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क्या जनसंख्या समस्या है?
01-Mar-2018 02:10 PM 2635     

जनसंख्या नीति को बदलकर दो बच्चों तक सीमित करने के लिए एक संसद सदस्य ने लोकसभा में निजी विधेयक पेश किया है। दो से ज्यादा बच्चों के अभिभावकों पर चुनाव आदि सुविधाओं पर तुरंत प्रतिबन्ध लगाने की मांग भी की है। इसके समर्थन में उन्होंने पश्चिमी उत्तरप्रदेश की जिलों के आंकड़े भी सामने रखे हैं और तुरंत सरकार से कानून बनाने की मांग की है। असम समेत कई अन्य राज्य भी ऐसी मांग लगातार करते आ रहे हैं लेकिन पता नहीं किन कारणों से सरकार इस मुद्दे से बचती आ रही है।
हमारे स्कूल के दिनों से लेकर आज तक कुछ निबन्ध लगातार लिखे जा रहे हैं। जैसे भारत में जनसँख्या की समस्या। मगर उसे हल करने से जैसे हर सत्ता बचती रहती है मानो यह ख़त्म हो गयी तो फिर बच्चे स्कूल में क्या लिखेंगे और पढेंगे। कभी हम सन 2050 तक आबादी में चीन को पीछे छोड़ने की बात करते थे, फिर 2035 तक और अब यह तारीख और नजदीक आ रही है। इसके दुष्परिणामों की भविष्यवाणियाँ किसी को भी चिंता में डाल सकती हैं। पिछले पन्द्रह वर्षों में हमारी जनसँख्या में पूरे अमेरिका की आबादी से ज्यादा जुड़ी है। ये सभी आने वाले वर्षों में रोटी रोजी मांगेंगे और रोजगार अगले दस वर्ष में आधे होने का अनुमान है। तो क्या होगा देश का? अभी भी करोड़ों सड़कों पर हैं रोजगार की तलाश में।
हम जनसंख्या जैसी दानवी समस्या से लगातार बच रहे है। जहां चीन, कोरिया और दूसरे देशों ने चालीस साल पहले ही कदम उठाये और विकास की रफ़्तार पकड़ ली। हमारी कोताही का अंजाम पूरा देश भुगत रहा है। गांव, शहर, महानगर, अस्पताल, मेट्रो, रेल सड़क, स्कूल हर जगह आदमी के ऊपर आदमी। कहाँ है इतने संशाधन? विकास की हर योजना पर पानी फेर दिया जनसँख्या के इस बोझ ने। क्या कभी इस मुद्दे पर संसद से लेकर जन्तर मन्तर तक कोई सार्थक बहस हुई? दिल्ली में पिछले कुछ बरसों से प्रदूषण, कानून व्यवस्था से लेकर पानी, स्कूल आदि सभी के पीछे क्या जनसँख्या सबसे बड़ी गुनाहगार नहीं है?
दिल्ली जैसे महानगरों की असली समस्या भी तेजी से बढ़ती जनसंख्या है जिसे वोट बैंक के राजनीतिक कारणों से हर कोई सीधे-सीधे कहने में डरता है। सरकार के आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली में उत्तर प्रदेश, बिहार की लगभग सत्तर प्रतिशत आबादी है शेष हरियाणा, राजस्थान, पंजाब आदि की। एक राष्ट्रीय अखबार की खबरों के अनुसार दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के जिले गाजियाबाद, बुलंदशहर, अलीगढ़, मेरठ, सहारनपुर की लगभग 50 प्रतिशत आबादी पलायन कर दिल्ली पहुंच चुकी है। और तो और दूरस्थ बिहार राज्य के मिथिला अंचल और दूसरे जिलों से भी पलायन का यही प्रतिशत है। शेष जिलों से लगभग 30 प्रतिशत। दिल्ली और नजदीक होने और भाषायी कारणों से इन पलायनों की बेहतर शरण स्थली है। वर्ष 2006 से 2013 के सर्वेक्षणों में बिहार से पलायन की रफ्तार कुछ धीमी जरूर हुई थी और उन्हीं वर्षों में पश्चिमी बंगाल राज्य को छोड़कर जाने वाले बिहार के मुकाबले ज्यादा थे। लेकिन देश के गांंवों में रोजगार, सुविधाओं के अभाव में संकट महानगरों में रोजगार के अवसर, सुविधाओं के केन्द्रीमकरण का ज्यादा है।
