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जबकि जीवन इसकी इजाज़त नहीं देता था
01-Nov-2017 02:43 PM 2033     

2008 के दिनों में रहते हुए कुछ शब्द: कुछ नोट्स

- एक -
कई बार कोई तुम्हारी सहायता नहीं कर पाता। न स्मृति, न भविष्य की कल्पना और न ही खिड़की से दिखता दृश्य। न बारिश और न ही तारों भरी रात। न कविता, न कोई मनुष्य और न ही कामोद्दीपन।
संगीत से तुम कुछ आशा करते हो लेकिन थोड़ी देर में वह भी व्यर्थ हो जाता है।
शायद इसी स्थिति को सच्ची असहायता कहा जा सकता है।
- दो -
रात के आकाश को देखकर, रात में तारों की गतिविधियाँ देखकर मुझे मनुष्य होने की लघुता और महत्ता के बारे में एक साथ स्मरण होता है। यदि कई दिनों तक चाँद, तारे और रात के आसमान को न देखूँ तो मैं संकुचित दिमाग का होने लगता हूँ।
बड़े होते शहरों में शायद इसलिए ही खुद पर गर्वीले लेकिन संकुचित दिमागवाले लोगों की बहुतायत होती चली जाती है। उनकी आपाधापी और होड़ आपस में बनी रहती है। पेड़ों, तारों, पहाड़ों, धाराओं और चंद्रमा से, कुल प्रकृति से उनकी क्रिया-प्रतिक्रिया खत्म होती जाती है और वे निरी भीड़ का ही हिस्सा होते चले जाते हैं। काफी हद तक उजड़े हुए से और रूखे।
मैं भी इधर उजड़ सा गया हूँ।
रूखा हो गया हूँ।
- तीन -
मैं एक शब्द भूला हुआ था। मुझे याद नहीं आता था कि वह कौन-सा शब्द था। वह रोजमर्रा का ही कोई शब्द था। आज सोने जाते समय, रात एक बजे वह अचानक कौंधा- "विषाद"। हाँ, यही वह शब्द था जिसे मैं, अचरज है, कि किसी अविश्वसनीय बात की तरह, न जाने क्यों कुछ समय से भूला हुआ था। जबकि जीवन इसकी इजाज़त नहीं देता था।
- चार -
आखिर मैं इतना ऊब गया कि मैंने मोबाईल उठाकर फोन लगाना शुरू कर दिया। करीब दस-बारह लोगों को मैंने फोन लगाये। इस तरह तीन घंटे बीत गये।
ऊब भी क्या चीज है!
- पाँच -
जहाँ अनिश्चय, प्रेम, कामना, स्वप्न और अवसाद से भरी पंक्तियाँ किसी आशा और व्यग्रता में छटपटाती हैं, जो अपने ही निष्फल क्रोध और जर्जरता में बार-बार उमगती हैं, जो अपनी सांद्रता और विरलता में सघन अनुभूति देती हैं, जिनकी कोई परिभाषा देना और रेखाचित्र बनाना संभव नहीं। जिनके बारे में यह सब लिखकर सोचना-कहना भी लगभग व्यर्थ है। उन कविताओं से मेरा सहज संबंध बन जाता है। और कई बार महज कुछ काव्य पंक्तियों से ही।
- छह -
कई बार मैं उन संबंधों के करीब फिर जाना चाहता हूँ जो मुझसे छूट गये हैं या दूर हो गये हैं। कुछ प्रयास करते हुए मैं उन्हें शायद फिर से पा सकता हूँ ताकि मेरे जीवन में, मेरी प्रेरणा में कुछ रिक्तता आ गई है तो उसे फिर से भर सकूँ। पुनः प्राणवान हो सकूँ।
फिर लगता है कि उन्हें खो देना ही अधिक प्राकृतिक और जीवन के लिए स्वस्थ लक्षण है। सप्रयास संबंधों में पुनस्र्थापना संभव नहीं। जैसे उन्हें खोकर ही शेष जीवन संभव है। जैसा भी हो। उन्हें खो देना ही नियति है।
उन्हें पाने की कोशिश यूटोपिया है।
यह किसी दूर टिमटिमाते तारे को पाने की कोशिश है जो खुली जगह की रात में सिर उठाते ही दिखा था और बस जरा सी देर में डूब गया। वह अब मेरी इस जमीन से, मेरे भूगोल से मुझे इस पूरी रात के जीवन में नहीं दिखेगा।
- सात -
मुश्किल और आशा का गहरा संबंध है। जब आप कठिनाई या संकट में नहीं होते तो आशा की कोई जरूरत नहीं पड़ती। जैसे ही कोई मुश्किल, विपदा, अवसाद या असंतोष पैदा होता है, आशा अपना काम करना शुरू कर देती है।
