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इन्सेफेलाइटिस से शिशुओं की मृत्यु
01-Nov-2017 03:47 PM 1724     

विगत दिनों उत्तरप्रदेश के गोरखपुर क्षेत्र में जापानी इन्सेफेलाइटिस (JE) से बच्चों की मृत्यु के प्रतिदिन मिलते रहे समाचारों ने विश्व भर को विचलित किया। अतः देश-विदेश में भारत की स्वतंत्रता की 70वीं वर्षगाँठ का उल्लास भी थोड़ा धूमिल ही रहा। देश व उत्तरप्रदेश के स्वास्थ्य विभागों से भी सामयिक सूचना इस विषय पर सुलभ नहीं थी। दुर्भाग्य से भारतीय मीडिया व सोशल साइट्स भी केवल राजनीतिक आक्षेप-प्रत्याक्षेप, आरोप-प्रत्यारोप आदि से भरे थे। ऐसी परिस्थिति में हमारे पास यही विकल्प रह जाता है कि हम सार्वजनिक स्वास्थ्य (public health) व चिकित्सा (medical) सम्बंधित उपलब्ध तथ्यों के आधार पर इस आपदा से पूर्व की परिस्थियों को समझने का प्रयास करें ताकि भविष्य में फिर ऐसा न हो।
भारत के साथ-साथ जापानी इन्सेफेलाइटिस एशिया के अनेक देशों, जिनमें चीन, जापान, मलेशिया व नेपाल इत्यादि शामिल हैं, में पाया जाता है। देश के चौबीस राज्यों में जापानी इन्सेफेलाइटिस का फैलाव है, परन्तु हाल के वर्षों में 75 प्रतिशत से अधिक केस उत्तरप्रदेश से रहे (A review of Japanese encephalitis in Uttar Pradesh, India. Kumari and Joshi, WHO South-East Asia Journal of Public Health, 4: 374-395, 2012)। जापानी इन्सेफेलाइटिस (एक प्रकार का मस्तिष्क ज्वर/दिमागी बुख़ार) का कारण जापानी बी विषाणु (ध्त्द्धद्वद्म) है जो धान के खेतों में खड़े जल में पनपने वाले क्यूलेक्स मच्छर में रहता है। मच्छर के काटने से दिमागी बुख़ार मनुष्यों व सुअरों, पक्षियों इत्यादि में फैलता है। क्यूलेक्स मच्छर की भूमिका यहाँ रोग वाहक यानी वेक्टर (ध्ड्ढड़द्यदृद्ध) की रहती है और विभिन्न जानवर एवं पक्षी इस विषाणु के स्त्रोत (द्धड्ढद्मड्ढद्धध्दृत्द्ध) हैं जिनमें विषाणु का विस्तारण (ठ्ठथ्र्द्रथ्त्ढत्ड़ठ्ठद्यत्दृद) होता है। मनुष्य ड्डड्ढठ्ठड्ड-ड्ढदड्ड ण्दृद्मद्य कहलाता है चूँकि संक्रमित मानव शरीर में जापानी इन्सेफेलाइटिस विषाणु की सँख्या में इतना बढ़ाव नहीं होता कि मनुष्य मच्छर के काटने पर उसको संक्रमित कर सके। ग़्ठ्ठद्यत्दृदठ्ठथ् ज्ड्ढड़द्यदृद्ध एदृद्धदड्ढ क़्त्द्मड्ढठ्ठद्मड्ढ क्दृदद्यद्धदृथ् घ्द्धदृढ़द्धठ्ठथ्र्थ्र्ड्ढ (क़्त्द्धड्ढड़द्यदृद्धठ्ठद्यड्ढ क्रड्ढदड्ढद्धठ्ठथ् दृढ क्तड्ढठ्ठथ्द्यण् च्ड्ढद्धध्त्ड़ड्ढद्म, ग्त्दत्द्मद्यद्धन्र् दृढ क्तड्ढठ्ठथ्द्यण् ः क़ठ्ठथ्र्त्थ्न्र् ज़्ड्ढथ्ढठ्ठद्धड्ढ, क्ष्दड्डत्ठ्ठ) के अनुसार संक्रमित पानी से भी कई प्रकार के मस्तिष्क ज्वर यानी ॠकच् (ठ्ठड़द्वद्यड्ढ ड्ढदड़ड्ढद्रण्ठ्ठथ्त्द्यत्द्म द्मन्र्दड्डद्धदृथ्र्ड्ढ) हो सकते हैं। अतः रोग वाहकों का मूलोच्छेदन (ड्ढद्धठ्ठड्डत्ड़ठ्ठद्यत्दृद) और स्रोत से आबादी विशेषतः बालकों का पृथक्करण इस बीमारी के नियंत्रण के लिए आवश्यक हैं।
