ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
भारतवंशी और भारतीयता
01-Jan-2018 05:23 PM 2150     

व क़्त की रफ़्तार भी अजीब है। कभी सुस्त (जब बोरियत
हो) तो कभी तेज़ (जब ख़ुशगवारी हो)। देखो ना, अभी
पिछले साल ही तो नौ जनवरी को प्रवासी दिवस मनाया था। लो, अब फिर सामने आ खड़ा हुआ। ऐ उम्र-ए-रवां आहिस्ता चल। और किसी का नहीं तो हमारी बढ़ती उमर का ही लिहाज कर। इतने सारे नये फैशन के कपड़े रखे हैं। इस तेज़ रफ्तारी से सब बेकार हो जायेंगे। वैसे भी बालों में चांदी चमकने लगी है। चेहरे पर वेदों की ऋचायें तथा कुरान की आयतें लिखी जा रही हैं। (अरे जनाब झुर्रियां पड़ रहीं हैं), पतली कमर कमरा बन गयी है, अब लचकती नहीं। मध्य प्रदेश का विस्तार हो रहा है। उत्तर प्रदेश (हमारा सर) सिकुड़ रहा है, मतलब यादाश्त कम हो रही है। ये सब तेज़ गति के कारण हो रहा है। तेज़ गति से दुर्घटना का खतरा भी बना रहता है।
रफ़्तार और हादसे की बात आते ही "क्यों याद आ रहे हैं गुज़रे हुये ज़माने?" अच्छे भले गाँव या छोटे शहर में धीमी गति से जीवन यापन कर रहे थे। गांवों से शहर और शहरों से महानगरों की ओर भागने से ही सारी गड़बड़ी हुयी है। चलो इसे भी बर्दाश्त कर लेते; लेकिन तत्पश्चात युवा पीढ़ी को जो विदेश जाने की लत लग गयी उसने कर दिया बंटाढार। कोई विलायत को जन्नत समझ कर वहाँ जाना चाहता है, कोई पैसे कमाने के लिये। कारण कुछ नहीं हो, हम पूछते हैं "वहाँ कौन है तेरा मुसफिर जायेगा कहाँ?" जवाब हाज़िर - अमरीका जायेंगे। ठीक है भाई, लेकिन रहेंगे कहाँ, सोयेंगे कहाँ, खायेंगे क्या? विदेशों में बसे भारतीय भारत की तरह "अतिथि देवो भव" में यक़ीन नहीं रखते। इसलिये उनकी मेहमान नवाज़ी के भरोसे रहने का सपना मत देखना, वो लोग टका सा जवाब दे देंगे कि भैया अपना ठौर ठिकाना ढूंढ लो, तीन दिन के बाद मछली और मेहमान बदबू देने लगते हैं। इसीलिये अम्मा को फ़िक्र होती है कि लाडला गुज़ारा कैसे करेगा और अब्बा को चिंता होती है कि कुलभूषण कोई मेम वेम ना उठा लाये। दोनों सही हैं। समस्या है, निवारण कुछ नहीं। सब कुछ राम भरोसे। चलो अल्ला हाफिज़। बच्चा विलायत-पलट हो जायेगा। वापस आकर गिटपिट अंग्रेजी बोलेगा। पास पड़ोसी तथा रिश्तेदारों के आगे सर गर्व से ऊँचा हो जायेगा। और क्या चाहिये इस दुनिया में जीने के लिये! हम सलाम करते हैं इन नौनिहालों को जो ज्यों-त्यों करके समंदर पार भी चले जाते हैं और येन-केन-प्रकारेण गुज़ारा भी कर लेते हैं। जिन्होंने घर में कभी चाय की प्याली नहीं धोई (बनाना तो दूर की बात) वे वहां के भोजनालयों में बर्तन मांजते हैं, झाड़ू लगाते है (हमने लंदन हवाई अड्डे पर एक सरदारनी को खुद अपनी कमज़ोर आँखों से झाड़ू लगते देखा है)। यानि पापी पेट के लिये कुछ भी करेगा - परन्तु सिरफ विलायत में। भारत में तो ये औरतों के काम हैं। ऐसे अंग्रेज़ीदाँ नौजवानों पर तरस खाते हुए ही अकबर इलाहाबादी ने कहा था -
हुये इस क़दर मुहज़्ज़ब, कभी घर का मुंह ना देखा
कटी उम्र होटलों में, मरे अस्पताल जाकर
मज़े की बात तो ये है कि इतने जीवट वाले ये लोग अक्सर वो होते हैं जिन्हें अंग्रेजी नहीं आती। एक बार फिर इनकी जिजीविषा को सलाम।
भला हो कम्प्यूटर और सॉफ्टवेयर का, जिसने भारतीय युवाओं को गौरव प्रदान कर दिया। अब वे इज़्ज़त से अमरीका में बुलाये जाते हैं क्योकि मेहनत और बुद्धिमत्ता में हम हिंदुस्तानी अमरीकियों से आगे हैं। अब उन्हें गाड़ी, बंगला भी मिल जाता है। सुख सुविधा तक तो ठीक है, मगर उनसे ऊपर की वस्तुओं का क्या फ़ायदा अगर कोई देखकर प्रशंसा या ईष्र्या करने वाला ना हो। कहते हैं कि किसी सुंदर स्त्री को गहने, कपड़े और प्रसाधन का सामान देकर घर के आईने छुपा दो। सोचो बेचारी का क्या हाल होगा। बस कुछ कुछ वैसी ही स्थिति इन प्रवासी अमीरों की भी होती है। ना कोई इनकी अति आधुनिक गाड़ी की ओर देखता है, ना ही इनके कपड़ों की तरफ। देखें भी क्यों? खुद अमरीकी कच्छे-बनियान (ढीले वाले निकर तथा बिना बाहों की कमीज़) में घूमते हैं। भैया थोड़ा है, थोड़े की ज़रूरत है। बस! तो आ अब लौट चलें!