दिल्ली में प्रदूषण की समस्या पर ध्यान तो कहीं अंतर्राष्ट्रीय दखल, कारणों और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल जैसी संस्थाओं के दबाव से सामने आया है लेकिन इसकी जड़े हैं वहीं विकराल आबादी में। सन अस्सी तक दिल्ली पहुंचने की रफ्तार इतनी बड़ी नहीं थी। 1984 में पंजाब समस्या से पहली बार दिल्ली में आबादी अप्रत्याशित रूप से बड़ी। पंजाब से पलायन करने वाले हिन्दु नागरिक भी और जो बिहार, उत्तर प्रदेश के मजदूर भी पंजाब जाते थे वे भी दिल्ली ठहर गये।
उदारीकरण के बाद कुछ केन्द्रीय नीतियों और उससे ज्यादा उत्तर प्रदेश, बिहार राज्यों के विकास की धीमी गति के चलते यह पलायन आज तक अबाध गति से जारी है।
जब मोबाइल को चार्ज करने के लिए भी गांंवों से कस्बों या नगरों की तरफ आना पड़े। दुनिया भर में बिजली की खपत प्रति इन राज्यों में सबसे कम है। बिजली खपत विकास के नवीन मानकों में शामिल हैं। हर काम के लिए चाहिए बिजली, टयूबवैल, कारखाने से लेकर अस्पताल, स्कूल, खलिहान तक। अलीगढ़ से दिल्ली आयी एक सात वर्षीय बच्ची लौटकर अलीगढ़ इसलिए नहीं जाना चाहती थी कि दिल्ली में पंखा तो भी चलता है जो अलीगढ़ में बिजली न आने के कारण नहीं चलता। बच्चे कैसे रहें इन गांवों में। किसान रात के दो बजे खलिहानों से गेंहू निकालते हैं क्योंकि उसी वक्त बिजली मिल पाती है। कारखाने खुले लेकिन बिजली आती नहीं और मूल सुविधाओं के अभाव में बंद होते गये। फिर जिन राज्यों की जनसंख्या भी गरीबी, अशिक्षा के चलते इतनी तेजी से बढ़ रही हो वे जायेंगे कहां? खेती के लिए जमीन उपजाऊ है, अंग्रेजों की बनाई नहरी व्यवस्था के चलते सिंचाई, पानी की भी कमी नहीं है। लेकिन इतनी छोटी जोत हो चुकी है कि बड़े संयुक्त परिवारों का पालन खेती से संभव ही नहीं रहा। कल, कारखाने नहीं हैं, जो थे वे भी उजड़ रहे हैं। किसी वक्त कानपुर कितना बड़ा औद्योगिक नगर था लेकिन आज वही दुनिया का सबसे प्रदूषित, गंदा शहर जाना जाता है। न सूती मिल बची, न दूसरे काम। ले देकर चमड़े के कारखाने कुछ सांस ले रहे हैं लेकिन इनसे निकले दूषित रसायनों से गंगा नदी की सांस रुक रही है। तो बस जो भी रेलगाड़ी मिल जाये दिल्ली जाने वाली वह भी बिना टिकट बंगलादेश तक से, दिल्ली पहुंच रहे हैं। याद दिला दें कि देशभर में रेलों में सबसे ज्यादा से सब ज्यादा बैठकर यात्रा करने वाले, जहर खुरानी, हत्या, लूटपाट के आंकड़े इन्हीं दो राज्यों के हैं।
देश की राजधानी दिल्ली में हर साल लगभग दस हजार बच्चों का गायब हो जाना पूरी दुनिया को सदमें में ला सकता है। लेकिन हमारे यहां शायद ही कोई जुम्बिश हो। क्योंकि अमीर अभी सुरक्षित हैं।
