ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
अंतरराष्ट्रीय हिंदी उत्सव क्यों?
01-Aug-2018 05:08 PM 598     

वर्ष 1989 में एक बहुत बड़े हिदी सम्मेलन का आयोजन किया था। सम्मेलन की विशेषता यह थी कि उसमें चार से अधिक प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों ने भाग लिया था। ऐसा लगता था कि हिंदी भाषी प्रदेशों के राजनीतिक प्रमुख हिंदी के लिए कोई संयुक्त रणनीति बनाएंगे। सम्मेलन के एक सत्र में मुझे भी वक्ता के रूप में बोलने का मौका मिला था। उस सत्र की अध्यक्षता जार्ज फर्नाडिंस कर रहे थे। सम्मेलन कई अर्थों में सफल था। पर उसका एक सत्र मन में मटमैली स्मृतियां छोड़ गया। उस सत्र में स्वामी अग्निवेश वक्ता थे उन्होंने अंग्रेजी के विरुद्ध जोरदार व्याख्यान दिया और स्थिति यह बन गई कि जिस स्टेडियम में सम्मेलन का आयोजन किया गया था उसमें लगे अंग्रेजी के बोर्डों को उखाड़ने का आह्वान किया। देखते-देखते श्रोता हुड़दंगी भीड़ मे बदल गए और तोड़फोड़ होने लगी। हिंदी के आंदोलन के असफल होने की वज़ह वैसे ही बिना सिर-पैर के विचारों और वक्तव्यों में देखी जा सकती है। इसका अर्थ है कि संकल्पना के स्तर पर, विचार के स्तर पर गहन चिंतन नहीं किया गया या जो विचार किया वह सतही है। एकआयामी और भीड़वादी था। यहां यह भी विचार करने की आवश्यकता है कि लोहिया या उनके अनुयायियों के आग्रह के बावजूद हिंदी को उसका उचित स्थान क्यों नहीं मिला।
लगभग इसी समय हिंदी आंदोलन अन्य स्तरों पर भी चल रहा था। श्यामरुद्र पाठक ने आईआईटी जैसे इलीट संस्थान में हिंदी में शोध-प्रबंध प्रस्तुत करने का आग्रह करते हुए धरना और भूख हड़ताल की। उनकी दशा एक बार तो काफी बिगड़ गई थी। परंतु अंतत: उन्हें सफलता मिली। संघ लोक सेवा आयोग के सामने पुष्पेन्द्र चौहान और राजकरण चौहान ने वर्षों आंदोलन चलाया। उस आंदोलन में हमने भी यथासंभव सहयोग दिया। बलदेव वंशी भी उसमें सक्रिय हुए। धरना इतना लंबा हुआ कि संघ लोक सेवा आयोग के सामने लगा वो धरने का टेंट संघ लोक सेवा आयोग का ही हिस्सा लगने लगा था। आधी-अधूरी सफलताओं के बाद वह आंदोलन समाप्त हुआ। यह दौर था कि वैश्विकरण का और निजीकरण की बातें शुरू हो चुकी थी। हिंदी के आग्रह गए जमाने की बातें लग रहे थे।
अब सवाल यह है कि वर्तमान समय में हिंदी के अभियान या आंदोलन का क्या स्वरूप हो? पहली बात क्या उसकी कोई जरूरत है! जब अंग्रेजी पढ़े-लिखे भारत के युवाओं ने पश्चिम में अपना झंडा गाढ़ दिया और मल्टीनेशनल कंपनियां लाइन लगा कर भारत में आ गई हैं तो हिंदी की क्या जरूरत! भारतीय भाषाओं का क्या महत्व! हम सब क्वीन विक्टोरिया की भाषा अपनाएं और सब कौए से कोयल बन जाएं। यह सारी दुनिया को एक-सा बनाने की पश्चिमी कवायद है। यह संस्कृतियों, शास्त्रीय साहित्य, लोक परंपराओं, लोक संस्कृति को शवघर में डालने का जश्न मनाने जैसा है। यह भाषा को संस्कृति और समाज से स्वतंत्र इकाई मानने जैसा है। यह अपने इतिहास और परंपराओं को नए तरीके से, हेय तरीके से, देखने जैसा है। दुर्भाग्य है कि हम अपना इतिहास अंग्रेजों के बनाए चश्मे से पढ़ने लगे हैं। तो मतलब भाषा का सवाल अभी भी मौजूं है। पर उसे कैसे आगे बढ़ाया जाए।