चलो यह तो हो गया। मगर पिक्चर अभी बाक़ी है बाबू। कुछ समय के बाद हरा पत्र (ग्रीन कार्ड) प्राप्त करके हमारे भारतवंशी सही मायनों में अमरीकी बन जाते हैं। समस्या समाप्त! नहीं साहब! यह तो प्रारम्भ है। इब्तदा-ए-इश्क़ है, रोता है क्या, आगे आगे देखिये होता है क्या। अब तक तो संघर्ष ही करते रहे। अब ज़रा स्थिरता आयी है तो ये लोग स्वदेश की बंशी बजाने लगे। नीड़ का निर्माण हो गया, पंछी को ठिकाना मिल गया तो वतन की याद सताने लगी। वापस जाने के लिये नहीं सिर्फ़ अपने वजूद को स्थापित करने के लिये। अब इनके दिल में अपनी सभ्यता, तरबियत भाषा और संस्कृति के लिये प्रेम हिलोरे लेने लगता है। पहले इंग्लिश-विंग्लिश नहीं आती थी तो एड़ी चोटी का ज़ोर लगा के वह भाषा सीख ली - करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान। पर विडंबना यह है कि अब वो अपनी मातृभाषा भूल गये। यही नहीं, अँग्रेज़ियत का ख़ुमार उतर गया, जन्नत की हक़ीक़त सामने आ गयी, अतः अपना धरम, करम, पूजा, अर्चना, यहां तक कि भाषा भी याद आ गयी। हिंदुस्तान के माँ-बाप भी इतने पुराण-पंथी नहीं हो सकते, जितने ये नूतन-अमरीकन हो गये (इतने वर्षों में वे युवक-युवतियां बड़े होकर माँ-बाप बन गये)। दरअसल उम्र से तो ये लोग बड़े हो गये किन्तु परिपक्व नहीं हुये। वो उम्र के उसी पड़ाव पर ठहर गये जहाँ से चल कर वे यहाँ आये थे। दुनिया में हर जगह आज भी लड़कों को सात खून माफ़ हैं। लड़कियों के सर पर ही सम्मान का ताज रखा जाता है। तो साहब, जिस देश में लड़के-लड़कियां स्वच्छंद घूमते हैं उसी देश को इन्होंने स्वेच्छा से चुना था, किन्तु अब जब अपनी बेटियों को स्वतंत्रता देने का मौक़ा आता है तो इन भारतवंशियों के दिल-ओ-दिमाग़ में वृन्दावन वाली बंशी बजने लगती है। लो कर लो बात।
वो कहावत सुनी है ना कि सावन के अंधे को हर तरफ़ हरा ही हरा नज़र आता है। इस हिसाब से पतझड़ के अंधे को हर ओर सूखा ही सूखा दृष्टिगोचर होता होगा, क्योंकि हमारे बिंदास, मॉडर्न, विद्रोही और नाराज़ युवा (अपने समय के) भारत पर हिकारत की नज़र डाल कर, खुद को अँगरेज़ की औलाद समझते हुये विदेश चले जाते हैं। कुछ वर्षों के बाद जब हमारे आधे-अधूरे अँगरेज़ - अमरीकी भारत लौटते हैं तो उन्हें एक सांस्कृतिक धक्का (ड़द्वथ्द्यद्वद्धठ्ठथ् द्मण्दृड़त्त्) लगता है। जिस हिंदुस्तान को वो छोड़ कर गये थे, वो तो वक़्त के साथ क़दम से क़दम मिला कर चलता हुआ आधुनिकता की दहलीज़ पर खड़ा मिलता है। लजीली, शर्मीली, साड़ी वाली कन्याएं जींस और स्कर्ट में घर की लक्ष्मण रेखा लांघकर ऑफिस भी जा रही हैं, साथ ही लड़कों के साथ डेटिंग भी कर रही हैं। इस बार वे स्वयं को पिछड़ा हुआ महसूस करते हैं।
यह तो होना ही था। कर्मफल आगे आ जाता है। अपनों को छोड़कर बेहतर दुनिया की ओर प्रस्थान करने वालों के अपने बच्चे साथ रह कर भी साथ नहीं रहते। अपने जहान में व्यस्त रहते हैं। उनकी त्रासदी उनका अकेलापन है जो उन्होंने खुद खरीदा है। अपनी सभ्यता, अपनी भाषा का तिरस्कार कर उन्होंने स्वयं अपने वजूद और अपनी पहचान को खतरे में डाला है। सत्यव्रत के त्रिशंकु बनने की कहानी कुछ-कुछ ऐसी ही है। अमरीका के भोगवाद और व्यक्तिवाद वाले स्वर्ग की खातिर सत्यव्रत से त्रिशंकु बन कर जीना कोई सुखमय भविष्य नहीं देने वाला। अंत में अपने अस्तित्व की गरिमा और संस्कृति के विकास के लिये अपनी भाषा और सभ्यता को पूरी तरह ग्रहण करना होगा। अपनी जड़ों की ओर लौट कर आना ही होगा।

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