ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
अंतद्र्वंद
01-Mar-2019 03:45 PM 1272     

फिर से वो ही आग जलेगी
फिर से वो पानी बरसेगा
बबली का दिल रो रोकर
फिर से पापा को तरसेगा।
माँ के सूखी छाती भी
सोचे मुन्ना कैसा होगा
शायद निंदा करते नेता के
मन में जिंदा होगा।

फिर से आंगन में टूटी चूड़ी के
अरमान दफन होंगे
धुंधलाती आंखों वाली
बूढ़ी लाठी पर खूब वज़न होंगे।
टीवी के पर्दे पर फिर से
आज वही नाटक होगा
कोई दल का नेता
रूप बदल के फिर बैठा होगा।

आग लगेगी शव में या
फिर कफन दफन होगा
इस बार तिरंगा पेटी के
अंदर कौन अंग होगा।
हाय किस्मत फूटी
हम अलबेलों के मेले में
खूब पसौरि दूध मलाई
जयचंदों के ठेले में।


हर बार यही सुनते हैं
अब संग्राम बड़ा भीषण होगा
नेता जी बदले हैं
अब न कोई सूर्य ग्रहण होगा।
सिसक सिसक कर बबली
अपने मन को समझा लेती है
और किताबों के पन्नों में
खुद को फिर उलझा लेती है।

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