ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
भारत मेरे सपनों का देश
01-Mar-2019 03:10 PM 879     

11 फरवरी, 1947 को भारत के मुम्बई महानगर में जन्मी डॉ. कुलसुम बशर मजूमदार वहीं पली-बढ़ी और वहीं उन्होंने शिक्षा ग्रहण की है। विवाह के बाद वे बांग्लादेश आ गईं, लेकिन आज भी भारत में बीते दिनों को वे अपना स्वर्णिमकाल मानती हैं। ढाका विश्वविद्यालय से उर्दू व फारसी विषयों में एम.ए., फिरदौसी विश्वविद्यालय मसद, ईरान से फारसी में एम.फिल. तथा मुम्बई विश्वविद्यालय से उर्दू में पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। आपके जन्म के समय भारत-पाक बँटवारा हुआ तो अध्ययन-अध्यापनकाल में बांग्लादेश के मुक्तियुद्ध तथा ईरानी क्रान्ति की साक्षी रहीं। 1973 से ढाका विश्वविद्यालय में शिक्षण कार्य प्रारम्भ कर जून 2012 में सेवानिवृृत्त हुईं, किन्तु उनकी विशेष सेवाओं के दृष्टिगत उन्हें 2013 में पाँच वर्षों के लिए सम्मानपूर्वक नियुक्ति दी गई। यहाँ हिन्दी शिक्षण के पुष्पन-पल्लवन में इनका विशेष योगदान रहा है। प्रस्तुत है डॉ. योगेश वासिष्ठ द्वारा उनसे की गई विस्तृत बातचीत के सम्पादित अंश :
आपका हिन्दी भाषा की ओर रुझान किस प्रकार हुआ?
मेरे माता-पिता कामकाज के लिए 1944 में मुम्बई चले गए थे और वहीं 1947 में मेरा जन्म हुआ। वहाँ के परिवेश में हिन्दी आम थी। जब मैं आठ वर्ष की थी तब हिन्दुस्तानी प्रचार सभा बम्बई से जुड़ गई जिसके तहत साप्ताहिक रूप से मेरे स्कूल में ही हिंदी सीखने की दो घंटे की कक्षा लगती थी। इस एक वर्षीय पाठ्यक्रम उत्तीर्ण करने पर मुझे संस्था के सदर श्री मोरारजी देसाई (पूर्व भारतीय प्रधानमंत्री) से हस्ताक्षरित प्रमाण-पत्र मिला। उस दौर में वहाँ के स्कूलों में विद्यालयी शिक्षा के अन्तर्गत कक्षा पाँचवीं से हिन्दी पढ़ाई जाती थी। इस प्रकार मेरा यह हिन्दी सीखने का सिलसिला बी.ए. कक्षा तक जारी रहा।
आपका बांग्लादेश में किस प्रकार आना हुआ?
मेरा पैतृक घर मूलतः नौआखली, बांग्लादेश में था। 1966 में बी.ए., इतिहास ऑनर्स करने के दौरान ही मेरा विवाह कुमिल्ला में हो गया। इस प्रकार मैं अपना स्नातक पूर्ण कर यहाँ (तत्कालीन पू. पाकिस्तान) आ गई। बंगाली होते हुए भी हमारे घर में तो उर्दू का ही प्रयोग होता था, इसलिए मुझे उस वक्त तक बांग्ला भी नहीं आती थी और टूटी-फूटी बांग्ला बोलकर ही मैं यहाँ काम चलाती थी। वर्ष 1969 में उर्दू मीडियम के एक स्कूल में अध्यापिका रूप में काम करना आरम्भ किया। उसके बाद 1970 में मोतीझील के सरकारी स्कूल में मेरी नौकरी लग गई।
विद्यार्थी जीवन की कुछ बातें बताएँ।
मेरे माता-पिता अनपढ़ थे किन्तु मुझे स्कूल से ही अध्यापकों का भरपूर स्नेह मिला। मैं पढ़ाई के अलावा खेलों में भी भाग लेती थी। जब मैं चौथी कक्षा में पढ़ती थी तो शिवाजी पार्क, दादर में मैंने सौ मीटर की दौड़ में भाग लेकर तीसरा स्थान हासिल किया। जब मैं अंजुमन ए इस्लाम गल्र्स हाई स्कूल माहिम में पढ़ती थी तो प्रसिद्ध फिल्मी गायक मोहम्मद रफी की बेटी वहाँ मेरी सहेली बन गई थी। 1963 में मैट्रिक करने के बाद बांद्रा के नेशनल कॉलेज में पढ़ने गई तो वहाँ पर पढ़ने वाली मुस्लिम लड़कियाँ दस से भी कम होंगी, जिनका प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता अमजद खान और उनके बड़े भाई इम्तियाज़ खान जो उस वक्त वहाँ विद्यार्थी थे, बहुत ध्यान रखते थे। अमजद खान उन दिनों दर्शन शास्त्र में बी.ए. कर रहे थे और नाटकों में खूब भाग लेते थे, इस तरह मुझे उन्हें निकट से जानने का अवसर मिला।
हिन्दी साहित्य में क्या अच्छा लगता है?
