ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
जेठ जरै जग, चलै लुवारा
CATEGORY : शब्द 01-May-2018 06:22 PM 766
जेठ जरै जग, चलै लुवारा

ग्रीष्म का आगमन हो गया। ग्रीष्म शब्द - ग्रसु अदने (खाना, निगलना) और मक् प्रत्यय से व्युत्पन्न हुआ है। इस ऋतु में काल हमें निवाला बनाना चाहता है। कोई कारण पूछ सकता है, "भला ऐसा क्यों होता है?" इसका उत्तर है कि ग्रीष्म निदाघ काल है। निदाघ - नि (हमेशा), दह् (झुलसाना) और घञ् प्रत्यय - हमेशा झुलसाता है। मैथिली के किसी कवि ने लिखा, "आबि गेल कराल कालक सदृश गर्विल ग्रीष्म सजनी। करथि ताण्डव नृत्य, निर्मम भय विभाकर ग्रीष्म सजनी।" (हे सजनी! विकराल काल के समान गर्वीला ग्रीष्म आ गया। अब ग्रीष्म का सूरज निर्मम होकर तांडव नृत्य करेगा।) ग्रीष्म घर्म (उष्णता) की ऋतु है। यह ऋतु अपने साथ घमौरियाँ लाती है। अतएव घर्म और चर्म (ड्डड्ढद्धथ्र्) का सही ताल-मेल है। घर्म घम्र्मपयस् (पसीना या घाम) या घर्मोदक से हमको आकुल-व्याकुल करता है, अतएव हम सब त्राहि-त्राहि करते हुए घर्मान्त (वर्षा ऋतु) का इंतजार करते हैं।
रीतिकालीन कवि बिहारी को दग्ध करने वाला निदाघ भी भाता है, क्योंकि गर्मी से त्रस्त साँप और मयूर अथवा मृग और बाघ जैसे भक्ष्य और भक्षक इस समय साथ-साथ ऐसे रहते हैं, मानो निदाघ ने जगत को तपोभूमि में तब्दील कर दिया हो।
कहलाने एकत वसत, अहि-मयूर मृग-बाघ।
जगत तपोवन सों कियो, दीरघ दघ - निदाघ।।
भारत में दो महीना - ज्येष्ठ और आषाढ़ ग्रीष्मकाल है।
ज्येष्ठ शब्द की व्युत्पत्ति ज्या (क्षरण होना, वृद्ध होना) और इष्ठन् प्रत्यय है। इस कारण ज्येष्ठ कई अर्थों में प्रयुक्त होता है। अग्रज ज्येष्ठ भ्राता है। स्त्री के पति का बड़ा भाई जेठ (ज्येष्ठ) है। ज्येष्ठ सर्वश्रेष्ठ है। इन सबके पीछे "ज्या" का मतलब पहले बूढ़ा हो जाना है अथवा पहले क्षय को प्राप्त होना है। ज्येष्ठ भ्राता तो पहले वृद्ध होंगे, अतएव उनका अनुभव श्रेष्ठ होगा ही। इसीलिए ज्येष्ठ वचन को आदर प्राप्त होता है। अब जेठ बड़े हुए, तो जेठानी का रौब स्वाभाविक है; किन्तु जेठानी अपनी देवरानी को छोटी बहन का स्नेह भी दे, यही अपेक्षा रहती है।
"ज्या" का सम्बंध धनुष के चाप से भी है, अतएव वृत्त के चाप से जुड़ा एक त्रिकोणमितीय फलन "ज्या" है। यह ज्या अरबी में जीबा हो गया, फिर लैटिन में द्मत्दद्वद्म यानि वक्र और अंततः अंग्रेजी में द्मत्दड्ढ कहलाया।
यह सब ठीक है, किन्तु ग्रीष्म ऋतु के ज्येष्ठ का रिश्ता त्रिकोणमिति से ज़्यादा ज्यामिति से है। ज्यामिति के दो पद हैं - ज्या (क्रड्ढदृ) और मिति (मापन)। इस प्रकार ज्येष्ठ ज्या अर्थात् धरती माता का महीना है। सूरज जब तपता है, तब धरती जलती है। भारतीय किसानों की आस बँधती है। जेठ - आषाढ़ में धरती जितनी गरम होगी, सावन-भादौ में उतनी ही वर्षा करेंगे इंदर राजा।
जेठ की दुपहरी में धरती सर्वाधिक तपती-जलती है। दूर जाने वाले भूखे-प्यासे पथिक तनिक सुस्ताने के लिए परोपकारी वृक्षों की छाँव तलाशते फिरते हैं। पर देखिए त्रासदी - छाँव भी इस समय छाँव की तलाश करती है।
बैठि रही अति सघन बन, पैंठि सदन तन माँह।
देखि दोपहरी जेठ की, छाँहौ चाहति छाँह।।
