ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
जन्नत की हकीकत Next
दौड़ की दिशा
यह एक शाश्वत और सही मान्यता है कि गति कम है लेकिन दिशा सही है तो वांच्छित लक्ष्य की प्राप्ति थोड़ा विलंब से ही सही निश्चित है। इसका उदाहरण है वास्को-द-गामा द्वारा अफ्रीका का चक्कर लगाते हुए योरप से भारत पहुँचना। यदि ज्ञान हो और उस पर विश्वास हो तो ...
बंदूक की संस्कृति
वैसे तो जब संस्कृति के नाम पर "बंदूक-संस्कृति" शब्द तक को स्वीकृति मिल गई तो फिर शेष रह ही क्या गया? ऐसे में प्रदर्शन, आत्मप्रशंसा, झूठ, बड़बोलापन, लम्पटता, धोखा, जुमलेबाजी तो बहुत छोटी बातें हैं। ऐसे में भिक्षा, चोरी, डाका, देह-विक्रय, नकली माल बन...
कैसी सेवा - कैसा स्वास्थ्य
जिन लोगों का स्वास्थ्य बीमा नहीं है और जो गरीब भी हैं उनकी बड़ी दुर्गति है। जिनके पास स्वास्थ्य बीमा है उन्हें भी इलाज़ के कुल खर्च का बीस प्रतिशत देना होता है, शेष बीमा कंपनी देती है।विगत शताब्दी के अंतिम दशक के प्रारंभ (199...
लोक स्वयंभू होता है
बाग़, बगीचे एक योजनाबद्ध तरीके से, किसी उद्देश्य विशेष के लिए लगाए जाते हैं। उनकी सार-सँभाल और विशेष व्यवस्था करनी होती है। वे किसी कारणवश नष्ट भी हो सकते हैं लेकिन जंगल उगाए या लगाए नहीं जाते। वे स्वाभाविक रूप से बनते और जीवित रहते हैं, जंगलों में...
मुक्ति के पिंजरे
शिक्षा, चिकित्सा और न्याय ये तीन क्षेत्र ऐसे हैं जिनसे और जहाँ से समाज के स्वरूप, निर्माण और विकास की दिशाएँ तय होती हैं। ये किसी के पद, धन, वंश, नस्ल आदि के आधार पर नहीं बल्कि आवश्यकता और पात्रता के अनुसार काम करते हैं। दवा और इलाज़ मर्ज़ और मरीज़ क...
लोक मतलब सामूहिकता और समानता
सन् दो हजार में पहली बार अमरीका जाना हुआ। अमरीकी राज्य ज्योर्जिया की राजधानी अटलांटा की धरती पर पाँव रखते ही एक रोमांच-सा हुआ। 1965 में अमरीका में गोरे अमरीकियों के गुलाम रह चुके अफ़्रीकी मूल की नीग्रो नस्ल के कालों के लिए मानवाधिकारों की माँग करने...
देखणा सो भूलणा नहीं
जीव का मूल स्वभाव है जिज्ञासा। यह उसकी मूलभूत जैविक आवश्यकताओं के कारण भी हो सकती है और मानसिक व वैचारिक ज़रूरतों के तहत भी। यह जिज्ञासा ही जीव को घुमाती है, सिखाती है और भटकाती भी है। परिस्थितिवश यह भाव कम-ज्यादा होता रहता है। जब मानव घुमंतू था तब...
अतियों के बीच झूलता अमरीकी समाज
मूल रूप से अमरीकी समाज सनक की सीमा तक पहुंचा हुआ समाज है जिसकी अपनी कुंठाओं से मुक्ति नहीं हुई है। वैसे तो हर समाज की अपनी कुंठाएँ होती हैं और उसे उनसे मुक्त होते हुए अपने अस्त्तित्व पर खतरा लगता है। भले ही भारतीय दर्शन वैदिक काल में बहुत मुक्त और...
प्रवास के मंतव्य और मानसिकता
आदिमकाल में मनुष्य का कोई निश्चित स्थान नहीं था और राष्ट्र जैसी अवधारणा तो कतई नहीं थी। भोजन के लिए पशुओं का पीछा करता या पशुपालन युग में अपने पशुओं के लिए चरागाहों और पानी की तलाश में मनुष्य जाने किन-किन जाने-अनजाने स्थानों में भटकता रहा। पशुपालन...
भय का व्यवसाय
दवा कंपनियों से मिलकर डॉक्टर तरह-तरह की बीमारियों से डराते रहते हैं। स्वाइन फ्लू का डर भी इसी योजना का एक भाग था। अमरीका में भी स्वाइन फ्लू से ज्यादा लोग साधारण फ्लू से हर वर्ष मरते हैं। भारत में भी एड्स से ज्यादा लोग दस्त से मरते हैं।...
आदमी का विकल्प नहीं हो सकता
जीवित होने का प्रमाण-पत्र जमा करवाने लगभग नौ महीने बाद बैंक गया। कारण एक तो पास बुक भरने वाली थी दूसरे कई महीने की प्रविष्टियाँ बाकी थीं। देखा, बैंक में कई परिवर्तन हो गए हैं। नौ महीने कम नहीं होते। इतने अंतराल में एक नए सिस्टम ने जन्म ले लिया था।...
स्वच्छंदता के उपफल
आदमी समस्त सृष्टि पर तो नियंत्रण नहीं कर सकता लेकिन अपने समाज, परिवार और अपने संपर्क में आने वाले सभी मनुष्यों, पशु-पक्षियों और यहाँ तक कि प्रकृति के अवयवों और उपादानों से भी अपनी और अपने समाज की व्यवस्था के अनुसार एक विशिष्ट प्रकार के आचरण और व्य...
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