ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
जापान में प्रवासी भारतीय
01-Jan-2016 12:00 AM 3529     

दिसंबर 2014 के आंकड़े के अनुसार जापान में 24 हजार 524 प्रवासी भारतीय रहते हैं। 2005 में जापान में प्रवासी विदेशियों की संख्या जापान की जनसंख्या का 1.6 प्र.श. था। उसमें भारतीयों की संख्या 16 हजार 988 थी। यह जापान में प्रवासी विदेशियों का मात्र 0.8 प्र.श. था। लेकिन 1990 से 2005 के बीच जापान में प्रवासी भारतीयों की संख्या 5.5 गुण बढ़ गई और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में काम करने वालों की संख्या अधिक हो जाना एक विशेषता थी। जापान में प्रवासी भारतीयों के दो समुदाय पाए जाते हैं। जापान में राष्ट्रीय अलगाव का लंबा इतिहास था, जब 1854 में देश खुला, तब से व्यापारिक केंद्र के रूप में बन्दरगाह शहरों का विकास हुआ। ह्रोगो जिले के कोबे शहर और कानागावा शहर के योकोहामा शहर महत्वपूर्ण केंद्र बने। उन दो शहरों में भारतीय व्यापारी रहने लगे। परंतु 1923 में कनतो इलाके में महाभूकंप आया और योकोहामा शहर के बहुत प्रभावित होने के कारण वहाँ के भारतीय व्यापारी कोबे में चले गए। उसके बाद कोबे शहर प्रवासी भारतीयों का केंद्र बन गया। सिंधी लोग कपड़ों का व्यापार करते थे। पंजाबी विविध वस्तुओं एवं ऑटो पाट्र्स का और गुजराती मोती का व्यापार करने में मशहूर थे। आज कोबे शहर के कई प्रवासियों ने जापानी नागरिकता ले ली है और आज वहाँ तीसरी एवं चौथी पीढ़ी के प्रवासी भारतीय रहते हैं। इस प्रवासी समुदाय में राष्ट्रीयता के आधार पर नहीं, बल्कि धर्म अथवा जाति के आधार पर लोग स्थानीय संबंध बनाते हैं। 1935 में भारतीय मुसलमानों ने कोबे में पहली बार मस्जिद का निर्माण किया। आज वहाँ हिन्दू मंदिर, जैन मंदिर, भारतीय भोजन सामग्री की दुकानें, भारतीय भोजनालय आदि पाए जाते हैं । तोक्यो में 1985 से प्रवासी भारतीय के दूसरे समुदाय का विकास हुआ। 1990 में उसकी संख्या कोबे से ज्यादा हो गई। तोक्यो के प्रवासी भारतीयों का कामकाज कोबे वाले से अलग है जो कि अधिकांशत: आई.टी. तकनीशन हैं। उसके अतिरिक्त बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बिजनेसमैन, भारतीय भोजनालयों का मालिक और रसोइये, कारखानों के श्रमिक आदि पाए जाते हैं। 1990 में आई.टी. तकनीशन अकेले ही अपने देश से जापान आते थे, लेकिन 2005 तक आते-आते उसके पत्नी और बच्चे भी जापान में साथ आने लगे। इसलिए बच्चों और महिलाओं की संख्या भी बढ़ गई। यद्यपि इस समुदाय में भी धर्म, भाषा, प्रदेश आदि के आधार पर लोगों के बीच स्थानीय संबंध होते हैं, लेकिन अधिकांश लोग राष्ट्रीयता के आधार पर स्थानीय संबंध बनाते हैं, क्योंकि इस समुदाय के लोग दो-तीन साल बाद वापस स्वदेश चले जाते हैं। कोबे समुदाय के लोगों की तुलना में ये कम समय जापान में रहते हैं। तोक्यो में भारतीय प्रवासियों की संख्या बढ़ने के कारण उनकी आवश्यकता के अनुसार भारतीय स्कूल का भी निर्माण हुआ। सबसे पहले 2004 में तोक्यो के कोतो इलाके में "इंडिया इंटरनेशनल स्कूल इन जापान' की स्थापना हुई। उसके बाद 2006 में तोक्यो के एदोगावा इलाके में "ग्रोबल इंडयिन इंटरनेशनल स्कूल' की स्थापना हुई। 2008 में योकोहामा में "इंडिया इंटरनेशनल स्कूल इन जापान' की स्थापना हुई। इन स्कूलों में भारतीय सरकार द्वारा प्रोत्साहित शिक्षा प्रणाली अपनाई गई है, ताकि भारत वापस जाने के बाद आई.