ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया
01-Jun-2016 12:00 AM 2581     

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बहुत बरस नहीं हुए जब कबीर-गायन सुनते हुये मेरी मुलाकात एक बूढ़े ग्रामीण से हुई। उन्होंने पहले काफी संकोच से मुझसे समय पूछा और फिर मुझे कबीर में भीगता देख हल्के से पूछा, ""क्या आप जानते हैं कि ये क्या गाया जा रहा है?'' तब स्टेज पर बैठी गायिका ""रस गगन गुफा में अजर झरै'' गा रही थी। मैं चुप रहा। गगन गुफा जैसे खूबसूरत बिम्ब का क्या इंगित हो सकता है? कोई तो होगा? वह क्या हो सकता है? ""खोपड़ी'', वे ग्रामीण वृद्ध बोले ""गगन गुफा यानी खोपड़ी, उसमें अजरुा गिरता रस, खोपड़ी के ब्राहृारन्ध्र में लगातार बरसता अमृत है।'' मैं देखता रह गया। एक खूबसूरत बिम्ब अपनी खूबसूरती छोड़े बिना ही एक गूढ़ संकेत में बदल गया था और उन ग्रामीण वृद्ध ने उसे कितनी खूबसूरती से बाँच दिया था। प्राचीन काव्य¶ाास्त्री आनन्दवर्धन ने लिखा है कि कविता के अर्थ को सिर्फ ¶ाब्द-¶ाास्त्र यानी व्याकरण और अर्थ¶ाास्त्र यानी को¶ा के सहारे जान लेना कठिन है। कबीर की कविता के लिये भी यह उतना ही सच है, बल्कि यहां यह बहुत गहन रूप से सच है। उसे जानने के लिये उस कविता में आये ¶ाब्दों और अर्थों के बीच के ऐसे संयोगों को पहचानना होता है जिनकी स्मृति अब धुँधली पड़ती जा रही है। लेकिन इन संयोगों को बाँचे बगैर वह कविता हमारे लिये अप्राप्य ही बनी रहती है, अपनी गूढ़ता में अपने को लगभग पूरी तरह छिपाये हुये।
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अगर फ्रांसीसी उपन्यासकार प्रूस्त के इस कथन में जरा भी सच्चाई है, जो कि मेरी नजर में है, कि साहित्य अपने लिये भाषा के भीतर ही हर बार एक परायी भाषा ईजाद करता है जो न तो कोई और भाषा होती है और न ही भाषा में नये अवका¶ाों का पुनराविष्कार बल्कि जो भाषा का खुद अपने लिये "पराया' हो जाना है, तो कबीर की कविता इसका अन्यतम उदाहरण है। एक श्रेष्ठ सृजन नयी भाषा ईजाद नहीं करता, वह हमे¶ाा ही उपयोग में आने वाली भाषा को इस तरह बरतता है कि इस बर्ताव की कौंध में वह भाषा खुद अपने लिये जरा-सी अजनबी हो जाती है। जैसे उस सृजन ने उसके सामने एक ऐसा लहरदार आईना रख दिया हो जिसमें वह खुद अपने अक्स को मु¶िकल से पहचान पा रही हो, जैसे उसी भाषा के ¶ाब्दों, अर्थों, विन्यासों आदि की ओट में एक बिल्कुल ही अलग भाषा छिपी रही जो जिस पर उस अनूठी सृजन¶ाीलता ने नि¶ााना साधा हो। साहित्य भाषा के पीछे से एक और भाषा को बाहर खींच लाने का भी नाम है। इसलिए कबीर जैसे लेखक को पढ़ने या सुनने के बाद हम अपनी आँखों के सामने ही उनके कृतित्व के आलोक