मलिक मुहम्मद जायसी अपने काव्य "पद्मावत" में नागमती के विरह प्रसंग में जेठ का इस तरह वर्णन करते हैं -
जेठ जरै जग, चलै लुवारा। उठहिं बवंडर परहिं अँगारा।
जेठ में सारा जग जलता है और सर्वत्र लू और बवंडर का प्रकोप छाया रहता है। भारतीय ज्योतिष शास्त्र के अनुसार महीनों का नामकरण सम्बन्धित माह की पूर्णिमा तिथि के अंत में चन्द्रमा के निकटस्थ नक्षत्र के नाम के आधार पर किया जाता है। इस हिसाब से ज्येष्ठ का सम्बंध ज्येष्ठा नक्षत्र से है। ज्येष्ठा भचक्र का अठारहवाँ नक्षत्र है। इस नक्षत्र के तीन तारे छाते की आकृति बनाते हैं। जेठ की दुपहरी में छाता यानि आतपत्र ही आतप (धूप) से त्राण दिलाता है। वेद में "शुक्रश्च शुचिश्च ग्रैष्मावृतु" अर्थात् शुक्र और शुचि नामक दो माह ग्रीष्म होता है, ऐसा उल्लेख मिलता है। सम्भवतः शुक्र का सम्बन्ध ज्येष्ठ की अग्नि सदृश से है।
ग्रेगोरियन कैलेंडर के हिसाब से लगभग मई मध्य से लेकर जून मध्य तक ज्येष्ठ का विस्तार हो सकता है। मई का नामकरण रोमन देवी मैया (ग्ठ्ठत्ठ्ठ) के नाम पर हुआ है। मैया को एटलस और प्लेइओन की सात बेटियों - सप्त कृत्तिकाओं (घ्थ्ड्ढत्ठ्ठड्डड्ढद्म) में से एक समझा जाता है। इन सप्त कृत्तिकाओं के विषय में एक कथा आती है कि ये सातों बहनें शिकारी देवता ओरियन से बचने के लिए सात कबूतर बनकर आकाश में उड़ गईं और फिर कृत्तिका के सात तारों में बदल गईं। जो भी हो, आखिरकार मई का रिश्ता गर्मी से है और कृतिकाएँ भी अग्नि शिखाएँ ही हैं। तभी तो मैया (ग्ठ्ठत्ठ्ठ) या माजा (ग्ठ्ठत्र्ठ्ठ) को ज्वालामुखी के देवता वल्कन (ज्द्वथ्ड़द्वद) की पत्नी और धरती माता भी कहा गया। कुछ विद्वान मई की व्युत्पत्ति लैटिन के थ्र्ठ्ठत्र्द्वद्म या थ्र्ठ्ठत्द्वद्म थ्र्ड्ढदद्मत्द्म से कहते हैं और थ्र्ठ्ठत्र्द्वद्म या थ्र्ठ्ठत्द्वद्म का सहजात (ड़दृढ़दठ्ठद्यड्ढ) शब्द है - थ्र्ठ्ठढ़दद्वद्म यानि महान, बड़ा या ज्येष्ठ।
सनातन परम्परा के अनुसार ज्येष्ठ मास के तीन त्यौहार प्रमुख हैं - नारद जयंती, वट-सावित्री व्रत और गंगा दशहरा। नारद देवताओं के दूत कहे गए, जो तीनों लोकों में विचरण करते हैं। ध्यातव्य है कि "देवता" (दिव, प्रकाश तत्त्व) परमात्मा की क्रियात्मक शक्ति का नाम है। अगर "नारद" शब्द पर गौर करें, तो यह मेघ (नार, जल और द, देने वाला) का ही पर्याय है, इसलिए नारद मेघदूत को कहा गया। मैया का पुत्र मरकरी भी देवताओं का दूत ही है।
उत्तर भारत में जहाँ-जहाँ पूर्णिमांत मास मानते हैं, ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या को वट-सावित्री व्रत मनाया जाता है, जबकि अमांत मास मानने वालों के लिए ज्येष्ठ पूर्णिमा को यह त्यौहार पड़ता है। वट-सावित्री व्रत वृक्ष की महत्ता और दीर्घायु जीवन के बीच सम्बन्धों को रेखांकित करता है। गंगा का एक नाम ज्येष्ठा भी है, क्योंकि ये पार्वती की बड़ी बहन मानी गईं। ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को गंगा दशहरा का पावन त्यौहार मनाया जाता है। यह ग्रीष्म काल में पानी का महत्त्व उजागर करता है।
वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमः श्रेष्ठाय नमो रुद्राय
नमः कालाय नमः।

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