ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
कहत कबीर सुनो भई साधो
01-Jun-2016 12:00 AM 2709     

कबीरदास बड़े ही विलक्षण व्यक्ति थे। एकदम बिंदास, बिलकुल हमारी तरह। उन्हीं की तरह हमारी भी ना किसी से दोस्ती है (अरे, दोस्त तो बहुत हैं हमारे - मगर चमचागिरी वाला रि¶ता किसी से नहीं है।) और ना ही बेकार की दु¶मनी। यूँ भी हम दु¶मन बनाने में यक़ीन नहीं करते। भैया ना जाने कब आदमी की असलियत सामने आ जाये (यानि वो अच्छा भला मानुस साबित हो जाये।) और हम खामखां ही पंगा लेकर बैठे हों। साहबान, परखने में गलती तो हम भी कर सकते हैं। इसीलिए दुआ सलाम सबसे बराबर रखनी चाहिये। वैसे भी अपने चारों ओर देखें तो कबीर के दोहों में जीवन की सच्चाई बयान की गयी है। वे जो भी आसपास देखते थे - उस पर अपने ढंग से टिप्पणी कर देते थे। हम भी कोई ¶ाोध या फ़लसफ़े की बात नहीं करते। जो दिखाई देता है उस पर कटाक्ष - मात्र कर देते हैं। कभी-कभी (बिन मांगी) सलाह भी दे देते हैं (हम भारतीय इस कला में दक्ष हैं) पहले कबीर दास जी की सलाह बता दें - तिनका कबहुँ ना निंदये जो पाँव तले होय / कबहुँ उड़कर आँख पड़े, पीर घनेरी होय।
बस यही बात, आज के सन्दर्भ में हम नरेंदर भैया को समझाना चाहते हैं। अरे भाई ये अरविन्द केजरीवाल हैं तो तिनका ही ना। पाँव में लगे तो भी चुभे और ठोकर मारने से उड़ कर अगर आँख तक पहुँच जाये तब तो अल्ला-अल्ला खैर सल्ला। देखो ना सभी अक़्लमंद लोगों की आँख की किरकिरी बना हुआ है। भाई मेरे राजनेताओं की भी डिग्री मांगी है किसी ने कभी?
एक ही व्यवसाय तो ऐसा है जिसमें अंगूठा छाप भी करोड़ों कमा लेते हैं। (पढ़े-लिखे तो, बाबू जी, घास छीलते हैं) अतः कबीर दास से प्रेरित हम भी एक कबीराना सलाह दिये देते हैं --
कबिरा डिग्री रखिये माथे पर चिपकाय
न जाने किस वे¶ा में केजरीवाल मिल जाय
कोई सीएम विदआउट पोर्टफोलियो से पूछे कि वे राहुल भुट्टो और सोनिआ (भा. माता) से उनकी डिग्री की क्यों नहीं मांगते। मुख-पुस्तक पर किसी ने लिखा है कि डिग्री की बात करते ही राहुल ने कहा "42 डिग्री सेल्सियस है।' मुख-पुस्तक से ही ज्ञात हुआ कि बालक अरविंद बैताल के अवतार हैं। उन्हें केवल राजा विक्रमादित्य पर ही सवार होना है और अनर्गल प्रलाप करके राजा का मौन तुड़वाना है। अब राजा अगर बुद्धिमान है और प्र¶न का उत्तर जानता है तो बोलेगा ही। बस राजा का मौन टूटा पीठ पर सवार बैताल फुर्रर्रर्र। का¶ा ये कभी कांग्रेस के राज में मनमोहन सिंह पर सवार होकर देखता।
लेकिन कोई बात नहीं। कड़वी नीम, कड़वे करेले के अपने लाभ हैं। इसलिए यह "करेला और नीम चढ़ा' बालक अरविंद दोहरा लाभदायक सिद्ध होगा। पहला लाभ यह है कि उसका अनर्गल प्रलाप सुन कर हम जैसों को भी (जो कि मोदीभक्त नहीं हैं) नरेंदर भैया अच्छे लगने लगे (द्रद्वडथ्त्ड़ दृद्रत्दत्दृद थ्र्ठ्ठद्यद्यड्ढद्धद्म)। दूसरा लाभ यह है कि आलोचक (पागल ही सही) के बग़ैर राजा के ताना¶ााह बनने का ख़तरा रहता है। यही पते की बात कबीरदास ने भी कही है --
निंदक नियरे राखिये आँगन कुटी छवाय
 बिन साबुन-पानी बिना निर्मल करत सुभाय
चलें छोड़ें गप्पू केजरीवाल को। कोई हमें यह बताये कि कांग्रेस में बुद्धिमान बा¶िंादों का अकाल पड़ गया है क्या? नेहरू, इंदिरा, राजीव जैसे लोग भले ही स्वार्थी थे, मगर अक़्लमंद ज़रूर थे। उनके स्वर्गवासी होने के बाद कांग्रेस को पप्पू भुट्टो के अलावा कोई दूसरा नेता नज़र नहीं आता? उनके परम मित्र श्री गप्पू केजरीवाल से कोई पूछे कि (मोदी को बक्¶ों) भैया पप्पू की डिग्री का पता करें। भा.माता सोनिआ की डिग्री का भी पता करें। मोदी का चायवाला होना मज़ाक का विषय है तो क्या सोनिआ का बार-गर्ल होना बहुत आदर की बात है? पर क्या करें साहिब आजकल मानसिकता ही ऐसी हो गई लोगों की कि सनी लियोन को भी इज़्ज़त देने लगे हैं और विजय माल्या अब तक रॉक स्टार माने जाते हैं, एक भगोड़े अपराधी नहीं। लगता है कबीर का नायाब दोहा लोगों को कुछ ज़्यादा ही पसंद आ गया --