ग़्ठ्ठद्यत्दृदठ्ठथ् ज्ड्ढड़द्यदृद्ध डदृद्धदड्ढ क़्त्द्मड्ढठ्ठद्मड्ढ क्दृदद्यद्धदृथ् घ्द्धदृढ़द्धठ्ठथ्र्थ्र्ड्ढ के अनुसार सम्पूर्ण भारत में वर्ष 2009-2015 के बीच 52,000 रोगी (अधिकतर उम्र में 15 साल या छोटे) ॠकच् से पीड़ित हुए जिनमें मृत्यु-दर 15 प्रतिशत (8,000) थी। आधे से अधिक रोगी व मृत उत्तर प्रदेश से थे, विशेषतः गोरखपुर मंडल से, जहाँ मृत्यु-दर और विकलांगता सबसे अधिक थी। बाबा राघवदास मेडिकल कॉलेज गोरखपुर में वर्ष 2008-2012 के बीच दस हजार ॠकच् रोगी भर्ती हुए जिनमें 8.4 प्रतिशत रोगी ख्क से पीड़ित थे। समाचार-पत्रों के अनुसार गोरखपुर मंडल में 1978 से अब तक 25 हजार रोगी ॠकच् से मर चुके हैं। हालाँकि ऐसा भी सम्भव है कि कुछ पीड़ित अस्पताल पहुँचने से पहले ही दिवंगत हो गए या कुछ में इस रोग के लक्षण दिखाई नहीं दिए। अतः संक्रमित व्यक्तियों की सँख्या अधिक मानी जानी चाहिए।
अमरीका के क्ड्ढदद्यड्ढद्धद्म ढदृद्ध क़्त्द्मड्ढठ्ठद्मड्ढ क्दृदद्यद्धदृथ् के अनुसार जापानी इन्सेफेलाइटिस एक बचावकारी (द्रद्धड्ढध्ड्ढदद्यठ्ठडथ्ड्ढ) बीमारी है जिसको रोकने के लिए विश्व में कई प्रकार की वैक्सीन या टीके उपलब्ध हैं। गोरखपुर डिवीज़न में पहले पहल 1-15 वर्ष के बच्चों में व्यापक टीकाकरण (थ्र्ठ्ठद्मद्म ध्ठ्ठड़ड़त्दठ्ठद्यत्दृद) वर्ष 2006 और फिर वर्ष 2010 में हुए जिसके लिए ख्क ध्ठ्ठड़ड़त्दड्ढ (च्ॠ-14-14-2) उपयोग की गयी। यह वैक्सीन वर्ष 2011 में छदत्ध्ड्ढद्धद्मठ्ठथ् क्ष्थ्र्थ्र्द्वदत्न्न्ठ्ठद्यत्दृद घ्द्धदृढ़द्धठ्ठथ्र्थ्र्ड्ढ के अंतर्गत 16-24 महीने के बच्चों को अन्य टीकों यानी क़्घ्च्र्/ग्र्घ्ज् वैक्सीन के साथ दी गयी परन्तु टीकाकरण दर केवल 51 प्रतिशत ही रही। तदुपरांत वर्ष 2013 से दो खुराक वाली वैक्सीन प्रयोग में लायी गयी जिसके अंतर्गत पहली खुराक बच्चों को खसरे के टीके (ग्क्ज्-1) के साथ 9-12 महीने की आयु के बीच व दूसरी खुराक 16-24 महीने की आयु में क़्घ्च्र्/ग्र्घ्ज् के टीके और खसरे की दूसरी डोज़ (ग्क्ज्-2) के साथ दी जानी चाहिये। इस सन्दर्भ में वर्ष 2015 में गोरखपुर मंडल के चार जिलों देवरिया, गोरखपुर, कुशीनगर व महराजगंज में हुए एक सर्वे के अनुसार पहली खुराक केवल 75 प्रतिशत बच्चों को प्राप्त हुई और दूसरी खुराक 42.3 प्रतिशत शिशुओं को ही मिल पायी। यानी प्रथमचरण में ही टीकाकरण पूर्णरूप से नहीं हो पाया व 32.7 प्रतिशत बालक दूसरी खुराक से वंचित रहे (क्दृध्ड्ढद्धठ्ठढ़ड्ढ ः थ्र्त्द्मद्मड्ढड्ड दृद्रद्रदृद्धद्यद्वदत्द्यन्र् ढदृद्ध ख्ठ्ठद्रठ्ठदड्ढद्मड्ढ ड्ढदड़ड्ढद्रण्ठ्ठथ्त्द्यत्द्म ध्ठ्ठड़ड़त्दड्ढ, क्रदृद्धठ्ठत्त्ण्द्रद्वद्ध ड्डत्ध्त्द्मत्दृद, छद्यद्यठ्ठद्ध घ्द्धठ्ठड्डड्ढद्मण्, क्ष्दड्डत्ठ्ठ, 2015: क्ष्थ्र्द्रथ्त्ड़ठ्ठद्यत्दृदद्म ढदृद्ध ड्ढदड़ड्ढद्रण्ठ्ठथ्त्द्यत्द्म ड़दृदद्यद्धदृथ्. ग्द्वद्धण्ड्ढत्त्ठ्ठद्ध ड्ढद्य ठ्ठथ्., क्ष्दड्डत्ठ्ठद ख् ग्ड्ढड्ड ङड्ढद्मड्ढठ्ठद्धड़ण्, 145: 63-69, 2017)।
