ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
विदेशी कलेवर में भारतीयता
01-May-2019 04:53 PM 193     

यूरोप प्रवास (पोलैंड) में हिंदी भाषा और साहित्य को नए सिरे से देखने का अवसर मिला है। यह देख पढ़कर आश्वस्ति का भाव प्रगाढ़ हुआ है कि हिंदी की भाषायी और साहित्यिक ताकत समाज में प्रभावी स्थान बनाए हुए है। विशेषकर सुदूर सात समुद्र पार से प्रवासी साहित्यकार जो लेखन कर रहे हैं, वे समाजशास्त्र की शाश्वत तस्वीर प्रस्तुत करते दिखाई पड़ रहे हैं। प्रवासी साहित्यकारों की साहित्य-सृजन की प्रक्रिया में उनकी मूल आत्मा की रंगत देखने को मिलती है। डेनमार्क में हिंदी की ध्वजा उठा रहीं अर्चना पैन्यूली की कुछ कहानियों का पाठ बेहद रुचिकर लगा है। एक बिंब जो वर्षों से मूर्ति की एकरूपता में जकड़ा था। नानाविविध छवियों के साथ जिस तरह मूर्ति की महत्ता को स्थापित करता है, वह संवेदना की अनेक पर्तों को तोड़ कर भीतर उतर गया है।
भारत से सुदूर पश्चिमी धरातल की पृष्ठभूमि को लेकर कहानी-लेखन में मील का पत्थर बनने वाली कहानीकार अर्चना पैन्यूली का नाम प्रवासी साहित्य में ही नहीं मानव जगत् की सूक्ष्म संवेदनाओं को जाहिर करने के कारण विश्व-साहित्य में उभर रहा है। उनकी कहानियों में "माँ" शब्द के तमाम रूपों की झलक प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद और मन्नू भंडारी की याद दिलाती है। 18 कहानियों में विशेष्य "माँ" के विभिन्न विशेषणों से सुशोभित धरती माँ, मदर बोर्ड, गौमाता, ऐ माँ, गे माँ, सासू माँ, कुँवारी माँ, सौतेली माँ, सेरोगेट माँ, फोस्टर माँ आदि।
आत्मा को व्याख्यायित करने वाली कहानीकार ने माँ को मात्र गर्भधारण करने की सीमित परिसीमा से उठाकर, उसके विशाल और महातम स्वरूप को उजागर किया है। वास्तव में माँ का विशाल रूप यशोदा का है न कि देवकी का, लेखिका ने माँ के इसी स्वरूप को अपनी कहानियों में उकेरा है। "माँ" माँ होती है, जीवन में नित्य परिवर्तनों, परिस्थितियों, दबावों के कारण उसके स्वभाव में भी मानव की दुर्बलताएं होती हैं। इतना सभी कुछ होने पर भी माँ हमेशा अपनी संतान के साथ खड़ी होती है। उसके लिए संजीवनी का कार्य करती है। डेनमार्क की पावन धरती पर जहाँ माता-पिता 18 वर्ष की आयु में संतान को स्वच्छ जीवन, आत्मा-भिमानी, आत्म निर्भर होने के लिए छोड़ देते हैं, वहीं दुर्दिनों में, समस्याग्रस्त होने पर संतान के साथ खड़े होते हैं। निश्चित रूप से यूरोपीय जीवन शैली का ढंग अपना है। परन्तु उसकी नियति भारतीय ही है। कहानीकार अर्चना की सभी कहानियों में यही भाव देखने को मिलता है। बेघर की कुसुम और सौतेली माँ लता के बीच झूलते राहुल को दादी माँ और नानी माँ का आश्रय मिलता है। कुसुम सगी माँ होते हुए भी उसे अपने पास नहीं रख पाती। एक छोटी सी चाह में स्वाती मोलर पीटरसन शुरू से ही यह जानती है कि इवा उसकी सगी माँ नहीं है, वह अपनी माँ से अपने नाम का अर्थ जानना चाहती है और किशोरावस्था की शारीरिक मानसिक बदलावों के कारण वह कौन है, उसके माता-पिता कौन हैं? यह सभी कुछ जानना चाहती है। अत्यधिक दबावों के कारण इवा को बताना पड़ता है कि उसे वह श्रीनिवास अप्पा के दफ्तर से गोद लेकर आये थे। वह तमिल परिवार की लड़की है। वह अपने माता-पिता के साथ उस जगह को देखना चाहती है जहाँ उसका बचपन बीता था। उस जगह जाने पर उसे अपनी माँ इवा के प्रति स्नेह उभर कर आता है। राजदूत द्वारा उसके नाम का अर्थ बताये जाने पर वह बहुत खुश होती है। उसके कारण इवा का घर खुशियों से भर गया और वह कहती है, "मैं तुम्हें निरंतर प्यार करूंगी तुम्हें हमेशा प्यार करूंगी, जब तक मैं जीवित रहूँगी, मेरी बच्ची तुम भी रहोगी..."
