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हिन्दी प्रेमी हैं, तो आइए बहुभाषी बनें
01-Jan-2019 01:31 PM 1612     

हिंदी इस देश की सम्मिलित आवाज है, यह केवल एक भाषा का नाम नहीं है यह इस देश की प्राणवायु का नाम है। देश की विविध संस्कृतियों को जोड़ने वाले पुल का नाम है। एक भरी पूरी संस्कृति और एक जीवनशैली का नाम है। हमने, खासतौर से हिंदी के कर्ताधर्ता लोगों ने एक भरी पूरी भाषा को जहां एक ओर "साहित्य" तक सीमित कर दिया, वहीं दूसरी ओर इसे भावुकता और अहं का विषय अधिक बनाया, इसे चेतना और व्यावहारिकता से कम जोड़ा। यह इस भाषा की बड़ी त्रासदी है। साहित्य भाषा का एक अंग है, वह इसके अलावे भी और बहुत कुछ है, इस बात को हम भूल जाते हैं।
अक्सर हम भाषा को माध्यम या संपर्क का साधन मान लेते हैं, सवाल यह है कि अगर भाषा सिर्फ माध्यम है तो कार्ल अल्ब्रेस्ट क्यों कहते हैं कि "अपनी भाषा बदलो, तुम्हारे विचार अपने आप बदल जाएंगे।" भाषा के बदलने से हम क्यों बदल जाते हैं या किसी भाषा विशेष के नहीं रहने पर अंधेरा (आचार्य दंडी) क्यों छा जाता है। सच्चाई यह है कि हम उतने ही होते हैं जितनी हमारे पास भाषा होती है। हम दुनिया को उतना ही जानते हैं जितनी हमारी भाषा बताती है। और यह तथ्य है कि अलग-अलग भाषाएं अलग-अलग चीज बताती हैं। "सकल पदारथ हैं जगमाही, कर्महीन नर पावत नाही"। पदार्थ केवल वस्तु नहीं है। पदार्थ भाषा से जुड़ा हुआ शब्द है। पदार्थ यानी पद का अर्थ, (अर्थ शब्द में नहीं होता, वह जब संदर्भ से जुड़ता है तब उसमें अर्थ आता है यानी जिन पैरों से चलकर अर्थ आप तक पहुंचता है वह पद है।) अगर पदार्थ यानी संसाधनों पर नियंत्रण चाहते हैं तो भाषा पर नियंत्रण जरूरी है।
इस बात को फ्रांस, चीन, जापान, जर्मनी, स्पेन और खासतौर से इंग्लैंड के लोगों ने बहुत अच्छी तरह समझा और अपनी भाषा के विकास के लिए कुछ भी उठा नहीं रखा। दूसरी ओर हिन्दी भाषी समाज ने इसे भावना और राष्ट्रीयता से तो जोड़ा पर इसके विकास के लिए व्यावहारिक स्तर पर कुछ खास नहीं किया। परिणाम यह हुआ कि विगत दशकों में हिन्दी ने संपर्क और मनोरंजन की भाषा के रूप में खूब प्रगति की, जनसंख्या की दृष्टि से हिन्दी विश्व की दूसरे नंबर की भाषा (कुछ लोगों, जैसे जयंती प्रसाद नौटियाल के अनुसार पहले नंबर की भाषा) हो गयी पर ज्ञान और व्यापार की भाषा के रूप में इसे देखा जाय तो यह बहुत पीछे है। यह एक कठोर सच्चाई है कि आजादी के बाद भारत के नीति निर्माताओं की प्राथमिकता में देश की भाषाएं और उनमें संचित ज्ञान परंपरा नहीं रही है और तमाम हिंदी दिवसों, पखवाड़ों के शोर के बावजूद हिंदी भी नहीं रही है। इसी कारण, देश का भविष्य तय करने वाले अधिकारियों, शिक्षाविदों, व्यापारियों और विज्ञान तकनीक, प्रौद्योगिकी आदि से जुड़े लोगों की चिंता और चिंतन का विषय हिंदी नहीं रही। हां, यह गरीब, मजबूर और कुछ जिद्दी धुनी किस्म के लोगों की प्राथमिकता में लगातार रही है पर हमें इस कठोर सच्चाई को स्वीकार कर लेना चाहिए कि सबसे ज्यादा प्रधानमंत्री देने वाले हिंदी क्षेत्र के राजनेताओं के लिए और अभिजन तथा सत्ता वर्ग के लिए, जो असल में सब कुछ तय करता है, भाषा कोई मुद्दा नहीं रही है।