में अपनी जानी-पहचानी भाषा को कुछ अजनबी, कुछ अटपटा महसूस करना ¶ाुरू कर देते हैं। ¶ाब्द वही हैं, वाक्य भी, लेकिन अब वे वह नहीं कह रहे होते जो अब तक कहते आ रहे थे। भाषा के भीतर स्वयं भाषा के स्थगन में ही कबीर की कविता का जन्म होता है। कबीर की कविता में यह स्थगन मूलभूत है क्योंकि वे ऐसा कुछ कहना चाह रहे थे जो कहने का रास्ता अब तक भाषा में बना ही नहीं था। वे अपने अनुभव को भाषा में इस तरह बरतने का प्रयत्न करते हैं कि वह ज्ञान में रूपान्तरित होने से पहले ही अनुभव में स्वायत्त हो जाये। लेकिन भाषा में अनुभव को ज्ञान में रूपान्तरित करने की आत्यन्तिक प्रवृत्ति होती है, कबीर इसी प्रवृत्ति को लाँघ जाना चाहते थे या अनुभव को ही ज्ञान के रूप में उपलब्ध करना चाहथे थे :
मसि बिनु द्वाइत, क़लम बिनु काग़ज बिनु अक्षर सुधि होई
सुधि बिनु सहज ज्ञान बिनु ज्ञाता कहहिं कबीर जन सोई।
अब ¶ाब्द ¶ाब्द नहीं गूढ़ संकेत हैं जिन्हें इस तरह पढ़ना संभव नहीं जिस तरह उन्हें इसके पहले तक पढ़ा जाता रहा था। इसलिए ऐसी कविता को पढ़ने के पहले पढ़ने के तरीकों को दांव पर लगाना होता है, अपनी जानी-बूझी पठन-युक्तियों का आत्मसमर्पण कर देना होता है; तब ही ऐसी कविता के नगर-द्वार को पार करने के लिये लगातार ऐसे आत्मसर्पण करते रहते होते हैं।
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प्राचीन एल्केमिस्ट पेरासेल्सस की यह प्रसिद्धि रही है कि उन्होंने ऐसी विधि खोज ली थी जिसमें राख हो गये गुलाब से दोबारा गुलाब उत्पन्न किया जा सके। इसी किंवदन्ति के सहारे अर्जेंटाईन लेखक बोर्खेज ने एक कहानी लिखी थी। कहानी में बूढ़े होते पेरासेल्सस ई¶वर से प्रार्थना करते हैं कि वह उनके पास एक ¶िाष्य भेज दें। संयोग से उनके दरवाजे पर एक ऐसा ¶ाख्स आता है जो उनका ¶िाष्य होने का इच्छुक है। लेकिन वह ¶ांकालु है। पेरासेल्सस से ¶िाक्षा लेने के पहले वह कुछ प्रमाण चाहता है। प्रमाण कि क्या वे सचमुच राख हो चुके गुलाब को दोबारा एक जीवन्त गुलाब में रूपान्तरित कर सकते हैं। इस पर पेरासेल्सस उस संभावित ¶िाष्य को जवाब देते हैं कि ""क्या तुम सचमुच ऐसा मानते हो कि किसी भी रोज को खत्म किया जा सकता है? क्या तुम मानते हो कि पहला आदम फूल या घास के तिनके तक को नष्ट कर सकता था।'' ¶िाषय के यह जोर देने पर कि वे जन्नत में नहीं हैं, पेरासेल्स चकित भाव से कहते हैं, ""हम जन्नत में नहीं तो और कहां हैं? ई¶वर ऐसी जगह बना ही नहीं सकता जो जन्नत न हो और उसे पहचान न पाना ही पतन है।'' यानी जैसे ही मनुष्य इस जगत की ओट में छिपी जन्नत को जन्नत की तरह अनुभव करने लगता है, राख हो गया गुलाब दोबारा अपने गुलाब रूप में लौट आता है। लेकिन इस जन्नत को जन्नत कैसे अनुभव किया जाये। पेरासेल्सस का जवाब है, "¶ाब्द से'। उनके ¶ाब्द से। यानी सतगुरु के ¶ाब्द से।
