ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
कहीं देर न हो जाये
01-Jan-2018 03:32 PM 1280     

बहुत कह चुके बहुत सुन चुके बस
अब कहीं देर न हो जाये
चलो मिलकर करें शंखनाद सभी
एक आशावादी शुरुआत के साथ
अपनों को अपनों से मिलाएं

भौतिकतावादी चमक-दमक
निगलती जा रही हमारी सभ्यता-संस्कृति को
साक्षी मान पर इस ही को करते हैं प्रतिज्ञा
नहीं मिटने देंगे इसकी अस्मिता को

दोष नहीं है हमारी नन्हीं और युवा पीढ़ी का
ये जिम्मेदारी हमारी है, हम ही इसे निभाएंगे
कच्ची मिट्टी को जिस रूप, आकर में ढालेंगे
वो सरलता से वैसे ही ढल जायेंगे

वैभवशाली इतिहास की धरोहर
समृद्ध परंपरा की अमूल्य थाती
कौन सम्हालेगा इसको कल को
यही बात समझ नहीं आती

भारत पार बसने वाले मेरे देशवासियों
अब तो जागो अब तो सम्हलो
ये तुम्हारी है जबाबदारी
जो तुमने इस देश से पाया और सीखा
उसके संवरण-संरक्षण की कर लो तैयारी

जीवन है नाम कुछ खोकर कुछ पाने का
पर इस कुछ पाने के लिए हम क्या गँवा रहे हैं
अनेकों बनावटी आवरण ओढ़े हम बस
अपनी मूलभूत पहचान ही खोते जा रहे हैं

अपना देश, संस्कृति और निज भाषा
मात्र यही मूलमंत्र है, हमारे चिरकालिक गौरव का
जैसा देश वैसा भेष ये बस क्षणिक बात है
अपनी जड़ से विलग हो कोई अस्तित्व नहीं है पौधे का

निज तरक्की की सीढ़ी चढ़ना
केवल नाम नहीं उन्नति का
परिवार, परंपरा और देश को जो आगे बढ़ाये
सार्थक उन्नति उसी की है
जो इस लक्ष्य को साधे
और जीवन को धन्य बनाये

चूक गए अगर हम अभी अपने उद्देश्य से
आने वाली पीढ़ियां हमें क्षमा न कर पाएंगी
जब तक हमें और उन्हें होगा चेतना-बोध
कुछ न रहेगा बस में फिर देर बहुत हो जाएगी।

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