हाल ही में छपी रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार (घ्ड्ढद्धड़ड्ढद्र-द्यत्दृदद्म, द्रद्धठ्ठड़द्यत्ड़ड्ढद्म, ठ्ठदड्ड ण्ड्ढठ्ठथ्द्यण् द्मड्ढड्ढत्त्त्दढ़ डड्ढण्ठ्ठध्त्दृद्ध ड़दृदद्मद्यद्धठ्ठत्द ख्क/ॠकच् त्दद्यड्ढद्धध्ड्ढदद्यत्दृदद्म त्द ण्त्ढ़ण् ड्ढदड्डड्ढथ्र्त्ड़ ड्डत्द्मद्यद्धत्ड़द्य दृढ ग़्दृद्धद्यण् क्ष्दड्डत्ठ्ठ. क्ण्ठ्ठद्यद्वद्धध्ड्ढड्डत् ड्ढद्य. ठ्ठथ्., एत्दृग्ड्ढड्ड क्ड्ढदद्यद्धठ्ठथ् घ्द्वडथ्त्ड़ क्तड्ढठ्ठथ्द्यण् 17:645, 2017), गोरखपुर मंडल में जापानी इन्सेफेलाइटिस रोगी अधिक होने के कई कारण हैं। सबसे पहले, यहाँ ख्क/ॠकच् को गंभीर रोग तो समझा जाता है परन्तु उसके उन्मूलन को प्रमुखता नहीं दी जाती। गन्दगी व गंदे पानी में विषाणु वाहक मच्छर का पनपना इत्यादि का जानकारी हैं किन्तु सुअर, जो इस विषाणु का महत्वपूर्ण स्रोत है, के विषय में आम जनता में ज्ञान कम है। फलस्वरूप अधिकतर शिशुओं को सुअरों से पृथक रखने का प्रयास नहीं किया जाता। अतः इस क्षेत्र में ख्क विषाणु के संक्रमण को रोकने और जीवन चक्र में व्यवधान की विधियों (त्दद्यड्ढद्धध्ड्ढदद्यत्दृदद्म) के विषय में जागरूकता बढ़ाना अत्यावश्यक है। यहाँ बिहार व नेपाल से भी रोगी आते हैं। दूसरे, इस रिपोर्ट में सावर्जनिक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा क्षेत्रों में व्यापक कमियां और गंभीर चुनौतियां चिह्नित की गयीं।
अगस्त 2017 में, समाचार-पत्रों के अनुसार, बाबा राघवदास मेडिकल कॉलेज, गोरखपुर में उपचार प्रबंधन (जैसे ऑक्सीजन की कमी इत्यादि) ख्क पीड़ित शिशुओं की मौत का कारण बने। केन्द्रीय स्वास्थ्य विभाग द्वारा दिल्ली से भेजे गये तीन-सदस्य विशेषज्ञ दल ने निरीक्षण में नवजात शिशु और बच्चों के आईसीयू (द्रड्ढड्डत्ठ्ठद्यद्धत्ड़ क्ष्क्छ) में समुचित चिकित्सा प्रबन्धन की कमी पायी। इन विशेषज्ञों के अनुसार, नवजात शिशुओं की मृत्यु समय से पहले जन्म लेने (द्रद्धड्ढथ्र्ठ्ठद्यद्वद्धत्द्यन्र्), दम घुटने (ठ्ठद्मद्रण्न्र्न्त्ठ्ठ), सेप्सिस (द्मड्ढद्रद्मत्द्म) के कारण हुई न कि ख्क संक्रमण से। (नवजात शिशु में माता से गर्भ में ग्रहण की गई एंटीबाडी जन्म से छह महीनों तक रह सकती हैं। जिन बच्चों में रोग प्रतिरोधक शक्ति (त्थ्र्थ्र्द्वदत्द्यन्र्) नहीं है उनमें मच्छर के काटने के 5-15 दिनों के बाद संक्रमण के लक्षण दिखाई देते हैं।) यह भी पाया गया कि मेडिकल कॉलेज में वरिष्ठ चिकित्सों की भारी कमी थी और केवल 15 प्रतिशत नर्सिंग स्टाफ को नवजात शिशु की देखभाल की विशेष ट्रेनिंग प्राप्त थी।
संक्षेप में रोगियों की सँख्या एवं मृत्यु-दर को कम करने के प्रयास प्रारंभिक और माध्यमिक स्तर से होने बहुत ज़रूरी हैं चूँकि रोगी अत्यंत गंभीर अवस्था में जब स्पेशलिटी हॉस्पिटल में पहुँचते हैं, वहाँ आपदा से जूझने की क्षमता और रोगी की देखभाल का समुचित प्रबंध न होना मृत्यु को बुलावा देता है। ऐसे में स्वास्थ्य पॉलिसी और चिकित्सा तंत्र की विफलता भारतीय शिशुओं के भविष्य के लिये अत्यंत चिन्ताजनक है।

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