ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
अज्ञान-तिमिर से ज्ञान-वर्चस् की ओर
01-Nov-2018 10:29 AM 148     

यह पवमान मन्त्र या पवमान अभ्यारोह है, जो वैदिक युग में ज्योतिष्टोम (ज्योतिस् स्तोम या ज्योति यज्ञ) के समय गाया जाता था। वैदिक संस्कृति में पवन और पावक को पवित्र (पूङ्, पवित्र करना) करने वाला माना गया। "पवमान" (पूङ्, पवित्र करना और शानच् प्रत्यय) में दोनों अर्थ निहित है। बाह्य पवित्रता अथवा शुचि के लिए पवन और पावक आवश्यक तत्त्व हैं, किन्तु आभ्यंतर कैसे पवित्र हो, यही पवमान अभ्यारोह का प्रतिपाद्य है।
साधारणतया इस औपनिषदिक मन्त्र के तीनों वाक्यों (यजु) का अलग-अलग अर्थ कर विचार किया जाता रहा है, जो समीचीन नहीं कहा जा सकता है। ऋषि ने इस मंत्र में तीन आरम्भ विन्दु लिया है और तीन अंत विन्दु। वह इसी आरम्भ से अंत तक चलने की बात कहते हैं। अतएव हम असत्, तमस् और मृत्यु को आरम्भ अवस्था कहें और सत्, ज्योति और अमृत को जीवन का लक्ष्य जानें।
असत् या असत्य क्या है? सत् की व्युत्पत्ति है - अस धातु (होना) और शतृ प्रत्यय। इसलिए जिसका अस्तित्व है, वह सत् अथवा सत्य है। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि असत् या असत्य का अस्तित्व नहीं हो सकता है। असत् के अलावे ऋषि तमस् यानि अंधकार और मृत्यु को भी आरम्भिक अवस्था मानता है, अतएव यह कहा जा सकता है कि अंधकार का भी कोई अस्तित्व नहीं है, बल्कि यह प्रकाश का अभाव मात्र है। इसी तरह मृत्यु का भी कोई अस्तित्व नहीं है, बल्कि यह जीवन का रूपांतरण है। जिस तरह आँखों पर पट्टी बाँधकर कोई अपने लिए अंधकार का सृजन कर सकता है, उसी तरह जीवन के रूपान्तरण को नहीं देख पाना मृत्यु है। मनुष्य वास्तव में अमृतपुत्र है। वैदिक ऋषियों ने असत् को इन्हीं कारणों से मृषा ज्ञान, मिथ्या, अनृत (अन्, नहीं; ऋत, शाश्वत) या वितथ (वि, नहीं; तथा, वैसा) कहा। श्रीमद्भगवद्गीता 2.16 में श्रीकृष्ण कहते हैं, "नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।", अर्थात् जो असत् या अस्तित्वहीन है; जो न भूत में था, न वत्र्तमान में है और न भविष्य में होगा; उसका भाव (जन्म या प्राकट्य) नहीं हो सकता है और जो सत् या सार्वकालिक अस्तित्व वाला है उसका अभाव नहीं हो सकता है। अतएव तमस (अंधकार या मानसिक अंधकार) और मृत्यु का भी कोई भाव नहीं होता है। ये अभाव की अवस्था हैं। जब ज्योति अथवा ज्ञान दीप प्रज्ज्वलित होती है तब अंधकार खत्म हो जाता है। इसी तरह जीवन का कभी अभाव नहीं हो सकता है। वह अनादि काल से चलता आ रहा है और अनंत समय तक चलता रहेगा। जीवन ही सत् (सत्य) है। पवमान मन्त्र, इस प्रकार अनस्तित्व से अस्तित्व की ओर जाने की बात कहता है।
