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कहीं बोलना बेकार तो नहीं हो गया...
01-Jan-2018 01:24 PM 2139     

अगर गहराई से विचार करें तो मनुष्य का एक अद्भुत आविष्कार भाषा है। पृथ्वी पर रहने वाले अनेक मनुष्यों ने अपने-अपने भूदृश्यों और आकाश के अनुरूप अपनी-अपनी ध्वनियाँ सुनी हैं, अक्षर बनाये हैं, शब्द गढ़े हैं, वाक्य बनाये हैं और फिर बोले भी हैं। कितनी बोलियाँ और भाषाएँ बनीं इनकी गिनती करना भी ठीक तरह से संभव नहीं हो सका है। अब तो गिनती इस बात की होती है कि कौन-सी बोली का कौन-सा आखिरी आदमी दुनिया से विदा हो गया। फिर भी बची हुई बोलियों और भाषाओं में लोग लगातार बोल रहे हैं। धर्म-चर्चा कर रहे हैं, राजनैतिक प्रलाप कर रहे हैं, बाजार संसार की सारी भाषाओं में अपनी चीज़ें बेच रहा है और लोग खरीद रहे हैं।
किसी समय धर्मक्षेत्र में काम करने वाले लोग अपनी भाषा में सांसारिकता से दूर रहने की सलाह देते थे, आज भी देते हैं। पिछले तीन-चार सौ वर्षों में, जब से दुनिया में लोकतंत्र की परिकल्पना सामने आयी है, तब से मनुष्य को एक तरह की प्रजातांत्रिक सांसारिकता में जिम्मेदार बनाने की गहरी कोशिशें की गई हैं, जिससे कि मनुष्य सिर्फ अपने अकेले की मुक्ति के लिये नहीं, सबकी मुक्ति के लिये जी सके। अब 21वीं सदी का बाज़ार मनुष्य की मुक्ति तो चाहता ही नहीं है, वह हर अकेले आदमी को उसके काम, क्रोध और लोभ की पहचान करते हुए अपनी सीमाओं में बाँधता चला जा रहा है। और इसका जो दुष्परिणाम संसार में हो रहा है वह यही है कि हर आदमी अपनेपन को खो रहा है और परायेपन में जीना सीख रहा है।
प्राचीनकाल में मनुष्य की भाषा कुछ सनातन सत्यों के प्रति आशा जगाकर उसे अपनी जीवन की विफलताओं के बावजूद भी उम्मीद से भरती थी। बाद में लोकतांत्रिक राजनीतिज्ञों ने रोटी-कपड़ा-मकान और सुरक्षा की आशायें जगाकर मनुष्य को नयी उम्मीदों से भरा। पर अब बाज़ार उम्मीद नहीं जगाता, वह बस यही आश्वासन देता है कि दम हो तो खरीद लो। प्रश्न उठता है कि जिन में दम नहीं होगा, वे इस दुनिया से कहाँ जायेंगे।
एक सहज विश्वास मनुष्य को है कि भाषा ही आशा जगाती आई है। आखिर सदियों से मनुष्य ने जो ईश्वर की परिकल्पना की है, वह भाषा के बाहर नहीं है। अगर भाषा हटा दी जाये तो न ईश्वर रहेगा, न राजनीति रहेगी, न बाजार रहेगा और न मनुष्य रहेगा। एक शून्य भर बचा रहेगा। जिसमें आदमी एक-दूसरे को देखने के अलावा और कुछ कर ही नहीं सकता। क्या यही कारण नहीं कि आदमी को बोलना लाजमी लगा। यूँ तो बोलते पक्षी भी हैं, पर पक्षियों ने कभी अपने शब्दकोष नहीं बनाये। अन्यथा कितने शब्दकोष बन जाते, तोतों के अलग, गौरइय्यों के अलग, कौओं के अलग और कोयलों के अलग। आदमी ने भी अपने शब्दकोष बनाये हैं। अंग्रेजी से लेकर संसार को अपने रंग में रंगने वाली कितनी रंगरेज भाषाएँ बनी हैं। आदमी उनमें व्यवहार करता आया है और शब्दों के अर्थों का निर्धारण भी करता आया है। वह चाहता तो गधे को गाय कहता और मान लेता कि गधा ही गाय है, लेकिन न जाने उसने क्यों गाय को गाय ही कहा और गधा को गधा। इसका कोई आधार जुटा पाना बड़ा कठिन है।
हम अपने समय में देख रहे हैं कि हम जिस प्रकृति में रहते हैं वह बोलती बिलकुल नहीं। सिर्फ अपने आपको प्रकट करती है। वृक्ष अपने पत्तों को, फूलों को, फलों को प्रकट भर कर देता है। वह यह कभी नहीं कहता कि उसने पत्ते दिये, फल दिये, फूल दिये, छाया दी। लेकिन मनुष्य को न जाने क्यों बहुत कुछ कहना पड़ता है। उसके राजनेता तो न जाने क्या-क्या कहते हैं। अगर कहने भर से दुनिया चलती होती तो संसार के सारे राजनेता सबसे पहले सफल हो गये होते। फिर कुछ करने की जरूरत नहीं होती।