आज वैश्वीकरण के दौर में दुनिया के प्राय: सभी देश द्विभाषी हो चुके हैं, बहुभाषी हो चुके हैं। इसलिए अंग्रेजी का विरोध और केवल विरोध के लिए विरोध, उसके कारण प्राप्त उपलब्धियों का नकार उचित नहीं है। इस स्थिति को नकारना वस्तुस्थिति से मुंह मोड़ना है। इसलिए सबसे पहले हमें द्विभाषिकता, बहुभाषिकता की स्थिति को स्वीकार करना होगा। हमारे आग्रह समाज और देश के हितों व समय की धारा के प्रतिकूल न हों यह ध्यान रखना होगा।
समय बदल गया है, आज हिंदी को धरने और आंदोलन की नहीं बल्कि आईटी क्रांति की जरूरत है। आज अनुवाद के माध्यम से आदान-प्रदान की जरूरत है। हिंदी को सरकारी औपचारिकताओं और आडंबर से मुक्त करने की आवश्यकता है। अंग्रेजी, भारतीय भाषाओं, उर्दू से मुक्त आदान- प्रदान की जरूरत है। हिंदी में यूनिकोड का आगमन किसी क्रांति से कम नहीं है। क्या करोड़ों युवाओं को कंप्यूटर पर हिंदी में काम करने, संवाद करने की सुविधा प्रदान करना किसी राजनीतिक उपलब्धि से कम महत्वपूर्ण है? हिंदी सेवियों को साहित्य से शक्ति तो लेनी है पर उस तक स्वयं को सीमित नहीं कर लेना है। हिंदी को साहित्य और उसमें भी कविता तक सीमित कर सोचने से कुछ नही होगा। हिंदी को समाज और उसकी आवश्यकताओं से जोड़ना होगा। अपनी पाठ्यपुस्तकों की पड़ताल करनी होगी। देखना होगा कि नई पीढ़ी की जीनियस हिंदी से जुड़े। शोध-प्रबंधों की हालत पर विचार करना होगा। हिंदी मे शोध का स्तर शोचनीय है। हिंदी के अभियान से राजनीति को दूर करना होगा। हिंदी में साहित्य ही नहीं विश्वविद्यालय और अकादमियां भी राजनीति के बड़े अड्डे हैं जहां जाति और राजनीति का वर्चस्व है। हिंदी में नई हवा को बहाने के लिए इस दुर्गंध को दूर करना होगा।
हिंदी के बाजार की शक्ति को समझना होगा और समझाना होगा। मीडिया ने राह दिखाई है। बालीवुड के प्रसार ने नए देशों में हिंदी के बीज डाले हैं। उन्हें खाद-पानी मुहैय्या करना होगा। हिंदी की अकादमियों और स्वैच्छिक संस्थाओं की ओवरहालिंग करनी होगी। ज्यादा बड़ी लड़ाई बाहर की नहीं, अंदर की होती है। चेतन से अधिक अवचेतन में भाषा के संस्कार डालने होंगे जिससे वह अगली पीढ़ी के भी सपनों की भाषा बन सके। करना तो बहुत दूर की बात है, हम हिंदी वाले अपनी समस्याएं, बीमारी समझें तो! एक मंच पर आकर उन पर विचार तो करें।
इन सबके लिए साझा मंच बनाने का प्रयास यह अंतरराष्ट्रीय उत्सव है। आइए इसके माध्यम से हिंदी के और उससे जुड़े सवालों के बहुआयामी स्वरूप को समझने का प्रयास करें और साथ बैठकर अपने दुख-सुख एक होने की वास्तविकता से दो-चार हों। समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। हमें ही अपने कदमों की गति तेज करनी होगी और समय से मिलानी होगी।

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