ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
समकालीन कविता की संवेदनहीनता
01-Apr-2019 09:27 PM 156     

जब समकालीन कविता के रूप-स्वरूप व कलेवर की बात आती है तो चारों तरफ संवेदनहीनता दिखाई देती है और बाजारवाद गर्म दिखाई देता है।
मनुष्य के लिए उपस्थित इस संकटकाल में कविता जन आंदोलनों से प्रभावित होकर लोकतंत्रात्मकता की ओर झुकी हुई दिखाई देती है। समकालीन कविता में गहराई कम है, उथलापन अधिक है। बिम्बों का स्पष्टीकरण कम है।
विकृत होते पूंजीवाद के कारण सब तरफ फैले समर्पण, समझौतों को ओढ़े कविता एक तरफ हमारे समय की क्रूरताओं, स्खलनों और चालाकियों को अचूक तौर पर पहचान कर इंगित कर रही है, तो दूसरी ओर तमाम निराशाजनक स्थितियों को बताते हुए भी वह कुंठित नहीं है।
मानवीय जीवन व सभ्यता के प्रारंभिक दौर में ही समाज को परिचालित और नियंत्रित करने के लिए, नियमों और कानूनों की ज़रूरत के अहसास ने एक व्यवस्था को जन्म दिया। जिसमें लचीलापन, सहजता तथा परिस्थिति के अनुसार परिवर्तन की क्षमता मौजूद थी। समय के साथ ही साथ इसकी लचक ख़त्म होती दिख रही है तथा अपने अस्तित्व की सुरक्षा और वर्गीय स्वार्थों की पूर्ति की गरज से शासक वर्ग को रेशम के कीड़े की भांति अपने चारों ओर अपनी निरंतरता, तार्किकता, सार्वभौमिकता और शाश्वतता का तर्क जाल बुनना ज़रूररी हो गया। व्यवस्था या शासक वर्ग का यह तर्कजाल आम आदमी की मानसिकता पर हावी होने की कोशिश करता है। ऐसी स्थिति में आमजन या तो यथास्थिति को स्वीकार कर लेता है या फिर उससे मुठभेड़ करने की कोशिश करता है। समकालीन कविता ऐसी किसी भी स्थिति के अनुरूप अपने आप को सत्यापित करती है। जैसा कि नई कविता के कवि पर मनुष्य का दर्द, पीड़ा, यातना, टूटन और त्रासद की स्थिति का अहसास हावी है, किन्तु मुक्तिबोध सरीखे कवि को छोड़कर अन्य कवि के यहाँ यह व्यथा मुख्यत: आतंरिक और निजी है। मुक्तिबोध के यहाँ आम मनुष्य की चिंता केंद्र में है। मनुष्य किस तरह दो पाटों के बीच पिस रहा है उसकी पड़ताल मुक्तिबोध की कविता करती है "पिस गया वह भीतरी /औ बाहरी दो कठिन पाटों के बीच /ऐसी ट्रेजिडी है नीच।" अगर समानता के परिप्रेक्ष में बात की जाय, तो वह विचारों की एक ऐसी संगति है जिसके अंतर्गत ऐसे क्षेत्र आते हैं जो मानव के अपने व्यक्तित्व के विकास के लिए प्रयास से शुरू होकर सामाजिक अन्वेषण तक अपनी महती भूमिका निभाते हैं। जिसमें सबल और कमजोर दोनों ही न केवल साथ रहते हैं अपितु दोनों को समान सुनवाई के अधिकार भी प्राप्त होते हैं।