हम जानते हैं कि भाषा किसी भी समाज की प्राथमिक आवश्यकता होती है, इसके बिना हमारा काम नहीं चल सकता। भाषाएं एक साथ कई भूमिकाएं निभाती हैं। कुछ के बारे में हम सचेत होते हैं और कुछ अचेतन रूप में हमें नियंत्रित कर रही होती हैं। सभ्यता का इतिहास बताता है कि धरती पर मनुष्यों के विकास, प्रगति और विज्ञान, चिंतन आदि के क्षेत्र में सफलता का भाषाओं से गहरा संबंध रहा है। साथ ही यह भी सच है कि केवल अन्य जीवों पर मनुष्य् की सत्ता और वर्चस्व के निर्धारण में ही नहीं बल्कि खुद मनुष्यों पर कुछ मनुष्यों के वर्चस्व में भी भाषाओं की बड़ी भूमिका रही है। निश्चित रूप से ये सत्ताएं केवल राजनीतिक नहीं रही हैं, इनका धर्म, धन, तकनीक, संख्या आदि से भी गहरा संबंध रहा है। इतना अवश्य है कि जिस भाषा को सत्ता का सहयोग मिला वह केंद्रीय भूमिका में आती चली गई। दुनिया की सारी बड़ी भाषाएं किसी न किसी रूप में सत्ता के सहयोग से विकसित हुईं पर यह भी सच्चाई है कि केवल सत्ता में शामिल हो जाने के कारण ही भाषाएं महत्वपूर्ण नहीं हो जातीं। जनता तक उनका पहुंचना भी जरूरी होता है। सत्ता के साथ सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि वह स्थिरता चाहती है, वह हमेशा अपने आपको बनाए रखना चाहती हैं जबकि भाषा हमेशा गतिमान होती है, वह लोक के साथ-साथ पानी की तरह बहती रहती है। सत्ता पीछे रह जाती है, भाषा आगे निकल जाती है। यही कारण है कि पूरी दुनिया में एक समय की महान भाषाएं आज ग्रंथों में सीमित होकर रह गई हैं। संस्कृत, ग्रीक, लैटिन आदि इसके प्रमाण हैं।
हिन्दी भाषी समाज के साथ एक बड़ी समस्या यह रही है कि वह व्यावहारिकता से कम भावना से अधिक संचालित होता है। मेरी दृष्टि में हिन्दी समाज की इस प्रकृति की सबसे बड़ी कीमत हिन्दी भाषा को चुकाना पड़ा है। इतिहास गवाह है कि हमेशा से ही उस व्यक्ति का महत्व अधिक रहा है जो कई भाषाएं जानता रहा हो। बहुभाषिकता इस दुनिया की सबसे बड़ी नियामत रही है, केवल इसलिए नहीं कि भाषा जानते ही आप महत्वपूर्ण हो जाते हैं, बल्कि इसलिए कि हर भाषा में एक अलग दुनिया होती है और कई भाषाओं को जानने वाला व्यक्ति तुलनात्मक रूप से अधिक अनुभवी, लचीला, समझदार आदि होने की योग्यता रखता है। यह अनायास नहीं है कि लगभग सभी इतिहास निर्माता विद्वान बहुभाषी रहे। प्राचीन विद्वानों से लेकर अमीर खुसरो, तुलसीदास, राजा राममोहन राय, भारतेंदु हरिश्चंद्र, महात्मा गांधी, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, प्रेमचंद आदि अनेक लोगों के उदाहरण लिये जा सकते हैं। राजा राममोहन राय अनेक भाषाओं में पत्र निकालते थे और आधुनिक युग के निर्माता भारतेंदु अल्पायु में ही कई भाषाओं को साध चुके थे और अंग्रेजी, बांग्ला, हिंदी, ब्रज, उर्दू, भोजपुरी आदि पर उनका अधिकार था। ऐसा क्यों हुआ यह