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गगन गरजै तहां सदा पावस झरै,
होत झनकार नित बजत तूरा।
वेद कत्तेब की गम्म नाही तहां,
कहै कबीर कोई रमै सूरा।।
गगन की गुफा तहाँ गैब का चाँदना,
उदय और अस्त का नाम नाहीं,
दिवस औ रैन तहँ नेक नहिं पाइए,
प्रेम परकास के सिन्धु माहीं।।
सदा आनन्द दुख-द्वन्द्व व्यापै नहीं,
पूरनानन्द भरपूर देखा।
भरम और भ्रान्ति तहँ नेक आवै नहीं,
कहैं कबीर रस एक पैखा।।
सर गगन गुफा में अजर झरै।
बिन बाजा झनकार उठै जहँ समुझि परै जब ध्यान धरै।
बिन ताज जहँ कँवर फुलाने, तेहि चढ़ि हंसा केलि करै।
बिन चन्दा उजियारी दरसै जहँ तहँ हंसा नजर परै।
दसवें द्वारे तारी लागी, अलख पुरुष जाको ध्यान करै।
काल-कराल निकट नहिं आवै, काम-क्रोध-मद लोर जरै।
कबीर की कविताओं में पारलौकिक आका¶ा का, एक अन्नत सुंदर व्योम का, वर्णन बार-बार आता है। यह वह आका¶ा है जहां निरन्तर अमृत वर्षा होती है, जहां अदृ¶यता की, गैब की चाँदनी छिटकी रहती है, जहां सूर्य न उदय होता है न अस्त, यानी जहां वह निरन्तर बना रहता है, जहां प्रेम का समुद्र फैला है, दु:ख और द्वन्द्व समाप्त हो चुके हैं, बिना किसी साज के संगीत गूँज रहा है, बिना सरोवर के कमल खिल रहे हैं। क्या जगह है यह? क्या पेरासेल्सस की जन्नत? कुछ-कुछ वैसी ही है लेकिन वैसी होती हुई भी उससे अधिक व्यापक और अधिक सूक्ष्म। उसे जन्नत न कहें, लेकिन जन्नतनुमा का यात्रावृत्तान्त हैं। वे लौट-लौट कर इसी जन्नतनुमा की यात्रा पर हमें लेकर जाती हैं :
गगन मण्डल के बीच में, तहवाँ छलकै नूर
निगुरा महल न पावई, पहुँचेंगे गुरु पूर।।
वे बार-बार हमें उस गगन मण्डल में लिये जाते हैं जहां नूर छलक रहा है। जहां वेद की गति है न कुरान की, यानी यह वह जगह है जिसको कोई भी ¶ाास्त्र संज्ञापित नहीं कर सकता, जहां "निगुरा', बिना गुरु के जाना संभव नहीं, जहां सिर्फ सतगुरु का ¶ाब्द ले जा सकता है। सतगुरु का ¶ाब्द ही वह सब दिखा सकता है जो आँखों के अनन्त परदों के पीछे झिलमिला रहा है :
सतगुरु की महिमा अनंत, अनंत किया उपकार,
लोचन अनंत उघाड़िया अनंत दिखावणहार।
सदगुरु का यही सबद उस प्रिय से मिल सकता है जो इस पारलौकिक व्योम में स्पन्दित है, अलख पुरुष है, वही अलख पुरुष जो देखने योग्य है पर अलक्ष्य है, अनुभव का सार है, जिसकी चाहना उसे बेचैन किये दे रही है :
पिया मिलन की आस रहों कबलौ खरी
यह अनन्त अमृत वर्षा, यह बिना सरोवर खिलता कमल, यह निरन्तर गूँजता संगीत, यह विराट आका¶ा, आखिर कहाँ स्थित है? कहाँ है वह स्थान जहाँ काल कराल फटकता तक नहीं?
