ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
झूठ का समाजशास्त्र
CATEGORY : नजरिया 01-May-2016 12:00 AM 1441
झूठ का समाजशास्त्र

कवि ¶ाुंतारी तानी कावा ने अपनी एक कविता में लिखा है : "कुछ बातें हम झूठ बोलकर ही कह सकते हैं।' बात सही है सचमुच कुछ ऐसी बातें होती हैं, जो बोली ही नहीं जा सकतीं। उन्हें प्रकट करने के लिए झूठ का सहारा लेना पड़ता है। उदाहरण के लिए अगर आप किसी ऐसे घर में गए हुए हैं जिसकी आर्थिक स्थिति, आपकी नजर में खराब है तो जब उस घर के सदस्य आपसे खाने का आग्रह करेंगे, आपको यह झूठ बोलना होगा कि आपको भूख नहीं है। भलेे ही आपको बहुत भूख लगी हो। ऐसा झूठ बोलना गलत नहीं। कई बार जब डॉक्टर रोगी का हौसला बढ़ाने झूठ बोलता है, वह भी बुरा झूठ नहीं है। ¶ाायद मनुष्य ही ऐसा प्राणी है, जिसमें जो सचमुच है, उससे अलग या उससे उल्टा प्रकट करने की सामथ्र्य है। यानि मनुष्य ही ¶ाायद ऐसा अकेला प्राणी है, जिसमें झूठ बोलने की ¶ाक्ति है। वह झूठ बोल सकता है। इसलिए उसके सच बोलने को मूल्य माना जाता है। प¶ाुओं के सत्य-व्यवहार करने को मूल्य नहीं माना जाता, क्योंकि वे झूठा व्यवहार ¶ाायद कर ही नहीं सकते। यह उनकी सामथ्र्य से परे हैं।
सार्वजनिक जीवन में हर मनुष्य से यह अपेक्षा होती है कि वह सत्य बोले। सत्य व्यवहार करे। सत्य-निष्ठा महाकाव्यों से लेकर लोक कथाओं तक बेहद बड़ा मूल्य माना जाता है। पर धीरे-धीरे जैसे-जैसे कार्पोरेट जगत का विस्तार हो रहा है, झूठ का व्यवहार आम होता जा रहा है। कंपनी के हित साधने के लिए कंपनी के कर्मचारी बिना किसी हिचक के धड़ल्ले से झूठ बोलते हैं। अगर आप कोई म¶ाीन लेने गए हैं, कंपनी के ¶ाो रूम गए हैं, वहां उपस्थित कंपनी का कर्मचारी उस म¶ाीन के विषय में कुछ न कुछ झूठ तो अव¶य बोलेगा। आपको उसे सुनते समय यह लगातार सोचते रहना पड़ेगा कि वह कौन-सी बात सच बोल रहा है, कौन-सी झूठ।
उसे यह करते हुए ज़रा भी तकलीफ नहीं हो रही होगी क्योंकि वह यह मानकर झूठ बोल रहा होगा कि इससे उसकी कंपनी को लाभ मिलेगा। आप हवाई अड्डे पर जाइए। निजी कंपनी के हवाई जहाज में आपको यात्रा करना है। वह हवाई जहाज बेहद देर से जाने वाला है। पर हवाई अड्डे पर उपस्थित उस निजी कंपनी का कर्मचारी आपको सच्चाई नहीं बताएगा। वह लगातार झूठ बोलेगा। कंपनी की उससे यही अपेक्षा है कि वह कंपनी के हितों को साधने की खातिर अपने मूल्यों की बलि दे दे। यही कुछ राजनैतिक दलों में भी हुआ करता है। वहां भी पार्टी के हितों की खातिर व्यक्तिगत मूल्यों की बलि देनी होती है। ¶ाासन में भी इसी तरह का व्यवहार बढ़ता जा रहा है। बड़ा अफसर अपने कमरे में बैठा गप्प लगा रहा है और उसके दरवाजे पर बैठा नौकर आगंतुकों को यह बोलकर टरका रहा है कि साहब किसी महत्वपूर्ण बैठक में व्यस्त हैं। अब इस नौकर ने जो झूठ बोला, उसका वजन किसके दिल पर आने वाला है? क्या वह अपने साहब के हित साधने के लिए अपने मूल्यों की तिलांजलि देता रहेगा? क्या यही उसकी नौकरी का अहम् हिस्सा है? अगर हमारे राजनैतिक दलों में, प्र¶ाासन में, कार्पोरेट वि¶व में झूठ सहज रूप से बोले जाने लगे हैं तो फिर व्यापक मानवीय वि¶वसनीयता कहां से आएगी? क्या हमें हर व्यक्ति पर ¶ाक करते हुए जीना पड़ेगा? क्या हमें हर व्यक्ति के ¶ाब्दों को उलट-पलट कर देखते रहना पड़ेगा कि कहीं वह किसी कारण झूठ तो नहीं बोल रहा।
