ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
कैसी सेवा - कैसा स्वास्थ्य
01-Oct-2017 01:12 PM 3016     

जिन लोगों का स्वास्थ्य बीमा नहीं है और जो गरीब भी हैं उनकी
बड़ी दुर्गति है। जिनके पास स्वास्थ्य बीमा है उन्हें भी इलाज़ के कुल
खर्च का बीस प्रतिशत देना होता है, शेष बीमा कंपनी देती है।

विगत शताब्दी के अंतिम दशक के प्रारंभ (1991-    92) में मेरे एक विद्यार्थी ने अमरीका में अपने उच्च अध्ययन काल की एक आप-बीती सुनाई कि वह अपने कुछ साथियों के साथ संयुक्त राज्य अमरीका के उत्तरी भाग की यात्रा पर गया। कुछ छात्रवृत्ति, कुछ अंशकालीन काम करके वहाँ पढ़ रहे प्रवासी विद्यार्थियों की जैसी यात्रा हो सकती है, वैसी ही थी यह यात्रा। एक पुरानी, सस्ती, खटारा कार; दिन में कहीं इधर-उधर फ़ास्ट फूड खाते हुए भ्रमण और अमरीका दर्शन तथा रात में एक स्थान से दूसरे स्थान की लम्बी यात्रा।
ऐसी ही एक रात में कुछ सोते, कुछ जागते छड़े लोगों की यात्रा में जैसा हो सकता है वैसा ही हुआ। चालक को नींद आ गई और कार सड़क पर लहराती हुई चलने लगी। पीछे आ रहे ट्रकों के काफिले वाले किसी ड्राइवर ने ट्रेफिक पुलिस को अजीब हालत में सड़क पर दौड़ रही एक कार के बारे में सूचित किया। पुलिस वाले समझ नहीं पा रहे थे कि इस कार को कैसे रोका जाए? इस कार में सवार लोगों को बचाने के लिए एक हेलिकोप्टर उसके ऊपर उड़ रहा था। अंततः जब कार डिवाईडर से टकराकर उलट गई तो उन युवकों को निकाला गया। अस्पताल पहुँचाया गया और उनका इलाज़ किया गया।
वे कौन हैं? उनका स्वास्थ्य बीमा है या नहीं? यदि नहीं तो वे पैसे चुका सकेंगे या नहीं? इन प्रश्नों का उत्तर जाने बिना भी सबसे पहले यह आवश्यक था इनकी जान बचाई जाए। उनमें से किसी का बीमा नहीं था। सभी बातों पर विचार करते हुए उन्हें माफ़ कर दिया गया और बीमा न होने पर भी उनके इलाज़ का पैसा नहीं वसूला गया। वसूलते भी कहाँ से?
यह है अमरीकी संविधान। जिन संविधान निर्माताओं ने ऐसा मानवीय संविधान बनाया उन्हें नमन। अपने देश में आजकल सड़कों, उन पर होने वाले हादसों, उस समय पुलिस और अस्पतालों के रवैये में जिस संवेदनहीनता के दर्शन होते हैं वह शर्मनाक है। अमरीका की यह सत्य घटना सुनकर मन गदगद हो गया। 2007 में एक दिन वहाँ का स्थानीय टीवी देखा रहा था कि अचानक उसी कॉलोनी में रहने वाले एक भारतीय जिसे मैं जानता था, दिखाया जाने लगा। वह वास्तव में एक विज्ञापन था अस्पताल का और बीमा कंपनी का। वह भारतीय टेनिस खेलते हुए अचानक गिर पड़ा। जैसे ही इमरजेंसी को फोन किया गया वैसे ही हेलिकॉप्टर आ गया और उसे अस्पताल ले जाया गया। उसकी जान बच गई। बहुत अच्छा लगा।