"कितनी माँएं हैं मेरी" कहानी में नीलाभ और इवोना के संबंधों को एक आदर्श भारतीय परिवार के रूप में देखा गया है। नीलाभ को जन्म देने वाली माँ मुस्लिम थी और उसकी सौतेली माँ सिख थी। जन्म देने वाली माँ की तस्वीर भी नीलाभ को याद नहीं थी। सौतेली माँ से उसकी कभी पटी नहीं। दादा-दादी ने उसे पढ़ाया लिखाया, पत्नी इवोना (ऑस्ट्रेलिया निवासी है) के साथ रहते हुए उसे एक दिन पता चलता है कि उसी एक बहन नीलोफर है और उसकी जन्म देने वाली माँ मरने वाली है। यह सुनकर वह अपनी पत्नी के साथ पाकिस्तान माँ के पास पहुँचता है। माँ के मरने के उपरांत खामोश नील से इवोना कहती है, "यह इतना महत्व नहीं रखता है कि हम अपना जीवन कैसे शुरू करते हैं, महत्वपूर्ण यह होता है कि हम अपना जीवन कैसे खत्म करते हैं। माँ ने तुम्हारी बाँहों में दम तोड़ा... तुम्हें तुम्हारी माँ मिल गई... और मैंने अपनी सास के दर्शन कर लिए।"
"आई एम प्राउड ऑफ यू माँ" कहानी में आरव को पता चल जाता है कि उसको जन्म देने वाली माँ उसकी चाची थी। चाची की बीमारी में आरव अपनी माँ के साथ उसका इलाज कराने के लिए डेनमार्क से भारत आता है। मानवीय दुर्बलताओं के कारण उसकी माँ उसके छिन जाने के कारण आरव को भारत नहीं भेजना चाहती। परन्तु आरव की जिद के कारण उन्हें वहाँ पहुँचना पड़ता है। चाची के इलाज के लिए डोनर के बजाए उसकी माँ अपना लीवर देकर अपनी देवरानी को बचाती है और आरव कहता है, "आई एम प्राउड ऑफ माँ।"
नारी ही नहीं पशुओं में फैनी और गौमाता में भी माँ का चरित्र संवेदनाओं से भरा हुआ है। अपनी संतान के प्रति अगाध प्रेम की गंगा रुला देती है। फैनी कहानी में फैनी का सेठ के घर जाकर रहना मात्र माँस हेतु नहीं है अपितु अपनी संतान की ममता के कारण वह वहाँ रहने लगती है। इनकी कहानियों में घटनाक्रम दृश्यबद्ध होता चला जाता है। आँखों के समक्ष कहानी के साथ-साथ जिज्ञासा का भाव बराबर बरकरार रहता है। कहानी चरमसीमा पर पहुँच कर एक निश्चित उद्देश्य देने में सफल होती है। भाषा की सहजता सरलता और विज्ञान की छात्रा होने के कारण ज्ञान-विज्ञान से परिपूर्ण इनकी कहानियाँ हृदय को छूती हैं। एक उचित उद्देश्य के निमित्त लिखी कहानियाँ हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि के रूप में जानी मानी जायेंगी। इनकी कहानियाँ छात्रों के पाठ्यक्रम में लगाने वाली उद्देश्यपरक, ज्ञान परीक्षण से परिपूर्ण प्रशंसनीय है। विदेशों में कई जगहों पर इनकी कहानियाँ पढ़ाई जाती हैं।

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