ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
कबीर का समाज
01-Jun-2016 12:00 AM 2795     

अल्बर्ट आइंस्टीन से क्षमा-याचना सहित उनके ¶ाब्दों को बदलकर मैं कहना चाहूँगा कि आने वाली पीढ़ियां कैसे वि·ाास करेंगी कि पंद्रहवीं ¶ाताब्दी में एक ऐसा इंसान हाड़-मांस युक्त जन्मा था जिसने "मसि कागद छूवो नहीं, कलम गही नहिं हाथ' जैसा अनपढ़ होते हुये हिन्दू समाज में क्रांति ला दी। जिसने हिन्दू और मुस्लिम दोनों धर्मों की खोखली कुरीतियों को बुरी तरह लताड़ा और का¶ाी के बदले मगहर में मरने का फैसला लिया। फिर उनकी मृत्यु पर उसे गाड़ा जाये या दफनाया जाय, इस बात पर हिन्दू-मुसलमानों में झगड़ा हुआ।
वह कबीर था जिसने कहा था कि पत्थर पूजने से हरि मिलता है तो मैं पहाड़ को पूजने के लिये तैयार हूँ- ताते यह चाकी भली पीस खाय संसार। उनका निर्गुण पंथ वास्तव में आज की वैज्ञानिक विचारधारा से भी साम्य रखता है क्योंकि इसमें किसी अंधवि·ाास को स्थान नहीं है। यहाँ तक कि केवल मूर्ति-पूजा छोड़ कर माला फेरने से भक्ति निर्गुण नहीं हो जाती। वे भक्ति की इस विधि की भी ¶ाल्यक्रिया करने से पीछे नहीं हटते। कर का मनका छाँडी दे, मन का मनका फेर, उन्होंने समाज में फैले वैचारिक प्रदूषण के लिये वैद्य बनकर भी कभी मीठी-मीठी गोलियों का सहारा नही लिया। जहाँ पर ऑपरे¶ान और कड़वी दवा की जरूरत हो वहाँ ठंडा मलहम किस काम का? वे कहते हैं- दिन में रोजा रखत है रात हनत है गाय, यह तो खुन वह बंदगी कैसी खु¶ाी खुदाय।
एक ओर कबीर ने सरल स्पष्ट और आक्रामक भाषा में प्रहार किये तो दूसरी ओर पंडितों के अहंकार को तोड़ने के लिये उलटवासियाँ लिखी "नैया बीच नदिया डूबी जाय' या फिर "बरसे कंबल भीगे पानी' इसका अर्थ पंडितों को ¶ाास्त्र में मिल पाना असंभव है। "बैल बियाय गाय भई बंझा, बछरू दुहिये तिनि-तिनि संझा' में किस अनुभूति की बात चल रही है? पुस्तक-कीट क्या समझेंगे? दार्¶ानिक ¶ाब्दों के पहाड़ पर बैठे पंडित ज्ञान की एक किरण के सामने विचलित हो उठे थे। क्योंकि जब तक "लाली देखन मैं गई मैं भी हो गई लाल' वाला जज़्बा न हो तो क्या वेद पढ़ कर अर्थ समझ लेने से ई·ार मिल जायगा? कबीर कहते हैं "चारिउं वेदि पठाहि, हरि सूं न आया हेत, बालि कबीरा ले गया, पंडित ढूंढे खेत'। कर्मकांड के चक्कर में पड़ने की जरूरत क्या है? "झाके आंगन नदिया बहै, सो कस मरै प्यास' भीतर जो आनंद की नदी बह रही है उसकी पहचान तो स्बयं ही करनी होगी। सांप्रदायिक भावना पर कहा कि "हिन्दु कहे मोहे राम पियारा, तुरक कहे रहिमाना, आपस में दोउ लरि मुए मरम न काहु जाना।' कबीर ने न केवल जप-तप, छापा, तिलक पर प्रहार किया बल्कि मरणोपरांत गंगा में अस्थि-विसर्जन पर लिखा "जारि वारि कहि आवे देहा, मूआ पीछे प्रीति सनेहा, जीवित पित्रहि मारे डंडा, मूआ पित्र ले घालै गंगा।'