2008 में ओबामा आए। एक सामान्य परिवार में जन्मे, गोरी माता और काले पिता की संतान। जिसका बचपन एशिया में बीता, बाद में किशोरावस्था नानी के पास। जीवन के सभी ऊँचे-नीचे रास्ते देखने के बाद दुनिया के सबसे शक्तिशाली राष्ट्र के पहले काले राष्ट्रपति बने। यह भी अमरीकी लोकतंत्र का एक चमत्कार है। हालाँकि इसके पीछे गैर-गोरे लोगों द्वारा उनमें अपनी आशाओं-आकांक्षाओं की दमित रोशनी देखना भी था।
ओबामा के राष्ट्रपति बनने के बाद कई तरह से सर्वे आए जिनसे पता चला कि अमरीका में साढ़े चार करोड़ लोगों के पास स्वास्थ्य बीमा नहीं है। कोई पौने चार करोड़ के पास अपर्याप्त स्वास्थ्य बीमा है। लगभग एक तिहाई लोग ढंग से इलाज़ नहीं करवा सकते। ओबामा ने गरीबों को ध्यान में रखते हुए "ओबामा केयर" के नाम से इन लोगों के लिए एक 50 डॉलर के सामान्य प्रीमियम वाली स्वास्थ्य बीमा योजना शुरू की। इसके बाद अबीमित लोगों की संख्या एक प्रतिशत रह गई, मतलब मात्र 30-32 लाख। आज नए राष्ट्रपति इस योजना को समाप्त करने के लिए जी-जान से लगे हुए हैं लेकिन यह अमरीका के जागृत जनों का ही दम है कि यह योजना पूरी तरह समाप्त होने में नहीं आ रही है, लेकिन जब सेवा भाव पगला जाता है तो वह मौका ढूँढ़ ही लेता है, खैर।
वन डॉलर रोबरी - नाम से अमरीका में एक सत्य कथाएँ चलती हैं। जेम्स वरोने ने जून 2011 में और टिमोथी एल्पिस ने अगस्त 2013 में बैंक में जाकर कैशियर को बंदूक दिखाकर लूट की, लेकिन केवल एक डॉलर की और बैंक में बैठकर पुलिस का इंतज़ार करते रहे। पुलिस के आने के बाद शांति से उसके साथ जेल में चले गए। दोनों अधेड़ थे और बेकार-घरहीन। पूछने पर पता चला कि उनके पास स्वास्थ्य जाँच करवाने के लिए पैसा नहीं है। जेल जाएँगे तो वहाँ जेल में भर्ती करने से पहले उनके स्वास्थ्य की जाँच तो हो जाएगी। जन्नत की विडंबना।
जिन लोगों का स्वास्थ्य बीमा नहीं है और जो गरीब भी हैं उनकी बड़ी दुर्गति है। जिनके पास स्वास्थ्य बीमा है उन्हें भी इलाज़ के कुल खर्च का बीस प्रतिशत देना होता है, शेष बीमा कंपनी देती है। सभी डॉक्टर बीमा कंपनी से जुड़े हुए हैं। वे विभिन्न प्रकार की जाँचों आदि के नाम पर जो बिल बनाते हैं वह वास्तविक लागत से कम से कम तीन-चार गुना होता है और लागत का 20 प्रतिशत बीमित मरीज़ से लेने के बाद बीमा कंपनी के पास से कुछ नहीं लगता। यहाँ हम चाहते हैं कि यदि डॉक्टर जेनेरिक दवाएँ लिखे तो दवाएँ कुछ सस्ती पड़ें, लेकिन डॉक्टर महँगी ब्रांडेड दवाएँ लिखते हैं, क्योंकि वे जिस अस्पताल में काम करते हैं उसी अस्पताल की वहीं दवा की दुकान भी होती है। इसलिए महँगी दवा से अस्पताल को एक और फायदा। अमरीका में डॉक्टर जेनेरिक दवाएँ इसलिए लिखते हैं कि क्योंकि इससे बीमा कम्पनी का खर्च कम हो, जबकि भारत में डॉक्टर महँगी दवाएँ इसलिए लिखते हैं कि अस्पताल के मालिक का फायदा हो। अब यहाँ भी मेडिक्लेम आदि बीमा कंपनियों ने कहा है कि डॉक्टर जेनेरिक दवाएँ लिखें अन्यथा हम क्लेम नहीं देंगे। दोनों स्थितियों में ही मरीज़ का हित नहीं धंधा प्रधान है। अपने यहाँ बहुत से अस्पताल या निजी क्लीनिक वाले डॉक्टर निःशुल्क जाँच के नाम पर शिविर लगाते हैं और वहाँ से मरीज फँसा कर ले जाते हैं। एक बार मैं पोरबंदर के सरकारी अस्पताल में आँखें दिखाने गया। उस समय वहाँ नियमित नेत्र चिकित्सक नहीं थे। एक निजी स्थानीय डॉक्टर वहाँ समाज सेवा के नाम पर दो घंटे आकर बैठते थे। वे समय समाप्त होने से कोई दस मिनट पहले आए और देखकर बोले- यहाँ तो कोई सुविधा है नहीं। यह मेरा कार्ड है। आप शाम को चार बजे मेरे क्लीनिक पर आ जाएँ। छत्तीसगढ़ के परिवार नियोजन कैम्प द्वारा की गई महिलाओं की सेवा के बारे में सब जानते हैं जिसमें वे एंटीबायोटिक दवाएँ खाने से ही मर गई थीं। पता नहीं, अमेरिका में सेवा की क्या स्थिति है? वैसे आजकल सेवा के नाम से आशीर्वाद कम निकलता है, शंका अधिक होती है।
अमरीका में एक गैर सरकारी संस्था ङॠग्. इसका पूरा नाम है रिमोट एरिया मेडिकल। इसकी स्थापना ब्रिटेन मूल के एक दानी, अभिनेता, लेखक, प्रकृति-प्रेमी और पूर्व टीवी एंकर स्टेन ब्रोक ने सन् 1985 में की थी। यह संस्था अमेरिका के अधिकतर राज्यों के दूरस्थ इलाकों में कैम्प लगाती है जिनमें शिकागो और लॉसएंजेल्स जैसे बड़े शहरों के पिछड़े इलाके भी हैं। ये कैम्प बिना किसी तामझाम के कहीं भी लगा लिए जाते हैं- कोई खलिहान, कोई प्लेन का खाली पड़ा हैंगर रनवे आदि।
ऐसे कैम्प सप्ताहांत में लगाए जाते हैं। लोग शुक्रवार को रात को ही दूर-दूर से आकर इकट्ठे हो जाते हैं। कई तो कई-कई किलोमीटर पैदल चलकर भी आते हैं। वॉलेंटियर टॉर्च की रोशनी में उनका रजिस्ट्रेशन करते हैं। ये वे लोग हैं जिनके पास छोटी-छोटी बीमारियों का इलाज करवाने तक के पैसे नहीं है। किसी को छाती का एक्सरे करवाना है, किसी का बत्तीसी टूट गई है तो किसी को दाँत निकलवाना है, किसी को चश्मा चाहिए, कोई कई वर्षों से मुस्कराने के लिए अपने सामने के दो दांत लगने का इंतज़ार कर रहा है, कोई कुपोषित है। ये वे लोग हैं जिनके पास नौकरी नहीं है, घर नहीं है, सरकार के गुजारा-भत्ता (जो कोई चार-पाँच डॉलर प्रतिदिन होता है) पर काम चलता है। ये पहले छोटे-मोटे काम किया करते थे लेकिन वालमार्ट जैसे बड़े स्टोर खुलने से वे काम भी छिन गए। कैम्प लगाने वाले लोग इन्हें दान में मिले जूते और कपड़े भी देते हैं।
शायद ऐसे ही जिल्ले सुभानी के महल के दीए को देखते हुए लोग जमुना के जल में खड़े-खड़े रात काट देते हैं।

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