कबीर का जवाब है, "गगन गुफा में?' यह सारी विलुपता, सारी समृद्धि, सारा सौन्दर्य, यह अलख पुरुष से मिलाप खोपड़ी के भीतर हो रहा है जहां वे योगसाधना से या सतगुरु के ¶ाब्द के सहारे मन को स्थिर करके पहुँचे हैं। लेकिन ¶ाायद यह दृ¶यावली "गगन गुफा' की नहीं है। वहां कोई दृ¶यावली मौजूद नहीं है बल्कि गगन गुफा में हुए अनुभव को उपलब्ध भाषा में किसी तरह करने की मजबूरी के कारण वह अकथ्य अनुभव इस अलंकृत दृ¶यावली में बिखर गया है। यह एक ऐसे अनुभव को व्यक्त करने की को¶िा¶ा है जिसे दरअसल किसी भी तरह उपलब्ध भाषा में व्यक्त किया नहीं जा सकता था। लेकिन व्यक्त करना ही था क्योंकि ¶ाायद किसी भी ढंग से व्यक्त किये बिना यह अनुभव अधूरा रहा आता। इसलिए कबीर के अनुभव की आँच में अक्सर उनकी भाषा गूढ़ संकेत-चिन्ह में बदल जाती है और ऐसी-ऐसी उलटवासियाँ जन्म लेती हैं जिनके सहारे वे कथन के अन्त:स्थल में अकथ्य को प्रतिष्ठित करते हैं जिससे भाषा के भीतर भाषा को लगभग हमे¶ाा के लिये स्थगित कर अपने पाठक को अनुभव के सागर में डुबाने की को¶िा¶ा में रहती है। यहां जो व्यक्त है वह लगातार खुद को अव्यक्त में तिरोहित करता है, जो प्रत्यक्ष है परोक्ष में अपना उपसर्ग करता है। और ऐसा करते हुये कबीर की कविता स्वयं अपने इंगित का स्थान ले लेती है। वह स्वयं उस "गगन गुफा' में रूपान्तरित हो जाती है जहां अजरुा रस की वर्षा हो रही है। कबीर की कविता से यह छुपा नहीं होगा कि काव्य के आनंद को ब्राहृानन्द का सहोदर कहने की परम्परा बड़ी पुरानी है।
5
जेहि मरने से जग डरै, सौ मेरे मन आनन्द।
कब मरिहौं कब पाइहौं, पूरन परमानन्द।।
"होना' कबीर के लिये समस्या है। होना यानी अस्तित्व। अस्तित्व मात्र उनके लिये समस्यामूलक है। उनकी पीड़ा का कारण है। यह होना ही है जिसके कारण अलख पुरुष का लोप हो गया है। यह होना ही है जिसके कारण प्रिय की नगरी में विछोह हुआ है। यह होने का नैहर ही है जो तकलीफदेह महसूस हो रहा है क्योंकि इस होने के कारण ही वह अपने पीहर से, प्रिय के दे¶ा से विलग हो गया है।
नैहरवां हमकां न भावै
सारा "होना' जैसे वृन्दावन में गोपी का होना है जिसे कृष्ण छोड़ गये हैं। होना अपने में ही सूनापन है। लेकिन यह होना ही है जिसमें प्रिय के अभाव की गूढ़ लिपियां बिखरी हैं, उनकी अनुपस्थिति की छापें हैं, उसके कहीं और होने की अनुगूँजें हैं। यह होना ही है जिसमें उसके प्रिय के कहीं और होने की आहटें झरती हैं। वह वियोग हुआ कैसे? कैसे यह विपुल अस्तित्व प्रिय मिलन की आस में जाने कब तक खड़े रहना हो गया? कबीर इसका जवाब देते हैं :
जब मैं था तब हरि नहिं, अब हरि हैं मैं नाहिं।
कबिरा नगर एक में, राजा दो न समाहिं।।
अस्ति का स्वरूप ही ऐसा है कि इसमें "मैं' और "हरि' का वास एक साथ नहीं हो सकता। "मैं' के अस्तित्व में आते ही हरि का लोप हो जाता है। यह होना ही है जिसे गालिब ने "कैदे-हयात' या जीवन कैद कहा था :
कैद-हयात ओ' बन्द-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं
मौत से पहले आदमी ग़म से निजात पाये क्यों?
जीवन के अस्तित्व में आते ही हरि के लाप का अर्थ है कि अब उसके और उसके प्रिय के बीच जीवन दीवार की तरह खड़ा है। वह सिर्फ अस्तित्व की कैद में फँसा अपने सांई के, अपने प्रिय के नगर की कल्पना करता है और उससे न मिल पाने के दुख में तड़पता है :
सांई की नगरी परम अति सुन्दर जहां कोई जावे न आवै
चाँद सूरज वहाँ पवन पानी, को सन्दे¶ा पहुँचावै?
दरद यह सांई को सुनावौ?