कबीर के बाद सगुणवादी भक्ति के आन्दोलन चले, उनकी उपादेयता एक दृष्टि से विवादास्पद ही बनी रहेगी क्योंकि एक मानवतावादी विचारधारा जिसमें ऊंच-नीच को कोई स्थान नहीं है, मिथ्या धारणाओं के लिये कोई जगह नहीं है, उसकी कोपल अंकुरित होते-होते सगुण भक्ति के बहाव में बह गई। हिन्दू समाज जो अन्य धर्मों के मुकाबले में आज अनेक अंधवि·ाासों में डूबा हुआ है उसकी पूर्ति केवल कबीर को संत और कवि का सम्मान देने से पूरी नहीं हो सकती। हमें उनकी विचारधारा को अंगीकृत भी करना होगा। आज कहने को तो पंडितजी भी अपने भाषण में कबीर का उद्धरण दे देते हैं पर व्यवहार में उनके अंधवि·ाास रहित मार्ग पर चलना तो दूर उल्टा समाज को ऊँच-नीच और ढकोसलों की खाई में धकेलते रहते हैं। आप पूछ सकते हैं कि हमने पत्थर को पूजा, सरलता के लिये उसे ई·ार का प्रतीक बनाया इसमें बुराई क्या है? कुछ भी नहीं। हमलावरों ने जब हमारे मंदिर तोड़ दिये और मूर्तियां तोड़ दी तब हमारा ई·ार तो नहीं टूटा था, धार्मिक-भावना पर हमारा वि·ाास था वह भी नहीं हटा था इसलिये हमने नये मंदिर बना लिये बल्कि पहले से भी ज्यादा। जबकि अन्यत्र दे¶ाों में पगान लोगों की देवी की मूर्तियां तोड़ी जाने पर आस्था भंग हो जाने से लोगों ने धर्म-परिवर्तन किये थे। जो भी हो, कितु बाद में पत्थर को ही ई·ार समझ लेने से मंदिरों में प्रवे¶ा से पहले ऊँच-नीच की धारणा ने चौकीदार बन कर हमारे समाज में प्रवे¶ा पा लिया। आज ¶ानि के मंदिर में स्त्रियों के प्रवे¶ा पर जो समस्या उठ रही है वह भी पत्थर को प्रतीक के बदले ई·ार समझ लेने के कारण हुई है। यह कैसी आस्था हुई? अगर रिवाजों के बंधन में मूर्ति खुद ई·ार हो जाय तब तो स्त्रियों के प्रवे¶ा पर भेदभाव ¶ाुरू हो जायगा। बाकी तो "ई·ार: सर्व भूतानां', भेदभाव के लिये कोई स्थान नहीं है।
माना कि कुछ सिद्धों और नाथों के प्रभाव में कबीर ने भी अपने रहस्यवाद में स्त्री-निंदा के परंपरागत प्रतीक ग्रहण कर लिये थे और इस विषय में 15वीं ¶ाताब्दी का वह संत आधुनिक युग से अव¶य पिछड़ गया था। नारी की छाया पड़ने से "अंधा होत भुजंग' कबीर की भाषा आज की नारी विषयक मान्यता से आँख नहीं मिला पाती।
कुछ विद्वानों का मत है कि कबीर अपनी साधना की अनुभूति को व्यक्त करने के लिये नारी-विषयक तत्कालीन मान्यताओं और परंपराओं से ¶ाब्द निकालते हैं। इस कारण उनका लौकिक समाज-सुधारक वाला अक्खड़पन अध्यात्म में विलीन होने लगता है। पर कुल मिला कर यह बचाव की दलील लगती है। सच तो यह है कि कबीर की माँ ने विधवा होने के बाद उन्हें जनम दिया था। और इसलिये नदी किनारे उन्हें छोड़ दिया था जिसके कारण उन्हें समाज में तिरस्कार झेलना पड़ा था। हो सकता है माँ के प्रति यह आक्रो¶ा ही व्यापक रूप धर कर नारी-निन्दा के रूप में फूट पड़ा हो। फिर भी यह तय है कि उन्होंने पतिव्रता नारी की प्र¶ांसा की है और अधिकतर दोहों में दु¶चरित्र और कामिनी रूप नारी पर पूरी तरह भड़ास निकाली है।