समकालीन कविता के निशाने पर वह व्यवस्था है जो समाज में समता, समानता व बंधुत्व के मार्ग में बाधक है। जो अपने वर्गीय स्वार्थों के तहत वास्तविकता की पहचान को हमेशा के लिए खत्म करने की फिराक में है। समकालीन कविता बड़े ही अच्छे तरीके से समय और समाज के मूल्यांकन पर बल देती है। उसे वह सब नापसंद है जिससे समाज की प्रगति अवरुद्ध होती है। समकालीन कविता समाज के उस वर्ग का नेतृत्व करती है, जो हाशिये पर है। जिसे प्रताड़ित किया गया है। जिसकी पक्षधरता समाज के बौद्धिक वर्ग का दायित्व है। समकालीन कविता की संघर्ष चेतना ही उसमें, आशा, आस्था और विश्वास पैदा करती है। वह इंसानी जिंदगी को बेहाल कर देनेवाली समस्याओं, मानवीय व्यक्तित्व को कुंद कर देनेवाली शक्तियों और मनुष्य की दुष्प्रवित्तियों की पहचान करती हुई दिखाई देती है। उससे बाहर निकालने के मार्ग को खोजती भी है। समकालीन कविता सामाजिक व्यवस्था के उन कारकों को प्रश्नांकित करती है जिसके कारण आमजन को दो जून की रोटी भी नसीब नहीं हो पा रही है। आमजन रोटी के अलावा कुछ सोच भी नहीं पा रहा है, साक्ष्य के तौर पर रोटी ही मनुष्य का सबसे बड़ा तर्क हो जाता है। अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति वह सोच भी नहीं सकता चूँकि "भुभुक्षिता किम न करोति पापंं" की उक्ति यहाँ चरितार्थ हो रही है। भूखे आदमी का सबसे बड़ा तर्क रोटी है।
समकालीन कविताएं मानवीय चिंता की कविताएं हैं, जिनमें समकालीन जिंदगी के दबावों को सहते हुए और आज के यांत्रिक और साम्राज्यवादी, पूंजीवादी समाज की विसंगति और तनावों में निरंतर टूटते हुए मनुष्य की यंत्रणा और त्रासदपूर्ण स्थिति के साथ ही साथ उसकी संघर्षशील चेतना शक्ति भी व्यक्त हुई है। आज के समय में कथनी और करनी में कितना अधिक अंतर आ गया है।
चंद्रकांत देवताले की कविता उस पर सवाल करती हुई मानवीय मानसिकता को उदघाटित करती है "आंकड़ों और सरकारी वक्तव्यों से /सट जाने पर /एक झूठे कुहासे के बीच /आइना गायब कर देना /वकालत है या खिलाफत /जानना जरुरी है /खासकर ऐसे समय में /जब कविता सीढ़ी नहीं है /और हमें आदमी से दूर /कहीं नहीं जाना हैं।"
भारतीय संविधान में वर्णित प्रावधानों का पालन कहाँ तक हो पा रहा है वह जग-जाहिर है। समकालीन कविता आज की रचनाशीलता में हुए संवेदनात्मक ह्रास को दिखलाती है। समता समानता की बात करने वाला राजनीतिक रूप से सबल शोषक वर्ग के चारित्रिक पतन को उदघाटित करते हुए उसकी भयावहता का नंगा नाच भी दिखलाती है। व्यक्ति स्वातंत्र्य की पक्षधरता करने वाला शासक वर्ग जब जनता की मुक्ति का प्रश्न आता है तब वह मौन हो जाता है। यह कैसी मुक्ति और कैसी नैतिकता है? समकालीन कविता उन समस्त संविधानिक प्रावधानों को जनता पर लागू करने की बात करती है तथा विवेचन एवं मूल्यांकन पर भी ध्यान आकर्षित करती है। समकालीन कविता जहाँ एक ओर शोषित जनों की विडंवनापूर्ण स्थिति का चित्रण करती है वहीं दूसरी ओर शोषक वर्ग के प्रतिनिधियों का भी कच्चा चिट्ठा खोलती है। "निर्धन जनता का शोषण है/कहकर आप हँसे/लोकतंत्र का अंतिम क्षण है/ कहकर आप हँसे/सब के सब हैं भ्रष्टाचारी कहकर आप हँसे/चारों ओर बड़ी लाचारी कहकर आप हँसे/कितने आप सुरक्षित होंगे/मैं सोचने लगा/सहसा मुझे अकेला पाकर/फिर से आप हँसे।"