कानून व्यावस्था किसी भी राष्ट्र के विकास की आधारभूत संरचना का प्रमुख हिस्सा बन चुकी है। पुराने मानक, सड़क, बिजली, पानी तो हैं ही। इन सभी मानदंडों पर ये राज्य देशभर में सबसे पीछे हैं। बिहार के तो हजारों छात्र न केवल विश्वविद्यालय शिक्षा बल्कि स्कूली शिक्षा के लिए भी हर वर्ष दिल्ली पहुंचते हैं, हापुड़, मेरठ जैसे पड़ोस के क्षेत्र में भी शिक्षा इतनी बदहाल हो चुकी है कि दिल्ली ही अंतिम सहारा लगती है। यही स्थिति दिल्ली पहुंचने वाले मरीजों की संख्या की है। कुछ वर्ष पहले आये आंकड़ों के अनुसार एम्स में लगभग पचास प्रतिशत मरीज बिहार के होते हैं। हाल ही में डेंगू, चिकनगुनिया के मरीजों को अस्पतालों में न जगह मिल रही थी, न बिस्तर। तब भी दिल्ली के मुख्यमंत्री ने बहुत डरे स्वर में कहा था कि हमारे पास दिल्ली की आबादी के लिए तो पर्याप्त सुविधाएं हैं, समस्याएं बाहर से आने वाले राज्यों से आने वालों से बढ़ती हैं। यानि कि वही उत्तर प्रदेश, बिहार की आबादी का दिल्ली पलायन।
पिछले एक दशक में स्टार्टअप की बाढ़ आयी हुई है। अब दुनियाभर में भारत का तीसरा नम्बर हो चुका है। फिलिपकार्ट, स्नैपडील, ओला जैसी सैकड़ों कंपनियों ने रातोंरात पुराने ढांचे के व्यावसायों को पीछे छोड़ दिया है। लेकिन ये स्टार्टअप कंपनियां कहां फलफूल रही हैं? बेंगलुरु, पूना, मुंबई, हैदराबाद, चेन्नेई। इन शहरों में जगह, सुविधाओं की किल्लत को देखते हुए नये शहर हुबली, मैसूर, कोयम्बटूर, केरल की तरफ ये स्टार्टअप फैल रहे हैं। हिन्दी भाषी राज्य बिहार उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश जैसे बीमारू राज्यों् में क्यों नहीं? आई.आई.टी. से लेकर संघ लोक सेवा आयोग तक एक से एक प्रतिभाशाली नौजवान तो इन्हीं राज्यों से आते हैं तो इन राज्यों की बदहाली कौन ठीक करेगा? 2016 के बिहार चुनावों पर बड़ी रोमांचिक प्रतिक्रियाएं आयी थी। लोकतंत्र में ऐसा होना भी चाहिए लेकिन आश्चर्य तब हुआ जब दिल्ली में बैठे बिहार के बुद्धिजीवी दोनों हाथ उठा-उठा कर कुछ ऐंठ में कुछ पेंठ में दुनिया को फेसबुक पर बता रहे थे कि मैं भी बिहार का हूं। मुझे बिहारी होने पर गर्व है। मुझे फख्र है कि मैं समस्तीपुर में पैदा हुआ। एक बुद्धिजीवी ने तो यह तक कह दिया कि मैं बिहार का दामाद हूं। क्या अंतर है दक्षिण पंथी राष्ट्रीवाद और आप में। किस मुंह से आप मराठी मानुष और तमिल राष्ट्रवाद के सामने खड़े हो पायेंगे? राष्ट्रवाद इन अर्थों में उदात्त कहा नहीं जा सकता है।
