ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
कबीर के बहाने मुँह चिढ़ाते सवाल
01-Jul-2016 12:00 AM 3409     

कबीर की बात करने वाला, उनके कहे के दम पर समाज में व्यापी विद्रूपता
पर कुठाराघात करने वाला समुदाय या वर्ग क्या वाकई कबीर के मंतव्यों का
अनुगामी है? और वही परिणाम चाहता है जैसी कबीर की अपेक्षाएँ थीं?

गर्भनाल पत्रिका का जून-2016 अंक प्राप्त हुआ। कबीर पर यथोचित सामग्री ने एक पठनीय पत्रिका के इस अंक को संग्रहणीय बना दिया है। कबीर वस्तुतः आज एक मिथ की तरह बहुश्रुत तो हैं ही, अपने ठोस और स्पष्ट मंतव्यों और सामाजिक विसंगतियों पर सीधा प्रहार करते दिखने के कारण भारतीय समाज में अपरिहार्य भी हैं। उनके तब के समाज में उनकी भूमिका और उनका प्रखर वर्तमान कितने प्रासंगिक थे, यह मनीषियों के लिए चर्चा और शाोध का विषय है, कबीर आज के समाज के लिए अवशय ही प्रासंगिक हैं।
यह ढँकी-छुपी बात नहीं है कि भारत में आज दक्षिणपंथ और वामपंथ राजनैतिक रूप से सबसे अधिक मुखर हैं। सामाजिक रूप से पूरी तरह तो नहीं, लेकिन वैचारिक रूप "युद्ध' की स्थिति है। यदि यही सामाजिक रूप से खुल कर दिखने लगे तो आशचर्य नहीं होना चाहिए। दो मंतव्यों के बीच की वैचारिक स्पर्धा अपने-अपने अब तक के उच्चतम स्तर पर है। ऐसे में कबीर अपनी प्रखर निर्लिप्तता और निर्ममता के साथ समाज के प्रति अपने दायित्वबोध के कारण अधिक सम्मोहित करते दिखते हैं।
लेकिन पहले हमें पूरी संवेदनशाीलता और दायित्वभाव के साथ आकलन करना होगा कि जब-तब कबीर की बात करने वाला, उनके कहे के दम पर समाज में व्यापी विद्रूपता पर कुठाराघात करने वाला समुदाय या वर्ग क्या वाकई कबीर के मंतव्यों का अनुगामी है? और वही परिणाम चाहता है जैसी कबीर की अपेक्षाएँ थीं? क्या उसके ह्मदय में भी कबीर वाली समता और करुणा की अजरुा धारा बहती है, जिसकी अंतर्धारा तो शाीतल है, लेकिन जिसकी सतह पर नीर-क्षीर करता विवेक का लावा बहता है? तो दुःख होता है! वस्तुतः, फिरकापरस्त के तौर पर किसी व्यक्ति, वर्ग या समुदाय को नामित करना और ठगों के बीच ठगों के षडयंत्रों के विरुद्ध बने रहने में से कौन श्रेयस्कर है? फिर, फिरकापरस्ती का बिल्ला दे कौन रहा है? किस बिना पर? उसके मानक क्या हैं? और जिनको ऐसा बिल्ला नहीं दिया जायेगा, उनकी समझ पर कौन बोलेगा? फिर अपने विरुद्ध तमाम षडयंत्रों और एकपक्षीय सोच से आहत हुआ कोई समुदाय किनके पास जाये? ऐसे प्रशन भी उतने ही समीचीन हैं। इसी कारण कबीर आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, या कुछ अधिक ही प्रासंगिक हैं। लेकिन कबीरपंथी नहीं! इसका जो कुछ कारण हो सकता है, वह इतना गझिन नहीं है।
कबीर वस्तुतः अपने समय की सामाजिक या साम्प्रदायिक विसंगतियों पर करारा प्रहार करते हुए आज के तथाकथित पंथनिरपेक्ष जमात की तरह कैलकुलेटिव खेल नहीं खेलते। अतः दोनों तरह के समुदाय द्वारा स्वीकारे भी जाते थे। कबीर की बात करते हुए उनके बताये मार्ग पर चलने के मूल अर्थों की व्याख्या तो पंथनिरपेक्ष जन करते हैं, लेकिन पंथनिरपेक्षता की परिभाषा गढ़ने के बिन्दुओं को उन्होंने इतना उलझा रखा है कि एक बड़ा वर्ग आये दिन छला हुआ महसूस करता है। तभी तो उनके द्वारा चक्की पूजे जाने की लताड़ प्रभावी नहीं लगती, क्योंकि काँकर-पाथर जोड़ने वालों की हठ पर ज़रूरी कबीराना तमाचा नहीं चल पाता। यही वे बिन्दु हैं, जो कबीर की बात करते हुओं को कॉस्मेटिक चिंतकों की श्रेणी में रख छोड़ते हैं। सामाजिक रूप से आज यह दशाा कबीर के