दरअसल अगर गौर से देखा जाये तो करना भाषा के परे है। आप करते रहिये और बोलिये मत। तो करना दिखता रहेगा। और आपको देख-देख कर लोग करते भी रहेंगे। लेकिन बोलने के साथ यह दिक्कत है कि जैसे ही आप बोलते हैं दूसरे का बोलना उससे भिन्न हो जाता है। पर करने में यह परेशानी नहीं है। अगर आप खड़े होते हैं तो दूसरा भी आपको देखकर खड़ा ही होगा। लेकिन जब आप भाषा में यह कहते हैं कि मैं आपके विरुद्ध खड़ा हुआ हूँ तो भाषा तुरंत किसी दूसरे को आपके विरुद्ध खड़ा कर देती है। भाषा में ही यह क्षमता है कि वह विरोधार्थी रचती है। जबकि जीवन में कहीं भी विरोध नहीं है। कोई किसी के खिलाफ साँस नहीं लेता। कोई किसी के खिलाफ देखता नहीं है। कोई किसी के खिलाफ सुनता नहीं, छूता नहीं है। बस बोलने में ही यह खतरा है कि हर कोई दूसरे के खिलाफ बोलता है।
कई सदियों का मूल्यांकन करें तो संसार को बोलना भारी पड़ गया है। बोल बोलकर संसार थका हुआ जान पड़ता है। संसार के सारे दर्शन इस बात पर करीब-करीब एकमत हैं कि संसार बोलने से नहीं करने से चलता है। प्रश्न यह नहीं है कि वह कृष्ण के करने से चले कि प्लेटो के करने से, वह ईसा के करने से चले या गाँधी के करने से। वह चलेगा तो सिर्फ करने से, केवल बोलने से दुनिया कभी चली नहीं है। चल भी नहीं सकती। इसलिये दुनिया में आज जिस बात पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता है वो बोलने पर उतनी नहीं, जितनी कर्म के निर्धारण पर है। अगर दुख है तो वह बोलने से कम नहीं होगा। उसे करने से मिटाया जा सकता है। सुख केवल सुख के विचार से नहीं आता। करने से आता है। अगर यह मोटी-सी बात आज 21वीं सदी का मनुष्य समझने के लिये तैयार नहीं है, तो फिर मनुष्य के अलावा इसको कौन समझेगा।
अगर जड़ की बात करें तो यही लगता है कि मानव जाति के मन में एक अदृश्य और दृश्य दोनों ही तरह का भय समा गया है। बोलना करने को और करना बोलने को प्रभावित कर रहा है। धर्म, राजनीति और बाजार की शक्तियाँ इसमें लगातार एक ऐसा अदृश्य हस्तक्षेप कर रही हैं कि बोलना करना न हो पाये और करना बोलना न बन पाये। कोई-कोई लोग दुनिया में होते रहते हैं जो बोल कर दिखाते हैं, भले ही वे कुछ न कर पाते हों पर उनका बोलना भी किसी समय करने जैसा हो जाता है। ये बोलना अगर करने जैसा हो जाये तो मानव जाति को सुखी होने में कब और कितनी देर लगने वाली है। महात्मा गाँधी ने आखिर किया ही क्या था, अपने बोलने को करने जैसा बना दिया था।
अगर कबीरदास को याद करें तो वह अपने एक गीत में कहते हैं - कि आदमी तो अपने मूल देश से किसी दूसरे देश में आया है। पृथ्वी उसके लिये दूसरा देश है। इस तरह वह पृथ्वी पर प्रवासी है। और पृथ्वी पर रहते हुए हर आदमी की चाह होती है कि वह अपने देश लौट जाये, जहाँ से वह आया है। किसी के लिये वह ईश्वर का देश है, किसी के लिये गॉड का, किसी के लिये ख़ुदा का। ख़ुदा के वास्ते यह उम्मीद करनी चाहिये कि आदमी इस धरती पर जो चाहे सो बोले, जो चाहे सो करे, पर यहाँ आने वाले और दूसरे आदमियों के लिये ये धरती सुरक्षित छोड़कर अपने देश वापस चला जाये जैसे साइबेरिया से भारत की झीलों में प्रवास पर आने वाले पक्षी कुछ समय रहकर वापस अपने-अपने मूल बसेरों की ओर लौट जाते हैं।

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