रोजगार के अलावा शिक्षा प्रमुख कारण है दिल्ली की आबादी बढ़ने का। यूं राष्ट्रीय मानदंडों पर दिल्ली के स्कूल, कॉलिज कोई अनोखा नहीं कर रहे लेकिन पूना, नागपुर, बेंगलुरू, चैन्नई की दूरियों की वजह से दिल्ली आना ज्यादा आसान लगता है। स्कूली शिक्षा के लिए लगभग 500 स्कूल हैं डेढ़ करोड़ आबादी के लिए। करीब पांच लाख बच्चों की पढ़ाई का इंतजाम दिल्ली को करना पड़ता है। इसमें बीस प्रतिशत सीटें प्रबंधन कोटे की। कुछ निजी स्कूलों में पच्चीस प्रतिशत आर्थिक गरीबों की। क्यों न हो हल्ला हो। यही परिदृश्य है कॉलिज के दाखिलों में। अकेले दिल्ली शहर में पांच केन्द्रीय विश्वविद्यालय हैं। जवाहरलाल नेहरू, जामिया मिलिया, हमदर्द और सबसे बड़ा दिल्ली विश्वाविद्यालय। इसके अलावा इन्द्रप्रस्थ विश्वविद्यालय और आई.आई.टी. व दूसरे इंजीनियरिंग कॉलिज। देश के इतने संसाधनों का इतना एकपक्षीय घनत्व। अर्थशास्त्र जैसे विषयों में उच्च शिक्षा के लिए चैन्नई, केरल, भुवनेश्वर, आंध्रप्रदेश के नौजवान भी अब दिल्ली में पढ़ना चाहते हैं जिससे समस्या और विकराल हो रही है। वक्त् आ गया है कि केवल प्रदूषण बल्कि सभी संस्थाओं पर चौतरफा जनसंख्या के दबाव को देखते हुए नजदीक राज्यों को भी बेहतर करने की हिदायतें देनी होंगी। संसाधन भी उन्हें देने होंगे। साथ ही जनसंख्या के लिए कारगर नीति भी।
समस्या की जड़ राजनीति, नौकरशाही, शिक्षा और मीडिया का दिल्ली में अति केन्द्रीयकृत होना भी है। यूं आजादी के बाद से ही विकेन्द्रीकरण के मॉडल की बातें तो होती रही लेकिन व्यवहार में कुछ भी फलीभूत नहीं हुआ। 1982 के एशिया खेल दिल्ली में ही क्यों? या उसके तीस वर्ष बाद कॉमनवेल्थ गेम्सी 2010 में फिर दिल्ली में। अरबों करोड़ों रूपये खर्च हुए स्टेडियम, अंडरपास बनाने में। यमुना के जिस संरक्षण की बात की जाती है उसके पेट पर लात मारते हुए कॉमनवैल्थ, पांच सितारा कॉलोनी खड़ी कर दी गयी। कई कुतर्क कि स्टेडियम के नजदीक खिलाड़ी रह सकेंगे। जो खिलाड़ी हजारों मील दूर से दिल्ली पहुँच सकते हैं उन्हें स्टेडियम पहुंचाने के लिए क्या वहीं ठहरना जरूरी है? फ्लाइओवरों कि ऐसी बाढ़ कि दिल्ली शहर ही फ्लाईओवरों का शहर कहा जाने लगा। लाखों मजदूर जो एक बार आये तो फिर वापस नहीं गये। ठीक भी है। क्या इन मजदूरों को भी अधिकार नहीं है अपने देश की राजधानी पर। क्या सिर्फ करोड़ों के घोटालेबाज राजनेता, नौकरशाह, दलाल, मीडियाकर्मी ही रहेंगे इस शहर में? सभी घोटालों पर उंगली तो उठी लेकिन ऐसे सबक अभी सिखाये जाने हैं जो भविष्य में ऐसे घोटालों को रोक सकें।
काश ऐशियन खेल, कॉमनवेल्थ खेलों के लिए दिल्ली से बाहर बंगलुरू जैसा कोई भी शहर चुन लिया गया होता। क्या बुराई थी? सबसे अच्छा मौसम रहता है बंगलुरू में। आईटी में दुनिया का सबसे तेज उभरता शहर। कानून व्यवस्था दिल्ली से लाख गुनी अच्छी। केवल खेलों के लिए ही नहीं, नौकरशाही, संसद, सुप्रीम कोर्ट के भी विकल्प इस शहर में तलाशे जा सकते हैं। बंगलुरू जैसा शहर यदि आगे बढ़ा है तो नई पीढ़ी के उद्यमियों, अजीम प्रेमजी, नारायन मूर्ति, नंदन नीलकर्णी और हजारों स्टार्टअप के सपनों में बंगलुरू पहुंचे नौजवानों के बूते। दिल्ली तो सिर्फ सरकारी पैसे के बूते चमक बनाए हुए है। लेकिन क्या कोई शहर, केवल शहर व्यवस्था के बूते जिंदा रह सकता है? सुनील