आगे चलौ पन्थ नहीं सुझै, पीछे दोष लगावै
केहि विधि ससुरे जाऊँ मेरी सजनी विरहा जोर जरावै।
यह "आत्म' की ऐसी कल्पना है जो इसी वियोग से बनी है। वह तड़पता है क्योंकि प्रिय के कहीं और होने की आहट तो इस अस्तित्व में मौजूद है लेकिन यह नगरी कुछ ऐसी है जहां से प्रिय की नगरी तक अपनी पीड़ा का संदे¶ा तक पहुंचना नामुमकिन है। यह अस्तित्व को देखने का एक खास नजरिया है जो ¶ाायद भक्ति की संवेदना के मूल में है, जो भक्त-कवियों को सूफी कवियों से जोड़ता है और गालिब और बेदिल जैसे फारसी के कवियों तक फैला है। यहां सारा अस्तित्व चाहना में तब्दील हो गया है। जीने का महत्व केवल इतना है कि उसके अंगों पर हरि के न होने की छापें हैं, और उनसे मिल सकने की आस के चिन्ह। यहां वह अपनी अनुपलब्धि में निरन्तर उपलब्ध है। पीड़ा की तरह। अस्तित्व में आना ही वेदना का कारण है, गालिब का कहना है :
न था कुछ तो खुदा था, कुछ न होता तो खुदा होता
डुबोया मुझको होने ने, न होता मैं तो क्या होता।
लेकिन यह अस्तित्विक वेदना अस्तित्ववादी चिन्तन की पीड़ा से भिन्न है। अस्तित्ववादियों के लिये अस्तित्व इसलिए असहनीय है क्योंकि वह मूलभूत स्तर पर अर्थ से ¶ाून्य है। उसके मर्म में अर्थहीनता हिलोरें ले रही है। लेकिन कबीर की कविता में अस्तित्व की असहनीयता का सबब उसकी अर्थहीनता में नहीं है। वह अर्थ से ¶ाून्य नहीं बल्कि प्रिय के विरह से परिपूर्ण है। उसका अंग-अंग विरह-¶ाोभा से दीप्त है।
अस्तित्व की यह वेदना, अस्तित्व की यह असहनीयता ही ¶ाायद कबीर के कृतित्व का रुाोत है। उनकी तमाम रंगतों की कविताएं यहीं से फूटती हैं। वे इसी वेदना को गहरे से गहरे तक उद्घाटित करने में अन्य भक्त कवियों से कहीं अलग हो जाते हैं। वे इस आध्यात्मिक अनुभव के आड़े आने वाली सभी दृष्टियों का निर्मम विवेचन करते हैं। यही कारण है कि उन्हें बाकी सारे वाद-विवादों, साम्प्रदायिक विभाजनों, धार्मिक आडम्बरों आदि को प्र¶नांकित करने की जरूरत जान पड़ती है। ये सारे आचरण या विचार कबीर के काव्य पुरुष की आत्मा की वियोग चेतना पर पड़े आवरण हैं जिन्हें वे हटाते चले जाते हैं। उन्हें इसलिए हटाना होगा कि नैहर में रहने की पीड़ा को अपनी ही आँखों में और अधिक स्पष्ट होगा कि नैहर में रहने की पीड़ा को अपनी ही आँखों में और अधिक स्पष्ट किया जा सके। इसलिए उसकी इस तरह की अनेक कविताओं को उनकी मूलभूत वेदना से काटकर देखना उनकी कविताओं का अधूरा विवेचन होगा। अगर समकालीन चिन्तन में कबीर की इस वियोग-चेतना को समझने का मुहावरा नहीं है तो इसे न तो उनकी कविता का दोष माना जा सकता है और न इस कारण उनकी कविताओं को समकालीन मुहावरे में अनुकूलित किया जाना चाहिए।
6
जीवन मात्र को प्रिय से विछौर के विवरण की तरह देखने तक कबीर और फारसी कविता में गहरी समानता नजर आती है लेकिन यहां के बाद कबीर का रास्ता अलग है बल्कि कहना चाहिए यहां से वे एक से अधिक रास्तों पर एक साथ चलते हैं। इनमें एक रास्ता फारसी कविता के समानान्तर चलता है और एक उससे थोड़ा आगे जाता है।
जीवन में रहते हुये तो प्रिय से मिलना मु¶िकल ही नहीं लगभग नामुमकिन है :
कबीर यहु घर प्रेम का, खाला का घर नाहिं