अलग से शोध का विषय है परंतु यह तथ्य है कि हिंदी भाषी समाज भाषाओं के मामले में आलसी रहा है। बहुभाषिकता के मामले में हम दुनिया के शायद सबसे पिछड़े लोगों में आते हैं। इसी आलस के कारण हालात यहां तक पहुंच गए कि हम हिंदी भी काम चलाऊ जानते हैं। हिंदी के एमए स्तर के विद्यार्थी भी अ से ज्ञ तक सही-सही नहीं लिख पाते हैं। ड़, ढ़, ऋ आदि की अवस्थिति के सवाल पर बहुतों की सांस फूलने लगती है। हम खुद को मजबूत करना नहीं जानते, अपनी भाषा को सक्षम बनाने के लिए खुद आगे नहीं आते और जब शिक्षा और तकनीक में भाषा के विकास की बात आती है तो हम भाषा के सवाल को व्यावहारिकता से कम भावुकता से अधिक हल करना चाहते हैं। तब हमारे लिए समर्पण और व्यवहार और प्रयोग की तुलना में राष्ट्रीयता, परंपरा, जनसंख्या आदि के सवाल अधिक महत्वपूर्ण होने लगते हैं।
हद तो तब हो जाती है जब भाषाओं के आधार पर हम समाज को विभाजित भी करने लगते हैं, जबकि भाषाओं में दुश्मनी का नहीं सहयोग और साझेदारी का संबंध होता है। दुनिया की सारी भाषाएं एक-दूसरे से सहयोग लेती रही हैं, शब्दों का आदान-प्रदान करती रही हैं। अंग्रेजी संभवत: सबसे ज्यादा कर्ज लेने वाली भाषा है। नजदीक की भाषाओं में स्वाभाविक रूप से यह साझेदारी अधिक दिखती है। अरबी-फारसी भाषियों से संपर्क के कारण हिन्दी में इन भाषाओं के अनेक शब्द आए और जन-जन में व्याप्त इन शब्दों को आज हिन्दी से अलग नहीं किया जा सकता। वैसे भी भाषाएं शब्दों से नहीं संरचना से खास तौर से क्रियाओं से बनती है इसलिए शब्दों पर बहुत ज्यादा बल देना दूर तक साथ नहीं देता। खड़ी बोली का इसकी पड़ोसी बोलियों खास तौर से ब्रज, अवधी, भोजपुरी, राजस्थानी आदि से गहरा अपनापा रहा है और इस साझेदारी से हिन्दी विकसित हुई है। ये उपभाषाएं (बोली शब्द भ्रम पैदा करता है) हिन्दी की रीढ़ रही हैं पर भाषाओं का उपयोग करने वाले लोग भाषाओं की सहृदयता और साझेपन की बजाय कटुता और अलगाव दिखाने पर बल देने लगते हैं।
यह समय की मांग है कि आज हमें कई भाषाओं की जरूरत है, यानी हमें मातृभाषा, संपर्क भाषा, राष्ट्रीय भाषा और अंतरराष्ट्रीय भाषा की जरूरत है और ये सारी भाषाएं एक साथ न केवल सीखी जा सकती हैं बल्कि ये एक-दूसरे को मजबूत भी करेंगी। जाने क्यों हम इनके बीच एक प्रतियोगिता निर्मित करते हैं वह प्रतियोगिता ठोस भूमि पर हो तो उसकी भूमिका होगी। मसलन, अगर स्पेनिश की कोई शानदार किताब अंग्रेजी में अनुदित हो और हम हिन्दी भाषी प्रतियोगिता करते हुए यह कहें कि अंग्रेजी से पहले हम हिन्दी में उस किताब का अनुवाद प्रकाशित करेंगे तो यह एक सुखद स्थिति होगी परंतु होता इसका उल्टा है। मेरा निजी अनुभव रहा है कि उर्दू की कोई अच्छी किताब पहले अंग्रेजी में अनुदित होती है और राष्ट्रीय स्तर की संस्था उस किताब का अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद कराती है जबकि केवल फारसी से देवनागरी में लिप्यंतरण कर कुछ कठिन शब्दों का अर्थ बता देने से वह किताब हिन्दी की हो सकती थी। दुखद यह है