ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
कलयुग गड़ासे सा तना है समय मेरी गर्दन पर
01-Aug-2019 03:52 AM 900     

कलयुग

यह उस युग की बात है
जब भाषा से
सौम्यता, उदारता और
विनम्रता जैसे शब्दों का
लोप हो गया था

सहनशीलता और सहिष्णुता -
बस राजनैतिक अनुष्ठानों में
बाकी थे

हर आदमी के हाथ में
एक पुरातन लोकनायक का धनुष था,
जिसकी प्रत्यंचा तनी हुई थी

"भय से उपजती है प्रीत" - समाज का
आदर्श वाक्य था

प्रेम पर नैतिक पाबंदियां थीं
सहनशीलता कमज़ोरी का लक्षण
रौद्र और वीर सबसे प्रमुख रस
शृंगार छिछोरेपन का सूचक
उदारता दोमुंहेपन का लक्षण मान ली गयी थी

सिर्फ पुरस्कार के लिए
कवितायें लिखने वाले कवि राजकवि थे
फिर भी "कविता" पर संदेह किया जाता था
क्योंकि उसमें भाषा के रूपक और
अनेकार्थता के गुणों का उपयोग
करने की शक्ति शेष थी

कलावंतों में सिर्फ संगीतज्ञ थे
जो चांदी काटते थे

जनता की भाषाओं को मार देने की
ख़ुफ़िया परियोजनाएं जारी थीं

लोकतंत्र में संख्याबल ही
एकमात्र कसौटी था
राजनीति पारिवारिक जायदाद
जाति और धर्म
मरी हुई खाल पर
चिपके आभूषण

 

 


प्रवचन उद्योग
सबसे बड़ा उद्योग

कुछ खास संगठनों की सदस्यता
देश प्रेम
कुछ खास कंपनियों का सामान खरीदना
नागरिक ज़िम्मेदारी

जनता को मुफ्तखोर
बनाने के लिए
लखमुखी योजनाएं

यह उस युग की बात थी
जब अपराधी का साथ
सुरक्षा की गारंटी था
हत्यारे नायक माने जा रहे थे
सामूहिक नरसंहार के रचयिताओं ने
इतिहास से महानायकों को
बेदखल कर दिया था

इस बखान से कहीं आप
फिक्रमंद तो नहीं हो गए
चिंता मत कीजे हुज़ूर
वह कलयुग बीते
सदियां बीत गयीं हैं

अभी तो
सतयुग चल रहा है।

 

गड़ासे सा तना है समय मेरी गर्दन पर

सनातन
सिर्फ़ संस्था का नाम नहीं है

हत्यारे मानुष से ख़तरनाक हैं
हत्यारे विचार

अहिंसा मानने का
भरम देने वालों के दिमागों में
चलती रहती हैं
नरसंहार की योजनाएं

वीरता के नाम पर
वे हिंसा के कारखाने चलाते हैं

समन्वय की मीठी गोली देने वाले
घूमते हैं
त्रिशूल लेकर
उनके भगवान के
प्रत्येक भाले पर है
एक विरोधी का
कटा हुआ सर।

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