ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
रोचक व्यंग्य संग्रह
01-Apr-2019 09:44 PM 151     

हिंदी व्यंग्य लेखन में महिला लेखिकाओं की संख्या बहुत कम रही हैं। लेकिन अब इस विधा में कुछ महिलाएं अपनी सशक्त व्यंग्य रचनाओं के साथ आ रही हैं। इनमें समीक्षा तैलंग व्यंग्य के आकाश में एक चमकता सितारा बनकर उभर रही है। नयी पीढ़ी की होनहार लेखिका समीक्षा तैलंग का प्रथम व्यंग्य संग्रह - "जीभ अनशन पर है" इन दिनों काफी चर्चा में है। समीक्षा पेशे से पूर्व पत्रकार हैं और वर्तमान में आबूधाबी में रहती हैं।
इस संकलन के जरिये वे आसपास के परिवेश की विसंगतियों, विद्रूपताओं को उजागर करके अनैतिक मानदंडों पर तीखे प्रहार करती हैं। संग्रह की भूमिका बहुत ही सारगर्भित रूप से वरिष्ठ व्यंग्यकार प्रेम जनमेजय, सुभाष चंदर और आलोक पुराणिक ने लिखी है। साथ ही व्यंग्यकार विवेक रंजन श्रीवास्तव और समीर लाल "समीर" ने पुस्तक पर सारगर्भित टिप्पणी लिखी है।
शीर्षक रचना "जीभ अनशन पर है" के माध्यम से लेखिका ने लोकतंत्र में अनशन करने वालों की कारगुजारियों पर प्रश्न-चिह्न लगाया गया है। इस व्यंग्य रचना में व्यंग्यकार लिखती है - एक बार ख़याल आया, एकाध नेता का दरवाजा खटखटा कर पूंछ ही लूँ, कि भैया जब आप लोग अनशन करते हो, वो केवल दिन-दिन का या रात भी उसमें शामिल होती है? या फिर वही सुबह चार बजे खाने के बाद दिन भर का उपवास, क्योंकि एक वही समय होता है जब मीडिया की निगाहें ज़रा दूर रहती हैं। "कहत कबीर सुनो भई साधो", "उपवास का हलफनामा" और "कुटिया के अंदर बंगला" रचनाओं में लेखिका की चिंतन की प्रौढ़ता का दर्शन होता है। "उपवास का हलफनामा" रचना में समीक्षा लिखती हैं - कलम ने पूरा उपवास पूरी तन्मयता से किया। न खुद श्रेय लिया, न किसी को हकदार बनाया उस श्रेय का। मेरी कलम उपवास पर ज़रूर थी पर किसी आत्मग्लानि में नहीं बल्कि मंथन कर रही थी।
"लो हमने भी डॉक्टरी कर ली" व्यंग्य रचना चिकित्सकों के पेशे पर, "पोल खोल होली" मीडिया की करतूतों पर और "मुझे भी एक घर चाहिए" बाजार व विज्ञापन पर गहरा कटाक्ष है। व्यंग्य "60 साल का नौजवान" में लेखिका का मानना है कि किसान कभी भी ऐशोआराम की जिंदगी जीने का विचार नहीं करता है। किसान हमेशा ही नौजवान बना रहता है। मेहनत-मजदूरी करने वालों को कभी भी उम्र का अहसास नहीं होता है।
"योगक्षेमं वहाम्यहं" रचना में व्यंग्यकार ने बीमा व्यवसाय की पोल खोल कर रख दी है। व्यंग्य "हम तो लुट गए" में लेखिका लिखती है - रसूखदार और राजदार एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं। रसूख के चलते राजदार काम तो करेंगे, पर" और आगे लिखती हैं "एक हम हैंं गले लगाने के बाद भी नहीं समझ पाते कि अब ये चपत लगाकर विदेश भागने वाला है" तो व्यंग्यकार रसूखदारों राजदारों और चौकीदारों के कार्यकलापों पर तीखा प्रहार करती है। लेखिका साहित्यकारों की पीड़ा को भी जानती है। इस पीड़ा को उन्होंने "ख़याली पुलाव" रचना में भली भाँति दर्शाया है।
"ठिठुरता रूपया, अकड़ता तेल", "अफवाहें! तुम्हारे सिर पर पैर हैं", "फि़टनेस फ्रीक हो गया रब्बा रब्बा", "लट्ठठमार होली", "हम जमूरा हूँ", "मुझे भी एक घर चाहिए", "तूफानी बयानबाजी", "सत्य से असत्य की ओर", "सूरजमुखी सेल्फी", "ध्यान रहे! हम भारतीय हैं" जैसे व्यंग्य अपनी विविधता का अहसास कराते हैं।
