ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
जब कोलाहल नहीं होगा
01-May-2016 12:00 AM 1787     

प्रातः का स्वर्णिम विहान हो
उड़ान भरते हों पाखी
या सुरमई साँझ हो
विश्रांति हेतु स्वप्न-सा लिए
नीड़ को लौटते हों पाखी
कलरव तब ही सुन पाओगे
जब कोलाहल नहीं होगा।

कभी कोलाहल में भी
एकल होता है मन
तो कभी
दो ¶ाब्द के ¶ाोर में ही
बीत जाता है सकल जीवन।

चहल पहल दुनिया है
नाद से अंतरनाद की यात्रा
आसान भी तो नहीं
कोलाहल से एकल की यात्रा
आसान तो नहीं।

सृष्टि का कलरव सुनना हो तो
एकांतप्रिय होना होगा
साधना एकल यात्रा ही है
कबीर की सुनो और साधो स्वयं को
तभी कलरव सुन पाओगे,
जब कोलाहल नहीं होगा।



अनुभूति

सहेज लें
एक अनुभूति
भोर सी सुदीप्त
खिलते हुए रंगों-सी
सुरम्य
बिखरी हुई खु¶ाबू-सी
सुरभिमय
बहते हुए भावों-सी
सुगम्य सौष्ठव
झरते हुए अमृत-सी
सुलक्षण
नाद ब्राहृ-सी
सुमधुर
किसी एक क्षण-सी
सुमंगल।

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