खीलनानी की किताब आइडिया ऑफ इंडिया में ब्रिटिश कालीन भारत में नगरों, शहरों के विकास पर रोशनी डाली है। उनके अनुसार कानपुर अंग्रेजी हुकूमत को आगे बढ़ा- फौजी सामान-कपड़े आयुद्य आदि कल कारखाने लगाये जाने की बदौलत, जबकि अहमदाबाद अपने निजी उद्यमियों की बदौलत। आज कानपुर और उसकी मिलें बंद हैं जबकि अहमदाबाद जैसे शहर वैसे ही आगे बढ़ रहे हैं। मलेशिया से सीख लेते हुए बंगलुरू जैसे शहर के पास ऐसे आयोजन होते तो नयी संभावनाएं भी खुलती और दिल्ली जैसे महानगरों में बोझ भी कम होता। दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण के पीछे भी यही सब कारण है।
चंद्रबाबू नायडू तुरत-फुरत हैदराबाद पर कब्जा जमाने की फितरत को छोड़ते हुए एक नये शहर अमरावती में राजधानी बना रहे हैं। काश हरियाणा, पंजाब, चंडीगढ़ के अलावा भी कोई ऐसा विकल्प सोच पाते। बीमारू राज्य जनसँख्या वृद्धि में ज्यादा बड़े अपराधी हैं। दक्छिन के राज्यों के मुकाबले उत्तर के इन राज्यों की जनसँख्या वृद्धि दस प्रतिशत से ज्यादा बढ़ी है। उसी अनुपात में पिछड़ापन बीमारू राज्यों को अपने गैर जिम्मेदाराना रवैया को बदलने की जरूरत है।
जनसंख्या के इतने दबाव में हर योजना में दरार पड़ जाती है। क्या दिल्ली की सड़कों को बनाते समय इतनी कारों और अन्य वाहनों की कल्पना की थी। पहले एक रिंग रोड वाली फिर बाहरी और अब एनसीआर तक जाल फैल चुका है।
दिल्ली से लगे इन्दिरापुरम में पांच लाख की बसावट के लिए सीवर, सड़क पानी, बिजली का प्रावधान किया गया था। आबादी पैंतीस लाख तक पहुंच गयी थी। कौन-सी व्ययवस्था इसे संभाल पायेगी। इन सब के दबाव में मैट्रो तक तड़की जा रही है। भला हो श्रीधरन का वरना यह शहर बरबाद हो गया होता। समाजवादी सिरका पीये कई बुद्धिजीवी अभी भी मैट्रो के पक्ष में कुछ सुनने को तैयार नहीं हैं। नुक्स तो निकालते हैं, समाधान कभी नहीं। जनसंख्या को तो ये नियति वादियों की तरह ईश्वर की देन मानकर आंखें मूंदे रहते हैं। हो सकता है इनकी राजनैतिक प्रतिबद्धता का वोट बैंक इससे प्रभावित होता हो।
पिछले कुछ सालों में दम घोंटने की हद तक पहुंच चुके प्रदूषण को रोकने का एक उपायकारों पर ऑड-ईवन फार्मूला भी लगाया गया। लेकिन कोई विशेष अंतर नहीं आया। कचरे, शमशान, खुले में शौचालय, पंजाब की परली का दहन जाने कितने कारणों को हम गिनाते रहते हैं, इस आबादी पर उंगली कभी नहीं उठती।
वर्ष 2017 के शुरू में असम सरकार ने बढ़ती जनसँख्या को रोकने के लिए कुछ कदम उठाये हैं। एकतरफ दो से ज्यादा बच्चों के माँ-बापों को सरकारी नौकरी से वंचित करना, कम संतान के लिए प्रोत्साहित करना। प्रस्ताव यह भी है कि पंचायत, नगर निगम आदि के चुनाव में भाग लेने से अयोग्य ठहराना। कुछ और सरकारों ने भी छिटपुट कदम उठाये हैं, लेकिन जरूरत है केंद्र सरकार के स्तर पर राष्ट्रीय नीति बनाना और उसे सख्ती से लागू करना।

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