 जो भी हो नारी पर खीझ और वासना-लोलुप पुरुषों के लिये लगभग मौन हो जाने के इस काले धब्बे के विरोध में उनके समाज सुधार के विभिन्न आयाम सूर्य की रो¶ानी की तरह चमकते है। कबीर "गहरे पानी पैंठ' कर मोती ढूंढ लाने वाले व्यक्तियों में थे। यह मोती विचार, भाव या भक्ति का भी हो सकता है अत: "जिन खोजा तिन पाइयाँ' का उद्घोष करने से नहीं चूके। अच्छे अच्छों को अपने अहंकार और आलस्य में डूबने का डर रहता है पर इसके परिणाम को प्रकट करने के लिये उपमा की भाषा में उन्हें कहना पड़ा कि "मैं बपुरा डूबन डरा, रहा किनारे बैठ'।
कबीर का लालन-पालन बड़े विरोधाभासी वातावरण में हुआ था। विवादास्पद मामले छोड़ भी दें तो इतना तय है कि वे मुस्लिम परिवार में पले बढ़े। पर इस्लाम की तुलना में उन्हें नाथ संप्रदाय, कुण्डलिनी जागरण, योग आदि की अधिक जानकारी थी। वे रामानन्द को अपना गुरू मानते थे। उनका दृष्टिकोण सामंजस्यवादी रहा। वे भक्ति के हर मार्ग से सार ग्रहण करके थोथा उड़ा देने में जरा भी नहीं झिझके। पाखंडी विचार के विरोध में उन्होंने पंडित और मुल्ला दोनों को क्रोधित कर देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। भारत में आज जरा-सी आलोचना पर बात फतवे और दंगों तक आ जाती है, धर्म नष्ट होने से बचाने के लिये हड़ताल के साथ पुस्तक पर बैन लगाने की मांग उठती है और उसकी प्रतियाँ जलाई जाती हैं तो आ¶चर्य होना स्वाभाविक है कि उस कथित पिछड़े युग में फक्कड़ कबीर की हत्या कैसे नहीं हुई? उल्टा कबीर "सब की खैर' मांगते हुये कहते हैं - "ना काहू से बैर'! सत्य को ज्यों का त्यों बोलने से बड़ी बैर मोल लेने वाली बात और क्या हो सकती है? कबीर उस पिछड़े काल-खंड के अंधवि·ाासियों पर "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' का भरपूर उपयोग कैसे कर पाये जबकि ये ¶ाब्द और उस पर चर्चा उस युग में नहीं के बराबर थी? सोचने के लिये मजबूर होना पड़ता है कि सहिष्णुता के मामले में भारत आगे बढ़ा है या पीछे हटा है? यह कैसा समय आ गया है जिसमें "सहिष्णुता' या च्र्दृथ्ड्ढद्धठ्ठदड़ड्ढ जैसा अच्छा ¶ाब्द भी राजनैतिक दुर्गन्ध से सराबोर हो गया है? एक आधुनिक व्यंग्यकार ने गहरा दु:ख व्यक्त करते हुये लिखा है कि कबीर के बाद भी कोई दूसरा कबीर क्यों नहीं बन पाया और मैं स्वयं क्यों कबीर बनने के बदले मामूली-सा व्यंग्य लेखक बन कर रह गया?

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