पवमान अभ्यारोह (सर्वतोभावेन चढ़ना) की एक व्याख्या इस प्रकार भी की जाती है। असत् (झूठ) और तमस (अज्ञान) ये दोनों मृत्यु हैं। मृत्यु से बचकर वह अमृत बन जाता है, जो झूठ और अज्ञान (तमस) से बचकर सच्चाई और ज्ञान (ज्योति) का रास्ता चुनता है। इस मंत्र का नाम अभ्यारोह है, क्योंकि इसके जप से उद्गाता निचले जीवन से ऊपर चढ़ता है।
भारतीय संस्कृति में ज्ञान को ही अंतज्र्योति कहा गया है। बाह्य ज्योति से जगत प्रकाशित होता है और अंतज्र्योति से अंतःकरण (मन, बुद्धि, अहंकार)। योग साधना में इसी आत्मा की ज्योति से अंतःकरण को आलोकित किया जाता है। ज्योति के अन्य पर्यायवाची शब्द - प्रकाश, आलोक, भा, प्रभा, आभा, द्युति, कांति, दीप्ति, तेजस्, रुचि, भास्, वर्चस् इत्यादि हैं। अंग्रेजी का लाईट (थ्त्ढ़ण्द्य) शब्द लैटिन के थ्द्वड़ड्ढद्धड्ढ और संस्कृत के लोकृ भासार्थः से बना है। लोकृ से ही आलोक की व्युत्पत्ति होती है।
वास्तव में प्रकाशित जीवन का अर्थ है - अविषमता, उल्लास, प्रफुल्लता, निश्चिन्तता, ज्ञान, बोध, प्रसिद्धि और सम्यक् दृष्टि से जीवन का युक्त होना। भारत में शरद ऋतु सर्दी (शरद से व्युत्पन्न) का सूचक है। इसमें दो महीने आते हैं - आश्विन (सितम्बर-अक्टूबर) और कार्तिक (अक्टूबर-नवम्बर)। कार्तिक से जाड़ा बढ़ जाता है। जाड़ा प्रकृति को जड़वत् कर देता है। यह आलस्य का समय है। जीव शीत-निद्रा में चले जाते हैं। हमारी संस्कृति जड़ता या आलस्य (लास्य का न होना) को अंधकार कहती है और कर्मठता या उल्लास (ज़्यादा लास्य होना) को प्रकाश। भारतीय पर्व-त्यौहार लास्य नृत्यरत पर्वन् पुत्री पार्वती के उल्लास का प्रतीक है। कार्तिक माह की अमावस्या (अ, अर्क और म, चन्द्र का साथ वसना) पर गहन अंधकार को चुनौती देते हुए दिवाली, दीपावली या दीपोत्सव का पर्व जड़ता पर गति, आलस्य पर उल्लास, असत् और अज्ञान से निर्मित मृत्यु तुल्य अंधकार पर सत् और ज्ञान से निर्मित जीवन के प्रकाश की विजय का प्रतीक है। बौद्धमत में दीयों का जलना जीवन है और बुझ जाना निर्वाण (बाती का जल जाना)।
कार्तिक माह के अन्य पर्व-त्यौहार धन्वंतरि जयन्ती (धनतेरस), नरक चतुर्दशी, काली पूजा, गोवर्धन पूजा, भैया दूज (भ्रातृ द्वितीया), छठ और देवोत्थान एकादशी हैं। ये सभी त्यौहार जीवन के सकारात्मक पक्ष को उजागर करते हैं। मसलन, धन्वंतरि जयन्ती स्वास्थ्य के देवता आयुर्वेद के जनक धन्वन्तरि की जयन्ती है। यह पर्व "स्वास्थ्य ही धन है" का संदेश देता है। नरक या नर्क का अर्थ है - न अर्क यानि प्रकाश का नहीं होना। नरक चतुर्दशी में मृत्यु के देवता यम को दूर रहने को और जीवन को प्रकाशित करने की प्रार्थना की जाती है। दिवाली के रात्रि में बंगाल में काल की अधिष्ठात्री काली (श्यामा) की पूजा की जाती है। दिवाली या प्रकाशोत्सव भारत के सभी मतावलंबियों के द्वारा किसी न किसी रूप में मनाया जाता है। हिन्दू इसे राजा बलि से लक्ष्मी के मुक्ति दिवस अथवा राम के अयोध्या लौटने की खुशी में मनाते हैं। जैन इसे तीर्थंकर महावीर के मोक्ष दिवस, तो सिख इसे अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर