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जल-संकट से मुक्ति की ओर चीन
01-May-2016 12:00 AM 2245     

हवा के बाद जीवन में अगर सबसे अधिक महत्त्व किसी का है तो वह पानी का ही है। ¶ारीर के पांच तत्त्वों में से पृथ्वी के प¶चात् यही तत्त्व है, जिसे आसानी से देखा-जाना और समझा जा सकता है। जीवन को सुरक्षित रखने के लिए इसको ग्रहण करना ही ज़रूरी नहीं है बल्कि यह जानना भी ज़रूरी है कि यह जल कब पिया जाए और कैसा हो तब पिया जाए। कितना पिया जाए और कैसे पिया जाए। मेरे बचपन में जब मैं खड़े-खड़े पानी पी रहा था तो एक बुज़ुर्ग महिला ने समझाया था, "पानी बैठ कर पिया करो।' बाद में कहीं पढ़ा था कि खड़े होकर पानी पीने से वह जोड़ों में उतरकर गठिया का कारण बनता है। ऊपर के ¶लोक में यही तो समझाया गया है कि, अपच की औषधि है पानी, कमज़ोरी का बल भी यही पानी ही है। लेकिन यही पानी जो भोजनकाल में अमृत है, भोजन के ठीक बाद पीने पर ज़हर के तुल्य हो जाता है। इसीलिए वैद्य लोग भोजन के आधा घंटे बाद पानी पीने की सलाह देते हैं। पुराने समय में विद्वानों से लेकर आम जन तक पानी को लेकर बहुत सजग रहते थे। इसीलिए केवल संस्कृत में ही नहीं लोक भाषाओं तक में भी पानी को लेकर अनेक कहावते हैं, जिनमें से एक तो यही है कि "पानी पिए छानि के, गुरू करे जानि के।'
चीन में रहते हुए मैं उसके दुख-दर्दों और विकास से बड़ी आत्मीयता महसूस करने लगा हूँ. जिस विदे¶ाी वि¶ोषज्ञ आवास में रहता हूँ, वहां प्राय: बोतल बंद पानी पिया जाता है। यहाँ कई कंपनियां अपनी-अपनी ¶ाुद्धता के दावों साथ पानी की आपूर्ति करती हैं। सबके भाव भी अलग-अलग हैं। बीस लीटर की बोतल सत्तर रुपए से लेकर एक सौ नब्बे तक की है। यानी ¶ाुद्ध पानी इतना मंहगा हो चला है कि गरीब के बस नहीं है। इतना मंहगा पानी फिर भी इसकी ¶ाुद्धता की कोई गारंटी नहीं है। लोग जितना मंहगा उतना ¶ाुद्ध के वि·ाास पर खरीद रहे हैं। मेरे कुछ मित्र पहाड़ पर जल लेने जाते हैं तो मैं भी चला जाता हूँ। यह मानकर कि वहाँ कोई फैक्ट्री नहीं है तो ऊपर का जल प्रदूषित नहीं होगा। मैं ही नहीं रोज़ सुबह सैकड़ों लोग इसी जल के लिए पहाड़ पर जाते हैं। वहाँ से बीस-बीस, तीस-तीस लीटर पानी लाते हैं। इसका सीधा-सा अर्थ है कि यहाँ भी आमजन का भू-जल पर अब उतना वि·ाास नहीं रहा है।
चीन की प्राचीन सभ्यता भी सिंधु घाटी की जल संस्कृति की तरह जल केंद्रित ही है। ऊंचाई वाले इलाकों और दो प्रमुख नदियों, छड़ी और चांग की बाढ़ का खतरा इन घाटियों में सिंचित क्षेत्रों के बीच जीवन और जीवन के साथ-साथ उसके संकट के रूप में भी विकसित हुआ। पानी के नियंत्रण की यह समस्या चीन की आधुनिक नहीं प्राचीन समस्या रही है। इतिहास में भी उत्तर के आक्रमण और यही पानी की समस्या चीन की चिंता और उसके चिंतन के भी केंद्रीय विषय रहे हैं।
 चीन की आबादी लगभग 1.4 अरब है। इनमें से आधी आबादी ¶ाहरी है। अनुमान है कि सन् 2020 तक चीन की राष्ट्रीय जल खपत 630 अरब घन मीटर हो जाएगी। चीन को तेजी से पानी की विकट कमी का सामना करना पड़ रहा है। पानी की बढ़ती खपत को पूरा करने के लिए अपर्याप्त जल संसाधनों के साथ, सतह जल और भूजल के अति दोहन से पहले ही उत्तरी और पूर्वी चीन के कई क्षेत्रों में पानी की कमी की गंभीर समस्या सामने आ चुकी है। चीन में पानी की कमी पर सन् 2009 की वि·ा बैंक की रिपोर्ट में पता चला था कि उपलब्ध नदी और भू जल का केवल 45 प्रति¶ात ही फसलों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। सबसे अधिक जल तो उद्योगों में उपयोग किया जाता है। वहाँ रीसाइÏक्लग सही ढंग से होती तो जल संकट इतना नहीं गहराता। नई सदी के पहले द¶ाक तक उद्योग के लिए पानी की रीसाइÏक्लग दर केवल 24 प्रति¶ात थी जो विकसित दे¶ाों (85 से 75 प्रति¶ात) का केवल 40 प्रति¶ात है। फार्मास्यूटिकल्स, कीटना¶ाक, उर्वरक, प्लास्टिक आदि उद्योग ऐसे अगस्त्य हैं जो समुद्र के समुद्र पचा सकते हैं। एक अध्ययन के मुताबिक सन् 2020 तक अकेले कोयला क्षेत्र ही चीन के कुल पानी की खपत का 27 प्रति¶ात पी जाने के लिए जिम्मेदार होगा। इस अतिरिक्त पानी की सबसे अधिक ज़रूरत पहले ही जल संकट के ¶िाकार झिंजियांग, इनर मंगोलिया, ¶ाांक्सी और निंग्¶िाया के ¶ाुष्क उत्तरी और प¶िचमी प्रांत होंगे, जहां चीन के वि¶ााल कोयला भंडार हैं।
