ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
काफ़ी का कप मुझे भी पेड़ बना देता
01-Oct-2018 08:44 PM 372     

काफ़ी का कप

टेबल पर कॉफ़ी का कप
मेरी तरह चुपचाप सा
पंखे का शोर मेरे अंदर के मौन-सा
सीने के अंदर एक उमस
बिल्कुल इस मौसम के जैसी

जानती हूँ कप के तल में
बची थोड़ी-सी कॉफ़ी सूख जाएगी
कप भी धुल कर
अपनी जगह पहुँच जाएगा
पर मैं?

मेरा क्या, चुप के शोर में
उमसता अंतस लिए
मैं भी कप की बची कॉफ़ी-सी
सूख जाऊँगी, और...
खुद ही खुद को उठाकर
इन जज़्बाती बवंडरों को समेट
रख दूँगीं धो-धाकर
किसी ताक पर।


मुझे भी पेड़ बना देता

तपती धूप में अकेला
घनी छाँव लिए
वो शजर अलबेला

कौन उसकी झुलसती
शाखाओं को सींचता है?
वो तो खुद ही की जड़ों से
पाताल से नमीं खींचता है

मुसाफ़िर दो घड़ी सुस्ताकर
नर्म निगाहों से सहला गए
वो काफ़िर-सा अपने ही
दरख़्तों को भींचता है

कोई चेहरा नहीं उसका
जिसपे उभरते जज़्बात पढ़ती
डाल से झरते पीले पत्तों की
अनकही पीड़ा समझती

मेरे मालिक! तू मुझे भी एक
पेड़ ही बना देता
मेरे अंदर की कचोटों को
भूरे तने की खरोंचों-सा सजा देता
सीने का लहू सूखी टहनियों-सा गिरा देता
कोई बेघर-सी चिड़िया
उसे अपने घरौंदे में जगह देती

कोई बवंडर-सा आता तूफान,
मेरे वजूद को हिला देता
मेरे थकते हौंसलों को
अपनी आगोश में गिरा लेता।

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