बुरा जो देखन मैं गया बुरा ना मिलिया कोय
जो दिल खोजा आपनों मुझसे बुरा ना कोय
खुद को पढ़ा-लिखा कहने वाले गप्पू बाबू भाषा तो अनपढ़ों वाली बोलते हैं। याद है ना, उन्होंने मोदी को साइकोपैथ, झूठा और ना जाने क्या-क्या कहा था। जो व्यक्ति जनता के लाखों रुपये केवल अपनी वाहवाही के विज्ञापन पर खर्च करता हो - मक्कार वो है या कोई और? हम तो उससे यही कहेंगे कि "भइये कभी कभी आईना देख लिया करो -- चेहरे पर कितनी कालिख और धूल है साफ़ नज़र आ जायेगा। बालक कांग्रेस की बिगड़ी हुई हालत से ही कुछ सबक सीख लो। गांधी आई परिवार ने समझा था कि भा.माता का ताज तो उनकी बपौती है। हो गयी ना ग़लतफ़हमी दूर? अब तो  ताजा चुनाव परिणाम आ गये हैं। कांग्रेस का पत्ता हर जगह से साफ़ है। ये तो होना ही था - काफ़ी गंदगी जो मचाई हुई थी। हमारे कबीर बाबा तो बहुत पहले कह गये थे --
पानी केरा बुदबुदा अस मानस की जात
एक दिना छिप जायेगा ज्यों तारा परभात
तो भैया सावधान! कांग्रेस तो भोर का तारा होती जा रही है, मगर भाई गप्पू पहले "आप (ॠॠघ्) पहले आप (ॠॠघ्) में कहीं आप पहले तथा अंतिम "आप' ना हो जायें।
खैर होगा तो वही जो होना है लेकिन अपनी तरफ से कबीर बाबा ने किसी को भी बख्¶ाा नहीं। फक्कड़ आदमी थे। फ़कीरी को बाद¶ााहत से कमतर नहीं समझते थे; इसीलिए किसी से डरते भी नहीं थे। भाई मेरे जिसके पास खोने के लिए कुछ ना हो वह क्यों किसी से डरेगा? हाथ के हुनर का खाते थे। कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया। इसीलिए एक संत-फकीर का दर्जा हासिल था उन्हें। उनके दोहे सामयिक होते हुए भी समय की रेखा से परे थे। आज के संदर्भ में भी वे सटीक साबित होते हैं। लोग जो महज़ दो साल पुरानी सरकार पर निष्क्रियता का इल्ज़ाम लगाते हैं वे भूल जाते हैं अड़सठ साल राज करने वाली सरकार ने इतना भी नहीं किया था जितना दो वर्ष में हुआ है। यहाँ यह दोहा कितना सामयिक है -
धीरे धीरे रे मना, धीरे सबकुछ होय
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आये फल होय
तो भैया अच्छे दिन भी आयेंगे। दरअसल कांग्रेस ने दे¶ा के दिन इतने बुरे बना दिये कि उन्हें अच्छा करने में वक़्त तो लगेगा ही।
ज़माना बदल गया है बाबू! कुछ मामलों में तो कबीर की कथनी का बिलकुल उल्टा हो रहा है। गये ज़माने में महिलाओं की एक मर्यादा होती थी। आम्रपाली जैसी स्त्रियों को, राज-संरक्षण प्राप्त होने के बावजूद, बहुत आदर की नज़र से नहीं देखा जाता था। नैतिकता के मापदंड बदल गए हैं। तभी तो सोनिया, वाडरा, लालू, जैसे लोग और अफ़ज़ल गुरु की जय बोलने वाले कन्हैया कुमार आदि खुले घूम रहे हैं, बिना किसी ¶ार्म लिहाज़ के। भले लोग या तो परे¶ाान हैं या ¶ाहीद कर दिये जाते हैं। (अधिक विस्तार के लिये दूरदर्¶ान देखें या अख़बार पढ़ें) इस सारी चर्चा का लुब्बेलुबाव यह है कि बचवा हमारे हाथ में कुछ नहीं। सबकुछ ऊपर वाले की मेहरबानी पर है। परम ज्ञानी कबीर बाबा ने गागर में सागर भरती लाख टके की बात कही है -
चलती चक्की देखि के दिया कबीरा रोय
दो पाटन के बीच में साबुत बचा ना कोय।

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