भारत की भांति चीन भी जल संसाधन के अनाव¶यक दोहन और रासायनिक प्रदूषण के कारण गंभीर पर्यावरणीय परिणाम भुगत रहा है। जैसे, जमीन का घटाव, जमीन में खारापन की उपस्थिति से पारिस्थितिकी तंत्र ही बिगड़ गया है। पानी की कमी और जल की गुणवत्ता में आई गिरावट एक-दूसरे के साथ मिलकर संकट को और अधिक खतरनाक बनाए दे रहे हैं।
चीन ने न केवल अपने जल संकट को जान लिया है बल्कि उससे निपटने की योजनाएं और परियोजनाएं भी बना ली हैं। उन पर ईमानदारी से काम भी चालू है। 62 अरब डॉलर की पानी मोड़ परियोजना (च्ग़्ज़्क़्घ्), जल क्षेत्र की सबसे बड़ी ऐसी परियोजना है, जिसका संपूर्ण निर्माण कार्य सन् 2050 में पूरा होगा। यह यांग्त्ज़ी, पीली और हैख नदियों को जोड़ने का काम करेगा। इससे ¶ाुष्क पड़ते जा रहे उत्तर में दक्षिणी नदियों से पानी की वार्षिक 44.8 अरब घन मीटर की खपत होगी। च्ग़्ज़्क़्घ् परियोजना तीन मार्गों से संपन्न की जा रही है। पूर्वी मार्ग, दिसंबर 2002 में ¶ाुरू हो गया है। इससे यांग्त्ज़ी से वार्षिक पानी का कम से कम 14.8 अरब घन मीटर हस्तांतरण होगा। बीजिंग नहर के माध्यम से 1800 किलोमीटर लंबाई वाले हांग्जो, ¶ांघाई, ¶ांघाई, ¶ोडोंग और हेबेई प्रांतों को और तियानजिन ¶ाहर के माध्यम से जोड़ा जाएगा। यह केंद्रीय मार्ग, दिसंबर 2003 में ¶ाुरू हो गया था जो लगभग पूरा हो गया है। अकेले गुरुत्वाकर्षण पर काम करने वाले प्रोजेक्ट और बीजिंग, तियानजिन हान नदी पर स्थापित तांचियांकऊ जला¶ाय (एक यांग्त्ज़ी सहायक नदी) की मह्त्त्वाकांक्षी योजना से हर साल 13 अरब घन मीटर पानी की आपूर्ति की जा सकेगी। बीजिंग जैसे बड़े ¶ाहरों के नए भवनों में वर्षा-जल के संरक्षण हेतु पाइप लाइन प्रणाली ¶ाुरू की गई है कि कपड़े धोने और ¶ाौचालय निस्तारण के लिए जल उपलब्धता बनी रहे।
जल संकट से निपटने के लिए चीन ने बड़ी गंभीरता से काम ¶ाुरू किया है। इस गंभीरता को देखते हुए ही वि·ा बैंक ने अपने सर्वेक्षण में चीन के जल प्रबंधन के प्रति आ¶ााजनक दृष्टिकोण अपनाया है। उसने निर्धारित लक्ष्य को समय पर पूरा कर लेने की चीनी क्षमता में पूरा वि·ाास व्यक्त किया है और लिखा है कि, "चीन, जिसने आर्थिक सुधारों के अपने सफल कार्यक्रम में अपार अभिनव क्षमता का प्रदर्¶ान किया है और संस्थागत और नीतिगत ढांचे में अपूर्व सफलता पाई है। यह दे¶ा जल संसाधन प्रबंधन में भी वि·ा नेता बनने की ओर अग्रसर है। इसके लिए वह अपनी नीतियो में सुधार करते हुए कोई बड़ा साहसिक कदम उठा सकता है।'
कठिन चुनौतियों के बावजूद, दे¶ा में व्याप्त जल संकट को चीन ने जिस गंभीरता से लिया है और कु¶ाल प्रबंधन किया है, उससे लगता है कि यह जल संकट अभी भले ही अपने लक्ष्य वर्ष 2020 तक पूरी तरह से दूर करना दूर की कौड़ी लगता हो पर यह कर्मठ दे¶ा जिस निष्ठा से लगा है, कुछ असंभव भी नहीं लगता।
 चीन तो जाग गया है। यहाँ के नालों का पानी भी उपचारित करके ही छोड़ा जा रहा है। जिस ¶ाहर में मैं हूँ उसका नाम है क्वांग्चौ। यहाँ की पर्ल नदी का पानी ¶ाी¶ो-सा साफ है। उसके पानी में मुंह देख सकना कोई अति¶ायोक्ति नहीं है। सच में उसमें लोगों को चांदनी रातों में नौका विहार का आनंद लेते और अपना मुंह देख-देख कर खु¶ा होते हुए देखा जा सकता है। एक-दूसरे पर पानी उछालती हुई जोड़ियों को देखकर तो मन कुहक ही उठता है कि वह दिन कब आएगा जब हमारे दे¶ा की नदियों में भी इसी उछाह से नौका विहार करती हुई जोड़ियां देखने को मिलेंगी।

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