ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
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ब्यूटी पार्लर
सिडनी की ये सुबह कितनी सुहानी थी। न जलाने वाली गर्मी थी, न ठिठुराने वाली सर्दी और न ही तेज़ हवा थी। मौसम बस परफेक्ट था। ट्रैक पैन्ट्स और स्नीकर पहनकर सुबह की सैर के लिए निकल पड़ी। घर में कोई था ही नहीं, आज का दिन मेरा पूरा अपना था। कभी-कभी प्रोजेक्ट...
कश्मीर के कब्र खोदने वाले
मेरा काम न तो रोचक है और न ही मेरे धन्धे में पैसा है। मैं राजी-रोटी के लिए कब्रें खोदता हूं। सदियों से मेरे पुरखे यही काम करते आए हैं। उनके पास काश्त करने के लिए जमीन नहीं थी और न ही उन्होेंने कभी किसी व्यापार में हाथ डाला। मेरे पिता कई बार शेखी म...
सर्द रात का सन्नाटा
नेहा बिस्तर पर पड़ी-पड़ी करवटें बदलती रही। नींद को न जाने किस बात की शिकायत थी, जो उसके पास आने-भर से क़तरा रही थी। जनवरी की गहराई रात काफ़ी ठंडी थी। सुबह से ही रुई-सी कोमल श्वेत बर्फ़ झर-झर गिरती हुई सड़क पर बिछी जा रही थी। स्कॉटलैंड के पहाड़ बर्फ़ से ढक...
रक्त कमल
रक्त कमल नाम था उसका। हालांकि इस नाम के साथ "था" लगाने में दिल और दिमाग दोनों को ही सख़्त ऐतराज़ है। न ही हाथों को यह कबूल है कि उसकी कोई नई पुरानी तस्वीर एक अच्छे से फ़्रेम में जड़कर दीवार पर लटका दी जाए। हां आंख और कान चाहे खुले हों या बंद वो स्टैटन...
उनके बोल
वे लोग गाँव में घर की दूसरी मंजिल की छत पर चढ़ आये थे। इन लोगों में से किसी ने भी अपने जीवन में, भानु के घर की दहलीज के भीतर, कभी कदम नहीं रखा था। फिर भी सभी बड़े आधिकारिक भाव से अपना अपना पक्ष रख रहे थे। गली में सहज रूप से चुप्पी भी सहमी-सहमी सी मह...
जागृति खबरदार!
जागृति दरवाजे पर पीठ टिका कर खड़ी थी। उसके बाएं हाथ में स्टील का एक चमचा था और दायें हाथ में मीट काटने वाला चाकू और वह एकदम सीधा कहीं घूर रही थी। वह एक हिंदू देवी की तरह तैयार खड़ी थी, घरेलू हथियारों से लैस और मार्शल-आर्ट का अभ्यास सा करती हुई। उसकी...
सिस्टर रोजी
बन्द कमरे से अनिता की चीखें स्पष्ट सुनाई दे रही थीं, साथ ही सिस्टर रोजी का डपटता हुआ कर्कश स्वर मेरे सीने पर हथोड़े मार रहा था। बार-बार जी चाहता था, दरवाजा तोड़ कर अन्दर घुस जाऊं, पर साथ खड़ी मीनाक्षी ने मुझे रोक रखा था। अचानक दरवाजा खोल मुझ पर आग्ने...
अभिशप्त
निर्जन सिंहा, तूूं की कमाया, एवें जान खपायी, लोकांन मक्सीकियां व्याइयां, गोरियां बसाइयां, पुतकुड़ियां जने-व्याहे। तूं कलमकल्ला (अकेला) खाली-दा-खाली। भाई-भतीजे ही आरे लांदा रया।फिर आप-से-आप एक लंबी उसांस भर वह कुर्सी से उठ खिड़की के पास खड़ा हो ...
एक और सच
सामने औंधे मुँह पड़ी वह औरत बस हड्डियों का ढाँचा मात्र थी जो जरा भी हिलाने-डुलाने क्या, छूने तक से टूट सकती थी। सूखे फूल-सी झर सकती थी। मुझे यह सब तभी समझ लेना चाहिए था जब सुबह-सुबह, सात बजे, बारबरा का फोन आया था- "हमारी मदद करो। यहाँ क्राइसिस सेंट...
कागज़ के टुकड़े
आज अंजना सफाई करने के मूड में थी। इतने कागज़ जाने कैसे इकट्ठे हो जाते हैं। इनमें से ढेरों तो ऐसे थे, जिन्हें वर्षों से, कभी देखने की, कोई आवश्यकता ही नहीं पड़ी। यहाँ तक कि वह यह भी भूल गई थी कि यह सब उसने संभाल के रखे हैं। ज़्यादातर तो किसी अवसर विशे...
परजीवी
यूँ तो खबर कोई अनपेक्षित भी नहीं थी। शंका मन मस्तिष्क में हर पल छाई ही रहती थी लेकिन कल रात जब बाबा का फोन आया कि माँ को हृदयघात के पश्चात शरीर के बाएँ भाग में लकवा हो गया है तब मानो पूरा पेरिस ठहर गया था। अगले हफ्ते की कन्फर्म टिकिट होने पर...
स्वतन्त्र वातावरण में घुटन
नीता तेज कदमों से चलकर पार्क में पहुँची। उसे डर था कि कहीं सुजाता उसकी प्रतीक्षा करके चली न जाये। रात उसने मुझे फोन करके जरूर ही आने को कहा था, शायद अपने मन की कोई बात मुझसे करना चाहती थी। तुषार आज जल्दी उठ गये और उन्होंने मुझे चाय के लिए रोक लिया...
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