर्गत काम करते थे। तत्कालीन कार्यालय में असंतुष्ट होने के नाम पर मैंने केवल इतना ही कहा था, "यहाँ लोग....।" वे मेरी बात के बीच में ही बोले, "हाँ, मैं समझ सकता हूँ." उनके इस "समझ सकता हूँ" पर मैं इतनी श्रद्धानत हुई कि मैंने उस वर्ष प्रकाशित अपना कहानी संग्रह "अपना अपना सच" उन्हें समर्पित किया। मेरी नौकरी के तनाव को मेरे बिना कहे उन्होंने समझा था। हालाँकि वे मेरा तबादला नहीं करवा सके थे। (जल्दी ही मेरा तबादला एक अच्छी तरक्की के साथ मुंबई में स्वतः हो गया था।)
बम्बई में आने के बाद जब भी दिल्ली जाऊँ, लेखक बंधु पूछें, "कमलेश्वर से मिलीं?" या मैंने जब भी बम्बई में बोर होने की बात कही तो बंधुओं ने तुरंत सुझाया, "भई, कमलेश्वर से मिलो ना।" कमलेश्वर जी भी उस समय बम्बई में थे और फ़िल्मी लेखन से गम्भीरतापूर्वक जुड़े हुए थे। मैं संकोची जीव। फिर कमलेश्वर जी आसानी से एप्रोचेबल नहीं। कमलेश्वर जी कोई खाली बैठे हैं क्या? बम्बई पहुँचने के लगभग एक वर्ष बाद मैं कमलेश्वर जी का फ़ोन नंबर ढूँढ पाई यानि ढूँढने की कोशिश तभी की। फ़ोन पर बोले, "एक वर्ष हो गया बम्बई आए और अब फ़ोन कर रही हो?" आवाज़ में जादू तो होता है साहब और कमलेश्वर जी की आवाज़ में बाकायदा वह जादू था जिसके मोह में आप अबश्य डूबना पसंद करें। लेकिन फिर कभी ज़्यादा बात नहीं हुई। वे अत्यन्त व्यस्त। मेरी नौकरी की माँग भी मुझे पूरे महाराष्ट्र के टूर करवा रही थी।
वे बंबई में ही इतने व्यस्त थे कि फिर उन्हें दिल्ली में भी खींच लिया गया। दिल्ली में उन्होंने "गंगा" को और "गंगा" के ज़रिये अपवित्रों को पार लगाने का बीड़ा उठाया कि कलकत्ता से "रविवार" पत्रिका वाले चले आए। कमलेश्वर एक, खींचने वाले अनेक।
जब आप ग्लैमर की दुनिया से जुड़ते हैं, तो ज़ाहिर है, आपके चाहने वाले बढ़ जाते हैं और आपके अफ़ेयर भी खूब होते हैं। लेकिन कमलेश्वर खुलेआम होने वाली बदनामियों से दूर रहे। अन्य कतिपय लेखकों की भाँति उनके तमाशे ज़माने ने नहीं देखे। उन्होंने जीवन पर्दे में तो नहीं जिया पर बुद्धिमत्ता से ज़रूर जिया। गायत्री भाभी अंत तक उनकी इकलौती पत्नी रहीं।
अब प्रसंगवश एक अप्रासंगिक बात। एक बार दिल्ली से बाहर के एक लेखक ने मुझे यह तमग़ा दिया था, "मणिका मोहिनी जी, आपके नाम का एक अपना ग्लैमर है। आपकी कहानियाँ बोल्ड होने के साथ-साथ ग्लैमरस होती हैं।" यह बात मैं बहुत पहले भी कहीं लिख चुकी हूँ।
मेरे पास कभी पत्रों के ढेर थे, इतने कि सोचा करती थी, ज़िन्दगी इन पत्रों के सहारे ही काटी जा सकती है। काश! वे सब पत्र सम्भाल कर रख पाती! पर कई तबादलों और बहुत सारे मकान बदलने के कारण सारे पत्र और मेरी पुस्तकों की लाइब्रेरी उजड़ती चली गई। इसलिए सबूत के तौर पर मैं कुछ पेश नहीं कर सकती।
एक बार एक तथाकथित लेखक, जो इतने लेखक भी नहीं थे इसीलिए "तथाकथित" लिखा, मुझसे मिलने आए, किसी ख़ास विषय पर मेरे विचार जानने का बहाना करके लेकिन उनकी बातें...। तौबा। वे चटखारों के साथ जिह्वा रस लेते रहे और यह लेखिका बेचारी ग्लैमरस कहानियाँ लिखने के जुर्म का दण्ड भोगती रही। उनका क्या कसूर? वे शांत भाव से बैठे सिर्फ़ बातें कर रहे थे, चाहे जैसी भी, वह भी इसलिए कि सामने बैठी श्रोता बोल्ड लेखिका होने का दम भरती है।
मैंने इस बात का ज़िक्र कमलेश्वर जी से किया था कि "देखिए, आपके साहित्य में कैसे-कैसे अजूबे हैं।" उन्होंने कहा था, "यह साहित्य अब तुम्हारा भी है और ये सब अजूबे तुम्हारे साहित्य के भी हैं।" बहरहाल, मैं संतुष्ट हो गई थी कि एक-न-एक दिन सब ऐसे-वैसों का नंबर आने वाला है।
कमलेश्वर जी का जन्म 6 जनवरी, 1932 तथा निधन 27 जनवरी 2007 को हुआ। साहित्य अकादमी ने उन पर एक डाक्यूमेंट्री फिल्म बनाई। वे साहित्य अकादमी पुरस्कार और पद्मभूषण से नवाजे गए। अनेक पुस्तकों के रचयिता होने के साथ उन्होंने आँधी, मौसम, रंगबिरंगी, द बर्निंग ट्रेन, सौतन, राम बलराम तथा अन्य कई बेहतरीन फ़िल्मों की कहानियाँ लिखीं। साहित्य और फ़िल्मों के इतिहास में वे हमेशा बने रहेंगे।

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