- आठ -
एक पत्रिका में एक कविता छपी है। और कविता के शब्दों से भी ज्यादा बड़ी कवि की भूमिका। जैसे कवि द्वारा कुंजी भी साथ में छापी गई है।
सोच रहा हूँ कि कविता को इस तरह कैसे ग्रहण किया जा सकता है!
- नौ -
अर्नेस्ट हेमिंग्वे ने, जो बीमारी की वजह से नोबेल पुरस्कार लेने स्वयं उपस्थित न हो सके थे, अपने संक्षिप्त धन्यवाद भाषण में लिख भेजा था : "कोई भी लेखक जो ऐसे अनेक महान लेखकों को जानता हो, जिन्हें यह पुरस्कार नहीं मिल सका, इस पुरस्कार को केवल दीनता के साथ ही स्वीकार कर सकता है। ऐसे लेखकों की सूची देने की आवश्यकता नहीं है। यहाँ प्रत्येक आदमी अपने ज्ञान और अंतर्विवेक से अपनी सूची बना सकता है।"
यह आत्म परीक्षण, लघुता भाव और विनम्रता हर भाषा के पुरस्कार प्राप्तकर्ताओं में देखी जाना चाहिए क्योंकि प्रत्येक समय, हर भाषा के महत्वपूर्ण पुरस्कारों में, ऐसे श्रेष्ठ लेखकों की सूची किसी कोने में पड़ी हो सकती है, जिन्हें वे पुरस्कार कबके मिल जाने चाहिए थे। लेकिन हिंदी में हम देख सकते हैं कि जो पुरस्कार लेते हैं उनमें ढीठता और अहमन्यता ही कहीं अधिक प्रकट होती है।
दीनता की जगह गहरा संतोष।
- दस -
मेरे आसपास ऐसे लोग ही ज्यादातर हैं जिन्हें कविता प्रसन्न नहीं बनाती। कविता उन्हें अनावश्यक ही नहीं, व्यर्थ भी लगती है। वे उसे सहन नहीं कर सकते। वे किसी भी कलारूप को सहन नहीं कर सकते। मुझे अहसास है कि मैं इन्हीं सब लोगों की घोर उपस्थिति के बीच कुछ लिखने की कोशिश करता रहता हूँ। यह चुनौती है जिसे प्रेरणा की तरह भी लेना पड़ता है।
- ग्यारह -
सोचकर कुछ हद तक अचरज हो सकता है कि मनुष्य की सभ्यता यात्रा में आविष्कृत कुछ आविष्कार ऐसे हैं, जो आज भी अपने आपमें न केवल अत्यंत उपयोगी हैं, बल्कि जिनका ठीक-ठीक विकल्प भी नहीं बन सका है। खासतौर पर उनमें लगनेवाली ऊर्जा, उपयोगिता एवं धन के अनुपात में उनका कोई भी विकल्प असुविधाजनक और महँगा है। आमजन को सहज ग्राह्य और प्राप्य भी नहीं है। कुछ चीजें याद कर सकते हैं, जैसे ः झाड़ू, छाता, चश्मा, मच्छरदानी, झोला, तवा, बेलन, चिमटा, दरी, रस्सी, घड़ा, डंडा।
- बारह -
क्या संसार में कोई ऐसा भी है जो रेल्वे प्लेटफॉर्म पर खड़ा हो और छूटती हुई रेल जिसे उदास न करती हो? प्लेटफॉर्म के ठीक बाहर खड़ा पेड़, जो उसे फिर कुछ याद न दिलाता हो? क्या? क्या??
दिमाग पर जोरे डालकर कुछ सोचना न पड़ता हो।
- तेरह -
रात मेरी रक्षा के लिए ही आती है।
सब तरफ शांति फैल रही है। अब मेरे सामने विशाल मैदान है। इस रात को मैं द्वीप की तरह, उम्मीद की तरह देखता हूँ जिसमें मेरे कुछ करते रहने, लिखते-पढ़ते रहने की गुंजाइश है, अवकाश है। इस रात्रि-प्रेम ने मुझसे मेरी सुबहें छीन ली हैं, यह दुख मनाया जा सकता है लेकिन इस रात की विशाल जगह ने मुझे कितना कुछ उपलब्ध कराया है। यह बात तारों का एकांत जानता है, गली में जलती रोशनियाँ और टुकड़े-टुकड़े होता चाँद।
ऑफिस से लौटता हूँ। फूहड़ताएँ और थकान साथ में लौटती है। शाम से ही कई बार अगले दिन की नीरसता और थकान दिखने लगती है। अभी कुछ देर पहले एक फाइल से, एक रिटर्न से उलझ रहा था और अब कविता पढ़ रहा हूँ या कुछ लिखने की कोशिश है। बड़ा घालमेल हो जाता है।
लेकिन यह सुख है कि अभी यह चढ़ती हुई रात है।

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