संस्कृत की अनेक सुंदर प्रेम कविताओं में नायिका-नायिक की धोखेबाजी को पकड़कर उसके सामने वे सारे झूठ खुद बोल देती है जो वह अपने बचाव में खुद बोल सकता था। ऐसा बोलकर वह नायक को यह भी बता देती है कि वह जानती है कि वह कहां से आ रहा है और साथ ही वह उसे झूठ बोलने से रोक भी लेती है।
पर ऐसे झूठ उनके बीच के प्रगाढ़ प्रेम को प्रदर्¶िात करने का काम करते हैं। इनसे कविता का सौंदर्य बढ़ता है। लेकिन ये झूठ प्रेम जैसे गहन मूल्य को बनाए रखने के लिए बोले जाते थे। इनके बोलने से आपसी वि¶वसनीयता कम नहीं होती क्योंकि बोलने वाले और सुनने वाले को पता होता है कि झूठ बोला जा रहा है। पर सार्वजनिक जीवन में, कम से कम भारत में, जिस तेजी से झूठ का व्यवहार बढ़ रहा है, वह हमारी आपसी वि¶वसनीयता को खत्म कर देगा। बिना वि¶वसनीयता के कोई भी कैसा भी लोक-व्यवहार संभव नहीं है।
करीब डढ़े सौ साल पहले अंग्रेज विद्वान और अफसर मैक्समूलर ने भारत में ¶ाासकीय नौकरी करने जाने वाले अंग्रेज अफसरों को कहा था कि भारतीय बहुत झूठ बोलते हैं। उसका यह कहना न्यायोचित नहीं था। यह इसलिए क्योंकि अंग्रेज अदालतों में जिस तरह के आरोप भारतीय किसानों या अन्य लोगों पर लगाए जाते थे, उनका सामना बिना झूठ बोले किया ही नहीं जा सकता था।
दरअसल भारत में अंग्रेजी ढंग के कानून और न्यायालयों ने ही ¶ाक्तिहीन भारतीयों को झूठ बोलने मजबूर किया था। ये अंग्रेजी न्यायालय ही थे जिसके कारण भारतीयों को झूठ बोलना पड़ा और फिर अंग्रेज अध्येताओं ने भारतीयों पर झूठ बोलने का लांछन लगाया। ¶ाायद जिस समाज में सार्वजनिक संस्थाएं उस समाज के स्वभाव के अनुरूप नहीं बनती, वहां समाज के सदस्यों को जीने की खातिर झूठ बोलने का सहारा लेना पड़ता है।
¶ाायद इसीलिए साधारण गरीब भारतीय झूठ बोलने को मजबूर हो जाता है। उसे हमे¶ाा लगता रहता है कि अगर उसने झूठ नहीं बोला, वह खुद को बचा नहीं पायेगा। पर ऐसा कोई दबाव राजनेताओं या प्र¶ाासकों या कार्पोरेट साहिबों पर ¶ाायद नहीं होता। वे स्वयं को बचाने नहीं, स्वयं की ¶ाक्ति को बढ़ाने या बनाए रखने की खातिर झूठ का सहारा लेते हैं। इससे लोगों का ¶ाासन पर से वि¶वास कम होता जाता है। यह पूरे समाज के लिए ¶ाुभकर नहीं है। इसमें धीरे-धीरे सभी सामाजिक संबंधों में ¶ांका की छाया घिरने लगती है। इसके व¶ाीभूत नागरिक जीवन का अधिकां¶ा हिस्सा एक-दूसरे पर ¶ांका करने और उसे दूर करने या पुख्ता करने में बीतता है।
हम पहले ही पर्याप्त चोट खाए समाज हैं, हमारे सार्वजनिक जीवन के झूठ इस चोट को दूर करने की जगह इसे गहरी करेंगे। समाज में समृद्धि हो न हो, सहकार अव¶य होना चाहिए। सहकार का आधार सत्य व्यवहार हुआ करता है। अगर हम सत्य का साथ छोड़ देते हैं, सहकार भी धीरे-धीरे हमारा साथ छोड़ देगा। वही हो रहा है भारतीय समाज में। मैंने जानबूझकर विज्ञापनों का जिक्र नहीं किया है और विचारधारा से प्रेरित लोगों का भी। वे झूठ बोलते रहने को अभि¶ाप्त हैं और उनके विषय में अब किसी को कोई ¶ांका बाकी नहीं है।

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