आज जो कुछ लिखा जा रहा है, वह सब समकालीन नहीं है। समकालीनता एक जीवन-दृष्टि है जहाँ कविता अपने समय का आकलन करती है - तर्क और संवेदना की सम्मिलित भूमि पर। यह एक प्रकार से मुठभेड़ है, सर्जनात्मक धरातल पर, जहाँ वस्तुओं के प्रचलित नाम, अर्थ बदल जाते हैं। जीवन को कवति में एक सहारा मिलता है, औ यह सब होता है, एक नए मुहावरे में, जिसकी पहचान का कार्य सरल नहीं होता। जिसे मुक्तिबोध ने अभिव्यक्ति के खतरे उठाना कहा है। कठिनाई यह भी कि जीवन, यथार्थ और उसे व्यंजित करनेवाले कवि हमारे इतने पास होते हैं कि सही विवेचन का प्रयत्न भी कई कठिनाइयाँ उपस्थित करता है। समकालीनता की पहचान आसान नहीं है। इससे बचना चाहिए। वास्तविकता यह है कि अपने समय से आँख मिलाए बिना न रचना संभव है, न आलोचना। नारी के प्रति नई कवि-दृष्टि और कवयित्रियों की अकुलाहट को भी यहाँ स्थान मिला है, संभवतः पहली बार। समकालीनता को देखने-समझने का ईमानदार प्रयत्न दिखाई देता है। स्त्री-विमर्श यथार्थ में आधुनिकता और समकालीनता से जुड़ा हुआ प्रश्न है। इसे स्त्री-मुक्ति आंदोलनों से पृथक करके नहीं देखा जा सकता है। स्त्री-मुक्ति की अवधारणा भी विश्व में लोकतांत्रिक अवधारणाओं के उदय के फलस्वरूप ही प्रकाश में आई। स्त्री आज साहित्य रूपी प्रोडक्ट के लिए कच्चा माल ही नहीं रह गई है। स्त्री-विमर्श व दलित विमर्श आज हिन्दी साहित्य के केन्द्रीय सरोकार व विमर्श हैं। साठोत्तरी कविताओं के पश्चात समकालीन कविता ने स्त्री की सर्वथा नई भूमिकाएं और साहित्य में स्त्री रचनाकारों का सार्थक हस्तक्षेप दोनों ही उल्लेखनीय है। अब कविता में स्त्री "केवल श्रद्धा" ही नहीं है वह पितृसत्ता के दुर्ग द्वार पर दस्तक देती, लहूलुहान होते हुये भी अपनी मंजिल की ओर बढ़ रही है। समकालीन हिन्दी कविता मानवीय सरोकारों से जुड़ी हुई कविता है जो स्त्रियों, आदिवासियों, पीड़ितों को पूरी मानवीय गरिमा और संवेदनशीलता के साथ चिह्नित करती है। यह जहां स्त्री की समाज में स्थिति का यथार्थ चित्र प्रस्तुत करती है, वहीं उसके लिए नया विस्तार भी तलाशती है। समकालीन हिन्दी कविता में स्त्री न तो बिहारी की नायिका है न छायावादियों की एकान्त प्रणयिनी है बल्कि अपनी पूरी साधारणता, कमजोरियों और विशिष्टताओं के साथ विद्यमान है। वह स्वाभिमानिनी मजदूरिन है या कृषक बाला या कोई आम स्त्री है। समकालीन कविता उसे पूरी कलात्मकता के साथ व्यक्त करती है। समकालीन कविता स्त्रियों की आदतें, उनके दैनिक कार्यों का पूरा ब्योरा सहेजती है- "वह रोटी बेलती है जैसे पृथ्वी / ज्वालामुखी बेलते हैं पहाड़, भूचाल