बचपन से ही कहानियाँ पढ़ने का शौक रहा है। छात्र जीवन में दत्त भारती, कृष्ण चंदर, प्रेमचन्द आदि साहित्यकारों की रचनाएँ पढ़ीं। प्रेमचन्द की रचनाएँ तो उर्दू-हिन्दी दोनों ही भाषाओं में पढ़ी हैं।
ढाका विश्वविद्यालय से कैसे जुड़ीं?
अध्यापिका होने के बाद 1970-71 में इस वि.वि. से एम.ए. उर्दू करना प्रारम्भ किया। प्रथम वर्ष उत्तीर्ण करने पर बांग्लादेश मुक्ति संग्राम प्रारम्भ हो गया। हम उस वक्त ढाका के राजाबाग इलाके में पुलिस हैडक्वार्टर के सामने रहते थे। हमने घर की खिड़की से युद्ध के दौरान लाशों के अम्बार देखे। वे हृदय विदारक दृश्य थे, जिसकी मैं साक्षी रही। इस बीच विश्वविद्यालय बन्द रहा और एक वर्ष से अधिक तक कक्षाएँ नहीं हो पाईं। बांग्लादेश बनने पर लगभग सभी उर्दू शिक्षक पाकिस्तान चले गए। उर्दू विभाग लगभग खाली हो गया था, मात्र एक शिक्षक रहे थे। वर्ष 1973 में एम.ए. उर्दू पूर्ण करते ही जुलाई मास में मुझे वहाँ उर्दू शिक्षक पद पर नियुक्ति मिल गई। बाद में मैंने इसी विश्वविद्यालय से फारसी में एम.ए. किया और 1978 में छात्रवृृत्ति प्राप्त कर ईरान जाकर मसद की फिरदौसी यूनिवर्सिटी से फारसी में एम.फिल. किया। दुर्योग से वहाँ भी उस वक्त मेरे अध्ययन के दौरान युद्ध जैसे हालात हो गए थे।
ढाका विश्वविद्यालय में हिन्दी विषय कैसे प्रारम्भ हुआ?
विश्वविद्यालय में अध्यापन के दौरान 1981 से मैं आधुनिक भाषा संस्थान में भी फारसी पढ़ाने लगी थी। तब मैंने शैक्षिक समिति की बैठकों में अनेक बार प्रतिवेशी देश भारत की मुख्य भाषा हिन्दी को भी यहाँ प्रारम्भ करने का प्रस्ताव दिया किन्तु यह स्वीकार न हो सका। राजशाही विश्वविद्यालय में भी हिन्दी पाठ्यक्रम प्रारम्भ होने के बहुत बाद वर्ष 2006 में तीन मास का हिन्दी लघु पाठ्यक्रम प्रारम्भ हो सका। इसमें मैंने और मेरी छोटी बहन शमीम बानो, जो वहाँ पहले से ही फारसी विषय की एसोसिएट प्रोफेसर थी, ने इसका पाठ्यक्रम तैयार कर इसे पढ़ाना प्रारम्भ किया। पहले सत्र में कुल ग्यारह छात्रों ने प्रवेश लिया। वर्ष 2015 में कनिष्ठ प्रमाण-पत्र पाठ्यक्रम प्रारम्भ होने तक लघु पाठ्यक्रम के दस सत्र सम्पन्न हुए, जिसमें लगभग 140 छात्रों ने प्रवेश लेकर सौ से अधिक ने प्रमाण पत्र हासिल किया।
हिन्दी के छात्रों का भाषा की ओर कैसा रुझान रहता है?
हिन्दी छात्रों का शुरुआत से ही रुझान सकारात्मक रहा है। जो बांग्लादेशी पर्यटन या व्यवसाय आदि कारणों से भारत जाना चाहते हैं, वे हिन्दी सीखना चाहते हैं। हिन्दी व बांग्ला दोनों का विकास संस्कृत से हुआ है, इसलिए इनके बहुत से शब्द मिलते जुलते हैं। दोनों भाषाओं की वर्णमाला लगभग समान है, बस लिपि का अन्तर है। यहाँ हिन्दी फिल्में व धारावाहिक खूब देखे जाते हैं। इस कारण ये छात्र बहुत ही जल्दी इसे सीख जाते हैं।
बांग्लादेशी छात्रों को हिन्दी सीखने में कौन-सी मुश्किलें आती हैं?
छात्रों को सर्वाधिक कठिनाई लिंग निर्धारण को लेकर रहती है। इन्हें यह समझने में मुश्किल होती है कि "सुबह" क्यों स्त्रीलिंग है और "दिन" पुÏल्लग है। इसे लेकर इन्हें लिखने व बोलने में सामान्यतः गलती रहती ही है। दूसरा इन्हें शब्दों के उच्चारण को लेकर विशेष समस्या रहती है।
विगत दस-पन्द्रह सालों में यहाँ की हिन्दी की स्थितियों में क्या अन्तर महसूस करती हैं?
पहले तो मैं और मेरी छोटी बहन शमीम ने ही हिन्दी पढ़ाना शुरू किया था। बाद में जब वर्ष 2011 में भारत सरकार द्वारा ढाका स्थित इन्दिरा गाँधी सांस्कृतिक केन्द्र में हिन्दी विषय के शिक्षण के लिए शिक्षक भेजा जाने लगा तो भारतीय उच्चायोग के निर्देश से इस हिन्दी शिक्षक की सेवाओं का लाभ विश्वविद्यालय स्थित आधुनिक भाषा संस्थान को भी मिलने लगा। तब से प्रतिवर्ष यहाँ विश्व हिन्दी दिवस पर विशेष कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। भारत सरकार द्वारा संस्थान की चौथी मंजिल पर हिन्दी तल का निर्माण किया गया है, जिसका जून 2015 में भारतीय प्रधानमन्त्री द्वारा उद्घाटन किया गया। अभी तक 2015 से प्रारम्भ हुए कनिष्ठ प्रमाण पत्र पाठ्यक्रम के तीन सत्र सम्पन्न होने पर इस सत्र में वरिष्ठ प्रमाण पत्र पाठ्यक्रम भी शुरू हो चुका है। इन्दिरा गाँधी सांस्कृतिक केन्द्र द्वारा वार्षिक हिन्दी पत्रिका "गरिमा" प्रकाशित होने लगी है। यहाँ हिन्दी पीठ भी स्थापित हो गई है। इस प्रकार इस भाषा सम्बन्ध में निरन्तर सकारात्मक परिवर्तन हुए हैं।
बांग्लादेश में हिन्दी विकास की क्या सम्भावनाएँ हैं?
भाषा किन्हीं दो देशों के सांस्कृतिक सम्बन्धों को मजबूत बनाती है। भारत बांग्लादेश की साँझी सांस्कृतिक विरासत है। इसलिए हिन्दी इन दोनों देशों के बीच महत्वपूर्ण सेतु हो सकती है। यहाँ पिछले अनेक दशकों से बेतार सेवा के माध्यम से हिन्दी के कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं। यह इन दोनों के व्यवसाय सम्बन्धों में भी कारगर हो सकती है। भविष्य में यहाँ हिन्दी का स्नातक स्तर पर ऑनर्स कोर्स शुरू हो सकता है। यहाँ स्थानीय शिक्षकों की नियुक्ति हो सकती है। यहाँ के छात्र जो केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा अथवा अन्य भारतीय विश्वविद्यालयों में जाकर हिन्दी का अध्ययन कर रहे हैं, वे भविष्य में चलकर अवश्य हिन्दी के शिक्षक या साहित्यकार के रूप में उभरेंगे।
अन्त में, भारत के बारे में कुछ कहना चाहेंगी?
भारत तो मेरे बचपन का झूला है। वहाँ मैंने बचपन के महत्वपूर्ण बीस साल गुजारे हैं। मुम्बई में बिताए उन सुनहले दिनों को मैं आज भी याद करती हूँ। मुम्बई से आज भी रिश्ता बना हुआ है और दो-तीन सालों में वहाँ जाना होता रहता है। जब कभी मुझे भारत के किसी शहर में सेमिनार में जाने का अवसर मिलता है तो मैं मुम्बई जाना नहीं भूलती। भारतीय राष्ट्रगान "जन-गण-मन" को सुनकर आज भी मुझमें वही संस्कार जाग उठता है और मैं खड़ी हो जाती हूँ। जब भी मैं अकेली होती हूँ तो बचपन की सहेलियों के बारे में सोचती हूँ। भारत को मेरे सपनों का देश कहना गलत नहीं होगा।

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