ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
इस चमन के फूल को पत्थर न होने दीजिये
CATEGORY : शायरी की बात 01-Dec-2016 12:00 AM 1275
इस चमन के फूल को पत्थर न होने दीजिये

ग़ज़ल को नए ढंग से परिभाषित करने वाले शायरों में जनाब प्रेमकिरण
साहब को बिलाशक शामिल किया जा सकता है। यूं नए शायरों को पढ़ना, नए अनुभव और अपरिचित क्षेत्र की यात्रा करने जैसा होता है। जहां पता नहीं होता रास्ते में कैसे मंज़रों से मुलाकात होगी। पूरी यात्रा में आपकी उत्सुकता बनी रहती है। प्रेमकिरण साहब की किताब आग चख कर लीजिय पढ़ते हुए बस ऐसा ही अनुभव होता है।
गोद में लेना चाहें तो वो गोद से फिसली जाय
मेरी नन्हीं बिटिया जैसी चंचल चंचल धूप
दामन-दामन ठंडक जागी, नुक्कड़ नुक्कड़ आग
सर्द हवाएं, जाड़े के दिन, शीतल शीतल धूप
खेत बेच कर आखिर उसने दिया गाँव को "भात"
चावल चावल क़र्ज़ में ठिठुरा पत्तल पत्तल धूप
चंचल-चंचल, शीतल-शीतल और पत्तल-पत्तल जैसे काफिये के साथ "धूप" जैसा रदीफ़ आप को कहाँ रोज़-रोज़ पढने को मिलता है? ये रचनात्मक मौलिकता ही हर शायर को बाकियों से अलग करती है। प्रेमकिरन जी की मौलिकता उनके ग़ज़ल संग्रह के शीर्षक से लेकर उनके हर शेर में देखी जा सकती है।
दिल है पिन कुशन-सा सीने में
हर खलिश आलपिन होती है
हम पे आंसू गिराने वालों के
हाथ में ग्लिसरीन होती है
आपाधापी भरे आजकल के जीवन में भौतिक सुखों के पीछे भागता व्यक्ति अपने लिए ही समय नहीं निकाल पाता ऐसे में उससे शायरी की किताब पढ़ने की उम्मीद रखना नीम के पेड़ से आम तोड़ने की कल्पना करने जैसा है, किन्तु फिर भी साहब रेगिस्तान में नखलिस्तान जैसे कुछ लोग हैं जो ये कारनामा करते हैं और जिंदगी में ताजगी बनाये रखते हैं।
मंजिलों की आस रखिये और चलिए
भूल का एहसास रखिये और चलिए
गर मुसीबत काई की सूरत बिछी हो
पाँव को हस्सास रखिये और चलिए
15 जनवरी 1953 को पैदा हुए प्रेम जी की ग़ज़लें अनेक ग़ज़ल एवं कविता संग्रहों के अलावा देश की हिंदी-उर्दू की बहुत सी पत्र-पत्रिकाओं में छप चुकी हैं।
अपने युग के आदमी का बंधु वर्णन क्या करें
आवरण उठता नहीं है रूप दर्शन क्या करें
कोई सपना ही जिन्होंने उम्र भर देखा न हो
वो समय के नाग-फन पर काल-नर्तन क्या करें
दूसरों पर उँगलियाँ ही हम उठाते रह गए
       इससे फुर्सत ही नहीं हम आत्म-मंथन क्या करें
शब्द हिंदी के हों या उर्दू के उन्हें बहुत सहजता से प्रेम जी ने अपनी ग़ज़लों में पिरोया है।
कितने शीशों की नज़ाकत का भरम खुल जाएगा
इस चमन के फूल को पत्थर न होने दीजिये
सस्ती लोकप्रियता से दूर ग़ज़ल के बेहद खूबसूरत अशआरों से भरी इस किताब को राजदीप प्रकाशन सी- 187 ज्वालापुरी, न.-4, नागलोई, नई दिल्ली से खरीदा जा सकता है।

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