ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
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कागज़ के टुकड़े

आज अंजना सफाई करने के मूड में थी। इतने कागज़ जाने कैसे इकट्ठे हो जाते हैं। इनमें से ढेरों तो ऐसे थे, जिन्हें वर्षों से, कभी देखने की, कोई आवश्यकता ही नहीं पड़ी। यहाँ तक कि वह यह भी भूल गई थी कि यह सब

परजीवी

यूँ तो खबर कोई अनपेक्षित भी नहीं थी। शंका मन मस्तिष्क में हर पल छाई ही रहती थी लेकिन कल रात जब बाबा का फोन आया कि माँ को हृदयघात के पश्चात शरीर के बाएँ भाग में लकवा हो गया है तब मानो पूरा पेरिस ठहर

स्वतन्त्र वातावरण में घुटन

नीता तेज कदमों से चलकर पार्क में पहुँची। उसे डर था कि कहीं सुजाता उसकी प्रतीक्षा करके चली न जाये। रात उसने मुझे फोन करके जरूर ही आने को कहा था, शायद अपने मन की कोई बात मुझसे करना चाहती थी। तुषार आज

गुरु दर्शन

गाड़ी तैयार है सर..., रामसिंह की आवाज़ थरथरा रही थी। यह गैरज़रूरी घोषणा रामसिंह ने आदत की मजबूरी से की। उसे पता था मुझे पता है। क्योंकि सारी गाड़ी की तैयारी मैंने अपनी आँखों से देखी थी : एक ए.के.-47 मश

मुझसे कह कर तो जाते

जीवन में ऐसे क्षण कभी-कभी ही आते हैं जब ऐसी तृप्ति महसूस होती है, बड़ी तृप्ति। छोटी-छोटी तृप्तियों की तो गिनती करना भी संभव नहीं हो पाता जो रोज़ ही महसूस होती हैं। जैसे बढ़िया चाय पीने के बाद के हाव-भ

बस यह शादी किसी तरह से गुज़र जाए

तो यह बेटी की शादी करने वाली माँ का हाल है। शादी जल्द ही होने वाली है। लेकिन क्या भारतीय माँ का भी यह हाल है? मैंने अधिकांश जीवन भारत में गुज़ारा, फिर भी चेक माँ हूँ, क्या करूँ।
वह किसका ख़याल थ

दहशत

शिप्रा! मैं मौसी से मिलने अस्पताल जा रही हूँ।"

"ठीक है"

".........। और सुनो, रमेश नाना आएँ तो उन्हें यह पैकेट दे देना।"
"हाँ, ठीक।"
"अरे! एक बार आकर देख तो लो, मैं किस पैक

उज्जवला अब खुश थी!

देखा आपने रात में कैसी रासलीला चल रही थी मोहल्ले में? पानी सर से ऊपर होता जा रहा है अब तो। वो तो अच्छा है दीदी कि हमारे बच्चे अभी बहुत छोटे हैं। वर्ना इन कमीनों की हरकतें देख सुन क्या असर पड़ता उन प

विसर्जन से पहले

मेरे सामने मेरे पति की अस्थियाँ रखी हैं। मैंने उसे मिट्टी के एक सुंदर लोटेनुमा कलश में रक्खा है। कलश ढूंढ़ने के लिए मैंने कितने प्रयत्न किए थे। भला हो मेरी कलाकार मूर्तिकार मित्र अनीता का जिसने मुझे

आकार

आज अल्पना बहुत खुश थी। उसकी छोटी-सी बेटी आदिका आज स्कूल से निकल कॉलेज में प्रवेश करने वाली थी। वह छोटी फुदकती चिरैया-सी कब उसकी हथेलियों से निकलकर खुले आसमान में कोमल पंख पसारे उड़ने लगी, उसे पता ही

साँकल

क्या उसने अपने गिरने की कोई सीमा तय नहीं कर रखी? सीमा के आँसुओं ने भी बहने की सीमा तोड़ दी है... इन्कार कर दिया रुकने से... आँसू बेतहाशा बहे जा रहे हैं।
वह चाह रही है कि समीर कमरे में आए और एक

अवैध नगरी

अचानक उसकी दृष्टि स्थिर हो गई। जिस ट्यूब को वह देख रहा था, उसमें उसकी चेतना मूर्त होकर पत्थर हो गई थी। कहीं कुछ दरक गया था। संशयों और अविश्वास के बीच उस की अंगुलियां ठिठक गई थी और मानसिकता कुंद हो

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