ज़माने के मुखर हठयोगियों और निरीह और दलित भक्तों की न भी हो तो भी उनके अपने-अपने छोर बने रहने की याद ज़रूर दिला देता है। कबीर इन्हीं दो छोरों के बीच समन्वय और संतुलन बनाये हुए अन्यथा के कर्मकाण्डों की बखिया उधेड़ते हैं। ऐसे कमाल के तात्विक समन्वयकारी समदर्शाी कबीर का पढ़ा-लिखा न होना किसी दोहे की पंक्ति का समर्थन संतुष्टि के साथ जुटा नहीं पाता। जानने योग्य है कि भारतीय समाज शिाक्षा की आज की समझ से समरस नहीं रहा है। भारतीय समाज में शिाक्षा और विद्या की अवधारणा रही है। शिाक्षा जहाँ परिवार-पालन और उदर पोषण के लिए आवशयक थी। विद्या मनस, तात्त्विक-बोध तथा आध्यात्म के गूढ़ विन्दुओं की मीमांसा और समझ के लिए तैयार करती है। उस हिसाब से आज की शिाक्षा के लिए आवशयक अक्षर ज्ञान की कबीर को तब ज़रूरत ही न पड़ी हो। उनका पेशाा तो था ही, जिसे वे मुखर रूप से स्वीकारते ही थे। लेकिन विद्या के क्षेत्र में उनकी पहुँच और समझ की बानग़ी तो उनकी कही और लिपिबद्ध हुई रचनाएँ हैं ही! वे किसी भी विद्वान से शाास्त्रार्थ कर पाने की क्षमता रखते हैं। अतः अभिधात्मक ढंग से कबीर को समझने का प्रयास कई बिन्दुओं पर शाोध-बिन्दुओं को हल्का रखता है। इन सूरतों में यह भी हो सकता है कि कबीर को तबके लिए आवशयक अक्षरज्ञान की ज़रूरत ही नहीं पड़ी हो। क्योंकि कबीर का हेतु ही भिन्न नहीं भी तो विशिाष्ट अवशय था। और यह भारतीय समाज और सोच की व्यापकता की आन्तरिक ताकत ही थी कि कबीर इस भूमि पर एक लम्बे समय तक बेहिचक घूम पाये।  
आचार्य रामचन्द्र शाुक्ल ने कबीर के साहित्य को बहुत महत्त्व नहीं दिया था। भला हो हज़ारी प्रसाद द्विवेदी का, जिन्होंने कबीर के कहे में आक्षरित शौल्पिकता के आगे तथ्यात्मक विशिाष्टता भी देखी। उनके कहे को लिपिबद्ध करने के प्रयास में लगे शिाल्प और विधानों से उथले लेखकों के कारण कबीर-साहित्य किसी मानक के सापेक्ष खड़ा नहीं रह पाता। "कबीरा खड़ा बाज़ार में' कहते हुए लेखक दोहा के चरित्र और उसके चरणों की मात्रिकता और पदों के शाब्द-संयोजन की महीनी को कतई नहीं समझ पाते। छान्दसिक प्रवाह में पूर्ण गेय पंक्तियों में अपनी बात कहने वाले कबीर का यह पक्ष यदि हाशिाये पर यदि रखा गया या धकेला गया तो यह बात समझ में भी आती है। क्योंकि, नई कविता के पुरोधाओं द्वारा छन्द और गीत मर गयेे की घोषणा को तुष्ट करना अधिक बड़ा आग्रह था।
मेरा व्यक्तिगत आग्रह है कि कबीर की भावनाओं और उनकी भावनात्मक उपलब्धियों को सापेक्ष प्रस्तुत करने के क्रम में हम उन्हें महज एक बड़बोला गँवर्इं साबित न कर दें, न करने दें। कबीर को जानने के लिए काशाी, काशाी परिक्षेत्र और पूरे पूर्वांचल के मानसिक ठोसपन तथा उदार जीवन-शौली को धैर्य के साथ समझना होगा। कबीर तभी सही समझे जा सकेंगे।
इस अंक में हरिहर झा, नवोदिता माथुर, ध्रुव शाुक्ल, प्रो. मोहनकान्त गौतम तथा डॉ. सुरेशा रॉय के आलेख विशोष रूप से पठनीय लगे। सम्पादकीय के माध्यम से कई बिन्दुओं की सार्थक चर्चा हुई है। इस चर्चा का स्तर कई अन्य आलेखों में बना रहना था। साथ में विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं में कबीर की शाास्त्रीय मौज़ूदग़ी का जैसा उदाहरण प्रस्तुत किया गया है, वह कबीर की पहुँच और समाज पर उनकी पकड़ की गाथा स्वयं कहते हैं। इस विशिाष्ट अंक के लिए गर्भनाल पत्रिका की पूरी टीम को हार्दिक शाुभकामनाएँ।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 15.00 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^