की स्थापना दिवस के रूप में मनाते हैं। वैसे पूरे कार्तिक माह आकाशदीप जलाने की भी परंपरा है। दिवाली की सुबह गोवर्धन पूजा होती है। वेदों में सभी गमन करने वाले को गो कहा गया। अतएव गो का अर्थ गाय के अतिरिक्त इन्द्रियाँ, जल, धरती, तारे, नक्षत्र और प्रकाश भी हैं। गोवर्धन पूजा वास्तव में संसार के सभी गतिशील और ज्योति तत्त्वों की पूजा है। दिवाली का समापन भारत के कतिपय प्रदेशों में भ्रातृ द्वितीया या भैया दूज के रूप में मनाया जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार इस दिन यम अपनी बहन यमुना के यहाँ आते हैं और आतिथ्य से तृप्त होकर यमुना को अखण्ड सौभाग्य (सुहाग) का आशीर्वाद देते हैं। यम का शाब्दिक अर्थ है - रोकना। मृत्यु के देवता यम जीवन को रोकते हैं और यमुना प्रयाग (आदि यज्ञ भूमि) में गंगा को। अतएव यमुना के भाई यम हैं।
कार्तिक माह का एक महत्वपूर्ण त्यौहार छठ है। छठ या छठी वास्तव में गौरी और शिव पुत्र देवसेनापति कार्तिकेय का जन्म उत्सव है। कार्तिकेय की धात्री माताएँ कृत्तिकाओं को कहा गया। कृतिका (घ्थ्ड्ढत्ठ्ठड्डड्ढद्म) भचक्र (न्न्दृड्डत्ठ्ठड़) का तीसरा नक्षत्र है। इसमें छह तारे दृश्यमान होते हैं और एक नहीं दिखता है। अतएव इन्हें छठी माता या सप्तमातरम् के रूप में जाना जाता है। कृतिका नक्षत्र की आकृति अस्तुरे के रूप में कल्पना की जाती है और अग्नि को इनका अधिदेवता कहा जाता है। कृतिकाएँ वास्तव में स्त्री-शक्ति का प्रतीक हैं। पौराणिक कथा के अनुसार शिव के बीज को अग्नि अथवा रुद्र प्राप्त करते हैं और उसे कृत्तिकाओं को देते हैं। छह कृत्तिकाओं से जन्म पाने के कारण कार्तिकेय षण्मुख या छह सिर वाले स्कंद कहे जाते हैं। छठ पर्व पर महिलाएँ सद्यप्रसूता स्त्रियों की तरह अत्यंत पवित्रता से व्रत करती हैं और सूर्य (सवितृ) देवता की उपासना करती हैं। वेदों में सूर्य यानि सविता देवता को जगत का प्रसव करने वाला (प्रसविता) कहा गया है।
कार्तिक माह के अन्य दो महत्वपूर्ण त्यौहार आँवला (अक्षय फल) नवमी और देवोत्थान एकादशी या तुलसी विवाह है। आयुर्वेद में आँवला को धात्री (पालनकत्र्री) और तुलसी को औषधि-तुल्य कहा गया है। कार्तिक तुला (ख्र्त्डद्धठ्ठ) राशि स्थित सूर्य का महीना है, अतएव इस समय प्रकृति में सबकुछ संतुलन में रहता है। कार्तिक माह का नामकरण कार्तिक पूर्णिमा के समय चाँद का कृत्तिका नक्षत्र के निकट होना है।
वर्षा ऋतु के समापन के बाद दशहरे में घर और देवालयों की सफाई की जाती है। दिवाली में दुकान-प्रतिष्ठान साफ-सुथरा किया जाता है। छठ पर्व में नदी-तालाब और घाटों को पवित्र किया जाता है। फिर देवोत्थान एकादशी में खलिहान साफ किया जाता है। इस तरह कार्तिक स्वच्छता या पवित्रता का महीना है, जो अज्ञान-तिमिर से ज्ञान-वर्चस् की ओर जाने की प्रेरणा दे जाता है।

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