सीस उतारे हथि करै, सो पैठे घर माहिं
कबीर निज घर प्रेम का, मारग अगम अगाध
सीस उतारि पगतलि धरै, तब निकटि प्रेम का स्वाद।
प्रिय से मिलने के लिये सिर उतारना होता है। जान देनी होती है। जान के आने से ही यह विछोह उत्पन्न हुआ है, जान दे देने से ही वह दूर होगा। लेकिन यहां जीते जी मरना है, जीवन में रहते हुये जीवन से विदा ले लेना है। जीते जी मृत्यु को स्वीकार कर लेना है :
अब हरि हैं मैं नाहि।
"मैं' के लोप होते ही हरि के अभाव का लोप हो जाता है। इसके लिये इस तरह जीना है जैसे मर चुके हों। क्या यह संयोग है कि कबीर ¶िाव के त्रि¶ाूल पर अटकी का¶ाी में रहते थे? का¶ाी यानी यहां मृत्यु का राज है जिसे ¶ाायद आदि-मरघट के रूप में लेने का रिवाज पुराना है। इस आदि-मरघट में भटकते कबीर को जीते जी मरने की कला कौन सिखाए? कौन है जो बताये कि जीते जी अपना सिर काट कर कैसे पगतल पर धरना है? कौन है जो नैहर से पीहर की राह बताये? सतगुरु, और कौन!
बिन सतगुरु अपना नहिं कोई, जो यह राह बतावै
और वह राय क्या है जिस पर जीते जी मर कर प्रिय से मिलन होता है, वह राह किस ओर जाती है :
हमन है इ¶क मस्ताना, हमन को हो¶िायारी क्या
रहें आजाद या जग से, हमन को दुनिया से यारी क्या
जो बिछुड़े हैं पियारे से, भटकते दर ब दर फिरते
हमारा यार है हममें, हमन को इन्तजारी क्या।
यह जीते जी मरने की कला को सीखकर खुद अपने भीतर स्थित पीहर जाकर प्रिय से मिलने का यत्न करना ही कबीर का मार्ग है। फिर वहां से हठयोगी की तरह जाएँ या सतगुरु के चेले की तरह। और यहीं से फारसी कविता से अलग चले जाते हैं। यही मार्ग उनका सहज आध्यात्म है। इसलिए वे आध्यात्म के तमाम व्याकरणों यानी विविध धर्मों की आलोचना करते हैं क्योंकि उनके टीम-टाम में न यह विछोह दिखायी पड़ रहा है और उसमें छिपी मिलन की यह रहस्य-स्थली।
साधो सहज समाधि भली
गुरु परताप जा दिन तै उपजी दिन दिन अधिक चली
जहँ जहँ डोलो सोई परिकरमा, जो कुछ करौ सो सेवा
जब सोवों तक करों दण्डवत, पूजों और न देवा।
आध्यात्मिक अनुभव किसी भी जड़ीभूत धार्मिक व्याकरण का मोहताज नहीं। आध्यात्मिक अनुभव की राह कोई भी हो सकती है, तमाम धार्मिक व्यवस्थाएं आवरण भर हैं और यही नहीं, वे सभी नैतिकताओं के निर्धारण में उलझ कर अपने आवरण या चादर होने को मैला कर रही हैं :
सो चादर सुर-नर-मुनि ओढ़िन,
ओढ़ि के मैली कीनी चरदिया
गुरु ग्रन्थ साहिब में गुरु नानक का सबद है :
सचु मन कारणि ततु बिलौवे
सुभव सरवरि मैलु न धोवै
आध्यात्मिकता मैल धोने में नहीं, नैतिक निर्धारणों में नहीं, तंतु यानी तत्व को मथकर ऊपर लाने में है। कबीर इन निर्धारणों में केवल वहां तक ही उलझते हैं जहां तक वे निर्धारण तत्व को मथकर सामने लाने में सहायक हैं, इसके अलावा वे उनकी तीखी आलोचना करते हैं, क्योंकि यह अस्तित्व नामक आवरण या चादर को मैला करना है। वे इसलिए इसके पार निकल जाते हैं जहां उन्हें समूचा अस्तित्व एक पुकार की तरह, विरह के विवरण की तरह अनुभव होता है। इसलिए वे इस चादर को मैली नहीं करते :
ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया

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