कि भाषाओं से हमारी प्रतियोगिताएं वास्तविक कम भावनापरक और आभासी अधिक होती हैं। मसलन हम हिन्दी में तकनीक का न उपयोग करेंगे न उसकी मांग करेंगे, हिन्दी की-बोर्ड की जरूरत हमें नहीं होगी पर अंग्रेजी का विरोध करेंगे। अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों में भेजेंगे, अंग्रेजी फिल्में देखेंगे, अंग्रेजी पेपर खरीदेंगे और अंग्रेजी में उपलब्ध तकनीक को ही सरल मानेंगे। हिंदी और हिंदी को मजबूत करने वाली उसकी स्रोत भाषाओं अवधी, भोजपुरी, राजस्थानी आदि को हिन्दी विरोधी मान लेंगे।
वास्तविकता यह है कि हम जीवन में कई स्तरों पर काम करते हैं, हरेक व्यक्ति की कई अस्मिताएं होती हैं। एक ही व्यक्ति घर में, कार्यालय में, समाज में अलग-अलग भूमिकाएं निभा रहा होता है। जब हम सात आठ प्रकार की भूमिकाएं सरलता से निभा सकते हैं, कुछ ही समय के अंतराल में गांव में, कस्बे में, महानगर में, विदेश में अलग ढंग से रह सकते हैं तो फिर तीन-चार भाषाओं को अलग-अलग जगहों पर क्यों नहीं बरत सकते हैं।
ज्यादातर शिक्षाविद मानते हैं कि बहुभाषिकता से मानसिक विकास होता है। प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए, माध्यमिक शिक्षा राज्य की भाषा में होनी चाहिए और विश्वविद्यालयी शिक्षा राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं में होनी चाहिए। किसी संथाली बच्चे के लिए ये भाषाएं क्रमशः संताली, हिंदी, हिन्दी/अंग्रेजी हो सकती है या भोजपुरी क्षेत्र के बच्चे के लिए यह भोजपुरी, हिंदी, हिन्दी/अंग्रेजी होगी एवं गामित क्षेत्र के गुजराती बच्चे के लिए यह गामित, गुजराती, गुजराती/हिंदी/अंग्रेजी होगी। इन भाषाओं में कोई विरोध नहीं है बल्कि सामान्य समझ और चिंतन करने की क्षमता विकसित होने के बाद प्रत्येक बच्चे को तीन-चार भाषाओं से जोड़ना सार्थक हो सकता है। आधुनिक तकनीक एवं घर-घर मोबाइल होने के कारण भाषा सीखना अब सरल एवं सुलभ हो चुका है। हां, कमी है तो इच्छाशक्ति की और यह कमी अनेक स्तरों पर दिखती है। चूंकि यह व्यक्ति के स्तर पर है इसीलिए प्रशासन में भी दिखती है, खासतौर से हिंदी क्षेत्र में तो बड़े स्तर पर इसके प्रमाण मिलते रहते हैं। परिणामत: लोक भाषाओं की कौन कहे 60-70 करोड़ लोगों की भाषा हिंदी में भी स्तरीय सामग्री का अभाव दिखता है। हिंदी भाषियों को बांग्ला, पंजाबी, मलयालम आदि भाषा-भाषियों से भाषा-प्रेम सीखना चाहिए। अनेक स्तरों पर हिन्दी को मजबूत करने की जरूरत है, उदाहरण के लिए हिंदी में बाल साहित्य के अभाव को देखा जा सकता है। बाल साहित्य के कारण ही कोई बच्चा सबसे पहले भाषा से जुड़ता है। हिन्दी के बड़े साहित्यकार बच्चोंे के लिए लिखना छोटी बात समझते हैं, जबकि बांग्ला के नामी साहित्यकार बच्चों के लिए लिखना न केवल महत्वपूर्ण मानते हैं बल्कि इसे गौरवपूर्ण समझते हैं।
अब समय आ गया है कि हम हिन्दी भाषी भावुकता छोड़कर बहुभाषिकता को अपनाएं एवं भाषा की जड़ों को मजबूत करें।

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