टी. तकनीशन के बच्चों को पढ़ाई में कोई कठिनाई न हो। शाकाहारी प्रवासी भारतीयों को जापान में कुछ अलग समस्या का सामना करना पड़ता है, क्योंकि उनको जापानी भाषा नहीं आती, इसलिए जापानी लोगों को यह ठीक से नहीं बता पाते कि उनको शाकाहारी होने के नाते किस प्रकार की विशेष ज़रूरतें होती हैं। दूसरी ओर जापान में शाकाहार के प्रति लोगों की जो मान्यता है वह भारत के शाकाहार की संस्कृति से काफी अलग है। जापान में माना जाता है कि जो मांस नहीं खाता वह शाकाहारी है और जो मांस खाता है वह शाकाहारी नहीं है। अगर कोई शाकाहारी प्रवासी भारतीय यह कहने लगे कि वह बर्गर शॉप का पोटैटो फ्राई खा सकता है क्योंकि वह बेजीटबल तेल से तला गया है परंतु ऐसा बर्गर शॉप जो सुअर की चर्बी से तला हुआ है - नहीं खा सकता तो यह बात जापानी लोगों की समझ से बाहर हो जाती है। आपनी इस मुसीबत को समझाने के लिए आपको अच्छी जापानी आनी चाहिए। यद्यपि आपको अच्छी अंग्रेज़ी आती हो तो इससे बहुत ज्यादा फायदा नहीं मिलता, क्योंकि आम जापानी नागरिकों को शायद ही अंग्रेज़ी आती हो। भारत के बाज़ार में प्रचलित सभी सामग्रियों पर हरे और लाल रंग के साथ यह स्पष्ट संकेत किया जाता है कि कौन-सी सामग्री शाकाहारी के लिए उपयुक्त है और कौन-सी मांसाहारी के लिए। परंतु यह प्रणाली जापान के मार्केट में प्रचलित नहीं है और सभी सामग्री के लेबलिंग भी जापानी भाषा में ही प्रदर्शित हैं, इसलिए शाकाहारी प्रवासी भारतीय यह पता नहीं कर सकते कि दुकान में बेची गई सामग्रियों में से वे क्या खा सकते हैं और क्या नहीं। जापानी रेस्तरां में भी वही हाल है तो शाकाहारी प्रवासी के लिए जापानी दोस्तों की सहायता के बिना बाहर का खाना खाना लगभग असंभव हो जाता है। रेस्तरां में जाना है तो सिर्फ भारतीय भोजन का रेस्तरां ही उनके लिए सुविधाजनक रह जाता है। इसी वजह से उन लोगों को जापानी भोजन को खाने की बहुत कम अवसर मिल पाते हैं। कुछ शाकाहारी प्रवासियों का कहना है कि जापान में वैसे तो हर चीज महंगी होती है, पर सब्जी का दाम विशेषकर महंगा लगता है। उपर्युक्त प्रवासी भारतीयों के अतिरिक्त जापान के वि?ाविद्यालयों में शिक्षक रूप में रहने वाले भारतीयों का भी महत्वपूर्ण स्थान है, यद्यपि उनकी संख्या अधिक नहीं है। जापान और भारतीय भाषा का संबंध लगभग 100 साल पुराना है। जापान में सबसे पहले हिंदुस्तानी भाषा और तमिल भाषा की पढ़ाई तोक्यो यूनिवर्सिटी ऑफ फोरीन स्टडीस में शुरू हुई, वहाँ 1908 से कई भारतीय शिक्षक अध्यापन करते रहे। उसके बाद "ओसाका यूनिवर्सिटी ऑफ फोरीन स्टडीस' में 1921 से हिंदुस्तानी की पढ़ाई शुरू हुई। 1969 से तकुशोकु वि?ाविद्यालय, तोक्यो में संध्याकालीन पाठ¬क्रम के रूप में हिन्दी की पढ़ाई शुरू हुई। दाइतो बुंका यूनिवर्सिटी, साइतामा में भी हिन्दी का शिक्षण 1986 से शुरू हुआ। काका साहब कालेलकर के विशेष शिष्य श्री नरेश मंत्री ने यहाँ नौ वर्ष तक अध्यापन किया। एशिया अफ्रीका भाषा विद्यापीठ, तोक्यो में 1962 से हिन्दी की पढ़ाई शुरू हुई, यहाँ श्री नरेश मंत्री ने कई सालों तक अध्यापन किया। एन.एच.के. (जापान ब्राोडकाÏस्टग कॉपरेशन) के रेडियो जापान प्रोग्राम पर 1940 से हिन्दी भाषा का प्रसारण आरंभ हुआ और आज भी यह जारी है। इन तमाम संस्थानों में प्रवासियों के रूप में भारतीय शिक्षकों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

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