"वे आत्महंता हैं", "मकड़जाल की चिंता किसे है", "राम अवतार और काÏस्टग काउच", "ख़याली पुलाव" व "कहाँ मियाँ तानसेन, कहाँ क्लाउडसीडिंग" जैसे रोचक व्यंग्य पढ़ने की जिज्ञासा को बढ़ाते हैं। इन व्यंग्य रचनाओं से लेखिका की गहरी दार्शनिकता दृष्टिगोचर होती है। कतिपय बानगी प्रस्तुत है। "वे सच बोलते थे। उन्हें आत्महंता की उपाधि से नवाजा गया। सच बोलने वाला बाजार में नहीं चल सकता। वह बैठ भी नहीं सकता। लेकिन वह बाजार चला भी नहीं सकता। उनके सच बोलने से ही बाजार गिरता है।" (वे आत्महंता हैं), "मकड़ियों का आना जाना अब भी लगा है। वह वहाँ-वहाँ जाती जहाँ-जहाँ उसे परेशान करने वाला कोई ना होता। नए घरों, बंगलों के अंदर उसका दम घुटता। वो वहाँ न रह पाती। उसे पनपने के लिए एकांतवास चाहिए। सारे आपराधिक जाल भी अक्सर उसी एकांत में ही बुने जाते हैं।" (मकड़जाल की चिंता किसे है), "मतलब, काम होने के बाद भी फंसाया जा सकता हैै। यही हुआ न इसका अर्थ। हाँ, हाँँ यही हुआ। यही हो भी रहा है। मतलब ब्लैकमेलिंग। भावनाओं का कोई काम नहीं। बाजारवादी सोच से लबरेज होते हैं ये लोग।" (राम अवतार और काÏस्टग काउच), "पाठक अब दिये की रोशनी में भी ढूँढने से नहीं मिलने वाले। फिर, फिर कौन पढ़ेगा इतनी मेहनत से लिखी गई किताब को। अब इसकी भी कोई मार्केटिंग होगी तो उसके भी गुर सीखने होंगे। यही बचा है अब लेखक के लिए। इतने बुरे दिन देखने को मिलेंगे किसी ने सोचा नहीं होगा। सुझाव भी ऐसे-ऐसे आते हैं कि" (ख़याली पुलाव), "आगे जाकर बारिश एलियन जैसी हो जाएगी पृथ्वीवासियों के लिए। भूले-भटके आ गई किसी दिन तब उसे पहचानने वाला तक कोई न रहेगा।" (कहाँ मियाँ तानसेन, कहाँ क्लाउडसीडिंग) वैसे व्यंग्य की राह बहुत कठिन और साहस का काम है लेकिन समीक्षा की कलम का पैनापन व्यवस्था में फैली विसंगतियों पर तीव्र प्रहार करता है। व्यंग्य लेखन में तो समीक्षा की सक्रियता और प्रभाव व्यापक है और साथ में वे व्यंग्य रचनाओं, व्यंग्य की पत्रिकाओं पर भी अपनी प्रतिक्रया से अवगत कराती रहती है।
व्यंग्यकार ने इस संग्रह में व्यवस्था में मौजूद हर वृत्ति पर कटाक्ष किए हैं। बाजारवाद, पर्यावरण, अनशन की वास्तविकता, चर्चाओं का बाजार, राष्ट्रभाषा हिंदी, रूपये का गिरना, भ्रष्टाचार, घोटाले, अफवाहों का बाजार, आभासी दुनिया, राजनीति, विज्ञापन और पुस्तक मेले की सच्चाई, नोटबंदी, मिलावट का कड़वा सच, बजट, बयानबाजी और जुमलेबाजी, सांस्कृतिक व सामाजिक मूल्यों इन सब विषयों पर व्यंग्यकार ने अपनी कलम चलाई हैं। व्यंग्यकार द्वारा कहीं-कहीं अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग कर व्यंग्य को आम आदमी के लिए अधिक ग्राह्य बनाया है।
लेखिका विदेश में रहते हुए भी मन से अपने भारत देश से जुड़ी हुई है। इस संग्रह की व्यंग्य रचनाओं में व्यंग्यकार ने लेखन की अपनी कुछ अलग शैली, नए शिल्प के साथ गहरी बात सामथ्र्य के साथ व्यक्त की है। वे अपनी कलम से व्यंग्य के बंधे-बँधाये फ्रेम को तोड़ती हैं और सरल शब्द, छोटे-छोटे वाक्य के साथ पुराने सन्दर्भों का बहुत उम्दा प्रयोग करके विसंगतियों पर तीव्र प्रहार करती हैं। संग्रह में कुल 45 व्यंग्य रचनाएं हैं। इस संग्रह की रचनाओं के विषय परंपरागत विषयों से अलग हैं। संग्रह की रचनाएं तिलमिला देती हैं और पाठकों को सोचने पर विवश करती हैं। कुछ रचनाओं में लेखिका ने विसंगतियों के चित्रण में अपनी टिप्पणियों से अनावश्यक विस्तार दिया है, लेखिका को भविष्य में इस प्रकार के विस्तार से बचना होगा। भविष्य में समीक्षा तैलंग से ऐसी और भी पुस्तकों की प्रतीक्षा पाठकों को रहेगी।

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