बेलते हैं घर, सन्नाटे शब्द बेलते हैं, भाटे समंदर।" आत्ममंथन भी करती है। खुद को ही सानती। खुद को ही गूँथती हुई बार-बार खुश है कि वह रोटी बेलती है - अनामिका की यह कविता स्त्री के घरेलू कार्यों को महिमामण्डित करती है। "स्त्री" की कमजोर छवि, अबला की छवि विलाप करती हुई छवि, पुरुष संरक्षण की आकांक्षी छवि को आधुनिक स्त्री तोड़ रही है। वहीं इस भूमण्डलीयकरण की बाजारवादी संस्कृति उसकी देह को विज्ञापन की वस्तु बनाकर पुन: उसकी मानवीय गरिमा को छीनने के लिए आतुर हैं। अधीनस्थ स्थिति का प्रतिवाद सविता सिंह अपनी कविता "मैं किसकी औरत हूँ" कविता में करती हैं और कहती हैं- "मैं किसी की औरत नही हूँ, मैं अपनी औरत हूँ, अपना खाती हूँ, जब जी चाहता है तब खाती हूँ, मैं किसी की मार नहीं सहती, और मेरा परमेश्वर कोई नहीं।" पुरुष से पृथक आज आत्मनिर्भर स्त्री एक स्वतन्त्र पहचान बना चुकी है। फिर भी घर-परिवार व समाज में वह दोयम दर्जे की ही नागरिक है। नारीवादियों को अभी एक लम्बी लड़ाई लड़ने की आवश्यकता है तभी स्त्री अपने संवैधानिक, सामाजिक व राजनैतिक अधिकारों का उपयोग कर सकेगी। भारतीय नारी मुक्ति आन्दोलन और समकालीन कविता में दिखाई देता है। आज भी भारतीय समाज में थोड़ा बहुत फर्क के साथ कोई बुनियादी परिवर्तन नहीं हुआ है। यहां सामन्तवाद, पूंजीवाद, समाजवाद सभी कुछ नमूने के तौर पर देखा जा सकता है। ऐसी स्थिति में आम भारतीय स्त्री को अपनी अस्मिता बचाने के लिए दोहरे-तिहरे मोर्चे पर संघर्ष करना पड़ रहा है। भारत में पुरुष आबादी का 70 प्रतिशत शोषित है और स्त्री दोहरे-शोषण दोहन एवं उत्पीड़न का शिकार है। यह रूप भी समकालीन कविता में दृष्टिगोचर होता है।
निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि समकालीन कविता प्रतिरोध और प्रतिबद्धता की कविता है। जिसमें समाज के नेतृत्व की समस्त कार्य विधि अन्तर्निहित है। समता, समानता व बंधुत्व समकालीन कविता की मूल अंतर्वस्तु है। जो समाज के सभी जाति-वर्ग के नेतृत्व की मांग करता है। समान पक्षधरता समकालीन कविता का केन्द्रीय फलक है। सामाजिक जड़ता से समवेत मुक्ति की आकांक्षा व अपनी जड़ों को पहचानने की संकल्पना का भाव लिए हुए है। समकालीन कविता की अपनी जमीन बहुत ही उपजाऊ एवं विस्तृत है। जो समय और समाज को जीवन्त बनाती है। सदियों की प्रताड़नाओं एवं भ्रष्ट नीतियों के शिकार बने लोगों के साथ संवेदनात्मक लगाव तथा मनुष्यत की तलाश समकालीन कविता की प्रमुख विशेषता है। समकालीन कविता सृजनात्मकता के उहापोह से मुक्त मानवीय जीवन से गहरा सरोकार रखती है।जो एक स्वस्थ्य समाज निर्माण के लिए महत्वपूर्ण एवं आवश्यक तत्व है। समकालीन कविता दिखावे से दूर यथार्थ के धरातल पर लिखी जा रही है।

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